वैश्विक हिंदी परिवार का ‘युवा रचना पाठ’ कार्यक्रम सम्पन्न

दिनाँक 02/08/2026, विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा 02 अगस्त 2026 को एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय युवा रचना पाठ था कार्यक्रम का शुभारंभ सुप्रसिद्ध लेखिका सुश्री स्वरांगी साने के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने सभी विद्वानों एवं अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया तत्पश्चात ओम चतुर्वेदी (विधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अपने मधुर एवं प्रभावशाली संचालन से कार्यक्रम को गति प्रदान की।
कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ.पद्मेश गुप्त (लेखक एवं संरक्षक, वैश्विक हिन्दी परिवार ) ने अपने वक्तव्य में युवा एवं प्रवासी रचनाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि प्रवास में रहकर हिंदी और साहित्य के लिए कार्य करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण दायित्व है। प्रवासी रचनाकारों को साहित्य-सृजन के साथ-साथ अनेक अन्य भूमिकाएँ भी स्वयं निभानी पड़ती हैं, फिर भी वे हिंदी की सेवा और रचनात्मकता को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि युवा रचनाकारों से मिलना और उनकी कविताएँ सुनना उनके लिए आत्मिक आनंद और नई ऊर्जा का स्रोत है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि आज के युवा कवियों की रचनाओं में गंभीरता, संवेदना और आत्मसुख के लिए सृजन की ईमानदार प्रवृत्ति दिखाई देती है। उन्होंने सभी युवा एवं प्रवासी रचनाकारों को बधाई देते हुए कहा कि कविता मनुष्य की संवेदना को जीवित रखने वाली शक्ति है और ऐसे आयोजन हिंदी साहित्य के भविष्य के लिए अत्यंत आश्वस्तकारी हैं। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय ( पूर्व कुलपति बाबासाहेब अंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी एवं लेखिका ) ने अपने संबोधन में कहा कि कविता केवल शब्दों का सुंदर संयोजन नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय की सच्ची अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के हृदय में भावनाएँ जीवित रहेंगी, तब तक कविता भी जीवित रहेगी। उन्होंने युवा एवं प्रवासी रचनाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कविता को प्रेम, आशा और संवेदना का प्रकाश फैलाने वाली सशक्त विधा बताया। संगोष्ठी के संरक्षक एवं वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल शर्मा जोशी ने युवा रचनाकारों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने युवा रचनाकारों को अभिव्यक्ति के अवसर देने और नई रचनात्मक टीम तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके पश्चात उन्होंने अपनी कविताओं ‘सूर्य पुत्र’ और ‘सोचना मना है’ का प्रभावपूर्ण पाठ किया, जिनमें आत्मसम्मान, सामाजिक विसंगतियों, भीड़ की मानसिकता और स्वतंत्र चिंतन जैसे विषय प्रमुख रहे।

काव्य पाठ की श्रृंखला में यूके से जुड़े आशीष मिश्र ने सामाजिक विडंबनाओं और बदलते जीवन-मूल्यों को स्वर देते हुए अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी प्रखर शर्मा ने ‘एक दिन’ और ‘पुरुष गाथा’ के माध्यम से भविष्य, सभ्यता, बाजारवाद तथा पुरुष जीवन के अंतर्द्वंद्व को अभिव्यक्त किया। यूके की कवयित्री तिथि दानी ने ‘लेखक की पत्नी’ के माध्यम से स्त्री के त्याग, पारिवारिक दायित्व और उसके अनकहे जीवन-संघर्ष को संवेदनशीलता से सामने रखा तथा मित्रता पर आधारित ‘दोस्ती के रसायन की कीमियागर’ कविता भी प्रस्तुत की। लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधार्थी रवि यादव ने ‘मातृभाषा’ और ‘गांव के आदिम पुरखे’ कविताओं के माध्यम से भाषा, लोकजीवन, गांव और पर्यावरण से जुड़ी स्मृतियों को अभिव्यक्त किया। लंदन की ऋचा जैन ने ‘विरासत’ तथा मां से जुड़े भावपूर्ण अनुभवों को कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया। गोलेंद्र पटेल ने ग्रामीण जीवन, किसान और उम्मीद को केंद्र में रखते हुए ‘मिट्टी का उत्सव’ एवं ‘उम्मीद की उपज’ जैसी रचनाएँ सुनाईं। उनकी कविताओं में श्रम, संघर्ष और आशा की जीवंत अभिव्यक्ति दिखाई दी। इसी क्रम में यूके की अंतरीपा ठाकुर ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया। अंतरीपा ठाकुर की कविताओं में उम्र, अस्तित्व और आत्मबोध जैसे प्रश्नों को स्वर मिला। कार्यक्रम के अंत में साक्षी शर्मा (विधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी रचनाकारों, अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

रिपोर्ट :— अजय शर्मा

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