दिन विशेष (कथेतर) में प्रगति नॉवमोस की रचना हमारी गुल्लकें : प्रेमचंद के परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टिकोण

प्रेमचंद की कालजयी कहानियों—“पंच परमेश्वर” और “ईदग़ाह” में उद्धृत आदर्श और अनुकरणीय जीवन के अनुसरण में लेखिका ने अपना दृष्टिकोण पाठकों के समक्ष रखा है। वह वैसे ही आदर्श के अधीन मनुष्य को अपना जीवन जीने की प्रेरणा इस आलेख में देना चाहती हैं। – मनोज मोक्षेंद्र

हमारी गुल्लकें : प्रेमचंद के परिप्रेक्ष्य में एक दृष्टिकोण

ज़िन्दगी क्या है–चंद गुल्लकें हैं, जिन्हें हम लमहों, मुलाक़ातों, यादों और अहसासों के सिक्कों से भरते रहते हैं। ये भरती जाती हैं बचपन से लेकर हमारे आखिरी दिनों तक। इन गुल्लकों के कुछ सिक्के तो इतने भारी और दुर्वह्य होते हैं कि उनसे छुटकारा पाने को मन करता है और कुछ ऐसे होते हैं कि जिनकी छनक और स्पर्श की तरफ हरदम मन खिंचता रहता है। ‘ग़र ज़िन्दगी है तो गुल्लकें दोनों ही तरहों के सिक्कों से भरेंगीं।

हमारी ज़िंदगियों में एक और बात बहुत मायने रखती है और वह है क़िस्से-कहानियों की। होश संभालते ही इनके प्रति हमें आकर्षण हो जाता है और बच्चे जब शब्दों और उनके अर्थों को जानते तक भी नहीं, उनको बहलाने के लिए हम अपनी कहानियों के भण्डार को ही टटोलते हैं। वैसे, हमारी ज़िन्दगी की एक गुल्लक इन कहानियों की भी होती है। ये कहानियाँ हमें कितने ही जाने-अनजाने, देखे-अनदेखे, सुने-अनसुने, पढ़े-अनपढ़े अनुभव दे जाती हैं और तैयार करती जाती हैं ज़िन्दगी के सभी रंगों को समेटने तथा चुनौतियों से जूझने के लिए- ये कहानियाँ हमें रुलाती हैं, हँसाती हैं, गिरकर उठना सिखाती हैं और कैसे न गिरें यह भी सिखलाती हैं।

कहानी सम्राट कहें या उपन्सास-सम्राट, प्रेमचंद जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हमारे जीवन को मानव चरित्र के हर भाव, हर पहलू से रू-ब-रू कराया है। उनका पूरा सृजन हम हिंदीभाषियों के लिए अनमोल धरोहर है; पर, बचपन में पढ़ी कुछ कृतियों ने मेरे मानस-पटल पर विशेष छाप छोड़ी है। उनकी कहानी ‘पंच परमेश्वर’ अपने में इंसानी ज़िन्दगी के लगभग सभी जज़्बात संजोए हुए हैं; उसमें अगर ज़नाब जुमराती और अलगू के बीच उस्ताद-शागिर्द के रिश्तों का बयान है तो उसमें जुम्मन शेख और अलगू चौधरी की मिसालिया दोस्ती का ज़िक्र भी है और इस दोस्ती के ज़रिये विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच के सद्भाव को भी दर्शाया गया है। उसमें अगर मनुष्य के ह्रदय को लालच से मलिन होते दिखाया गया है तो बताया गया है कि पंच के उच्च पद पर आसीन होते ही इन्साफ से बड़ा जज़्बा कोई रह ही नहीं जाता है। ख़ाला और जुम्मन शेख के बीच मिल्कियत के हाथ बदलते ही रिश्तों में आने वाले फेर-बदल का बखूबी बखान है। ख़ाला बेचारी जब गाँवभर में अपना दुखड़ा रोती फिरती है तो सहानुभूति की जगह
कैसे लोग उसे हास्य का पात्र बनाते हैं–क्या ऐसा चित्रण हमारे लिए कोई अनजानी बात है? चिंगारी को हवा देने की लोगों की आदत हमेशा से रही है और हमें उसका नमूना ‘पंच परमेश्वर’ में भी दिखता है। इसमें व्यक्तिगत लाभ के लिए पशुओं के साथ अति क्रूर व्यवहार का भी मार्मिक वर्णन है। अपने फायदे के लिए किसी घटना को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने की इंसानी फितरत भी इस कहानी में अछूती नहीं रही है। समझू साहू पहले तो बैल को बेहाल करते हैं जिससे उसकी मौत हो जाती है और फिर अलगू चौधरी को उन्हें उसकी क़ीमत न चुकानी पड़े—इसलिए, वह पंचायत बुलाने के लिए तैयार हो जाते हैं। कहानी यह भी दिखाती है कि कैसे व्यापार या व्यवसाय से जुड़े झगड़ों में घर की गृहस्थियां भी हाथापाई पर उतर आती हैं। यानी, यह कहानी कुछ ऐसी है कि अपनी ज़िन्दगी में होते हुए कितने ही वाक़यों को हम इससे जुड़ा पाते हैं।
यह कहानी आदर्शोन्मुख यथार्थवाद पर आधारित है जो मुंशी प्रेमचंद की बहुतेरी कहानियों का आधार है। जैसाकि मैंने कहा है कि चंद मुलाक़ातें और एहसास ताज़िन्दगी हमें गुदगुदाते रहते हैं और जीने का सबक़ और सबब देते रहते हैं। घटनाएँ तो बहुत हैं जो मुझे बचपन से अबतक एकदम साफ़ याद हैं और जो मुझे
हौसला देती रहती हैं, पर, एक और है ईदगाह के आयोजन का, जिसका कोई तोड़ नहीं। मैं लखनऊ से हूँ, जो हमारी गंगा-यमुना तहज़ीब का उम्दा नमूना है। होली और दिवाली की जितनी रौनक मन में हुआ करती थी, ईद और शब ए-बारात के आने पर उत्साह उससे कम नहीं होता था। ईदगाह और होली-मिलन पर नई पोशाकों में सजे-संवरे लोग जब दोस्ती और भाईचारे की चमक चेहरे पर पहने पहुँचते थे तो मानो वे जगहें ज़न्नत-स्वरुप हो जाती थीं।

आइये! लौटें प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ की तरफ जिसके मुख्य पात्र हैं– हामिद और उसकी बूढ़ी दादी–अमीना। कैसे सुबह से लेकर दोपहर तक ईदगाह के इर्द-गिर्द लोगों के मन में भावों के बवंडर चढ़ते-उतरते हैं, कैसे हर कोई परेशान होने के साथ-साथ खुश भी है, कैसे हर किसी की ख़ुशी का पैमाना और मतलब बिलकुल अलग हैं, कैसे गाँव का हर बाशिंदा अपनी ईद के ज़श्न को अव्वल दर्जे की करना चाहता है, वग़ैरह-वग़ैरह। इस ईदगाह में मैंने सैकड़ों चक्कर लगाए हैं– किसी को कुर्ते में बटन टांकने के लिए धागा दिया है तो शायद किसी से घर पर खीर पकाने के लिए दूध लिया है। हर साल ईद आती है। यहां ज़िक्र रमज़ान के बाद आने वाली ईद से है। मुझे न नए कपड़ों की चमक-दमक याद रहती है, न क़बाबों के ज़ायका, न खीर की मिठास और न ही ईद-मिलन समारोहों से उठने वाली खुशबूओं की। याद आता है–बस, यह जुमला-रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद आज ईद आयी है और हामिद तथा उसकी दादी का प्यार और त्याग। मुझे पूरा यक़ीन है कि यह मेरे अकेले के जज़्बात नहीं हैं। जिस किसी ने भी मुंशी प्रेमचंद को पढ़ा है, उन सभी की ज़िन्दगी के कुछ पल तो उनकी लेखनी के कर्ज़दार हो ही गए होंगे। उनका लेखन इतना विस्तृत और प्रभावकारी है कि चंद शब्दों में उसे बयान कर पाना मुमकिन नहीं है। बस! हर बार, जब कभी भी मन करता है मानवता के पास जाने का, उसे नज़दीक से जानने का, तो मुंशी प्रेमचंद हमेशा वहां खड़े मिल जाते हैं उसे बारीकी से समझाने और बुझाने के लिए। एक सदी पहले वे एक ऐसा साहित्य लिख गए जो तब तो प्रासंगिक था ही, लेकिन वर्तमान के मुद्दों से भी अछूता नहीं है।
वैसे तो साहित्य और कला की अनेक विभूतियाँ देश-विदेश ने हमें दी हैं जो हमारे जीवन को बहुमुखी आयाम देने के साथ-साथ इसे हर्ष, उत्साह, संवेदना, त्याग, प्रगति और अनेक रंगों से परिपूर्ण करती हैं। यही वे रंग हैं जो अदृश्य रूप से हमारी हौसला-आफ़ज़ाई और मार्गदर्शन करते रहते हैं। कभी भी मन में शुबाह पैदा होने पर, कोई खटका उठने पर, पहले का कुछ पढ़ा हुआ, कुछ सुना हुआ मन में उभर आता है और हमारे उन सवालों को समाधान कर जाता है। जीवन की विभिन्नताएं हमें समृद्धशाली और सारगर्भित बनाती हैं, हमारी गुल्लकों के वांछनीय सिक्कों को बढ़ाती हैं और सृजनशीलता को जीवित रखकर हमें सतत् नए क़िस्से-कहानियां देती है। आइये! इस सृजनशीलता को अपने सामर्थ्य के अनुसार जीवित रखकर हम भी कोशिश करें कि लोगों की गुल्लकों में सकारात्मकता से भरे सिक्कों का ही आधिक्य रहे। प्रेमचंद के माध्यम, से यह छोटा-सा लेख उन सभी साहित्यकारों को मेरा विनम्र प्रणाम है, जिनकी कोई बात, इबारत अथवा शब्द आदि घोरतम अँधेरे के क्षणों में जुगनू-से चमकते हुए हमारे मन-मस्तिष्क में उड़कर आ जाते हैं और यह हौसला दे जाते हैं कि किसी भी परिस्थिति से उबरा जा सकता है। ये शब्दों के ऐसे चितेरे हैं जो न केवल अतीत का गौरव-राग गाते हैं, अपितु हमारे भविष्य को हैरतअंगेज़ रंगों में रंग भर जाते हैं। वे पूरी ईमानदारी के साथ वर्तमान में जीते हैं और उसमें जीने का हौसला अपने पाठकों को देते हैं।

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