अँखियाँ लड़ीं ख़ुद से (व्यंग्य) : डॉ. शैलजा सक्सेना
डॉ. शैलजा सक्सेना जी का व्यंग्य ‘अँखियाँ लड़ीं ख़ुद से’ आधुनिक समाज में तेज़ी से बढ़ती आत्ममुग्धता (Narcissism), अहंकार और ‘मैं ही श्रेष्ठ हूँ’ की मानसिकता पर तीखा एवं सटीक कटाक्ष है।
मुझे रचना का अंत सबसे अधिक मारक लगता है। पुराने प्रसिद्ध फ़िल्मी गीत ‘अँखियाँ लड़ीं तुझसे’ को बदलकर ‘अँखियाँ लड़ीं ख़ुद से’ कहना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आज का मनुष्य केवल अपने ही अक्स से प्रेम कर रहा है। लेखिका ने हास्य और कटाक्ष के सहज मिश्रण से यह सिद्ध किया है कि आत्ममुग्धता के इस दौर में सहिष्णुता, आत्म-विश्लेषण और दूसरों के प्रति सम्मान जैसे मूल्य धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। यह व्यंग्य पाठक को हँसाने के साथ-साथ उसे अपने भीतर झाँकने और स्वयं का मूल्यांकन करने के लिए भी विवश करता है। – तितिक्षा शाह

जब भी देखते हैं, हम ख़ुद को देखते हैं, ख़ुद को मानते हैं, ख़ुद से बड़ा कब, किस को मानते हैं। यही सोचते सब चले जा रहे हैं, मगन हैं कि शंहशाहे आलम चले जा रहे हैं।
सबके दिल में एक यही ख्याल। मैं एकदम गिरे-पड़े लोगों की बात नहीं कर रही, पर किसी की भी अगर अपने एक पैर पर भी खड़े होने की हिम्मत है, तो उसके मन में भी यही विचार है। ‘‘तू होगा तो अपने घर का होगा, यहाँ तो हम ही हम हैं।” इतनी विविधता में एकता तो संस्कृति दिवस मनाने वाले समय में नहीं होती, जितनी इस एक विचार में है। इस विचार में एक अलग नशा है, धरती से गगन तक, सब अपनी सेवा में खड़े दिखाई देते हैं। सब कुछ पर जब अपना अधिकार तो सड़क पर ‘पिच्च’ करके थूक भी दें, तो भी क्या? पीछे आने वाले छींटे से बचना चाहकर भी बच न पाए तो यह उसकी गलती, वह कुछ कहे, तो हम गाली-गुफ़्ता पर। यह उसका काम है कि वह देखकर चले। सड़क उसके बाप की थोड़े ही है! आजकल लोग अपना काम ठीक नहीं करते और बेकार ’दूसरों’ पर दोष!
कवि महोदय ’ख’ मंच पर चढ़े बाद में कि उन्हें तालियों की तलब पहले लग आई। मंच पर पहला वाक्य यही बोले, ’तालियाँ बजती रहनी चाहिए’। उनके हिसाब से तालियों और कविताओं का आपस में क्या मेल, कविता कैसी भी हो, दर्शक का धर्म है ताली बजाना, उसे अपना धर्म निबाहना चाहिए। हम अपना धर्म निबाह रहे हैं, जैसी मर्ज़ी हुई, वैसा सुना रहे हैं। यूँ भी कविता से ज़्यादा लोगों को कॉमेडी भाती है, तभी तो कवियों को चुटकुलों की लाइन लगानी पड़ती है। हमने जो सुनाया, वह अमर है! जो लिखा, वह कालजयी! संस्थानों में साहब, बहुत धाँधली चलती है पुरस्कारों की! इसको उठा, उसको बिठाने की, वरना अपने दिल का खून देकर हम लिख रहे हैं, किसी की मजाल जो कह दे कि कोई कमी है। ‘ख’ महोदय का कवि सम्मेलन के बाद का व्याख्यान जारी है, उनके बगल में बैठे ‘ग’ महोदय मन ही मन ऊब रहे हैं, ‘ख’ को कोस रहे हैं, ’चार कविता ढंग की न लिखीं और ख़ुद को तोप समझ रहा है यह ‘ख’! ‘हमें देखो, हमारे तो मंच पर चढ़ने से पहले ही दर्शक हमारा नाम सुनने को बेताब होते हैं, तभी तो आयोजक हमारे घर हर समय फोन खटकाया करते हैं।’ कई अन्य महोदय आँखें बंद करे, अपनी कविता के प्रेम में डूबे थे और ‘ख’ की बेसुरी बातों और ‘ग’ के बिगड़े मुँह को देख, अपने परम आनंद और अपने श्रेष्ठ काव्यत्व रस को बिगाड़ना नहीं चाहते थे।
इधर यह गोष्ठी थी< तो उधर घर पर ‘ख’ की पत्नी ने मौके का लाभ उठा अपनी मित्र मंडली को आमंत्रित कर लिया था। वे अपनी मित्रों पर अपने रेशमी, मुलायम दही बड़ों की धौंस जमाना चाह रही थीं, ‘हमारे मिस्टर तो कहते हैं, खाना तो तुम्हारे हाथ का ही स्वाद लगता है, बड़े-बड़े रेस्टोरेंट के खाने से वह तृप्ति नहीं होती, जो तुम्हारे खाने से होती है’। उनकी मित्र प्रशंसा करने में कंजूसी कर रही हैं, श्रीमती ‘ख’ को भी चारों तरफ़ से ‘वाह! वाह!’ सुनने की इच्छा है; पर यह वाह, वाह की चाह उनकी पूरी होती नहीं दिख रही। वे मन ही मन भुनभुना रही हैं, ‘सब जलती हैं, किसी की तारीफ़ करना आता ही नहीं। सच्चाई कबूलने से क्या उरेज़!” उधर अन्य महिलाएँ मन में सोच रही हैं, ‘इतना भी क्या बढ़िया बना लेती हैं, जो पति महोदय फ़िदा हैं। वे तो कवि हैं, बढ़ाकर कह दिया होगा मन रखने को और ये सच मान बैठीं। इनसे बढ़िया तो हम बनाते हैं।”
श्रीमान ‘प’ सरकारी संस्थान के पुनीत महकमें में काम करते हैं। 10 बजे पधारकर, अपने व्हाट्सएप से निगाह उठाकर वे कुछ ज़रूरी फ़ाइलें छाँटते हैं और एक कोने में दो या तीन फ़ाइल रख लेते हैं। अब पूरा दिन इन्हीं को देखा जायेगा। उनके हिसाब से सबसे ज़्यादा काम वे ही करते हैं, बाकी लोगों को देखें तो सारे दिन में एक या हद से हद दो फ़ाइल देखते हैं और अपने को बड़ा कमीला समझते हैं। ‘प’ साहब परेशान हो जाते हैं उनकी काहिली देखकर। एक तो हर समय यह छोटू चाय ले -लेकर आ जाता है, फिर कोई एक सिगरेट पीने उठेगा तो तीन उसके साथ उठ लेंगे। भैया, देश की नैया इन्हीं लोगों के कारण मँझधार में है। ‘प’ साहब के झुँझलाने को बाकी लोग जानते हैं और यह भी कि सारे दिन में तीन फ़ाइलें कोने में रखे ‘प’ दिन भर मोबाइल पर लगे रहते हैं, बहुत हुआ तो कोई स्क्रीन खोल लिया कम्प्यूटर पर। साहब का बुलावा आया तो दो-चार कागज़ का काम कर लिया वरना दिन भर दूसरों को भारत देश की हालत का ज़िम्मेदार बताकर उपदेश। काम तो अब वे ही लोग करते हैं, काम करने वाले को ही चाय- सिगरेट से अपनी थकान उतारने का अधिकार है, जिसने कुछ किया नहीं, जो थका नहीं, उसे क्योंकर चाय की तलब लगेगी?
सड़क पर दो गाड़ियों का एक्सीडेंट हुआ। काली गाड़ी ने गलत मोड़ ले लिया और सामने से आती कार को ठोंक दिया। दोनों कार वाले गाड़ी से उतरकर अपने नुकसान को ज़्यादा बताते लड़ने पर आमादा। दोनों अपने-अपने काम की जल्दी के समय इस एक्सीडेंट के लिए दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे थे.. ‘तुझे पता है टाइम इज़ मनी’ और तेरी वजह से मैं यहाँ अटक गया।’- सुनकर दूसरे का स्वर ऊपर हुआ, ‘गलत मोड़ ख़ुद लिया और मेरा इतना नुकसान किया। मेरे दस काम इसके चक्कर में अटक गए, और अब मुझे बता रहा है, ‘टाइम इज़ मनी’!” हद हो गई। पहला फ़िल्मी अंदाज़ में गुर्रा रहा था, ‘तुझे पता है मैं कौन हूँ?’ – पास से गाड़ी गुनगुनाती निकल गई, “मुझसे अच्छा इस दुनिया में न होगा कोई और…”- ट्रैफ़िक के इस तमाशे को देखने वालों में नौजवान लड़के ने अपने बालों पर हाथ फिराया, ख़ुद को हीरो से कम न समझता, कॉलेज की लड़कियों के बारे में सोचता चल पड़ा। उधर कुछ हटकर दीवार की ओर मुँह किए खड़ा आदमी भी अपने अधिकारों का प्रयोग करता स्वयं को किसी देशभक्त से कम न समझ रहा था। धीरे-धीरे पुलिस की गाड़ी प्रकट हुई, जिससे अपने को श्रेष्ठ पुलिस कर्मचारी मानने वाले आदमी ने दोनों से अलग-अलग बात की और अपने अधिकारों के प्रयोग से कुछ हिसाब लगाते हुए अपने कर्तव्य को निर्धारित करने की चेष्टा की।
पास ही पनवाड़ी की दुकान पर पान लगाते आदमी ने दबी ज़ुबान में गाली बकी और कहा, “ठुल्ला, आ गया, अब कर लो टाइम इज़ मनी।’’ पान खाते आदमी ने ‘यह जीवन है..’ के दार्शनिक शांत भाव से तुच्छ भीड़ को क्षुद्र बातों पर लड़ते देख, अशांति महसूस की ही थी कि उसके दाँत के नीचे सुपारी का ज़रूरत से ज़्यादा बड़ा टुकड़ा आ गया, जिसने पान का मज़ा ही नहीं खराब किया; बल्कि दाँत हिला देने वाला दर्द भी पैदा कर दिया था। इधर पनवाड़ी दूसरी ओर खड़े नए ग्राहक को विश्वास दिला रहा था, “हमसे अच्छा कोई पान पूरे शहर में लगाकर तो दिखाए, नाम बदल दीजिएगा।”
सड़क के दूसरी ओर टी.वी. शो रूम में टी.वी. पर कोई डिबेट चल रही थी। पार्टियों के प्रवक्ता और एंकर की ऊँची आवाज़ें शो रूम की दीवारों को फ़ाड़कर बाहर निकलने को आमादा थीं। एक – दूसरे की कमियों और अपनी पार्टी की अच्छाइयों की न समाप्त होने वाली सूचियों को बताने की गरज़दार आवाज़ें एंकर को यह हिसाब लगाने का समय दे रही थी कि किस पार्टी की तरफ़ से इस समय बोलने में उसे फ़ायदा होगा और किस को उकसाने से उसकी टी. आर. पी. बढ़ेगी। मन ही मन वह हँस रहा था, “तुम्हारा चिल्लाना भी मेरी चाल का एक हिस्सा, तुम्हें चुप कराना भी मेरी चाल का एक हिस्सा” अब मुझ जैसा समझदार मीडिया में और कौन? मेरे कार्यक्रम की रेटिंग देख लो! उधर प्रवक्ता सोच रहे थे, “मुझसे बढ़िया बोलने वाला कौन? तभी तो पार्टी मुझे हर बार भेजती है, मैं ही तो पार्टी का चेहरा हूँ, इतना सा बोल/ चिल्लाकर मेरा जीवन ठाठ से चल रहा है और हर कोई पहचानता है मुझे सो अलग!” डिबेट मंच पर सब अपनी श्रेष्ठता की मिठास में मुदित मन डूबे चिल्ला रहे थे।
पीछे किसी दुकान के रेडियो से गाना सुनाई दे रहा था, “अँखियाँ लड़ीं तुझसे…” -गाना लिखने वाले ने सोचा होगा कि कितना बढ़िया गाना लिखा है; पर सच कहो, तो यह गलत गाना है! आज किसी को दूसरे से अँखियाँ लड़ाने की फ़ुरसत भी है? यह आत्ममुग्धता का समय है। अपने पर ‘वारी-वारी’ जाने का, अपने ढिंढोरे पीटने का, अपने को श्रेष्ठ कहने का, अपने से आगे किसी को न बढ़ने देने का, अपनी शान और दूसरे की औकात बताने का, अपने झूठ को सच में बदलकर उसे स्वयं भी सच मान लेने का…तो फिर यह गीत हुआ न गलत! लिखना तो यह चाहिए , “अँखियाँ लड़ीं ख़ुद से… !”
