झाँसी में जमा दिल्ली के कवियों का रंग

झाँसी में रविवार, छह सितम्बर को कवि-शायरों की एक ख़ूबसूरत महफ़िल सजाई डॉ. विक्रम अग्रवाल और कथाकार डॉ. निधि अग्रवाल ने, जिसका सरस संचालन दिल्ली के कवि अनिल मीत ने किया ।
दिल्ली एनसीआर से मनोज अबोध, नरेश शांडिल्य, विजय स्वर्णकार, अरविंद असर, माधुरी स्वर्णकार, प्रमोद शर्मा असर और अनिल मीत ने इस काव्य गोष्ठी में भाग लिया । इस अवसर पर झाँसी के प्रमुख कवियों के अलावा बड़ी संख्या में स्थानीय प्रबुद्ध श्रोता भी उपस्थित रहे ।
पेश है कुछ चुनिंदा बानगी:-
मेला ढोने की प्रथा कहां हुई है बंद
नदियों के सर कर दिया हमने अपना गंद ।
जुगनू बोला चांद से उलझ न यूं बेकार
मैंने अपनी रोशनी पाई नहीं उधार ।
——- नरेश शांडिल्य
रेत को जो लोग पानी कह रहे हैं
सब उन्हें ही आत्मज्ञानी कह रहे हैं
लोग ऐसे भी बहुत हैं देश में, जो
मूर्खता को बुद्धिमानी कह रहे हैं
——— मनोज अबोध

भंवर की बांह पकड़ कर हिलोर कर देगा
वो जादूगर है कबूतर को मोर कर देगा
पता है चॉंद सितारों को सूर्य का जलवा
जिधर वो ऑंख उठाएगा भोर कर देगा
———- विजय स्वर्णकार
ये तेरा काम तो है दोस्त रुलाने वाला
मैं तो समझा था तुझे साथ निभाने वाला
नाख़ुदा इतना तकब्बुर तो तेरा ठीक नहीं
एक तू ही तो नहीं पार लगाने वाला।
———-प्रमोद शर्मा असर
बात सच्चाई की करना है अगर
किसलिये कोई बहाना चाहिए
रंग भरना है अगर इस वक़्त में
कुछ नया और कुछ पुराना चाहिए
———-माधुरी स्वर्णकार
कामनाएँ इसमें मेरी पूरी हो पाती नहीं
ये धरा मेरे लिए तो एक कारागार है
क़ायदे क़ानून इसमें आज भी जंगल के है
लोग फिर भी कह रहे हैं ये चुनी सरकार है
—————अरविन्द असर
चुपके चुपके सब कुछ सहना ठीक नहीं
मन ही मन में कुढ़ते रहना ठीक नहीं
दुनिया को समझा तो हमने ये जाना
सीधी सच्ची बातें कहना ठीक नहीं
—————-अनिल ‘मीत’
मेरे होने का पता दे मुझको
ज़िंदगी ख़ुद से मिला दे मुझको
तेरी धरती पे हैं भगवान बहुत
बस तू इंसान बना दे मुझको
———-पन्नालाल असर
एक क़त्ल है हुआ इधर, क़ातिल कोई नहीं।
ख़ंजर है सबके हाथ में, शामिल कोई नहीं।
———डॉ. निधि अग्रवाल
लश्कर भी तुम्हारा है, सरदार तुम्हारा है
तुम झूठ को सच लिख दो, अखबार तुम्हारा है।
———-अर्जुन सिंह चांद
जबसे मैं अपने हक़ का तलबगार हो गया
हर शख़्स मेरी राह की दीवार हो गया
पत्थर जो मुझपे फेंके थे इस पार वक़्त ने
उनसे ही पुल बना के मैं उस पार हो गया
———— पंकज अभिराज
याद है क्या उन पलों की, साथ जो हमने गुजारे। करके स्मृतियाँ विसर्जित,आ गई नेपथ्य द्वारे।।
दर्द अंतर में सहेजे, हूँ चल रही मैं हर घड़ीं
शब्द समिधा होम करके, द्वार पर तेरे खड़ी हूँ। ————डॉ. सुमन मिश्रा
अगर बन जाऊं मैं धरती, गगन बनकर तुम आ जाना,
मुझे छूना क्षितिज पर तुम, नीर बनकर बरस जाना,
जो बन जाऊं रेत गर मैं, लहर बनकर तुम आ जाना,
मुझे भरना तुम बाहों में, बहा कर संग ले जाना।।
———कुन्ती हरिराम
प्रकृति सन्तुलन की राह में पहल करने स्वयं आगे आओ
नयी पीढ़ी के लिए प्रतिवर्ष एक पेड़ अवश्य ही लगाओ
————-निहाल चंद्र शिवहरे
देह की नाव में बैठा मैं कर्म के चप्पू चलाता हुआ मैं कुछ अन्यमनस्क-सा सोचता हुआ मैं यात्रा किसलिए
————-डॉ. ए. के. सांवल
बुरे समय में किसीका साथ न देता कोय ।
नदी किनारा कर गई दुखी किनारा रोय
————साकेत सुमन चतुर्वेदी
जीवन के हर रूप में तुमने जैसे चाहा वह वैसी ढली।
पर चाह जब उसकी जगी,
उन्मुक्त हो वह ऋतुरोहित बनी।
—————रचना तिवारी
उम्र के साथ भूत तो चले गए
पर उनकी जगह ऐसे डर आ गए
जो रोशनी जलने पर भी दूर नहीं जाते
————-मेघा निगम
तारों सा तो सभी चमकते,सूरज सा दमको तो जानें
झूठ-मूठ तो सभी महकते,फूलों सा महको तो जानें
—————डॉ. सविता दुबे
इस अवसर पर दिल्ली की साहित्यिक संस्था वयम् की ओर से डॉ. विक्रम अग्रवाल और डॉ. निधि अग्रवाल का सारस्वत सम्मान भी किया गया । करीब चार घंटे के इस कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल जी द्वारा सभी का आभार व्यक्त किया गया।
