‘वैश्विक हिंदी परिवार’ की संगोष्ठी में उठा भाषा, शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक अस्मिता का व्यापक विमर्श : विजय नगरकर

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मातृभाषा : स्मृति नहीं, भविष्य की शक्ति

भाषा केवल शब्दों का विन्यास नहीं होती। वह मनुष्य की स्मृतियों, संवेदनाओं, संस्कारों, लोकानुभवों और सांस्कृतिक अस्मिता की सबसे जीवंत अभिव्यक्ति होती है। मनुष्य जब अपनी मातृभाषा में बोलता है तो वह केवल संवाद नहीं करता, बल्कि अपनी जड़ों, अपने परिवेश और अपनी सामूहिक स्मृति से संवाद करता है। किंतु वैश्वीकरण, अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव, शहरीकरण, रोजगार की बदलती आवश्यकताओं और डिजिटल संस्कृति के बीच अनेक मातृभाषाएँ और बोलियाँ अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रही हैं।

इन्हीं गंभीर प्रश्नों को केंद्र में रखकर ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ के तत्वावधान में ‘मेरे जीवन में मातृभाषा—स्थिति और चुनौतियाँ’ विषय पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में 70 से अधिक देशों से हिंदी से जुड़े विचारकों, साहित्यकारों और भाषाकर्मियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम ने मातृभाषा को केवल भावनात्मक विषय न मानकर शिक्षा, रोजगार, तकनीक, सृजन, संस्कृति और भविष्य की भाषायी नीति से जोड़कर देखने का अवसर दिया।

भाषा के बहाने स्वयं से संवाद

संगोष्ठी का विषय जितना आत्मीय था, उतना ही व्यापक भी। ‘मेरे जीवन में मातृभाषा’ का ‘मेरे’ से आरंभ होना इस बात का संकेत था कि मातृभाषा का प्रश्न किसी दूर बैठे भाषावैज्ञानिक या नीति-निर्माता का विषय मात्र नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के निजी जीवन का प्रश्न है।

कार्यक्रम का संचालन सुश्री विशाखा अरोड़ा ने किया। उन्होंने अत्यंत सहजता और गरिमा के साथ कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए विभिन्न वक्ताओं का परिचय कराया तथा मातृभाषा के प्रश्न को व्यक्तिगत अनुभव से व्यापक सामाजिक संदर्भ तक ले जाने का वातावरण तैयार किया।

इसके पश्चात सुश्री स्वरांगी साने ने स्वागत एवं प्रास्ताविक उद्बोधन में मातृभाषा के प्रति अपने गहरे लगाव और चिंता को अभिव्यक्त किया। उन्होंने इस बात पर ध्यान आकर्षित किया कि अनेक स्थानीय बोलियाँ और भाषिक रूप धीरे-धीरे हमारे दैनिक जीवन से बाहर होते जा रहे हैं। अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव ने विशेष रूप से नई पीढ़ी के भाषिक व्यवहार को प्रभावित किया है। उनके वक्तव्य में मातृभाषा के प्रति गर्व का आग्रह भी था और उसके भविष्य को लेकर चिंता भी।

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अध्यक्षीय गरिमा और वैचारिक दिशा

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राजेश वर्मा, कुलपति, दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर ने की। संगोष्ठी की विषयवस्तु को देखते हुए अध्यक्षीय भूमिका केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि मातृभाषा के प्रश्न को अकादमिक और सामाजिक विमर्श से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी थी।

कार्यक्रम में डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय, पूर्व कुलपति, बाबासाहेब आंबेडकर विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, का सान्निध्य भी प्राप्त हुआ। उनके साथ देश के विभिन्न भाषायी क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों की उपस्थिति ने संगोष्ठी को वास्तविक अर्थों में बहुभाषिक और व्यापक स्वरूप प्रदान किया।

बीज वक्तव्य : मातृभाषा को संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता

संगोष्ठी का बीज वक्तव्य सुश्री नर्मदा कुमारी, अनुवादक एवं भाषाकर्मी, ने प्रस्तुत किया। उन्होंने मातृभाषा को केवल अतीत की स्मृति या भावनात्मक विरासत मानने के बजाय एक महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया।

उनका विशेष आग्रह युवाओं को मातृभाषा से जुड़े शोध और सृजनात्मक कार्यों में सक्रिय रूप से जोड़ने का था। उन्होंने संकेत किया कि यदि मातृभाषा को केवल घर और पारिवारिक बातचीत तक सीमित कर दिया गया, तो उसके विकास की संभावनाएँ संकुचित हो जाएँगी। मातृभाषा का प्रयोग रोजगार, विज्ञान, तकनीक, मनोरंजन और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्रों में बढ़ाना होगा।

यह विचार संगोष्ठी की मूल चिंता को एक सकारात्मक दिशा देता है—भाषा को बचाने के लिए केवल उसके विलुप्त होने का शोक पर्याप्त नहीं है; उसे आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप सक्षम बनाना होगा।

लोकभाषा से लोकस्मृति तक : डॉ. नवदीप जोशी की चिंता

डॉ. नवदीप जोशी (पंजाब) ने मातृभाषा के सामने खड़ी चुनौतियों को सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखा। उन्होंने अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव तथा लोक साहित्य के लुप्त होने को गंभीर चुनौती बताया।

उनके विचार में भाषा का संकट केवल शब्दों के कम होने का संकट नहीं है। जब लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, मुहावरे और पारंपरिक अभिव्यक्तियाँ जीवन से बाहर होती हैं, तब भाषा के साथ-साथ एक पूरा सांस्कृतिक संसार भी कमजोर होता है।

उन्होंने इस ओर भी संकेत किया कि अपनी मातृभाषा में सोचने और जटिल अवधारणाओं को समझने की प्रक्रिया अधिक सहज हो सकती है। इसलिए प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा की भूमिका को गंभीरता से समझना आवश्यक है।

डॉ. किरण खन्ना : मातृभाषा और नई शिक्षा नीति

डॉ. किरण खन्ना, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर, ने शिक्षा के संदर्भ में मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा अथवा स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा की आवश्यकता पर बल दिया।

उनके विचार का केंद्रीय आधार यह था कि बच्चा अपनी परिचित भाषा में कठिन से कठिन अवधारणाओं को अधिक सहजता से समझ सकता है। शिक्षा का प्रारंभिक चरण यदि बच्चे के घर और सामाजिक परिवेश की भाषा से जुड़ा हो, तो ज्ञान केवल रटने की प्रक्रिया न रहकर समझ और अनुभव की प्रक्रिया बन जाता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण संदेश उभरकर आया—मातृभाषा और अंग्रेजी को परस्पर विरोधी बनाना उचित नहीं है। मातृभाषा बच्चे को अपनी जड़ों से जोड़ती है और अन्य भाषाएँ उसे व्यापक दुनिया से जोड़ सकती हैं।

आँकड़ों की भाषा में संकट : डॉ. विवेक शर्मा का वक्तव्य

डॉ. विवेक शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने मातृभाषाओं के संकट को सांख्यिकीय और तथ्यपरक दृष्टि से प्रस्तुत किया।

उन्होंने बताया कि भाषाओं के विलुप्त होने की प्रक्रिया को केवल भावनात्मक दृष्टि से देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय कारणों को समझना आवश्यक है। जब किसी भाषा का प्रयोग परिवार, शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में घटता है, तो धीरे-धीरे नई पीढ़ी उस भाषा के सक्रिय प्रयोग से दूर होती जाती है।

यहाँ से एक बड़ा प्रश्न सामने आता है—भाषा तभी जीवित रहती है जब उसके बोलने वालों के जीवन में उसका वास्तविक उपयोग बना रहे।

‘आंदोलन नहीं, सृजन चाहिए’ : प्रो. सुधीर प्रताप सिंह

संगोष्ठी के मुख्य वक्ता प्रो. सुधीर प्रताप सिंह, अध्यक्ष, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, ने मातृभाषा संरक्षण के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र प्रस्तुत किया—

“ भाषा को बचाने के लिए केवल आंदोलन नहीं, बल्कि सृजन आवश्यक है।”

उनका विचार संगोष्ठी के सबसे प्रभावशाली निष्कर्षों में रहा। उनका मानना था कि भाषा के संरक्षण का अर्थ केवल उसके पक्ष में नारे लगाना या उसके संकट पर चिंता व्यक्त करना नहीं है। वास्तविक संरक्षण तब होगा जब उस भाषा में निरंतर साहित्य लिखा जाए, विज्ञान की सामग्री तैयार हो, समाजशास्त्र पर काम हो, नए विचार व्यक्त किए जाएँ और आधुनिक ज्ञान का सृजन किया जाए।

अर्थात् भाषा को संग्रहालय की वस्तु नहीं, जीवन और ज्ञान की सक्रिय भाषा बनाना होगा।

उनके विचार का व्यापक अर्थ यह है कि मातृभाषा का भविष्य हमारे लेखन-व्यवहार पर निर्भर है। यदि हम अपनी भाषा में कविता लिखेंगे, कहानी लिखेंगे, शोध करेंगे, विज्ञान समझाएँगे, तकनीकी सामग्री बनाएँगे और डिजिटल संसार में उसका विस्तार करेंगे, तभी वह भाषा नई पीढ़ी के लिए उपयोगी और आकर्षक बनी रहेगी।

कश्मीर की भाषायी विविधता : डॉ. मुदस्सिर अहमद भट्ट

डॉ. मुदस्सिर अहमद भट्ट, सहायक आचार्य, कश्मीर विश्वविद्यालय, श्रीनगर, ने कश्मीर की भाषायी विविधता के संदर्भ में मातृभाषा के भावनात्मक पक्ष को सामने रखा।

उनके वक्तव्य में यह बात विशेष रूप से उभरी कि मातृभाषा का संबंध केवल व्यावहारिक संवाद से नहीं है। भाषा मनुष्य की भावनाओं, स्मृतियों, पारिवारिक अनुभवों और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी होती है।

कश्मीर जैसे बहुभाषिक क्षेत्र का अनुभव यह समझने में मदद करता है कि भारत की भाषायी विविधता को किसी एकरूपता में बदलने के बजाय उसे सम्मान और सह-अस्तित्व के आधार पर देखना आवश्यक है।

विमर्श सत्र : विभिन्न भाषायी अनुभवों का साझा मंच

संगोष्ठी में मुख्य वक्तव्यों के साथ विमर्श सत्र भी आयोजित किया गया। इसमें डॉ. नवदीप जोशी (पंजाब), सुश्री आरुषी ठाकुर (दिल्ली) और सुश्री किरण सिंह (पश्चिम बंगाल) ने अपने विचार रखे।

इस सत्र ने विषय को विभिन्न भौगोलिक और सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया कि मातृभाषा का संकट पूरे भारत में एक जैसा नहीं है। कहीं अंग्रेजी का दबाव प्रमुख है, कहीं रोजगार का प्रश्न, कहीं स्थानीय बोली के प्रति हीनभावना और कहीं परिवार के भीतर मातृभाषा का प्रयोग कम होना प्रमुख कारण बन रहा है।

मातृभाषा के क्षरण के पीछे कौन-से कारण?

पूरी संगोष्ठी के विमर्श को समेटें तो मातृभाषाओं के सामने निम्नलिखित प्रमुख चुनौतियाँ उभरती हैं—

  1. अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व

शिक्षा, रोजगार और प्रशासनिक-व्यावसायिक जीवन में अंग्रेजी को मिलने वाली प्राथमिकता मातृभाषाओं को पीछे धकेल रही है। विशेषकर जब माता-पिता रोजगार और भविष्य की सुरक्षा को अंग्रेजी से जोड़कर देखते हैं, तो बच्चों का मातृभाषा से संपर्क कम हो सकता है।

  1. रोजगार से संबंध का अभाव

यदि किसी भाषा को सीखने के बाद रोजगार और व्यावसायिक अवसर दिखाई नहीं देते, तो नई पीढ़ी स्वाभाविक रूप से उससे दूरी बनाने लगती है।

इसलिए मातृभाषा संरक्षण की रणनीति में एक प्रश्न केंद्रीय होना चाहिए—क्या मातृभाषा आधुनिक रोजगार और ज्ञान की भाषा बन सकती है?

संगोष्ठी का उत्तर स्पष्ट रूप से सकारात्मक था।

  1. हीन भावना

कई युवा अपनी मातृभाषा अथवा स्थानीय बोली बोलने में संकोच महसूस करते हैं। यदि किसी भाषा को ‘गाँव की’, ‘पिछड़ी’ या ‘कम उपयोगी’ समझा जाने लगे तो उसका सामाजिक आधार कमजोर होने लगता है।

  1. शहरीकरण और औद्योगीकरण

शहरी जीवन ने पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं और लोक-संस्कृति को तेजी से बदला है। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय शब्दावली, कहावतें, लोकगीत और जीवन-शैली से जुड़े भाषायी रूप भी धीरे-धीरे कम हो रहे हैं।

  1. पर्यावरण और जीवनशैली में परिवर्तन

संगोष्ठी में सामने आया एक अत्यंत रोचक पहलू यह था कि भाषा का पर्यावरण से भी गहरा संबंध है। जब किसी क्षेत्र की पारंपरिक जीवनशैली और प्राकृतिक परिवेश बदलता है, तो उस प्रकृति, मौसम, कृषि और स्थानीय जीवन से जुड़े अनेक विशिष्ट शब्द भी धीरे-धीरे अप्रचलित हो जाते हैं।

  1. डिजिटल युग की चुनौती

डिजिटल दुनिया में यदि मातृभाषा की पर्याप्त सामग्री, तकनीकी संसाधन, ऐप, शब्दकोश, शैक्षिक सामग्री और मनोरंजक सामग्री उपलब्ध नहीं होगी, तो युवा डिजिटल संसार में दूसरी भाषाओं की ओर अधिक आकर्षित होंगे।

घर से शुरू हो भाषा-संरक्षण

संगोष्ठी का एक अत्यंत व्यावहारिक सुझाव था—मातृभाषा संरक्षण की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए।

अभिभावकों से आग्रह किया गया कि वे बच्चों के साथ घर में मातृभाषा में बातचीत करें। भाषा सीखने के लिए हमेशा औपचारिक कक्षा की आवश्यकता नहीं होती। घर की बातचीत, दादा-दादी की कहानियाँ, लोकगीत, पारिवारिक संबोधन, कहावतें और स्थानीय शब्दावली भाषा के स्वाभाविक विद्यालय हैं।

यदि घर में माता-पिता स्वयं बच्चों से केवल दूसरी भाषा में संवाद करेंगे, तो मातृभाषा की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली कड़ी टूट सकती है।

इसलिए एक सरल सूत्र उभरता है—

“भाषा की पहली पाठशाला परिवार है।”

मातृभाषा में शिक्षा : क्या अन्य भाषाओं के रास्ते बंद हो जाएँगे?

संगोष्ठी में इस आशंका को भी स्पष्ट रूप से संबोधित किया गया कि मातृभाषा में शिक्षा कहीं बच्चों को अंग्रेजी या अन्य भाषाओं से दूर न कर दे।

वक्ताओं के विचार में यह धारणा उचित नहीं है। मजबूत मातृभाषा आधार बच्चे की संज्ञानात्मक क्षमता, आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति को मजबूत कर सकता है। अपनी भाषा में अवधारणा समझ लेने के बाद दूसरी भाषा में उसे ग्रहण करना अधिक सहज हो सकता है।

इसलिए मातृभाषा बनाम अंग्रेजी का विवाद खड़ा करने के बजाय मातृभाषा + हिंदी + अन्य भारतीय भाषाएँ + वैश्विक भाषाएँ जैसी बहुभाषिक दृष्टि अधिक उपयोगी हो सकती है।

यही दृष्टिकोण नई शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा/स्थानीय भाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा की चर्चा से भी जुड़ता है।

मातृभाषा को रोजगार और तकनीक से जोड़ना होगा

संगोष्ठी ने एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक प्रश्न उठाया—यदि मातृभाषा केवल भावनाओं और स्मृतियों तक सीमित रहेगी तो नई पीढ़ी उसे कितने समय तक अपनाए रखेगी?

इसलिए आवश्यकता है कि मातृभाषाओं में—

विज्ञान और तकनीक की सामग्री तैयार हो,

डिजिटल पाठ्यक्रम विकसित हों,

ई-पुस्तकें और ऑडियोबुक उपलब्ध हों,

मोबाइल ऐप और डिजिटल शब्दकोश बनाए जाएँ,

अनुवाद के नए अवसर पैदा हों,

पत्रकारिता और मीडिया में प्रयोग बढ़े,

कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा भाषा-प्रौद्योगिकी में उनका समावेश हो,

और मातृभाषा आधारित रोजगार के नए क्षेत्र विकसित किए जाएँ।

मातृभाषा को यदि भविष्य की तकनीक से जोड़ दिया जाए तो वह अतीत की भाषा नहीं, भविष्य की भाषा बन सकती है।

‘विस्तारित मातृभाषा’ की अवधारणा

कार्यक्रम के समाहार उद्बोधन में नारायण कुमार ने भाषायी विविधता के प्रति एक उदार और समावेशी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी प्रांतीय भाषाओं को ‘Extended Mother Tongue’ अर्थात् ‘विस्तारित मातृभाषा’ के रूप में स्वीकार करने का विचार रखा और भाषाओं के प्रति किसी भी प्रकार के दुराग्रह को त्यागने की आवश्यकता बताई।

यह विचार भारतीय भाषायी परिदृश्य में विशेष महत्व रखता है। भारत में व्यक्ति की भाषायी पहचान अक्सर एकल नहीं होती। घर की भाषा अलग हो सकती है, क्षेत्रीय भाषा अलग, संपर्क भाषा अलग और शिक्षा अथवा रोजगार की भाषा अलग। इसलिए भाषाओं को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी मानने के बजाय परस्पर पूरक मानना अधिक स्वाभाविक भारतीय दृष्टिकोण हो सकता है।

समाहार : चिंता से संकल्प की ओर

लगभग डेढ़ घंटे से अधिक चले इस विचार-विमर्श का समापन नारायण कुमार जी के समाहार उद्बोधन से हुआ। उन्होंने पूरे विमर्श से निकले प्रमुख बिंदुओं को समेटते हुए मातृभाषा के प्रति सम्मान, भारतीय भाषाओं के बीच सह-अस्तित्व तथा भाषायी दुराग्रह से ऊपर उठने की आवश्यकता पर बल दिया।

संगोष्ठी का समग्र संदेश यह रहा कि मातृभाषा की रक्षा केवल सरकार, विश्वविद्यालय या साहित्यकार का दायित्व नहीं है। यह परिवार, समाज, शिक्षण संस्थानों, लेखकों, तकनीकविदों, मीडिया और स्वयं भाषा-समुदाय की साझा जिम्मेदारी है।

आभार : सहयोग की पूरी श्रृंखला को नमन

कार्यक्रम के अंत में सुश्री स्वरांगी साने ने सभी वक्ताओं, अध्यक्ष, सान्निध्य प्रदान करने वाले विद्वानों, आयोजकों, तकनीकी सहयोगियों और देश-विदेश से जुड़े श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। प्रखर शर्मा ने भी धन्यवाद ज्ञापन के माध्यम से कार्यक्रम को सफल बनाने वाले सभी सहयोगियों का अभिनंदन किया।

संगोष्ठी के आयोजन में ऋषि कुमार शर्मा, विनयशील चतुर्वेदी, डॉ. शिवम शर्मा, डॉ. जयशंकर यादव और डॉ. सुरेश मिश्र सहित पूरी आयोजन-टीम का योगदान रहा। कार्यक्रम के संयोजन एवं समन्वय में स्वरांगी साने, डॉ. अनीता वर्मा, डॉ. संध्या तिवारी तथा अंतरराष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सहयोगियों की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। तकनीकी सहयोग में डॉ. मनीष कुमार, डॉ. शैलेश सोलंकी, डॉ. राजेश्वर मिश्र, राजेश उपाध्याय तथा कृष्ण कुमार आदि का योगदान रहा। सहयोगी दल में डॉ. विजय नगरकर, डॉ. वैकुंठराव तथा श्रीमती नर्मदा कुमारी का भी उल्लेख किया गया।

कार्यक्रम की व्यापक वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने में वैश्विक हिंदी परिवार के संरक्षक एवं मार्गदर्शक मंडल का योगदान रहा, जिसमें पोस्टर के अनुसार नारायण कुमार, डॉ. रा. जगन्नाथ, प्रो. सीमा शर्मा, डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय, डॉ. राजेश कुमार वर्मा आदि का मार्गदर्शन शामिल था।

संगोष्ठी का सार : मातृभाषा बचाने के सात सूत्र

पूरे विमर्श को यदि सात सूत्रों में समेटा जाए तो वे इस प्रकार हैं—

  1. परिवार में मातृभाषा बोलें।
  2. प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को स्थान दें।
  3. मातृभाषा में निरंतर सृजन करें।
  4. भाषा को विज्ञान और तकनीक से जोड़ें।
  5. मातृभाषा को रोजगार और आर्थिक अवसरों से जोड़ें।
  6. स्थानीय बोलियों और लोक साहित्य का दस्तावेजीकरण करें।
  7. सभी भारतीय भाषाओं को प्रतिस्पर्धी नहीं, परस्पर पूरक मानें।

निष्कर्ष : भाषा बचेगी तो स्मृति बचेगी, स्मृति बचेगी तो समाज बचेगा

‘मेरे जीवन में मातृभाषा—स्थिति और चुनौतियाँ’ संगोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही रहा कि मातृभाषा को बचाने का अर्थ केवल एक भाषा को बचाना नहीं है; यह मनुष्य की स्मृति, संस्कृति, लोकज्ञान और पहचान को बचाने का प्रयास है।

लेकिन भाषा को बचाने का सबसे प्रभावी रास्ता अतीत की ओर लौटना नहीं, बल्कि भविष्य की ओर भाषा को साथ लेकर चलना है।

जब माँ बच्चे से अपनी भाषा में बात करेगी,
जब विद्यालय में बच्चा उसी भाषा में ज्ञान को समझेगा,
जब लेखक उसी भाषा में नए साहित्य की रचना करेगा,
जब वैज्ञानिक उसी भाषा में ज्ञान समझाएगा,
जब तकनीक उस भाषा को अपना लेगी,
जब रोजगार उस भाषा में उपलब्ध होंगे
और जब युवा उस भाषा को बोलने में गर्व अनुभव करेगा—

तभी मातृभाषा वास्तव में जीवित रहेगी।

भाषा को बचाने का प्रश्न अंततः भाषा का प्रश्न नहीं, हमारे अपने अस्तित्व का प्रश्न है। और शायद इसीलिए संगोष्ठी का सबसे सार्थक संदेश आंदोलन से अधिक सृजन, विरोध से अधिक प्रयोग, और भावुकता से अधिक व्यावहारिकता की ओर संकेत करता है।

मातृभाषा को स्मृति की अलमारी में सुरक्षित रखने की नहीं, जीवन के खुले आकाश में उड़ाने की आवश्यकता है।

यही ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ की इस सार्थक संगोष्ठी की सबसे बड़ी उपलब्धि और भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश कहा जा सकता है।

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