दिन विशेष युवा लेखन में वैभव भारतीय की कविताएँ

वैभव भारतीय उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में 21 नवम्बर 1997 को पैदा हुए। पिता डॉ. अर्जुन सिंह, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ पर डॉक्टरेट हैं तो बालपन से ही घर में रचनात्मक और काव्यात्मक माहौल था। सरलहृदया माँ और रचनात्मक पिता का गहरा प्रभाव इनके चित्त पर पड़ा। गणित और भौतिकी में गहरी रुचि थी और बचपन से भारतीय वायु सेना में लड़ाकू विमान पर बैठ कर बादलों को विच्छिन्न करने के स्वप्न देखा करते थे लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था। किशोरावस्था में इनकी रुचि दर्शन, साहित्य, मनोविज्ञान, राजनीति और उपनिषदों में हो गई। तुलसीदास, दिनकर और पन्त के साहित्य ने इनके मानसरोवर के ठहरे जल में कंकड़ी फेंकी और मानविकी का ककहरा सीखने के लिए प्रेरित किया। विज्ञान की औपचारिक पढ़ाई छोड़कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) वाराणसी में हिन्दी साहित्य (हॉनर्स), दर्शन, संस्कृत, अंग्रेज़ी, जापानी भाषा और संस्कृति की पढ़ाई की। बहते जोगी की तरह इनको भी बहुत समय तक एक स्थान पर टिकना रास नहीं आता इसलिए परास्नातक के लिए ये दिल्ली चले गए। वहाँ पर हिन्दी साहित्य में हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय से परास्नातक किया। हिमालय बचपन से इनको आकर्षित करता था. इसलिए कोविड-19 के समय में अपने बचपन की पुकार को आवाज़ देते हुए ये शिमला. हिमाचल प्रदेश में रहने आ गए। वर्तमान में ये अंग्रेज़ी साहित्य और मनोविज्ञान में भी परास्नातक हैं और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पूर्वोत्तर भारत पर डॉक्टरेट कर रहे हैं और साथ में विभिन्न आयामों में रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। – प्रखर शर्मा

Vaibhav bharti

गमले में देवदार

कितना भी मैं मशरूफ़ रहूँ
कितना भी कर लूँ ढोंग प्रिये!
सच ये है कि हर-क्षण हर-पल
स्मृति की कारा जटिल हुई।

सारे प्रयास हैं व्यर्थ हुए
सब मारक नुस्ख़े खर्च हुए
यादों का क्या है. बाग़ी हैं
हर रोज़ बग़ावत करती हैं
मैं रोज़ काटता जंज़ीरें
ये रोज़ पहन कर बैठी हैं।

ये ज़िद्दी हैं मग़रूर भी हैं
ये साँस निगलकर जीती हैं
काली अँधियारी रातों में
अस्तित्व घोंटकर पीती हैं।

इनकी गणना के नियम अलग
ये क़ैदी हैं. आज़ाद भी हैं
ये मार कुंडली बैठी हैं
लाँघे अनन्त आकाश भी हैं।

सच ये है कि कितना भी चाहूँ
आग नहीं बुझ पाती है
यादों का पानी पिया बहुत
पर प्यास नहीं बुझ पाती है
सच ये है कि कुछ काम असम्भव
सम्भव नहीं हुआ करते
सच है जंगल के देवदार
गमलों में नहीं उगा करते।

जंगल का नायक

किसने देखा रात का सूरज
किसे पड़ी है मन पढ़ने की
कौन वहाँ करता है शिरकत
जहां ज़रूरत है भिड़ने की ?

सबने क़िस्सा वही सुनाया
ख़ुद जिसमें नायक बन पाया
सब बदमाशी के क़िस्से हैं
जो शिकारियों ने लिक्खे हैं
ये शिकार की छद्म कहानी
होती रेत है लगता पानी।

जब तक सिंह नहीं सीखेगा
क़िस्सागोई इस जंगल की
जब तक सिंह नहीं लिक्खेगा
असल कहानी दावानल की
जंगल के हर इक क़िस्से में
नायक एक शिकारी होगा।

जीवन

जीवन क्या है ?
प्रश्न विकट है
ये मृत्यु के परम निकट है।

कोई मदमाता सा पक्षी
अंधड़-तूफ़ानों में घिरकर
पत्थर जैसी बारिश सहकर
भूखा रहकर. प्यासा रहकर
चक्रवात से चोंच लड़ाए
प्रलय-काल को धता बताए
तब यह शब्द अर्थ लेता है
जीवन परिभाषित होता है।

कोई नौसिखिया बचपन में
मठाधीश पंडों के आगे
प्रेम. दया. मानवता ख़ातिर
दुनिया के सारे तर्कों को
दुनिया की सारी गणना को
पल भर में बकवास बताए
तब यह शब्द अर्थ लाता है
जीवन फिर जीवन पाता है।

रंगमंच

नए पात्र आते जाएँगे
नाटक वही पुराने होंगे
फिर से रावण दम्भ भरेंगे
फिर दस-सिर काटे जाएँगे।

सब रंगमंच के सूत्रधार
सब स्वगत और सब स्वस्ति गान
जब सस्वर होकर गाएंगे
षटराग वही दोहराएंगे।

इस सृष्टि में कुछ नया नहीं
सब नितनवीन चिरपरिचित है
हैं मनोभाव सब आदिम से
शुरुआत अन्त में गर्भित है।

दुनियादारी

बे-बात रंजिशों के क़िले ना बनाया कर.
खेल ग़र भाई से है तो हार जाया कर।

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए.
कलेजा है जो छोटा तो ज़ुबाँ ना लड़ाया कर।

पिता का बोझ समझ आता है बस पिता बनके.
कंधा ना बन सके तो उनकी मार खाया कर।

सुना है कि माँ के चरणों में ही जन्नत है.
जब भी समय मिले तू उनमें लेट जाया कर।

मोहब्बत की तो तासीर ही बग़ावती है.
खूँरेज़ ना हो दिल अगर तो ना लगाया कर।

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