दिन विशेष व्यंग्य : “काला टेलीफोन” – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

Suresh kumar mishra

कस्बे के सबसे पुराने कोतवाली थाने के मुंशी कक्ष की लकड़ी वाली टूटी मेज पर भारी लोहे और काले बकेलाइट वाला एक पुराना टेलीफोन पिछले पंद्रह सालों से धूल फांक रहा था। उसका गोल डायल पीतल के नंबरों से सजा था पर उसका मोटा तार दीवार के बोर्ड से उखड़ा पड़ा था। उस पुराने टेलीफोन के ठीक सामने लकड़ी के खुरदरे बेंच के कोने पर भोर होते ही भोलानाथ काका अपनी पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का झोला कंधे पर लटकाए और आँखों पर गोल पीतल की कमानी वाला चश्मा चढ़ाए भोलानाथ काका दिन भर उस कटे हुए तार वाले काले टेलीफोन को एकटक निहारते रहते थे। थाने में सुबह से ही नए मुकदमों की लिखापढ़ी होती, सिपाही डंडा फटकारते हुए गश्त पर निकलते और फरियादियों की कतारें लगतीं पर काका को दुनिया के किसी झगड़े या हंगामे से कोई मतलब नहीं रहता था। जब भी कोई नया सिपाही अपनी बंदूक संभालते हुए उधर से गुजरता तो वह इस बुजुर्ग को उस बंद फोन के रिसीवर को सहलाते देखकर अचरज में पड़ जाता था। थाने का पुराना चपरासी रामसेवक जब भी साहब की मेज पर चाय की ट्रे लेकर जाता तो काका बहुत ही धीमी आवाज में उससे पूछते “क्यों रे रामसेवक आज इस काले फोन की घंटी बजी क्या, साहब के पास उस बड़े दफ्तर से मेरी अर्जी का कोई जवाब आया क्या?” रामसेवक बस अपनी नजरें झुका लेता और एक लंबी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

थाने में हाल ही में शहर के बड़े जोन से स्थानांतरित होकर आए नए थाना प्रभारी सुधीर सिंह बहुत ही कड़क, रौबदार और आधुनिक तकनीकी के पक्के सिपाही माने जाते थे। सुधीर साहब जब भी अपनी चमचमाती जीप से उतरकर थाने के परिसर में कदम रखते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी बेंच पर बैठे भोलानाथ काका पर जाकर अटक जाती थी जिनकी कांपती उँगलियाँ हमेशा उस फोन के गोल डायल के छेदों में फंसी रहती थीं। सुधीर साहब को जनता दरबार और थाने के सौंदर्यीकरण के इस नए माहौल में किसी बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक कटे हुए फोन को पूजना पुलिस की छवि के खिलाफ लगता था। जब दोपहर के समय जनसुनवाई का समय समाप्त हुआ और थाने के बाकी दरोगा केस डायरी समेटने लगे तो सुधीर साहब अपनी रिवाल्वर का बेल्ट ठीक करते हुए सीधे भोलानाथ काका के पास पहुँच गए। सुधीर साहब ने अपनी भारी आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “बाबा तुम रोज यहाँ आकर थाने का रास्ता क्यों रोकते हो, अगर तुम्हारी कोई जमीन का विवाद, चोरी या मारपीट की रपट है तो लिखित में दो, इस तरह थाने में बैठकर एक मरे हुए टेलीफोन को घूरने से तुम्हारी कोई सुनवाई नहीं होने वाली है।” भोलानाथ काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “थानेदार बाबू मैं यहाँ किसी रपट या झगड़े की शिकायत लेकर नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस बंद फोन के तार में वह खोई हुई आवाज वापस लौटेगी जो किसी जमाने में इसी थाने की चौखट पर मुझसे छीन ली गई थी।”

सुधीर साहब को काका का यह जवाब किसी अटपटी पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “बाबा आप किस खोई हुई आवाज की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर थाने में वायरलेस और हाईटेक कंप्यूटर लगा चुकी है, फिर आपकी इस पुरानी कबाड़ मशीन का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध हेड कांस्टेबल पंडित कृपाशंकर जी जो पिछले तीस सालों से उस थाने की हर ईंट से वाकिफ थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “थानेदार साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब पंद्रह साल पहले इस थाने की पुरानी हवालात को तोड़ा जा रहा था तब काका के इकलौते बेटे सूरज ने इसी थाने में खड़े होकर न्याय की एक बहुत बड़ी मशाल जलाई थी।” सुधीर साहब ने उत्सुक होकर पूछा “सूरज ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस टूटे फोन से जुड़ा हुआ है?” पंडित कृपाशंकर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब सूरज उस समय कस्बे की घुमंतू और विमुक्त बस्तियों के बेकसूर युवकों का सबसे बड़ा पैरोकार था, जब भी पुलिस किसी निर्दोष मजदूर को शक के आधार पर पकड़कर लाती तो सूरज आधी रात को इसी टेलीफोन से बड़े मानवाधिकार आयोग को फोन मिलाकर उनकी रिहाई करवाता था, उसने कसम खाई थी कि जब तक इस थाने से आखिरी गरीब का डर खत्म नहीं होगा तब तक वह पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ अपनी आवाज बंद नहीं करेगा।”

भोलानाथ काका ने कृपाशंकर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस टेलीफोन के भारी रिसीवर को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे सूरज ने उस दिन इस मुंशी कक्ष में खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह टेलीफोन केवल लोहे और प्लास्टिक का डिब्बा नहीं बल्कि इस पूरे इलाके के मजलूमों की चीख को दिल्ली तक पहुँचाने वाली नब्ज है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह राजधानी से राज्य मानवाधिकार आयोग का सबसे बड़ा मुक्ति आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद इसी फोन की घंटी बजाकर मुझे अपने हाथों से न्याय का परवाना सौंपेगा।” सुधीर साहब ने बहुत ही भावुक होकर पूछा “तो क्या पंद्रह सालों में सूरज वह आदेश लेकर वापस नहीं लौटा, क्या वह शहर जाकर किसी बड़े पद के लालच में अपने इस बूढ़े बाप और इस छोटे से थाने के संघर्ष को हमेशा के लिए भूल गया?” काका की आँखों में आँसू छलक आए और उन्होंने कहा “नहीं साहब मेरा सूरज बहुत सच्चा लड़का था, उसने मुझे अपने आखिरी पत्र में लिखा था कि बापू तुम इस फोन पर नजर रखना, जिस दिन इस देश में मुक्ति दिवस की असली सुबह होगी उस दिन मैं अपनी सबसे बड़ी कामयाबी लेकर तुम्हारी आँखों के सामने आऊँगा।” सुधीर साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने ठान लिया कि वे खुद मालखाने और गोपनीय रिकॉर्ड रूम में जाकर उस पंद्रह साल पुरानी केस डायरी और सूरज की असलियत का पता लगाएंगे।

सुधीर साहब तुरंत थाने के पिछले हिस्से में बने सीलन भरे रिकॉर्ड रूम में पहुँचे और उन्होंने मुंशी को उस पंद्रह साल पुराने मानवाधिकार आंदोलन और सूरज के मुकदमों की फाइल खोजने का हुक्म दिया। लगभग दो घंटे की कड़ी मशक्कत और दीमक लगी पेटियों को खंगालने के बाद आखिरकार वह लाल फीते में बंधी पुरानी फाइल मिल गई। जैसे ही सुधीर साहब ने उस फाइल के आखिरी पन्नों को खोला और उसमें लगे सरकारी दस्तावेजों, गुप्त सीआईडी रिपोर्टों और अंतिम जांच आदेशों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई और उनके हाथ बुरी तरह थरथराने लगे। उस फाइल में एक बहुत ही चौंकाने वाला कानूनी दस्तावेज लगा था जिसमें लिखा था कि पंद्रह साल पहले जब सूरज ने मानवाधिकार आयोग में पुलिस के फर्जी मामलों की पोल खोली थी तो पुलिस महकमे के बड़े अफसरों और नेताओं में हड़कंप मच गया था। सूरज को दबाने के लिए उस पर झूठे आरोप लगाने की कोशिश की गई पर जब वह नहीं झुका तो तत्कालीन बड़े अफसरों ने उसे सीधे राज्य मानवाधिकार संरक्षण विंग में राजपत्रित अधिकारी का सबसे बड़ा पद और सरकारी बंगला देकर इस मामले को हमेशा के लिए रफा-दफा कर दिया था। सुधीर साहब ने जब उस फाइल के सबसे अंतिम पन्ने पर आज के इस विमुक्त जाति मुक्ति दिवस समारोह के मुख्य संरक्षक और राज्य मानवाधिकार आयोग के वर्तमान महानिदेशक का नाम और हस्ताक्षर देखे तो उनका पूरा शरीर पसीने से भीग गया क्योंकि वह नाम किसी और का नहीं बल्कि उसी सूरज का था।

सुधीर साहब कांपते कदमों से दौड़ते हुए बाहर बरामदे में आए जहाँ भोलानाथ काका अपनी लाठी के सहारे उस काले टेलीफोन से अपना माथा टिकाए खड़े थे। सुधीर साहब ने बहुत ही रुँधे गले से काका के कांपते हाथों को पकड़ा और बिलखते हुए बोले “काका आप जिस सूरज के लौटने और गरीबों को न्याय दिलाने की राह देख रहे हैं, वह तो पंद्रह साल पहले ही उसी भ्रष्ट व्यवस्था का सबसे बड़ा हाकिम बन चुका है और आज उसी के दस्तखत से यह पूरा मुक्ति दिवस मनाया जा रहा है, फिर आप पंद्रह सालों से इस कटे हुए तार वाले फोन के आगे बैठकर किसका मातम मना रहे हैं?” काका ने अपनी धुंधली आँखों से थानेदार साहब को देखा और उनके चेहरे पर एक ऐसी दिल दहला देने वाली कड़वी मुस्कान तैर गई जिसने पूरे पुलिसिया तंत्र और समाज के झूठे दावों की धज्जियाँ उड़ा दीं। काका ने अपनी जेब से एक पुराना मुड़ा हुआ सरकारी नोटिस निकाला और रोते हुए बोले “थानेदार बाबू मुझे सब पता था कि वह सौदा हो चुका है और मेरा बेटा बहुत बड़ा हुक्मरान बन चुका है।” सुधीर साहब ने स्तब्ध होकर पूछा “तो फिर काका आप रोज यहाँ इस फोन के पास क्यों आते हैं?” काका ने बिलखते हुए भरे गले से कहा “बेटा मैं पंद्रह सालों से यहाँ किसी बड़े अफसर बेटे का इंतजार नहीं कर रहा बल्कि रोज यहाँ आकर यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर कमजोरों की मुक्ति और न्याय का ढोंग करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप के आंसुओं को सत्ता की मलाई के लिए बेच देते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई अंतरात्मा के सन्नाटे का अहसास होता है या नहीं।” सुधीर साहब सुन्न होकर उस काले टेलीफोन को ताकते रह गए और पूरा थाना उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

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