द्विवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संपन्न

स्वत्वबोध ही भारतीयता की मूल प्रतिज्ञा है। भारतीय साहित्य का उत्तमांश जीवन-मूल्यों की सर्जना है। समावेशिता, सह-अस्तित्व, स्वीकार्यता और परदुःखकातरता ही भारतबोध का वैशिष्ट्य है; यही हमारे राष्ट्रीय चरित्र का द्योतक है। यह बात महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रति-कुलपति एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र ने कही। वे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। ‘आधुनिक हिंदी साहित्य और भारतीयता’ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में भारतीयता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने हिंदी साहित्य में भारतीय चेतना और भारतबोध को समूची साहित्य-परंपरा का मूल सरोकार बताया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. सोमा बंदोपाध्याय, कुलपति, शिक्षक-प्रशिक्षण विश्वविद्यालय, कोलकाता ने कहा कि आधुनिक हिंदी साहित्य भारतीय जीवन-मूल्यों का पोषक और संवर्धक रहा है; आज भी हमारे साहित्य का उत्तमांश इसी चेतना से अनुप्रेरित है। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. मनोज पाण्डेय ने विषय की महत्ता प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट किया कि इस दो दिवसीय संगोष्ठी में भारतीयता के विविध पक्षों पर चर्चा और चिंतन होगा। उद्घाटन सत्र का आभार प्रदर्शन संस्थान के सचिव मेहर चंद नेगी ने किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक हिंदी साहित्य पर आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारतीय मूल्य-चेतना पर व्यापक चिंतन होगा।

संगोष्ठी के प्रथम अकादमिक सत्र की अध्यक्षता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलगुरु प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने की। उन्होंने भारतीयता की संकल्पना और साहित्य की भूमिका को स्पष्ट करते हुए भारतीय मूल्य-चेतना को रेखांकित किया। इस सत्र में प्रो. अखिलेश शंखधर (मणिपुर विश्वविद्यालय) ने अज्ञेय के साहित्य-चिंतन में भारतीय पक्ष का उद्घाटन किया, तथा सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के प्रो. विजय कुमार रोड़े ने आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतीय सांस्कृतिक अवबोध पर प्रकाश डाला।

दूसरे अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. आलोक गुप्ता ने आधुनिक हिंदी साहित्य में सामाजिक उत्थान की चिंता पर अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र में बाबासाहेब अंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के प्रो. सर्वेश सिंह ने ‘हिंदी कथा-भाषा और भारतीयता’ विषय पर प्रपत्र प्रस्तुत किया। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. वीरपाल सिंह यादव ने ‘भारतबोध और हिंदी साहित्य’ विषय पर अपना प्रपत्र प्रस्तुत किया।

संगोष्ठी का तीसरा अकादमिक सत्र इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. शिव प्रसाद शुक्ला की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस सत्र में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के प्रो. गिरजा शंकर गौतम तथा कोलकाता विश्वविद्यालय, कोलकाता के डॉ. रामप्रवेश रजक ने भारतीय साहित्य के विविध पक्षों पर अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन तथा आभार प्रदर्शन डॉ. अखिलेश शंखधर ने किया।

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