मेरा पुणे आना, भाषा अभियान की एक कड़ी- अनिल जोशी

‘वह एक शख्सियत है, जो जवाब भी है और सवाल, वह चिंगारी है जो राख भी है और मशाल भी। उनको आना है और हमको बुलाना है’। वैश्विक हिंदी परिवार, नईदिल्ली के अध्यक्ष अनिल जोशी ने युवाओं को ‘वह’ संबोधन देकर यह बात कही। नईदिल्ली में तृतीय अंतरराष्ट्रीय भाषा सम्मेलन के सफल आयोजन के बाद वे पुणे के साहित्यकारों से मिलने व आगामी योजनाओं की जानकारी देने आए थे। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के बाजीराव रोड स्थित सभागार में शनिवार को हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि युवा हमारे देश का भविष्य है। ऐसे में सबसे प्रमुख बात है कि युवाओं और प्रौद्योगिकी से भारतीय भाषाओं को जोड़ना है। यह कार्यक्रम नहीं, मिशन है। मेरा पुणे आना उस बड़े अभियान की एक कड़ी है। भारतीय भाषाओं का थिंक टैंक बनना चाहिए। भारतीय भाषाओं को जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें केंद्रीय भूमिका युवाओं और प्रौद्योगिकी की हो।
मुख्य अतिथि के रूप में समिति के कार्याध्यक्ष डॉ. सुनील देवधर ने समिति की जानकारी देने के साथ उन्होंने , “बड़े अनमोल गीतों के बोल” की रचना प्रक्रिया को बताया। उन्होंने कहा कि पहले के गीतों में लय होती थी, जो अब खोती जा रही है। उन्होंने अपने द्वारा किए गए छंदबद्ध गीतों के अनुवाद की भी चर्चा की. आज के युवाओं से उनकी भाषा में तो बात करनी ही होगी लेकिन उन्हें पुरानी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत से भी अवगत करना हमारी जिम्मेदारी है।
वैश्विक हिंदी परिवार की प्रांत संयोजक स्वरांगी साने ने वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा युवाओं के लिए आयोजित ऑनलाइन हिंदी प्रतियोगिता से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि इस प्रतियोगिता में पूरे देश के गैर हिंदी प्रदेशों से पाँच हजार से अधिक युवाओं ने भाग लिया था। महाराष्ट्र से ही 18 से 25 वर्ष के प्रतिभागी युवाओं की संख्या 900 से अधिक थी। मॉर्डन कॉलेज से प्रतिभागियों की संख्या पर प्रकाश डालते हुए कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रेरणा उबाले ने बताया कि उनके यहाँ लगातार हिंदी पर काम होता है। वे स्वयं हिंदी-मराठी के अनुवाद कार्य को करते हुए हिंदी की सेवा कर रही हैं। व्यंग्य लेखिका समीक्षा तेलंग ने उनकी लेखन यात्रा व प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। विभिन्न भाषाओं के ज्ञाता डॉ. सुमित पॉल ने स्पष्टता से कहा कि कोई नहीं कह सकता कि वह किसी भाषा को पूर्णतः जानता है। एक भाषा सीखने में हज़ार साल लग जाते हैं, तब कोई कह सकता है कि उसने उस भाषा को सीख लिया, लेकिन मानवीय जीवन तो औसतन 70-80 साल का होता है। तो कोई कैसे भाषा का विद्वान हो सकता है। एसएनडीटी कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.शिवदत्त वावलेकर ने विभिन्न शोधकार्यों की जानकारी देते हुए कहा कि भाषाओं को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद होना ही चाहिए। इसी महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका सुप्रिया शिन्दे ने भी अपने विचार रखे। डॉ. मंजू चोपड़ा ने मुक्तिबोध के जीवन प्रसंगों पर प्रकाश डाला। दीप्ति पेठे ने गजल व मुक्त छंद लेखन में भेद को बताया। मॉर्डन जूनियर कॉलेज की प्राध्यापिका अनिता जठार ने अपने 20 वर्ष के अध्यापकीय अनुभवों को साझा किया। इस अवसर पर अशोक भांबुरे, रिचा मोहबे, स्वाति जोशी, स्नेहसुधा कुलकर्णी, उषा सिंह आदि ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं।
