बुखारेस्ट क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में हिंदी साहित्य पर चर्चा
बुखारेस्ट क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में हिंदी साहित्य पर चर्चा नहीं हुई। चर्चा हुई तो केवल इस विषय पर कि भारत के बाहर, विदेशों में हिंदी पढ़ाने में क्या दिक्कतें पेश आ रही हैं, और हिंदी भाषा–विज्ञान की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं। इन समस्याओं पर केवल बातचीत ही नहीं हुई, बल्कि उनके समाधान भी सुझाए गए, जो विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्रीमती अंजु रंजन तक पहुँचे। उन्होंने उन्हें समझा भी और शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।
‘पुरवाई’ के पाठकों के साथ एक सुखद समाचार साझा करना आवश्यक समझता हूँ। 28-29 जनवरी को रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में भारतीय दूतावास द्वारा एक क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया गया। आयोजन स्थल रोमानियन-अमेरिकन यूनिवर्सिटी, बुखारेस्ट का सभागार रहा। भारतीय उच्चायोग की ओर से आयोजन के मेज़बान श्री सीतेश सिन्हा रहें।
सबसे पहले शहर का नाम… रोमानिया के निवासी इसे पुकारते हैं ‘ब्युकरिस्टि’ और अंग्रेज़ कहते हैं ‘बुकेरिस्ट’ जबकि भारत में हिन्दी में हम कहते हैं – बुखारेस्ट !
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में रोमानियन-अमेरिकन यूनिवर्सिटी के रेक्टर प्रो. कोस्टेल नेग्रिसिया ने स्वागत भाषण में सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया और भारत-रोमानिया संबंधों के साथ-साथ हिंदी भाषा के लिए रोमानिया में एक सम्मानजनक स्थिति निर्मित करने का आश्वासन दिया। महामहिम राजदूत श्री मनोज कुमार महापात्र ने हिंदी भाषा के शिक्षण और प्रशिक्षण को लेकर भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए विदेश मंत्रालय को धन्यवाद दिया कि उसने यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका और भारत से हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़े बुद्धिजीवियों को एक स्थान पर एकत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारत से पधारीं श्रीमती अंजु रंजन (संयुक्त सचिव-विदेश मंत्रालय) ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि इतने कम समय में विश्व भर से इतनी बड़ी संख्या में हिंदी प्रेमी रोमानियन-अमेरिकन यूनिवर्सिटी में एकत्रित होकर यूरोप में हिंदी भाषा के प्रशिक्षण पर विचार-विमर्श के लिए एकत्र हुए हैं।

समापन सत्र में संयुक्त सचिव ने घोषणा करते हुए कहा कि उनका मंत्रालय निकट भविष्य में एक पोर्टल बनवाएगा, जिसमें वैश्विक स्तर पर पाठ्यक्रम (सिलेबस) प्रकाशित किया जाएगा। वहाँ विश्व भर के हिंदी अध्यापक एवं साहित्यकार अपना परिचय प्रकाशित कर सकेंगे। पोर्टल पर पाठ्य-पुस्तकें भी उपलब्ध करवाने की योजना भविष्य में है। इसके अतिरिक्त एक डेटाबेस भी बनाया जाएगा। जिसमें भारत से बाहर हिंदी भाषा का शिक्षण करवा रही सभी संस्थाओं के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाई जाएगी।
इस क्षेत्रीय सम्मेलन के लिए भिन्न देशों के भारतीय दूतावासों ने अपने–अपने देश से प्रतिभागियों के नाम की प्रस्तावना की। भारतीय उच्चायोग लंदन ने प्रतिभागी नामांकित करने में विशेष सतर्कता बरती। उप–उच्चायुक्त महामहिम श्री कार्तिक पांडेय एवं हिंदी अधिकारी डॉ. अनुराधा पांडेय ने एक तरफ़ तो मुझ जैसे वरिष्ठ लेखक के नाम का चयन किया, तो वहीं दूसरी ओर हिंदी शिक्षण एवं साहित्य से जुड़ी युवा पीढ़ी की ऋचा जैन को इस आयोजन के लिए नामांकित किया। इससे इन दोनों अधिकारियों की दूर–दृष्टि का अनुमान लगाया जा सकता है। इस क्षेत्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए हेंज वर्नर वेस्लर (स्वीडन), अर्चना पैन्यूली (डेनमार्क), डॉक्टर ऋतु ननंन पांडे (नीदरलैंड), ऋचा जैन (यू.के.), श्रीमती श्रद्धा मिश्रा (जर्मनी), सुश्री मिलेना ब्रतोएवा (बुल्गारिया), श्री एनरिक गैलुड जार्डिएल (स्पेन), सुश्री गयाने नज़रियान (आर्मेनिया), डॉक्टर एलेक्जेंड्रा ट्यूरेक (पोलैंड), डॉ जानन योगुर्त (तुर्की), डॉ. पीटर सागी (हंगरी), डॉ. मारियस पार्नो (रोमानिया), इयाज़ू स्वेतलाना (मोल्दोवा), सुश्री माताएआ वेडिल्जा (क्रोएशिया), दारिगा कोकेयेवा (कज़ाख़स्तान), मिरेला क्रेस्टी (रोमानिया), प्रो. इंद्रजीत सिंह सलूजा (अमेरिका), श्री प्रेड्रैग सिकोवच्की (सर्बिया) तथा भारत से प्रो. नवीन कुमार एवं श्री के. डी. सिंह गौर पहुँचे थे। विदेश मंत्रालय की श्रीमती सचेतना स्नेही भी पूरे सम्मेलन के दौरान उपस्थित रहीं।
इन सभी वक्ताओं की भागीदारी के लिए चार सत्रों का आयोजन किया गया था। 28 जनवरी को आयोजित पहले सत्र का विषय था- “हिंदी: वैश्विक पहचान और सांस्कृतिक एकता।” जबकि दूसरे सत्र में वक्तागण मिलकर इस बात पर विचार करते रहे, कि “हिंदी भाषा-विज्ञान की वास्तविक समस्याएँ” क्या हैं।
पहले ही दिन डॉ. के. डी. सिंह ने भारत की शिक्षा नीति पर प्रहार करते हुए उसे मैकॉले के षडयंत्र की परंपरा बताया। उन्होंने बहुत तीखे अंदाज़ में भारत में हिंदी की स्थिति की आलोचना करते हुए सम्मेलन में एक तुर्शी पैदा कर दी।
फिर 29 जनवरी को दो सत्रों के बाद समापन सत्र आयोजित किया गया। पहले सत्र का विषय था- “हिंदी भाषा सिखाने के तरीके।” वहीं अंतिम सत्र आधुनिक समय के सबसे ज्वलंत विषय को समेटे हुए था- “हिंदी- कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोमानिया में भारतीय कर्मी: सहयोग के नए आयाम।”अंतिम सत्र में लंदन से पधारीं ऋचा जैन ने एक पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन के माध्यम से उपस्थित सभी प्रतिभागियों को इस नई तकनीक से परिचित कराया तथा उसके उपयोग और खतरों से अवगत करवाया। ऋचा ने बताया कि “कृत्रिम बुद्धिमत्ता कैसे काम करती है”, दैनिक बोलचाल की भाषा में मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग के बीच अंतर स्पष्ट किया तथा एआई की महत्वपूर्ण शब्दावली जैसे ‘प्रॉम्प्ट’, ‘ग्राउंडिंग’, ‘हैलुसिनेशन’ आदि से परिचय कराया। उन्होंने यह भी बताया कि हिंदी भाषा के लिए एआई किस प्रकार उपयुक्त है, एआई किस तरह काम की गति और गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक हो सकता है, तथा एआई का उपयोग करते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ बरतनी चाहिए। हंगरी से पधारे डॉ. पीटर सागी ने अपने अनुभव साझा किए।

पोलैंड से सेमिनार में पहुँचीं एलेक्जेंड्रा एंटोनिया ट्यूरेक ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा कि आज का युग ‘डिजिटल युग’ है। आज का युवा जब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर कुछ सीखता है और किसी भी प्रकार की परीक्षा के लिए अपने उत्तर पोस्ट करता है, तो वह तुरंत उस पर प्रतिक्रिया भी चाहता है,भले ही वह प्रतिक्रिया किसी इमोजी के रूप में ही क्यों न हो। इस क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन की एक और ख़ास बात यह रही, कि दो दिनों के चारों सत्रों का संचालन आपकी ‘पुरवाई’ के संपादक तेजेन्द्र शर्मा, यानी कि मुझे ही करना पड़ा। यह भी एक अलग ही अनुभव रहा, क्योंकि इससे पहले मुझे ऐसा कारनामा अंजाम देने का अवसर नहीं मिला था। संतुष्टि इसी बात की थी कि दूतावास के अधिकारी मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा, “संपादक महोदय, आप तो विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर तमाम हिंदी सम्मेलनों के विरुद्ध लिखते रहते हो, फिर इस छोटे से सम्मेलन में ऐसा क्या था कि आप लंदन से उठकर बुखारेस्ट पहुँच गए?” उन्होंने सोचा था कि मुझे घेर लिया और मैं अनुत्तरित हो जाऊँगा, मगर मैंने उन्हें निराश कर दिया।
मेरा मानना है कि विश्व हिंदी सम्मेलन या भारत में होने वाले अधिकांश हिंदी सम्मेलनों में राजनेता, उपराष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि की उपस्थिति का बोलबाला रहता है। मगर किसी में हिम्मत नहीं होती कि इन विभूतियों से यह पूछा जा सके, कि आप विषय पर क्यों नहीं बोल रहे हैं। आयोजक और साहित्यकार इनके पीछे-पीछे घूमते दिखाई देते हैं, और उनके साथ फ़ोटो खिंचवाकर कृतार्थ होते रहते हैं।
वहीं जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल आदि में सबसे बड़े और महत्वपूर्ण साहित्यकार के रूप में गुलज़ार और जावेद अख़्तर ही छाए रहते हैं, बेचारे अन्य साहित्यकार तो प्रतीक्षा करते रहते हैं। समाचारपत्रों में पढ़ने को मिलता है- “जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल में इस साल कई बड़े नाम शामिल हो रहे हैं… प्रमुख आकर्षणों में जावेद अख़्तर, सुधा मूर्ति, वीर दास, किरण देसाई, टिम बर्नर्स-ली, विश्वनाथन आनंद, जिमी वेल्स, डी. वाई. चंद्रचूड़, गौर गोपाल दास, अश्विन सांघी समेत कई जाने-माने वक्ता शामिल हैं।” मुझे नहीं लगता कि नमिता गोखले और संजय रॉय का कभी हिंदी साहित्यकारों से कोई विशेष वास्ता भी पड़ा है।
इन बड़े हिंदी सम्मेलनों में मुख्य मंच पर राजनीतिज्ञ विभूतियाँ दिखाई देती हैं, जबकि वरिष्ठ साहित्यकारों को किसी कोने में एक छोटे से कमरे में बिठा दिया जाता है, जहाँ दस-पंद्रह से अधिक श्रोता नहीं होते। जब से पहला विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में आयोजित हुआ है, हम हर विश्व हिंदी सम्मेलन के बाद हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का संकल्प लेते रहे हैं, और आज तक लेते आ रहे हैं। मगर बुखारेस्ट में आयोजित क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन की बात एकदम अलग रही।बुखारेस्ट क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन में हिंदी साहित्य पर चर्चा नहीं हुई। चर्चा हुई तो केवल इस विषय पर कि भारत के बाहर, विदेशों में हिंदी पढ़ाने में क्या दिक्कतें पेश आ रही हैं, और हिंदी भाषा-विज्ञान की वास्तविक समस्याएँ क्या हैं। इन समस्याओं पर केवल बातचीत ही नहीं हुई, बल्कि उनके समाधान भी सुझाए गए, जो विदेश मंत्रालय की संयुक्त सचिव श्रीमती अंजु रंजन तक पहुँचे। उन्होंने उन्हें समझा भी और शीघ्र कार्रवाई का आश्वासन भी दिया।
यह क्षेत्रीय सम्मेलन संभवतः बड़े-बड़े हिंदी सम्मेलनों को एक नई राह दिखाने में सफल हो सकेगा कि सम्मेलन में फैलाव और बड़े नाम आवश्यक नहीं हैं, आवश्यकता है तो विषय केंद्रित बातचीत की। सोच में केवल यही होना चाहिए कि भारत में और विदेशों में हिंदी भाषा को कैसे प्रतिष्ठित किया जा सकता है। हमें पूरा विश्वास है कि अगले क्षेत्रीय सम्मेलन तक इस बार लिए गए निर्णय लागू हो चुके होंगे।
