मातृभाषा दिवस के अवसर पर हिंदी में रचित कविताओं का ब्रजभाषा व अवधी बोली  में अनुवाद

मातृभाषा दिवस (21 फ़रवरी 2026) हेतु  मातृभाषा विषय पर  हिंदी में रचित कविताओं का ब्रजभाषा व अवधी बोली  में अनुवाद  प्रस्तुत है

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

हमारी हिंदी-1 (मूल कविता)

मन के धन वे भाव हमारे हैं खरे।

जोड़ जोड़ कर जिन्हें पूर्वजों ने भरे॥

उस भाषा में जो है इस स्थान की।

उस हिंदी में जो है हिंदुस्तान की॥

उसमें जो कुछ रहेगा वही हमारे काम का।

उससे ही होगा हमें गौरव अपने नाम का॥

ब्रजभाषा में (अनुवाद)

अनुवादक  प्रो. वीना शर्मा पूर्व निदेशक केंद्रीय हिंदी संस्थान

हमारी हिंदी

सोने से खरे भाव मन के धन होत है

पुरखे हमारे जिनने जोड़ जोड जोडत है ।

जा ठीया की भाषा कहलात

हिंदी  हिन्दुस्तानी है ।।

वामे जो हते वो ही है काम को

बाकी सब हमरे काजे खारो सो पानी है।

जाते बढ़ेगा गौरव मेरे देस को

हिंदी भासा सबकी जानी पहचानी है ।।

अवधी में (अनुवाद)

अनुवादक प्रदीप सारंग कवि व सामाजिक कार्यकर्त्ता

हमारी हिंदी

भाव खरे सच्चे मन से जो धरिन हवैं।

जउन सहेजे सोधे पुरिखा भरिन हवैं॥

उइ भासा मा जउन राम गुनगान कै।

हिंदी मा जो आहै हिंदुस्तान कै॥

अपनिन भासा पालि पोसि कै बड़ा करी।

स्वाभिमान का झंडौ ऊँचै खड़ा करी।।

लिखै पढ़ै औ ब्वालै मइहाँ सरल हवै।

दूसरि भासा बचपन तइहाँ गरल हवै।।

मैथिलीशरण गुप्त

राष्ट्रभाषा (मूल कविता)

है राष्ट्रभाषा भी अभी तक देश में कोई नहीं,

हम निज विचार जना सकें जिससे परस्पर सब कहीं।

इस योग्य हिंदी है तदपि अब तक न निज पद पा सकी,

भाषा बिना भावैकता अब तक न हममें आ सकी!

यों तो स्वभाषा-सिद्धि के सब प्रांत हैं साधक यहाँ,

पर एक उर्दू दाँ अधिकतर बन रहे बाधक यहाँ।

भगवान जाने देश में कब आएगी अब एकता,

हठ छोड़ दो हे भाइयो! अच्छी नहीं अविवेकता॥

ब्रज भाषा में (अनुवाद)

अनुवादक  प्रो. वीना शर्मा पूर्व निदेशक केंद्रीय हिंदी संस्थान

राष्ट्र भाषा

कोऊ राष्ट्र भाषा हते ना मेरे देश में

जामे मिल बैठ बोल बतराते सब ।

लायक हिंदी कू मिलो न ताज

भाषा बिन भाव अधूरे रह जात अब ।।

कहबे कू तो सब बोलत है अपनी भाषा

पर उर्दू बाले टांग खींचत रहे सबकी ।

ऊपर वालो जाने कब आएगी एकता

जा जिद ए छोड़ दे बजमारे

भली नाय जे मूर्खता ।।

रामधारी सिंह “दिनकर”

कलम या कि तलवार (मूल कविता)

दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार

अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान

कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली

पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे

एक भेद है और वहां निर्भय होते नर -नारी,
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी

जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
बादल में बिजली होती, होते दिमाग में गोले

जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार,
क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार

अवधी में (अनुवाद)

अनुवादक प्रदीप सारंग कवि व सामाजिक कार्यकर्त्ता

कलम या कि तलवार

दूनौ मइसे येकु गहौ तुम, कलम याकि तलवार।

मन मंदिर, तन बज्जर बनवौ, जिनगी लेउ सँवार।।

कगजै पइहाँ हुनर देखइहौ, रचिहौ देश बखान।

या तलवार भाँजि कै करिहौ, फते जंग मैदान।।

कलम कै ताकत तुलै न तोले, मुरदौ दियै जगाय।

दिल-दिमाग मा जोस भरै, औ आगिव दियै लगाय।।

अंगारा उपजैं तन मन मा, पढ़ि-पढ़ि लेख विचार।

कलम अइस हो जउन देस मा, होवे कबौ न हार।।

संस्कृति जिंदा रहै, जोस मा भरे रहैं नर-नारी।

कलम से निकरै आगि, अउर अक्षर-अक्षर चिंगारी।।

जान हथेली पर रक्खे, हर हिरदय धधकै ज्वाला।

जहाँ जवानन के दिमाग मा बारुदन के ग्वाला।।

रोवाँ-रोवाँ से निकरै जब, हालाहल कै धार।

तनिकौ चिंता नहीं अगरचे, हाथ नहीं तलवार।।

मातृभाषा दिवस (21 फ़रवरी 2026) हेतु  मातृभाषा विषय पर  हिंदी की बोलियों दक्खिनी और ब्रजभाषा में रचित कविताओं का हिंदी  में अनुवाद  प्रस्तुत है

निम्न कविता शाह मीरांजी शम्सुल उश्शाक (1408-1497 ई.) द्वारा रचित है, जो आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व हुए, कविता दक्खिनी हिंदी में रची गई है। देखिए यह आज की हिंदी से कितनी समानता रखती है।

मूल कविता (दक्खिनी हिंदी में)

हैं अरबी बोल केरे। और फ़ारसी भौतेरे

ये हिन्दी बोलूँ सब। उस अर्तों के सबब

ये भाका भल सो बोले । पन उसका भावत खोले

ये गुरुमुख पंद पाया। तो ऐसे बोल चलाया

जे कोई अछे खासे। उस बयान के पासे

वे अरबी बोल न जाने । ना फ़ारसी पछाने

ये उनकूं बचन हीत। सुन्नत बूझें रीत

ये मग्ज मीठा लागे। तो क्यूं मन उसथे भागे।’

हिंदी में (अनुवाद)
अनुवादक डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’


अरबी बोले कितने जन, फ़ारसी बोले हैं बहुत,

मैं तो हिंदी ही बोलूँ, अर्थ रहे एकदम मजबूत।

यह भाषा मधुर सरल, भाव सभी खोल दे,

गुरुवाणी से ज्ञान पाकर, वचन सहज बोल दे।

जो सज्जन समझदार हैं, अर्थ के पास पहुँचें,

अरबी-फ़ारसी जानें बिन, भाव सभी वे बूझें।

हितकारी ये वचन मधुर, रीति हृदय में जागे,

ज्ञान लगे जब मीठा, मन फिर क्यों भागे।

निम्न कविता काजी मुहमद बहरी (1620-1718 ई.) द्वारा रचित है, जो आज से लगभग 250 वर्ष पूर्व हुए, कविता  दक्खिनी हिंदी में रची गई है। देखिए यह आज की हिंदी से कितनी समानता रखती है।

मूल कविता  (दक्खिनी हिंदी) में

हिन्दी तो ज़बान च है हमारी

कहने न लगी हमन कूं भारी

होर फ़ारसी इसते अत रसीला

हर हुर्फ़ में इश्क़ है न हीला

हर बोल में मारिफ़त की बानी

सीता की न राम की कहानी।

हिंदी में (अनुवाद)
अनुवादक डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

हिन्दी ही है अपनी बोली,


बोलने में है आसान,

पर-फ़ारसी से है रसीली

प्रेम भरी है हिंदी अपनी

हर शब्द में ज्ञान झलकता,

बोल-बोल में सत्य की गूंज,

यही है अंतर ज्योति जगानी,

सीता की न राम की कहानी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र

मातृभाषा प्रेम पर दोहे (मूल कविता)

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।

निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।

हिंदी में (अनुवाद)
अनुवादक डॉ. संध्या सिलावट

निज भाषा की प्रगति, हर प्रगति का मूलाधार,

निज भाषा अज्ञानता, देती वेदना अपार।।

अंग्रेजी के ज्ञान से, होते सब गुण प्रवीण,

पर निज भाषा अज्ञान से , रहते हीन के हीन।।

प्रगति होती है तभी, जब निजजन प्रगति पाते हैं,

केवल तन की प्रगति से , सभी मूर्ख रह जाते हैं।।

निज भाषा प्रगति बिना, संभव उन्नति नहीं कभी,

अनेक तरीके अपना कर, देख  लें चाहे सभी।।

एक भाषा एक मानस, एक विचार रमे सब,

काज कर पाएं तभी सब, मिटे सब अज्ञान तब।।

संकलनकर्त्ता

डॉ. संध्या सिलावट

उपायुक्त राज्यकर,

इंदौर, मध्य प्रदेश,

भारत।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »