श्री विजय गोयल द्वारा रचित नवीनतम कृति “अटल बिहारी वाजपेयी – शाश्वत राजनेता” के लोकार्पण समारोह का भव्य आयोजन

दिनांक 21.02.2026 को नई दिल्ली के विंडसर प्लेस निकट जनपथ मार्ग पर स्थित डॉ अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर के सभागार में पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं वर्तमान में गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के उपाध्यक्ष श्री विजय गोयल द्वारा रचित नवीनतम कृति “अटल बिहारी वाजपेयी – शाश्वत राजनेता (THE ETERNAL STATESMAN)” के लोकार्पण समारोह का भव्य आयोजन किया गया।
सभागार में गणमान्य विभूतियों के आगमन से पूर्व कार्यक्रम में पधार रहे जनसमुदाय के ज्ञानार्जन हेतु दूरदर्शन द्वारा स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की शताब्दी जयंती पर उनके जीवन चरित्र पर निर्मित वृतचित्र को कई बार दोहराया गया। इस अवसर पर मंचासीन गणमान्य विभूतियों में भारतीय गणतंत्र के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी पी राधाकृष्णन, पूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ मुरली मनोहर जोशी, बिहार राज्य के राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान, राजस्थान के राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागडे तथा हरियाणा के राज्यपाल प्रोफेसर आशिम कुमार घोष सहित लोकार्पित की जाने वाली पुस्तक के लेखक श्री विजय गोयल उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय गीत “वंदेमातरम” एवं राष्ट्र गान “जन गण मन…..” की रिकार्डिंग के साथ-साथ सभागार में मंचासीन गणमान्य विभूतियों सहित उपस्थित समस्त जनसमुदाय ने अपने स्थान पर खड़े होकर समवेत स्वर में उनके गायन के साथ हुआ। तत्पश्चात्, मंचासीन गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित करने की प्रक्रिया को परिपूर्ण करने के श्री विजय गोयल द्वारा क्रमबद्ध तरीके से सभी मंचासीन विभूतियों को शाल ओढ़ाकर एवं पुष्पगुच्छ भेंट स्वरूप प्रदान करके सम्मानित किया गया। अगले चरण में गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा श्री विजय गोयल द्वारा रचित नवीनतम कृति “अटल बिहारी वाजपेयी – शाश्वत राजनेता (THE ETERNAL STATESMAN) का विधिवत लोकार्पण किया गया।
अपने आरंभिक उदबोधन में श्री विजय गोयल ने अपने पिता एवं स्वयं के विद्यार्थी जीवन के दौरान घटित घटनाओं को श्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्य-कलापों एवं उनकी राजनीतिक परिदृश्य से व्याख्यायित करते हुए रेखांकित किया कि हम उनकी रैलियों को सुनने पैदल जाया करते थे। मैं उनका फैन था। अटल जी आधुनिक राजनीति के शीर्ष नेता थे। वह सही मायने में सच्चे इंसान थे, जो अपनी विचारधारा पर अडिग रहते थे, किंतु लेशमात्र भी कट्टरतावादी नहीं थे। दलगत राजनीति से ऊपर थे। सभी को अपना मानते थे। उनके सामाजिक जीवन में कितनी भी विकट परिस्थितियां आई, लेकिन वह सदैव संवेदनशील बने रहे। यहां तक कि संसद पर हमले की घटना के समय भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया था। शांत मन से परिस्थितियों का अवलोकन करके मनन करने में जुटे थे। वह समावेश की राजनीति के प्रखर समर्थक थे। वह कहा करते थे कि मैं किसी भी तरह के भेदभाव को चिमटे से भी छूना नहीं चाहता। पोखरण में परमाणु विस्फोट और दूरसंचार क्रांति के द्योतक थे। इतना नजदीकी होने के बावजूद मंत्री नहीं बनाया था, जिससे मेरे समर्थक नाराज़ हुए थे और जब रखा, तो पीएमओ में अपने साथ रखा। डॉ मुरली मनोहर जोशी के संबंधों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मेरा और जोशी जी का जन्मदिन एक दिन आगे-पीछे आता है। बस वो बात अलग है कि आयु का अंतर 20 वर्षों का है। उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद पर होते हुए 19,000 किलोमीटर की यात्रा की थी। शिक्षामंत्री के तौर पर वह सबसे अधिक प्रभावशाली साबित हुए थे। श्री आरिफ मोहम्मद खान पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वह युवा नेता थे। 26 वर्ष की आयु में विधायक बन गए थे। कांग्रेस में होते हुए भी उन्होंने बहुचर्चित शाहबानो मुकदमे में भी अपनी सहमति जताई थी। प्रोफेसर आशिम कुमार घोष पर टिप्पणी करते हुए उदृधत किया कि वह पश्चिम बंगाल भाजपा इकाई के अध्यक्ष रहे हैं और उन्होंने 10 से अधिक रिसर्च पेपर क्रियान्वित किए हैं। श्री हरिभाऊ बागडे पांच बार महाराष्ट्र से विधायक रह चुके हैं और आज राज्यपाल का दायित्व निभा रहे हैं। अंबेडकर जी पर विचार प्रस्तुत करते हुए रेखांकित किया कि उन्होंने सामाजिक लोकतंत्र के मार्ग को प्रशस्त किया। अपनी वाणी को विराम देने से पूर्व उन्होंने जानकारी सांझा की कि आज लोकार्पित की जाने वाली पुस्तक 312 पृष्ठ की है और उसका मूल्य ₹4,000/- है। इसमें समाहित दुर्लभ चित्र और संबंधित सामग्री बहुत-से सहयोगियों के माध्यम से जुटाई गई है, जो निश्चित रूप से एकसाथ अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं होगी।
श्री आशिम कुमार घोष ने अपने उदबोधन में अवगत कराया कि मुझे बंगाल इकाई का अध्यक्ष होने के नाते अटल जी के साथ काम करने का अवसर मिला था। वाजपेयी जी के समय में नवीन राजनीतिक परिदृश्य बना था। उस समय में न्यू चेप्टर शुरू हुआ था। उनके सत्ता संभालने पर राष्ट्रीय राजमार्ग, किसान कार्ड इत्यादि जैसे विकास कार्य हुए थे। वह प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उनका कार्यकाल हमारे राष्ट्र का स्वर्णिम काल (गोल्डन एरा आफ अवर कंट्री) था।
श्री हरिभाऊ बागडे ने अपनी विस्मृतियों से उकेरकर रेखांकित किया कि उन्हें अटल जी के साथ गाड़ी में बैठने का सौभाग्य मिला था। 20 वर्ष की आयु में उनसे प्रथम बार बम्बई में मिला था। वर्ष 1953 में वहां दूसरा अधिवेशन हुआ था। अहमदनगर जिला के बेलापुर गांव भेजा था। उस दौरान श्रीरामपुर तक गाड़ी में और फिर साइकिल पर गया था। उस समय के चुनावी दौर के किस्सागोई भी सुनाई। वर्ष 1985 में विधायक बना था। हमारे गांव में सूखा हुआ था, अटल जी तब वहां आए थे। जलगांव का किस्सा उदृधत करते हुए कहा कि उन्होंने समस्याएं सुनी थी और गेहूं की भरपाई की थी। वर्ष 1987 में संसद में उन्होंने जो भाषण दिया था, उसकी हमने पुस्तक बनाकर पूरे महाराष्ट्र में बंटवाई थी। उन्होंने अटल जी की किस्सागोई से अवगत कराया कि अकबर के पुत्र को पूछो कि मीना बाजार याद है क्या? अकबर भेष बदलकर वहां जाता था। एक दिन बीकानेर की लड़की ने अकबर पर चाकू रख दिया था, तो अकबर ने तबसे वहां आना बंद किया था। मंच पर पुनः अपना स्थान ग्रहण करने से पूर्व उन्होंने अपनी समयावधि की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण और चुनिंदा जानकारियां भी सांझा की।
श्री आरिफ मोहम्मद खान ने अतीत में बहुत महानुभावों की सूची बनाई और देखी है। अटल जी अलग थे। उनके व्यक्तित्व ने मुझे सदैव प्रेरित किया है। मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में था। मैंने लोकसभा में कहा था कि हमारी विचारधारा अलग है। फिर भी, 6-7 किलोमीटर पैदल चलकर अचल झील के पास हम अटल जी का भाषण सुनने जाते थे। उनके बोलने के लहज़ा और शब्दावली की हम नकल किया करते थे। उनकी रूचि साहित्य, कला, ललित कलाओं के साथ-साथ आध्यात्मिकता में भी थी। उनमें मायूसी कभी नहीं थी। उस दौर में अपने पहले ही वर्ष में 20-25 युवा सांसद थे। एक ही जगह संजय गांधी के बगल में बैठते थे। इंद्रजीत गुप्ता को गुस्सा आ गया था। इंदिरा जी को उंगली दिखाकर मेरा नाम बोलकर संज्ञान कराया था। अटल जी की मेहरबानियां भी थी और कृपा भी रही थी। वह सदैव कहते थे कि राजनीति से ऊपर उठकर सोचिए। भारतीयता कोई कल्पना नहीं है। संस्कृत की कुछ विशिष्ट पंक्तियों का मंत्रोच्चारण करते हुए उन्होंने अटल जी को ‘राजयोगी’ बताया और ‘लोका समसता सुखिनो भवन्तु’ कहकर अपना वक्तव्य पूर्ण किया।
डॉ मुरली मनोहर जोशी ने दृष्टिगोचर प्रस्तुत करते हुए कहा कि परमाणु विस्फोट के समय मैं बैंगलोर में था। मेरे सामने मीडिया आ गया था और पूछने लगा था कि कल क्या होगा? मैंने कहा था कि कल फिर होगा? मीडिया से इस बाबत की जानकारी मिलने पर अटल जी का फोन मुझे आया था। कह रहे थे कि यह बोलना नहीं चाहिए था। मैंने कहा था कि दूसरा कदम उठता नहीं है, इसलिए कहा था। बाधाएं तो आती हैं। अंतराष्ट्रीय शक्तियां आड़े आ जाएंगी। फिर वह बोले थे कि तुमने ठीक किया था। अर्थव्यवस्था ठीक चल रही है। राजधर्म क्या होता है। निष्पक्ष और निर्भीक होकर पालन करना। न लूं, तो इस्तीफा दे देना। कहते थे कि अब मन ऊब गया है। 23 पार्टियों ने मिलकर मुझे प्रधानमंत्री बनाया था। राजधर्म और संगठन धर्म का सदैव पालन किया था। ऐसे गठबंधन की सरकार कोई नहीं चला सकता था। इकलौते अटल जी थे। काश्मीर गए और काशमीरियत, जंबुरियत तथा इंसानियत के जीवन मंत्र का संचार करके लौटे। जनतंत्र की यही पहचान होती है। अपने और अटल जी के समस्त वृत्तांत को उन्होंने अपने लहज़े और सामने से आए जवाब अटल जी के लहज़े में अपने चुटकीले अंदाज में जनसमुदाय के समक्ष प्रस्तुत किए, जिसे सुनकर वह गदगद हो गए। श्री विजय गोयल को पुस्तक के प्रति बधाईयां प्रेषित करने के साथ उन्होंने अपनी वाणी को विराम दिया।
श्री सी पी राधाकृष्णन ने अपने उदबोधन में अवगत कराया कि अटल जी ने डॉ अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के लिए चुना था। मुझे और विजय गोयल को उनका पर्चा दाखिल कराने के लिए चैन्नाई भेजा गया था। मैं बारहवीं और तेरहवीं लोकसभा का सदस्य रहा था,जब अटल जी प्रधानमंत्री थे। वह मेरे से और मैं उनसे बेरोकटोक सीधे मिलते थे। मुझपर उनका प्रभाव है। उनके विचारों और व्यक्तित्व की छाप है। उनको सुनने के लिए कोयंबटूर की सभा में 10,000 लोग आए थे। उनका मानना था कि राजनैतिक दलों की सीमाओं और विपक्ष के भेदभाव से ऊपर उठकर, नेताओं का आम जनता के साथ सीधा संवाद और जुड़ाव लोकतंत्र को मजबूत करता है। उन्हीं के कार्यकाल में दिल्ली में मैट्रो का कार्य प्रारंभ हुआ था। उनका व्यक्तित्व गरिमा के साथ सरलीकृत था। उन्हें स्वीकार्य था कि इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होना चाहिए। उनका मानना था कि संवेदनशीलता बनाए रखनी होगी। परमाणु विस्फोट करने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन्हें फोन करके युद्ध भड़कने की चिंता जताई थी। तब प्रत्युत्तर में अटल जी ने स्पष्ट कह दिया था कि यदि हमारे विरूद्ध परमाणु हथियार का उपयोग किया गया, तो अगली सुबह पाकिस्तान का अस्तित्व नहीं रहेगा। उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली था। अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन मूल्य – अटल राष्ट्रवाद, लोकतांत्रिक मर्यादा, सहृदयता और विपक्षी दलों के साथ संवाद – आज भी बेहद प्रासंगिक हैं। उनके आदर्शों में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ सभी को साथ लेकर चलना (सर्वस्वीकार्यता), ईमानदारी, देश को सर्वोच्च प्राथमिकता देना और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखना प्रमुख हैं। यह पुस्तक सिखाती है कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए ताकि आप एक लोकप्रिय और प्रभावी चरित्र बन सकें। इन्हीं शब्दों के साथ उन्होंने अपना उदबोधन पूर्ण किया।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत “वंदे मातरम्” और राष्ट्रगान “जन गण मन…..” की रिकार्डिंग के साथ-साथ सभागार में मंचासीन गणमान्य विभूतियों सहित उपस्थित समस्त जनसमुदाय द्वारा अपने स्थान पर खड़े होकर समवेत स्वर में उनके गायन के साथ यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
— कुमार सुबोध, ग्रेटर नोएडा वेस्ट।
