साहित्य अकादेमी के सभागार में ऊॅं शांति साहित्य मेमोरियल के तत्वावधान में तृतीय सम्मान समारोह तथा काव्य गोष्ठी का भव्य आयोजन सम्पन्न

दिनांक 06.03.2026 को नई दिल्ली के मंडी हाउस स्थित रबीन्द्र भवन के प्रांगण में साहित्य अकादेमी के सभागार में ऊॅं शांति साहित्य मेमोरियल के तत्वावधान में स्व॰ श्री ओमप्रकाश शर्मा एवं स्व॰ श्रीमती शांति देवी की स्मृति में तृतीय सम्मान समारोह तथा काव्य गोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता का कार्यभार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ चंद्रकांता ने निर्वहन किया। विशिष्ट अतिथि की भूमिका वरिष्ठ कवि श्री राजेश्वर वशिष्ठ ने निभाई। मुख्य वक्ता के दायित्व का वहन वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने किया। बीज वक्तव्य हेतु संस्था के अध्यक्ष एवं प्रख्यात गज़लकार श्री नरेश शांडिल्य उपस्थित रहे। सम्मानित होने वाली विभूति वरिष्ठ कवयित्री एवं साहित्यकार श्रीमती अल्का सिन्हा भी विराजमान रही। वैश्विक हिंदी परिवार एवं वयम संस्थाओं ने अपने सहयोग का सानिध्य प्रदान किया। संयोजन समिति के सदस्यों की श्रेणी में श्री शशिकांत, श्री विनयशील चतुर्वेदी, श्री ऋषि कुमार शर्मा तथा श्री ताराचंद ‘नादान’ उपस्थित रहे। इस भव्य आयोजन के संचालन का दायित्व संयुक्त रूप से सुप्रसिद्ध गीत एवं गज़लकार श्री अनिल वर्मा ‘मीत’ तथा विदेश मंत्रालय में सेवारत अधिकारी एवं श्री नरेश शांडिल्य की सुपुत्री श्रीमती कल्याणी शांडिल्य के सशक्त हाथों में रहा।
कुशल संचालक द्वारा सशक्त मंच पर मंचासीन गणमान्य विभूतियों के परिचयात्मक वक्तव्य के पश्चात् कार्यक्रम का शुभारंभ कवि श्री मनोज अबोध के मुखारविंद से मां सरस्वती की वंदना में सुरमई प्रस्तुति के साथ हुआ। तत्पश्चात्, प्रथम चरण में मंचासीन गणमान्य विभूतियों को क्रमबद्ध तरीके से अंगवस्त्र ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। इसी श्रेणी के प्रमुख अलंकरण “तृतीय ऊॅं शांति साहित्य मेमोरियल” सम्मान से गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवयित्री श्रीमती अल्का सिन्हा को माल्यार्पण, शाल ओढ़ाकर, स्मृति-चिन्ह एवं अनुदान राशि प्रदान करके सम्मानित किया गया। साथ ही, इस पुनीत अवसर पर संस्था के अध्यक्ष श्री नरेश शांडिल्य एवं उनकी पत्नी श्रीमती पुष्पांजलि शांडिल्य को भी शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र को गति प्रदान करते हुए संचालक श्री अनिल वर्मा ‘मीत’ ने अपनी वाकपटुता शैली में क्रमानुसार विशिष्ट विभूतियों को इस पुनीत अवसर पर अपने-अपने उदगारों के लिए आमंत्रित किया गया।
श्री नरेश शांडिल्य ने अपने बीज वक्तव्य में अपने माता-पिता को समर्पित आरंभ की गई संस्था एवं उनकी स्मृति में प्रदान किए जा रहे “ऊॅं शांति साहित्य मेमोरियल” अलंकरण के प्रति अपने मनोभावों तथा उसके क्रियान्वयन हेतु परिवार एवं हितैषियों के उत्साहवर्धक सहयोग से इस प्रयास के मूर्त रूप में फलीभूत होने की प्रक्रिया की कड़ियों को बड़ी संक्षिप्तीकरण सहित रेखांकित किया। अलंकृत श्रीमती अल्का सिन्हा के संबंधों पर उदृधत किया कि मैंने उनका ‘काल की कोख’ काव्य-संग्रह देखा था। फिर वह हमारी मासिक गोष्ठी में डॉ रामदरश मिश्र जी के साथ आई थी। इस प्रकार परिचय के साथ संबंधों का जुड़ाव प्रारंभ हुआ था। हमारी माताजी नित्यप्रति अखबार पढ़ा करती थी। अखबार आज तक घर पर आता है। भागवत का अध्ययन भी किया करती थी। वेदांत, गीता, रामचरितमानस, विवेकानंद साहित्य, कल्याण पत्रिका इत्यादि सभी धार्मिक पुस्तकें उस समय घर में थी। स्वयं मैं भी कवि उन्हीं की वजह से बना हूं। यह संस्था निरंतरता से सदैव कार्यरत रहे, यही प्रयास रहेगा। उन्होंने यह भी दोहराते हुए स्मरण कराया कि प्रथम वर्ष यह पुरस्कार श्री राजेश्वर वशिष्ठ एवं द्वितीय वर्ष यह पुरस्कार श्रीमती आशा ओझा को प्रदान किया गया था। इस अवसर पर अपनी अनुपस्थिति के परिप्रेक्ष्य में पूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री, सांसद एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ तथा कनाडा में आवासित सुपुत्र श्री शशांक शांडिल्य द्वारा भेजे गए संदेश सुपुत्री कलयाणी शांडिल्य ने उनका अपनी वाणी में वाचन करके सभागार में उपस्थित जनसमुदाय के समक्ष प्रस्तुत किए।
श्री अनिल जोशी ने अपने उदबोधन में दृष्टिगोचर के माध्यम से अवगत कराया कि आदरणीय श्री ओमप्रकाश शर्मा मेरे मामाजी थे। उनके सानिध्य में बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला था। काफ़ी ज्ञानार्जन मैंने उन्हीं के सानिध्य से अर्जित किया है। श्रीमती अल्का सिन्हा का व्यक्तित्व विशिष्ट है। पुरस्कारों की राजनीति को मैं बहुत करीब से जानता हूं। उनकी गरिमा समाप्त कर दी है। पुरस्कारों का खेल देश में जोर-शोर से चल रहा है। यह सम्मान अकादमी पुरस्कारों के समकक्ष है। अल्का जी के पिताजी का यहां उपस्थित होना विशेष है। यह चार बहनें हैं। दो पक्ष और दो विपक्ष में डिबेट किया करती थी। इनके पति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अनुवाद और भाषा-शैली की विधा में श्री मनोज सिन्हा की गहरी पैठ है। पत्नी के कार्यों में भी इनका बड़ा योगदान है। अल्का जी ने उपन्यास लिखा, बहुत प्रसिद्ध हुआ। इनके शब्दों का जो तिलिस्म है, उस पर हम सभी लिखने का प्रयास कर रहे हैं। कई खो जाते हैं। शब्दों से खिलवाड़ नहीं करना है। छेड़-छाड़ नहीं करनी है। शब्दों के तिलिस्म को तोड़ना बहुत बड़ा कार्य है। इन्होंने यह कर दिखाया है। उनकी कविता, कहानी और उपन्यास से उदाहरण देते हुए उनके लेखन की विवेचना सहित प्रशंसा करते हुए पुनः स्मरण कराया कि इनकी डायरी पर एक गोष्ठी में चर्चा भी की गई थी। इनके सृजन में जादू है। गांव का चित्रण बहुत अदभुत रहा है। ओर भी बहुत कुछ बोला जा सकता है, किंतु समयावधि को ध्यान में रखते हुए अपनी वाणी को विराम देता हूं।
श्री अनिल वर्मा ‘मीत’ ने उनकी सृजित कृतियों को व्याख्यायित करते हुए श्रीमती अल्का सिन्हा को अपने उदबोधन के लिए आमंत्रित किया।
श्रीमती अल्का सिन्हा ने अपने वक्तव्य में अवगत कराया कि उन्होंने जिंदगी को बहुत अलग तरीके से देखा है। हम पांच भाई-बहन थे। मैं बहुत जल्द भावुक हो जाती हूं। निधि तैयार हुई थी। एक समय में मुझे श्री अनिल जोशी की रचना बहुत पसंद आई थी, जिसे मैंने उसे उनसे मांगकर अपने नाम से भेजने को कहा था। शगुन से शब्द गढ़े गए हैं। यही इस धरोहर को परिवार ओर आगे ले जाएगा। निशंक जी का संदेश आना मेरा सौभाग्य है। पत्थर में से जो नहीं चाहिए, उसे हटाकर ही मूर्ति बनाई जाती है। यह केवल मात्र मेरा ही अलंकरण नहीं है, अपितु सभी लेखकों का सम्मान है। उन्होंने पिता पर सृजित अपनी एकमात्र कविता एवं मां पर रचित कविता सुनाई। ‘सिलपोखरी’ शीर्षक से एक कविता भी सुनाई, जिसकी प्रशंसा बलदेव वंशी ने की थी। इसी के उन्होंने मंच पर पुनः अपना स्थान ग्रहण किया।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में डॉ चंद्रकांता ने अपनी सौम्य वाणी में आयोजन एवं अलंकृत विभूति को बधाई अर्पित करते हुए कहा कि माता-पिता के संस्कारों को आगे बढ़ाना यह बहुत अच्छा संदेश है। उन्होंने रेखांकित किया कि स्त्रियों का ही नहीं, पुरूषों का भी शोषण हुआ है। यह भी कटु सत्य है। इनकी मां के जाने के बाद की लिखी कविताएं मैंने पढ़ी हैं। उन्होंने पुनः ध्यानाकर्षण प्रस्तावित करते हुए अवगत कराया कि आपकी अपनी स्मृतियां होती हैं, जो आप समाज को देना चाहते हैं। आप सभी सृजनकर्ता मनुष्य की कठिनाईयों और उतार-चढ़ावों के बारे में लिखें। समाज की समस्यायों पर अपने विचार प्रकट करें। जो अपने लिए करता है, वह दूसरे तौर पर समाज के लिए ही करता है। संवेदना के साथ-साथ भावुकता का होना भी आवश्यक है, तभी सृजन की अभिव्यक्ति सशक्त बनेगी। बस मुझे यही कहना था, इसी के साथ उन्होंने अपना उदबोधन पूर्ण किया।
श्रीमती अल्का सिन्हा के पिताजी श्री सीताराम प्रसाद ने धीमे और सधे सवर में कहा कि यह सुखद अवसर है। मुझे गर्व होता है। सबकी बेटियां आगे बढ़े। ऐसे पल जीवन को दुगने उत्साह से भर देते हैं। बेटियां पराई होती हैं, किन्तु हमारी सम्पत्ति का निचोड़ होती हैं।
‘नई धारा’ के संपादक श्री शिवनारायण ने अपने वक्तव्य में रेखांकन प्रस्तुत किया कि इस आयोजन का हिस्सा बनकर प्रसन्नता है। अपना भाव अर्पण करने का अवसर पाकर सौभाग्यशाली समझता हूं। इनकी भाषा-शैली अदभुत है। चाहता था कि यह उपन्यास भी लिखें। इन्होंने लिखा, यह उपन्यास बहुत ही प्रभावशाली है। डायरी में इनकी अदभुत कल्पना है, वह भी एक प्रतिभा है। काव्य रचनाओं पर विवेचनात्मक टीका-टिप्पणी करते हुए बताया कि दिल्ली में भी आंगन और रास्ते के राही मिल सकते हैं, मेरे लिए यह अविस्मरणीय संस्मरण है। श्री अनिल जोशी को स्मरण कराया कि उनके साथ फ़िजी से भारत की हवाई-यात्रा के दौरान छह घंटे का कवि सम्मेलन हुआ था।
कार्यक्रम के निर्धारित द्वितीय सत्र में कुछ चुनिंदा हस्ताक्षरों श्रीमती कल्याणी शांडिल्य, श्री राजेश्वर वशिष्ठ, श्री अनमोल आचार्य, श्री प्रमोद शर्मा ‘असर’, श्री मनोज अबोध, श्रीमती अल्का शर्मा, श्रीमती रूबी मोहंती, श्रीमती अनीता वर्मा सेठी, श्रीमती आश्मा कौल, श्री विनयशील चतुर्वेदी, श्री विनोद शेखर, श्री सत्यपाल चावला तथा श्री अनिल जोशी ने अपनी-अपनी श्रेष्ठतम रचनाओं के काव्यपाठ द्वारा सभागार में उपस्थित जनसमुदाय को भाव-विभोर करते हुए मंत्रमुग्ध तो किया ही, उन्हें वाह-वाही के उदघोषों सहित दात देते हुए गड़गड़ाती करतल-ध्वनि से समस्त वातावरण को गुंजायमान कर दिया।
श्रोता-दीर्घा में देश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से पधारे विद्वतजनों में डॉ शकुंतला मित्तल, डॉ रंजना अग्रवाल, डॉ मनीष, डॉ रेणु पंत, श्रीमती आश्मा कौल, श्रीमती पूनम अग्रवाल, श्री अरविंद ‘असर’, डॉ प्रमोद ‘असर’, श्री अनमोल आचार्य, श्री मनोज अबोध, श्रीमती रूबी मोहंती, श्रीमती अनीता वर्मा सेठी, श्रीमती पुष्पा सिन्हा, श्रीमती पुष्पांजलि शांडिल्य, श्री अश्विनी गौड़, श्री मनोज सिन्हा, श्री शिवनारायण, श्री ऋषि कुमार शर्मा, श्री सीताराम प्रसाद, श्रीमती संतोष बंसल, एस के त्रिपाठी, श्रीमती सत्या त्रिपाठी, श्री राजीव वत्स, श्री बी एल शुक्ला, श्रीमती राजश्री वर्मा, डॉ आर पी अरनेजा, डॉ वीरेंद्र कुमार शेखर, श्री जगमोहन सैनी, श्री सत्यपाल चावला, श्री विनोद कुमार, श्री अमित कुमार, श्री राजेश पाण्डेय, कैप्टन श्री सागर दासगुप्ता, श्री आदर्श कश्यप, श्री मणिशंकर कुमार, श्री जग मिश्रा, श्री अमित कुमार साहा, श्री प्रतिबिंब शर्मा, श्री अवेध आलोक, अल्का शर्मा, श्री सतीश चौहान, प्रोफेसर विकास शर्मा, श्री कुमार सुबोध इत्यादि प्रमुख रहे।
श्री ऋषि कुमार शर्मा द्वारा आज के समस्त आयोजन के प्रस्तुतीकरण पर विवेचनात्मक टीका-टिप्पणी सहित कार्यक्रम में देश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से उपस्थित रहे जनसमुदाय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के साथ यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
— कुमार सुबोध

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