गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा एवं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के तत्वाधान में काका कालेलकर राष्ट्रीय प्रोत्साहन सम्मान -2025 के “अर्पण समारोह” का भव्य आयोजन सम्पन्न

नई दिल्ली के राजघाट स्थित गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा के सभागार में काकासाहेब कालेलकर एवं विष्णु प्रभाकर की स्मृतियों को समर्पित सन्निधि संगोष्ठी के अंतर्गत गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा (दिल्ली) एवं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान (नोएडा) के तत्वावधान में काका कालेलकर राष्ट्रीय प्रोत्साहन सम्मान – 2025 के “अर्पण समारोह” का भव्य आयोजन किया गया।
इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता का दायित्व फ़िल्म निर्माता एवं रंगकर्मी डॉ राजीव श्रीवास्तव के सशक्त हाथों में रहा। मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वहन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ केशुभाई देसाई ने किया। सम्माननीय अतिथि के तौर पर गांधीवादी विचारक, समर्थक, समाजसेवी एवं अधिवक्ता डॉ शंकर कुमार सान्याल विराजमान रहे। पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, हिन्दी भाषा सेवी एवं अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव श्री नारायण कुमार ने सान्निध्य प्रदान किया। संयोजक की श्रेणी में विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के अध्यक्ष श्री अतुल विष्णु प्रभाकर, वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती कुसुम शाह एवं श्रीमती अंजू खरबंदा उपस्थित रहे। संचालन का कार्यभार गांधीवादी विचारक, समाजसेवी, पत्रकार एवं लेखक श्री प्रसून लतांत के सशक्त हाथों में रहा।
तत्पश्चात्, संचालक महोदय ने एक-एक करके सारगर्भित आलेख के माध्यम से मंचासीन गणमान्य विभूतियों के जीवन के कुछ उल्लेखनीय तथ्यों को परिचयात्मक स्वरूप सभागार में उपस्थित विद्वतजनों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए मंच पर अपना-अपना स्थान ग्रहण कराया।
अध्यक्षता कर रहे डॉ राजीव कुमार श्रीवास्तव फिल्म निर्माता-निर्देशक, रंगकर्मी, इतिहासवेत्ता, लेखक एवं साहित्यकार हैं, जो निरंतरता से समय-समय पर महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों के जीवन पर सृजन की विविध अभिव्यक्तियों द्वारा सामाजिक परिवेश का ज्ञानार्जन करते आ रहे हैं।
मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वहन कर रहे डॉ केशुभाई देसाई, जिन्होंने कुछ वर्षों में ही अपनी प्रैक्टिस छोड़ दी थी और साहित्य-सृजन में संलग्न हो गए थे। पूर्णकालिक साहित्यकार हैं, जो केवल साहित्य-साधना ही करते हैं।
सम्मानित अतिथि के तौर पर विराजमान डॉ शंकर कुमार सान्याल, गांधी जी द्वारा स्थापित संस्था के अध्यक्ष हैं। पिछड़े वर्ग के लोगों को आगे लाने के कार्यों में निरंतर प्रयासरत हैं। साथ ही, गांधीवादी विचारधारा का एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व एवं प्रवर्तक हैं।
सानिध्य प्रदाता श्री नारायण कुमार अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् के महासचिव हैं और निरंतरता से भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के प्रति समर्पण भाव से योगदानकर्ता के तौर पर कार्यरत हैं। इसके साथ-साथ विश्व पटल पर भी वह तन्मयता से हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में कर्मठता के साथ संलग्न हैं।
लक्ष्मीबाई कालेज सेवानिवृत्त प्राचार्य, शिक्षाविद् एवं साहित्यकार डॉ वीणा गौतम ने अपनी उपस्थिति से सानिध्य प्रदान कर सभागार को दीप्तिमान अलंकरण से शोभायमान बनाया।
कार्यक्रम के आरंभ को गति प्रदान करते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज और कुशल वाकपटुता परिपूर्ण शब्दावली के उपसर्गों सहित क्रमबद्ध तरीके से मंचासीन गणमान्य विभूतियों को संचालक द्वारा अतुल विष्णु प्रभाकर को अंगवस्त्र ओढ़ाकर एवं भेंट स्वरूप महत्त्वपूर्ण सामग्री परिपूर्ण बैग उपहार स्वरूप प्रदान करके सम्मानित किया गया। तत्पश्चात्, अतुल विष्णु प्रभाकर ने अपने स्वागतीय उदबोधन में दृष्टिगोचर के माध्यम से सभागार में उपस्थित विद्वतजनों को अवगत कराया कि गत 13 वर्षों से अलंकरण की इस श्रृंखला से विभिन्न शहरों और क्षेत्रों में विविध क्षेत्रों और विधाओं में सृजनात्मकता कार्यों में उत्कृष्ट योगदान हेतु कुछ श्रेष्ठतम व्यक्तित्वों को सम्मानित किया जाता आ रहा है। इस दीर्घ अंतराल के मध्य अभी तक 150 व्यक्तित्वों को इस अलंकरण से सम्मानित किया जा चुका है। हम जिन लोगों को सम्मानित करते हैं, उसके बाद हम उनसे किसी भी प्रकार का ना तो कोई कार्य करवाते हैं और ना ही उनसे किसी प्रकार के सहयोग की पेशकश अथवा अपेक्षा स्वीकार्य है। एक निर्धारित चयन-प्रक्रिया के तहत बिना किसी की सिफारिश के अंलकृत होने लायक विशिष्ट विभूतियों का बिना किसी पक्षपात के निर्णायक मंडल द्वारा चिंहित किया जाता है।
अगले चरण में, इस आयोजन के प्रमुख चरण वर्ष 2025 के लिए काका कालेलकर राष्ट्रीय प्रोत्साहन सम्मान समारोह का शुभारंभ किया गया।
समाज के विभिन्न क्षेत्रों से उत्कृष्ट योगदान हेतु चयनित विभूतियों को मंचासीन गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा माल्यार्पण, अंगवस्त्र ओढ़ाकर, प्रशस्ति-पत्र एवं स्मृति-चिन्ह प्रदान करके सम्मानित किया गया, जिनके नाम इस प्रकार हैं:-
पत्रकारिता के लिए तेजस वैद्य; समाज सेवा एवं महिला सशक्तिकरण के लिए श्वेता अग्रवाल; अनुवाद-भाषा के लिए मीनू माथुर बधवार; शिक्षा, साहित्य एवं भाषा के लिए श्रीलंका निवासी प्रो॰ आर के डी निलंती के राजपक्षे तथा कला – शास्त्रीय संगीत के लिए दिनेश कुमार। इसी क्रम में जहां एक ओर, डॉ राजीव कुमार श्रीवास्तव ने वरिष्ठ साहित्यकार कुसुम शाह अपनी संरचनाओं की एक सीडी भेंट स्वरूप प्रदान की। वहीं दूसरी ओर, प्रो॰ राजपक्षे को गीतकार मुकेश के जीवन पर सृजित अपनी पुस्तक भेंट स्वरूप प्रदान की। तत्पश्चात्, संचालक द्वारा क्रमबद्ध तरीके से अलंकृत विभूतियों को अपने-अपने उदगारों के लिए आमंत्रित किया गया।
तेजस वैद्य ने अपने उदबोधन में रेखांकित किया कि जीवन-लीला पुस्तक में नदियों का बहुत ही सजीवता से बहुत अच्छा वर्णन किया गया है। मैंने वह नदियां नहीं देखी हैं, देखना भी नहीं चाहता। इमरजेंसी के दौरान जेल में बंद रहते हुए कोक्रोच पर सृजित अपनी पुस्तक पर बात करते हुए उसके महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला। हमारी परम सखा मृत्यु ही है, फिर उससे घबराना कैसा। काकासाहेब कालेलकर का सृजन बहुत विशाल है। गांधी जी की नक्षत्र माला पर ध्यानाकर्षण प्रकरण के माध्यम से व्याख्यायित करके विस्तार दिया। महादेव देसाई के सृजन पर टीका-टिप्पणी के साथ प्रकाश डालते हुए अपनी वाणी को विराम दिया।
अपने अतिसंक्षिप्त और संकुचित वक्तव्य में श्वेता अग्रवाल ने सामाजिक परिवेश में अपने द्वारा प्रदान की गई सेवाओं को ध्यान में रखते हुए मुझे सम्मानित किए जाने हेतु आयोजकों का धन्यवाद और आभार व्यक्त करके अपना स्थान ग्रहण किया।
मीतू माथुर बधवार ने अपना दृष्टिगोचर प्रस्तुत करते हुए कहा कि उन्होंने 16 पुस्तकों का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया है। वह भाषा के लिए तड़प रही थी। उन्होंने वीडियो बनाए। यह सब अपनी अभिव्यक्ति के लिए ही किया। प्रणाम में प्र उपसर्ग है। णाम नम से आता है। झुककर सम्मान देना, यही प्रणाम कहलाता है। अपने वक्तव्य को पूर्णता प्रदान करने से पूर्व उन्होंने नमस्ते शब्द को भी संधि-विच्छेद के विस्तार से व्याख्यायित किया।
प्रो॰ निलंती राजपक्षे ने अपने वक्तव्य में अवगत कराया कि श्रीलंका में विदेशी भाषा के तहत हिन्दी पढ़ाई जाती है। उन्होंने भाषा और संगीत में अध्ययन किया है। केंद्रीय हिन्दी संस्थान में विजिटिंग प्रोफेसर की भूमिका मिली थी। 2 वर्ष के बच्चे के साथ वर्धा विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर पढ़ाई की थी। शोध करके पीएचडी भी किया है। तत्पश्चात्, प्रोफेसर की सेवा मिल गई। मैंने पांच पुस्तकों का संपादन किया है। बाल कहानियों एवं लोक-कथाओं का सिंगली भाषा में अनुवाद किया है। आईसीसीआर से जुडकर काम कर रही हूं और पाठ्यक्रम निर्धारण के दायित्व का निर्वहन करती आ रही हूं।
दिनेश कुमार ने अपने संक्षिप्त उदगारों के माध्यम से श्रोताओं को संबोधित करते हुए बताया कि शास्त्रीय संगीत में उनका प्रिय और विशिष्ट वाद्य हारमोनियम है। फिर भी, आप सभी के अनुरोध को मध्य नज़र रखते हुए कुछ गाकर सुनाता हूं। अपनी सुरमई प्रस्तुति ‘पायो जी मैंने, राम रतन धन पायो…….’ के गायन के पश्चात् अपनी वाणी को विराम दिया।
अतुल विष्णु प्रभाकर के विशेष अनुरोध पर सभागार में उपस्थित प्रसिद्ध संगीतज्ञ राजेश नेगी ने अपनी शास्त्रीय संगीत की संगीतमय प्रस्तुति से जनसमुदाय को मंत्रमुग्ध करते हुए भाव-विभोर कर दिया।
नारायण कुमार ने अपने उदबोधन में स्पष्टता से उदृधत किया कि गांधी जी ने डांडी मार्च और नमक सत्याग्रह का मार्ग चुना था। ‘यात्रा का आनंद’ पुस्तक का जिक्र करते हुए उनकी देश भ्रमण की गतिविधियों को रेखांकित करते हुए उनकी देशभक्ति परिपूर्ण भावनाओं के प्रति ज्ञानार्जन किया। दीनबंधु एंड्रूस के बारे में में संक्षिप्त में अवगत कराया। ‘छूता है पवन जिसको, उससे बहकर वह हम तक आता है…..’ काव्य रचना का काव्यपाठ करते हुए अपने उदबोधन को परिपूर्ण करने से पूर्व स्पष्टीकरण दिया कि यह बुद्ध, गांधी और काका कालेलकर का देश है। इसका भविष्य सदैव उज्जवल ही रहेगा।
डॉ शंकर कुमार सान्याल ने अपनी सौम्य वाणी में गांधी के जीवन से जुड़े कुछ अनकहे-अनसुने-अनछूए तथ्यों को व्याख्यायित करते हुए उनकी भावनाओं और देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठा को कुछ चुनिंदा प्रकरणों के माध्यम से रेखांकित करने के पश्चात् अपने उदगारों को विराम दिया।
डॉ केशुभाई देसाई ने अपने उदबोधन में काकासाहेब कालेलकर के गुजरात और महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि से जुड़े कुछ अनकहे-अनसुने-अनछूए तथ्यों कि किस्सागोई के माध्यम से उनके जीवनयापन के तौर-तरीकों तथा जीवन-शैली के आधारभूत संयमित गांधी जी द्वारा प्रतिपादित स्थापित मूल्यों के आधार पर स्वावलंबी रहते हुए जीवन का निर्वाह किया। अपनी वाणी को विराम देने से पूर्व उन्होंने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की काव्य-रचना ‘समर शेष है…..’ अपने सुरम्य स्वर में सुनाई और मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में डॉ राजीव कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि जो युगपुरुष हुआ करते हैं, जो कालजयी होते हैं, इस तरह का समावेशी व्यक्तित्व काका कालेलकर का ही था, जो हमारे जीवन में सदैव प्रेरणादाई रहेगा। उनका सृजन हमारी तन्द्रा को जागृत करने में समर्थ है। मौन की अपनी भाषा होती है और जब मौन मुखरित होता है, तो बदलाव की पुरवाई बहने लगती है। बदलाव की परिस्थितियां प्रकट होने लगती हैं।
मौन जब मुखर होते ही बदलाव की बयार बह निकलती है। आप नहीं, आपका काम बोले। अमिताभ बच्चन की परिस्थितियों के प्रकरणों के माध्यम से जीवन में आने वाली क्लिष्टताओं और उतार-चढ़ावों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया। उन्होंने अवगत कराया कि शमशाद बेगम ने 94 वर्ष की आयु में निर्माता के तौर पर फिल्म बनाई थी। यह हिन्दी भाषा का ही कमाल है। हम इन दोनों महान विभूतियों के अनुयायी हैं। उसके लिए चिंतन मनन करते हुए हमें समर्पण भाव से कार्य करना होगा।
श्रोता-दीर्घा में देश-विदेश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से आज के कार्यक्रम में पधारी प्रमुख विभूतियों में सदानंद कवीश्वर, अर्चना गोयल, स्वास्ति कपूर, विक्की कपूर, श्रीकांत, डॉ मुख्तार अहमद, अभिषेक, बाल कीर्ति, सुगंधी, श्वेता अग्रवाल, कृष्णा बिष्ट, डॉ वीणा गौतम, भाग्येन्द्र पटेल, संजय राय, नरेश यादव, नंदन शर्मा, शंभू कुमार साह, महेन्द्र सिंह, नीरज बधवार, हीना, चाॅंद शर्मा, रूपा देवी, डॉ पूरनसिंह, राजेश पटेल, पूर्णिमा पटेल, श्रवण कुमार, एन आर बब्बर, गणेश कुमार, दिनेश कुमार, राजेश सिंह नेगी तथा कुमार सुबोध इत्यादि उल्लेखनीय रहे।
सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारी एवं सौम्य व्यक्तित्व के धनी डॉ पूरनसिंह द्वारा देश-विदेश के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से पधारे विद्वतजनों, प्रबुद्धजनों एवं आगंतुकों के प्रति कृतज्ञतापूर्वक धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के पश्चात् यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर मेरे द्वारा लिए गए कुछ चित्र एवं वीडियो आप सभी के अवलोकनार्थ यहां प्रस्तुत हैं।
रिपोर्ट – कुमार सुबोध
