विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित अनीता प्रभाकर स्मृति कहानी प्रतियोगिता सम्पन्न

दिनांक 02.05.2026 को नई दिल्ली के मंडी हाउस स्थित रबीन्द्र भवन में साहित्य अकादेमी के सभागार में विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के तत्वावधान में अनीता प्रभाकर स्मृति कहानी प्रतियोगिता – 2025 के तृतीय संस्करण के अंतर्गत “पुरस्कार वितरण समारोह एवं कहानी पर चर्चा” का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता का दायित्व अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रज्ञान पुरुष पंडित सुरेश नीरव के सशक्त हाथों में रहा। मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वहन कला संगम एवं कथानक के संपादक डॉ अनुज ने किया। संचालन का दायित्व गांधीवादी विचारक एवं जनसत्ता के पूर्व प्रखर पत्रकार प्रसून लतांत के सशक्त हाथों में रहा।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र का शुभारंभ मंचासीन गणमान्य विभूतियों एवं सभागार में विराजित अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद् के राष्ट्रीय महासचिव नारायण कुमार को विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से माल्यार्पण, शाल ओढ़ाकर एवं भेंट स्वरूप उपहार प्रदान करके सम्मानित किया गया। तत्पश्चात्, आकाशवाणी स्वर कोकिला उमा शर्मा द्वारा मां सरस्वती वंदना की सुरमई प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम को गति प्रदान की गई।
अपने आरंभिक उदबोधन में विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के सर्वेसर्वा अतुल विष्णु प्रभाकर ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर दृष्टिगोचर के माध्यम से रेखांकित करते हुए अवगत कराया कि इस तृतीय संस्करण की प्रतियोगिता में सहभागिता हेतु 73 पुरूषों एवं 102 महिलाओं की कुल मिलाकर 175 कहानियां प्राप्त हुई थी। इस प्रतियोगिता की चयन-प्रक्रिया के अंतर्गत पुरस्कृत कहानियों का निर्धारण तीन चरणों के स्तर पर क्रियान्वयन द्वारा किया जाता है। इसके तहत निर्णायक मंडल से प्राप्त हुई सभी कहानियों के रचनाकारों का नाम एवं लिंग गोपनीय रखा जाता है। इसके परोक्ष में उद्देश्य मात्र यह है कि संपूर्ण चयन प्रक्रिया द्वारा चयनित कहानियों पर कोई पक्षपात का आक्षेप ना लगा सके। इस वर्ष प्रथम चक्र में कुल मिलाकर 175, द्वितीय चक्र में 21 पुरूषों एवं 42 महिलाओं अर्थात् कुल मिलाकर 63 तथा तृतीय चक्र में पहुंचने पर इनकी कुल संख्या 12 रही, जिसमें 5 पुरूष एवं 7 महिलाओं की रचनाएं रही। इसमें महिलाओं की भागीदारी निरंतरता से बढ़ती जा रही है। छह महीने गतिमान रहने वाली इस प्रक्रिया के अंतिम पड़ाव पर 2 पुरुष एवं 6 महिला रचनाकारों की कहानियों को अलंकरण हेतु निर्णायक मंडल आचार्य अनमोल, डॉ वेदमित्र शुक्ल एवं डॉ सविता मिश्रा द्वारा चयनित किया गया।
अगले चरण में अनीता प्रभाकर की पोती विभूति गोयल ने अपने आलेख के माध्यम से अपने अंतर्मन के उदगारों द्वारा अवगत कराया कि मैं नारी के जीवन के संघर्षों एवं उसकी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना चाहती हूं। मेरी दादी को हिन्दी साहित्य पढ़ने और लिखने से बहुत गहरा लगाव रहा है। जीवन की विभिन्न जिम्मेदारियों का संतुलन बनाए रखते हुए उन्होंने अपने लेखन को सहेजकर रखा। जब एक नारी को अवसर और समर्थन मिलता है, तो वह समाज को नई और सुंदर दिशा प्रदान करने का प्रयास करता है। मेरी दादी की पुस्तकों “मुक्त गगन की ओर” तथा “आओ बदले तस्वीर” में यही सोच और सशक्त विचार स्पष्ट दिखाई देते हैं।
कार्यक्रम के द्वितीय चरण में अनीता प्रभाकर स्मृति कहानी प्रतियोगिता की “पुरस्कृत कहानियां – 2025” पुस्तक का मंचासीन गणमान्य विभूतियों एवं इस अवसर पर उपस्थित विद्वतजनों के कर-कमलों द्वारा विधिवत लोकार्पण किया गया।
इस अवसर पर निर्णायक मंडल के सदस्य आचार्य अनमोल ने अशुद्धियों और व्याकरण पर ध्यानाकर्षण द्वारा रेखांकित करते हुए पुरस्कृत कृतियों से संबंधित प्रकरणों को सभागार में विराजित विभूतियों के समक्ष उदृधत किया।
अन्य सदस्य डॉ वेदमित्र शुक्ल ने अवगत कराया कि निर्णायक मंडल इस समस्त प्रक्रिया क्रियान्वित करने के दौरान आपस में एक-दूसरे को ना ही जानते थे और ना ही आपस में कभी मिले थे। ज्ञाना किया कि कहानी का शीर्षक दो-तीन शब्दों का ही होना चाहिए। हमें उपलब्ध कराई गई कहानियों में उनके लेखकों के नामों का उल्लेख नहीं था। सिर्फ कहानियां थी। डॉ नामवर सिंह के जीवन से जुड़े उदाहरण द्वारा स्पष्टीकरण से सभागार में उपस्थित जनसमुदाय को लाभान्वित किया।
तत्पश्चात्, पुरस्कृत कहानियों के सृजनकर्ताओं को “पुरस्कार वितरण समारोह” मंचासीन गणमान्य विभूतियों के कर-कमलों द्वारा वीणा श्रीवास्तव को ‘अब आप सुनिए’, इन्द्रजीत कौर को ‘शब्द- नि:शब्द’, अरूण कुमार को ‘एक जोड़ी नम आंखें’, वेद स्मृति कृति को ‘खाली फ्रेम का सच’, रेनू श्रीवास्तव को ‘तारीख’, सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा को ‘स्वेटर’, सुधा जुगरान को ‘बिखरते जज़्बात और इक्कीसवीं सदी’ तथा रंजना जायसवाल को ‘तिथि’ के लिए माल्यार्पण, शाल ओढ़ाकर, स्मृति-चिन्ह, प्रशस्ति-पत्र एवं अनुदान राशि प्रदान करके सम्मानित किया गया।
सर्वग्राहृय एनसाइक्लोपीडिया स्वीकार्य नारायण कुमार ने अपने संक्षिप्त उदबोधन में अवगत कराया कि टैगोर हिल्स की रचना रांची में हुई थी। विष्णु प्रभाकर को वहां आवारा मसीहा के लिए सम्मानित भी किया गया था। तभी उनसे मेरा परिचय भी हुआ था। निर्णायक मंडल का उदबोधन बहुत ही प्रेरणादायक रहा। ऐसी प्रक्रिया निर्विरोध और संवाद प्रदान करने वाली होती है। विष्णु प्रभाकर ने अपनी संतानों को यथोचित शिक्षित किया। अलंकृत विभूतियों को बधाईयां अर्पित करने के उपरांत उन्होंने अपनी वाणी को विराम दिया।
डॉ अनुज ने अपने वक्तव्य के माध्यम से रेखांकित किया कि पुरस्कार प्रोत्साहन होता है। कहानियां भाव होती हैं। वास्तविक कहानी का स्वरूप एआई के प्रभाव और पहुंच से बाहर है। फणीश्वरनाथ रेणु की मैला आंचल के प्रकाशक ने बहुत से शब्दों को बदल दिया था, जिसपर उन्होंने प्रकाशक महोदय से कहा था कि तुमने तो मेरी दुकान ही बंद कर दी। 175 कहानियों का चयन महत्त्वपूर्ण था। कभी अपने संज्ञान में आए एक निर्णायक का प्रकरण को श्रोताओं के समक्ष रखते हुए बताया कि उसने बिना सभी को पढ़े पुरस्कृत व्यक्तित्वों का चयन कर लिया था। विमर्श पर कहानी लिखना बहुत महत्वपूर्ण है। मात्रा से अधिक गुणवत्ता महत्त्वपूर्ण है। खुली आंखों से सपने देखने जैसा है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी एवं मुंशी प्रेमचंद की रचनाधर्मिता को संक्षेप में उदृधत करते हुए अपने वक्तव्य को विस्तार दिया। सपनों को अपनी स्मृति से उकेरकर मूर्त रूप देना ही कहानी है, जिसकी एक सहज प्रक्रिया को भी समझाया। पुरस्कार को प्रोत्साहन के तौर पर स्वीकारें, अहंकार के रूप में नहीं, इन्हीं शब्दों के साथ बधाई पश्चात् अपनी वाणी को विराम दिया।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में पं सुरेश नीरव ने सभागार में विराजित विद्वतजनों के समक्ष अपने उदगारों को व्याख्यायित करते हुए कहा कि मैं अतुल विष्णु प्रभाकर को मिला कम हूं, देखा है। उनके डीएनए में आज भी विष्णु प्रभाकर बोलते हैं। मुझे विष्णु प्रभाकर का सान्निध्य प्राप्त हुआ है। मैं कांच में एक सांड की तरह आता हूं और अपनी बात कहता हूं। इंडियन काफ़ी हाउस में विष्णु प्रभाकर से साक्षात्कार हुआ था। आवारा मसीहा भी पढ़ा था। सरफरोशी की तमन्ना फिल्म बना रहे थे। उनका घर आश्रम की तरह से था। अतुल विष्णु प्रभाकर ने बिस्मिल की अदभुत और अभूतपूर्व बातें बताई। शाला को त्यागकर मनुष्य विशाल बनता है। कहानी का उदगम लोकमत से आरंभ होता है। हरिश्चन्द्र तारामति का जिक्र करते हुए ज्ञानार्जन किया कि मार्कंडेय पुराण में इसका उल्लेख है। मां की ममता को रेखांकित करने वाली कथा है। दादी-नानी से कहानी सुनना उसका वास्तविक उदगम स्थल है। लाओत्से का प्रकरण द्वारा बताया कि सूर्योदय देखते हुए साथ गए सज्जन ने कहा कि यह कौन-सा अदभुत दृश्य है। उसका इतना कहना मुझे उस दृश्य के अवलोकन करने से प्राप्त हो रही अनुभूति के आनंदलोक से एकाएक बाहर ले आया। मेरी भावों की चेतना त्वतरित मर गई और मैं वापिस लौट आया। हमें दर्शक दीर्घा में नहीं होना है। अधिकांशतः पन्ना धाय की कहानी के लेखक का नाम मालूम नहीं होगा। जो चीज समाज से निकलकर आती है, वह कहानी का प्रतिरूप धारण कर लेती है। उन्होंने संक्षेप में नव कहानी पर भी बात की। संवेदनाओं का चेतना से संबंधित हो जाने से ही कहानी का प्रादुर्भाव होता है। कथन कहने के लिए कंटैंट का होना ही कहानी है, इसी वाक्यांश से अपने उदबोधन को अलंकृत विभूतियों को बधाई देते हुए अपनी बात को विराम देता हूं।
नवीन कुमार गोयल ने अपने अतिसंक्षिप्त उदबोधन में रेखांकित करते हुए अवगत कराया कि सुरेश नीरव से मेरा परिचय शाहदरा से है, जब वह वहां रहा करते थे और कादंबनी में कार्यरत थे। उनके मुखारविंद से आज का उदबोधन सुनकर मैं रोमांचित हो गया। प्रत्येक वर्ष आयोजित किए जाने वाले इस संपूर्ण समारोह का श्रेय अतुल विष्णु प्रभाकर को है, जिसके लिए उनके साथ पूरा परिवार सहयोग करता है। चयन-प्रक्रिया की निष्पक्षता में परिवार का कोई दखल नहीं है। है। मेरा कार्य तो मात्र इतना है कि मैं इस कार्यक्रम और आयोजन को सफल बनाने हेतु आप सभी के सहयोग, योगदान, सहभागिता और समर्पण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद और आभार ज्ञापित करता हूं और पुरस्कृत व्यक्तित्वों को बधाई एवं शुभकामनाएं अर्पित करने के साथ इस प्रथम सत्र के समापन की घोषणा करता हूं।
भोजन अवकाश के पश्चात्, द्वितीय सत्र का शुभारंभ किया गया, जिसकी अध्यक्षता का दायित्व आकाशवाणी से सेवानिवृत्त पूर्व महानिदेशक एवं सुविख्यात गज़लकार लक्ष्मीशंकर वाजपेई के सशक्त हाथों में रहा। कार्यक्रम को गति प्रदान करते हुए माल्यार्पण, शाल ओढ़ाकर एवं भेंट स्वरूप उपहार प्रदान करके उन्हें सम्मानित किया गया। तत्पश्चात्, सभागार में उपस्थित पुरस्कृत रचनाकारों ने अपनी कहानियों का अपने मुखारविंद से अपने अनूठे अंदाज में वाचन करते हुए सभागार में उपस्थित जनसमुदाय को भाव-विभोर करते हुए गड़गड़ाती करतल-ध्वनि से वातावरण को गुंजायमान करने पर बाध्य कर दिया। अंतिम पड़ाव पर, इस कार्यक्रम में देशभर के विभिन्न शहरों से पधारे सभी प्रबुद्धजनों, विद्वतजनों एवं आगंतुकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के साथ यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
श्रोता-दीर्घा में विराजित हिन्दी साहित्य जगत की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षरों में मधु मिश्रा, ममता किरण, डॉ कुसुमलता सिंह, अनुराधा अतुल प्रभाकर, अर्चना प्रभाकर, स्तुति गोयल, डॉ नीलम वर्मा, अरूण कुमार पासवान, पुष्पा शर्मा, आलोक धमीजा, राजकुमार, शशि बाला, डॉ मुख्तार अहमद, परिंदर सिंह सैनी, ललिता सैनी, नीरज, मानसी, उत्कर्ष, सत्येंद्र सिंह, अखिल चंद्र, सुरेन्द्र कुमार, संगीता सिंह तंवर, मीनल कुमार, मनोरमा, कर्नल प्रवीण शंकर त्रिपाठी, मीनू त्रिपाठी, अनिता तिवारी, वंदना, कार्तिक, ज्योति कार्तिक तथा कुमार सुबोध इत्यादि प्रमुख रहे।
कार्यक्रम के दौरान मेरे द्वारा लिए गए कुछ चित्र एवं वीडियो आप सभी के अवलोकनार्थ यहां प्रस्तुत हैं।
रिपोर्ट :- कुमार सुबोध
