सांस्कृतिक समन्वय और अनुवाद

महाराष्ट्र दिवस के अवसर पर दिनांक 3 मई 2026 को वैश्विक हिंदी परिवार के तत्वावधान में संस्कृत समन्वय एवं अनुवाद कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य हिंदी एवं मराठी भाषाओं के मध्य संवाद को सुदृढ़ करना तथा अनुवाद की सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित करना रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. रविंद्र कात्यायन के स्वागत उद्बोधन से हुआ, जिसमें उन्होंने अध्यक्ष डॉ. दामोदर राय खडसे(वरिष्ठ साहित्यकार, पुणे), मुख्य अतिथि श्रीमती लीना मेंहदले(वरिष्ठ चिंतक, पुणे), मुख्य वक्ता सुश्री अडेलै हैन्निश तेंबे(लाईपत्सिग विवि विद्या संस्था, जर्मनी) सहित सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए श्रीमती स्वरांगी साने (लेखिका, महाराष्ट्र) ने ‘गंगा–कावेरी श्रृंखला’ के अंतर्गत हिंदी–मराठी भाषाई संवाद को कार्यक्रम का मुख्य केंद्र बताया तथा भाषा और संस्कृति के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया। बीज वक्ता डॉ. सुनील देवधर( कार्याध्यक्ष,राष्ट्रीय प्रचार समिति, पुणे) ने अनुवाद की परंपरा को लगभग ढाई सौ वर्ष ईसा पूर्व से जोड़ते हुए बौद्ध ग्रंथों से इसकी शुरुआत का उल्लेख किया तथा भाषा को संस्कृति की वाहक बताते हुए अनुवाद में सांस्कृतिक संदर्भों की महत्ता पर बल दिया। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. दामोदर खडसे ने मानवता, प्रेम और सांस्कृतिक मूल्यों पर विचार व्यक्त करते हुए कारगिल युद्ध जैसे प्रसंगों का उल्लेख किया तथा अनुवाद के सिद्धांत “न कुछ जोड़ा जाए, न कुछ छोड़ा जाए” को महत्वपूर्ण बताया। मुख्य अतिथि श्रीमती लीना मेंहदले ने अनुवाद के लिए विषय की गहन समझ को आवश्यक बताया तथा ‘हर घर में तीसरी संतान बने अर्जुन’ विषयक निबंध प्रतियोगिता का उल्लेख किया। मुख्य वक्ता सुश्री अडेलै हैन्निश तेंबे ने अनुवाद को ‘सांस्कृतिक सेतु’ बताते हुए भारतीय भाषाओं का जर्मन भाषा में अनुवाद दोनों संस्कृतियों के बीच सेतु निर्माण का माध्यम बताया।संरक्षक के रूप मे अनिल शर्मा जोशी (अध्यक्ष – वैश्विक हिन्दी परिवार ) ने भाषा के नाम पर हुई राजनीतिक दीवार को तोड़ना तथा देवनागरी लिपि पर जोर देते हुए सभी भारतीय भाषा को एक परिवार का अभिन्न अंग बताया | डॉ. रमेश यादव (अनुवादक,मुंबई) ने महाराष्ट्र का परिचय प्रस्तुत करते हुए मराठी गीतों के माध्यम से सांस्कृतिक अभिव्यक्ति दी। डॉ. गोरख थोरात(हिन्दी विभागाध्यक्ष स.प. महाविद्यालय, पुणे) ने भाषा और संस्कृति के संबंध को स्पष्ट करते हुए कहा कि भाषा का ज्ञान संस्कृति के ज्ञान के बिना अधूरा है। श्रीमती स्वरांगी साने ने अनुवाद में भाव की गहराई को समझने पर बल देते हुए महाराष्ट्र की संस्कृति को ‘पीली साड़ी’ के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया। कार्यक्रम के अंत में सुश्री समीक्षा तेलंग ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया तथा कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रेरणा उवाले(हिन्दी विभागाध्यक्ष,मॉर्डन कला,विज्ञान व वाणिज्य महाविद्यालय,पुणे ) द्वारा सफलतापूर्वक किया गया। इस अवसर पर नारायण कुमार, वी.आर. जगन्नाथन, प्रो. तोमियो मिज़ोकामी एवं डॉ. सुरेंद्र कुमार की गरिमामयी उपस्थिति रही।

रिपोर्ट :- अजय शर्मा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »