वात्सल्य वार्षिकोत्सव के उपलक्ष्य में डॉ कविता मल्होत्रा की दो नवीनतम कृतियों “भारत भाग्य विधाता” तथा “संस्कारों की उड़ान” के लोकार्पण एवं सम्मान समारोह का भव्य आयोजन सम्पन्न

कार्यक्रम की अध्यक्षता का दायित्व सुविख्यात व्यंग्य ऋषि डॉ हरीश नवल के सशक्त हाथों में रहा। मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वहन आकाशवाणी के पूर्व महानिदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने किया। वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती ममता किरण ने सानिध्य प्रदान किया। अतिविशिष्ट अतिथि के तौर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सविता चडढा उपस्थित रही। विशिष्ट अतिथियों की श्रेणी में हिन्दुस्तानी साहित्य सभा के अध्यक्ष डॉ सुधाकर पाठक, हिन्दी अकादमी के पूर्व उपसचिव ऋषि कुमार शर्मा, ट्रू मीडिया के सर्वेसर्वा ओमप्रकाश प्रजापति, आकाशवाणी दूरदर्शन कलाकार, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी, अधिवक्ता एवं लेखक कुमार सुबोध तथा अंतर्राष्ट्रीय रिकार्ड होल्डर पत्रकार एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शंभू पंवार मंचासीन रहे। कार्यक्रम के संचालन का दायित्व शिक्षाविद् अर्चना त्यागी के सशक्त हाथों में रहा।
कार्यक्रम का शुभारंभ संचालिका महोदया ने वार्षिकोत्सव से संबंधित तथ्यों एवं वात्सल्य संस्था की वार्षिक गतिविधियों पर विस्तृत दृष्टिगोचर हेतु डॉ कविता मल्होत्रा के दत्तक पुत्र प्रणव मेहरा को आमंत्रित किया, जिसे उसने बहुत ही तन्मयता के साथ सारगर्भित प्रस्तुतिकरण के माध्यम से सभागार में उपस्थित जनसमुदाय को लाभान्वित किया।
तत्पश्चात्, कार्यक्रम के प्रथम चरण में वात्सल्य संस्था के बाल एवं तरूण सदस्यों द्वारा ‘गणेश वंदना’ की प्रस्तुति के साथ रंगारंग सांस्कृतिक सुरमई प्रस्तुतियों द्वारा आगाज़ किया गया। इसी क्रम में संस्था के विभिन्न ग्रुपों के समूह ने एक-एक करके पर्यावरण पर ‘माटी की पुकार’, ‘संस्कारों की उड़ान’, ‘मैं बसाना चाहता हूं, स्वर्ग धरती पर’, ‘प्राॅब्लम चाइल्ड’, ‘गुस्ताख़ लड़का’, तथा मार्मिक प्रस्तुति ‘हर चीज़ पर अश्कों से लिखा है तुम्हारा नाम’ शीर्षकों के तहत अपनी क्रमबद्ध प्रस्तुतियों द्वारा खचाखच भरे सभागार में उपस्थित विद्वतजनों के समक्ष जहां एक ओर, उन्हें उनमें विद्यमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े संदेशों से आत्मसात कराते हुए ज्ञानार्जन अर्जित करवाया। वहीं दूसरी ओर, उन्हें अपनी अपनी प्रत्येक कड़ी की प्रस्तुतियों पर वाह-वाही के प्रशंसनीय उदगारों एवं उदघोषों सहित दात देते हुए दांतों तले अंगुली दबाने पर विवश तो किया ही, साथ-ही-साथ, अपनी-अपनी भाव-भंगिमाओं से सराबोर होकर गड़गड़ाती करतल-ध्वनि के माध्यम से समस्त वातावरण को गुंजायमान करने पर बाध्य दिया।
इस प्रथम चरण के अंतिम पड़ाव पर “वात्सल्य परिवार” द्वारा अपने माता-पिता तुल्य श्री यशपाल मल्होत्रा एवं डॉ कविता मल्होत्रा के प्रति एक हृदयस्पर्शी सामूहिक प्रस्तुति के माध्यम से श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के साथ इस चरण का समापन किया गया।
कार्यक्रम के द्वितीय चरण में कुशल संचालिका अर्चना त्यागी ने अपने काव्यात्मक अंदाज में सभागार में उपस्थित एवं विराजित गणमान्य विभूतियों को अपने-अपने कर-कमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित करने की प्रक्रिया को क्रमानुसार क्रियान्वित करने के लिए आमंत्रित किया गया। इस चरण के अगले क्रम में डॉ कविता मल्होत्रा एवं यशपाल मल्होत्रा के कर-कमलों द्वारा क्रमानुसार सभी मंचासीन गणमान्य विभूतियों को माल्यार्पण, शाल ओढ़ाकर एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान करके सम्मानित किया गया। इसी क्रम में इन सभी प्रतिष्ठित हस्ताक्षरों के कर-कमलों द्वारा डॉ कविता मल्होत्रा द्वारा सृजित उनकी दो नवीनतम कृतियों “भारत भाग्य विधाता” तथा “संस्कारों की उड़ान” का विधिवत लोकार्पण समारोह परिपूर्ण किया गया।
कार्यक्रम के तृतीय चरण में कुशल संचालिका अर्चना त्यागी ने संयमित परिचय के साथ मंचासीन गणमान्य विभूतियों को अपने-अपने उदबोधन के क्रमबद्ध तरीके से आमंत्रित किया गया।
डॉ शंभू पंवार ने जहां एक ओर, डॉ कविता मल्होत्रा की कर्मठता और समर्पण भाव से सामाजिक परिवेश में उनके सराहनीय योगदान सराहा। वहीं दूसरी ओर, संस्था की प्रस्तुतियों के माध्यम से समाज के जनमानस को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में व्याप्त विसंगतियों और विकृतियों के प्रति सजगतापूर्वक जनचेतना को संचारित और प्रसारित करने का अभिनंदनीय कार्य कर रही हैं। इसके लिए वह सदैव प्रशंसा की पात्र हैं। उसके बाद उन्होंने राजस्थानी और अपनी मातृभाषा मारवाड़ी में कुछ सामाजिक तथ्यों और प्रकरणों के द्वारा श्रोताओं को लाभान्वित करने के उपरांत उन्हें उनकी नवीनतम सृजित कृतियों के लिए बधाई एवं शुभकामनाएं अर्पित करते हुए मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया।
ओमप्रकाश प्रजापति ने अपने उदबोधन में अवगत कराया कि आज का आयोजन बहुत ही बढ़िया और आनंददाई होने के साथ-साथ शिक्षाप्रद रहा है। सभी को इससे सामाजिक परिवेश से संबंधित बहुत-से अदभुत और अनूठे पहलुओं को सारगर्भित और रोमांचक प्रस्तुतियों के द्वारा अत्यधिक ज्ञानार्जन प्रदान किया गया है।

कुमार सुबोध ने अपने वक्तव्य के माध्यम से डॉ कविता मल्होत्रा की लोकार्पित दोनों कृतियों से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां साझा करते हुए अवगत कराया कि वह इन पुस्तकों की सृजनात्मक यात्रा के प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य रहे हैं। इनकी प्रूफ रीडिंग और ऐडिटिंग करते-करते इनके एक-एक प्रकरण और संवाद मेरे मन-मस्तिष्क में अमिटता के साथ अंकित हो गए हैं। निश्चित रूप से यह दोनों कृतियां पाठकों को अवश्य पढ़नी चाहिए, जो उन्हें जीवनयापन में सहायक और सहभागी बनने में उनका पथ-प्रदर्शक बनकर सुधार के प्रयासों में महत्त्वपूर्ण योगदान भूमिका निभाने में समर्थ और सक्षमता प्रदान करेंगी।
डॉ सुधाकर पाठक ने अपने अतिसंक्षिप्त उदबोधन में रेखांकित करते हुए कहा कि यह संस्था भविष्य में ओर अधिक ऊंचाईयां छूने की क्षमता रखती है, ऐसा मेरा दृढ़विश्वास है। मेरा भी प्रयास रहेगा कि भविष्य में अपनी संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में वात्सल्य परिवार के बच्चों की सहभागिता को भी जोड़ा जा सके, जो समाज में एक सुधारक के तौर पर कुछ बदलाव का क्रम लागू कराने में सहायक सिद्ध होगा।
डॉ सविता चडढा ने वात्सल्य संस्था की प्रस्तुतियों की भूरि-भूरि प्रशंसा के साथ-साथ डॉ कविता मल्होत्रा की समाजसेवी गतिविधियों पर ध्यानाकर्षण करते हुए कहा कि काफ़ी समय से इनसे जुड़ी हुई हूं और इनकी संवेदनशील भावनाओं से ओत-प्रोत नाट्य रूपांतरित प्रस्तुतियों की साक्षी रही हूं। समाज को विभिन्न पहलुओं पर शिक्षाप्रद ज्ञानार्जन कराने के साथ-साथ उन्हें क्रियान्वित करने को प्रतिबद्धताओं से सामाजिक परिप्रेक्ष्य में स्थापित करने हेतु प्रेरित करने का दृढ़संकल्पित इच्छाशक्ति का समर्पण भाव भी दर्शाती हैं, जो समाज के प्रति एक अतुलनीय योगदान है।
ममता किरण ने अपने उदबोधन में अवगत कराया कि निश्चित रूप से यह एक श्रेष्ठ समाजसेवी कार्य है, जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है। आज की सभी विधाओं की प्रस्तुतियां एक-से-एक उच्च-कोटि की रही। अपनी कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्ति के वाचन पश्चात् मंच पर अपना स्थान ग्रहण किया।
लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने अपने उदबोधन में अपने समय के कुछ जीवंत प्रकरणों के द्वारा सभागार में उपस्थित जनसमुदाय को लाभान्वित करने के साथ-साथ जीवनयापन के कुछ संजिदा पहलुओं पर भी ध्यानाकर्षण प्रस्तावित करते हुए आज के समय में जेंनजी कही जाने वाली पीढ़ी को आगाह करते हुए मार्गदर्शन प्रदान किया कि यह जीवन अनमोल है और इस दौरान कर्मठता से कुछ कर गुजरने की आवश्यकता है। परिश्रम के द्वारा चट्टानों में से भी पानी निकाला जा सकता है।
वात्सल्य संस्था के संस्थापक एवं भीष्म पितामह श्री बी एस मक्कड़ ने अपनी सृजित रचनाओं के साथ-साथ हिन्दी साहित्य जगत के कुछ चुनिंदा हस्ताक्षरों की कविताओं के अपनी ओजपूर्ण वाणी में काव्यपाठ द्वारा सभागार में उपस्थित जनसमुदाय को दांतों तले अंगुली दबाने पर विवश करते हुए वाह-वाही के उदघोषों से वातावरण को आच्छादित करने पर विवश कर दिया।
अपने अध्यक्षीय उदबोधन में डॉ हरीश नवल ने सौम्यता से रेखांकित करते हुए कहा कि इतनी शक्ति हमें देना दाता……इन शब्दों में बहुत शक्ति है, जिसमें जीवन का सार निहित है। उन्होंने ऐतिहासिक सन्दर्भों जैसे राम ने सीता को छोड़ा, श्रीकृष्ण के जीवन और महाभारत काल से जुड़े प्रकरणों तथा शिवजी के शिवत्व को उदृधत करते हुए विस्तार से समझाया कि दाता है कौन? सर्वशक्तिमान कौन है? विधायक, वोट के बाद कुछ नहीं करते हैं। पैसा इकट्ठा करते रहते हैं और कभी दिखाई नहीं देते। आज विवेकानंद याद आते हैं, जो सही मायने में हमारे दाता हैं। उन्होंने ही कहा था कि ‘अपने दीपक खुद बनो।’ अपना अनुशासन ही आपका मार्गदर्शक होता है। मैं रंगमंच से संबंध रहा हूं। आज अपने भीतर विद्यमान विचारशक्ति की आवश्यकता है। प्रस्तुतियों के माध्यम से आज बच्चों ने ऐसा ही किया है। हम अभिव्यक्त नहीं कर पाते। संप्रेषित हो रहा है कि नहीं। किसी भी विधा से संप्रेषण है, तो सार्थकता है। एक साथ अत्यधिक प्रस्तुतियां अति बोरियत और उबाऊ लगने लगती हैं। प्रस्तुतियों की संख्या कम हो। मंच पर भी लोग कम हों। जिंदगी में थकना नहीं है। जीवन में हरी-वरी-करी की कोई जरूरत नहीं है। अर्थात्, हरी – कोई रैट रेस नहीं। वरी – कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। करी – उसका समुचित श्रवण जरूरी है। सबका कुल मिलाकर टोटल दस ही होगा। आज चिंतन मनन नहीं है। स्वयं को उनके आदर्श बनना होगा। आत्मनिरीक्षण बहुत जरूरी है। नैतिकता की बात की गई है, लेकिन उसे अपने दैनिक जीवन में क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। कहने को बहुत कुछ है, किंतु समय सीमा को ध्यान में रखते हुए इन्हीं शब्दों के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूं।
इस अवसर पर श्रोता-दीर्घा में विराजित विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से पधारे विद्वतजनों में वात्सल्य संस्था के संस्थापक एवं भीष्म पितामह बी एस मक्कड़, वात्सल्य संस्था के आधार स्तम्भ यशपाल मल्होत्रा, डॉ कल्पना पाण्डेय ‘नवग्रह’, डॉ कुसुमलता सिंह, डॉ अंजू क्वात्रा, वीणा अग्रवाल, शकुंतला मित्तल, डॉ संजय जैन, डॉ उर्वी उदल, डॉ गीतांजलि अरोड़ा ‘गीत’, रोहित आनंद, नीलांजल बैनर्जी, मुहम्मद इस्हाक़ ख़ान, संतोष खन्ना, बबली सिन्हा ‘वान्या’, पूजा श्रीवास्तव, प्रकाश कंवर, राधा गोयल, यति शर्मा, नयन नीरज ‘नायाब’, सुनीला नारंग, हिमांशु शुक्ल, आरती वर्मा, कुलदीप कौर, पूनम मल्होत्रा, प्रेरणा सिंह, भूपेन्द्र कौर, लक्ष्मी अग्रवाल, उमंग जौली सरीन, राघव, कोमल पंत, पंकज सिंह, नीरजा मेहता ‘कमलिनी’, कविता विकास, सुमन गोयला, डॉ वंदना गुंसाई, डॉ कविता सिंह ‘प्रभा’, अशोक गुप्ता, ऊषा श्रीवास्तव, राजीव श्रीवास्तव, विभा राज ‘वैभवी’, अवधेश कनोजिया, शिप्रा खरे, विनोद पाराशर, दीपिका वल्दिया, डॉ सैयद अली अख़्तर ‘नकवी’, अजिमा ‘नकवी’, मीनाक्षी ‘स्वर्ण शांति’, वनिता शर्मा, मीनाक्षी सुकुमारन, निधि भार्गव ‘मानवी’, शुभ्रा पालीवाल, हनुमान रतनू, गरिमा संजय, रितु रस्तोगी, सरिता गर्ग, किशोर श्रीवास्तव, अशोक कुमार, रजनीश गोयल, मीनाक्षी भसीन, रितु अग्रवाल, देवेंद्र, विनोद पाराशर, हिमांशु, भूपेंद्र राघव, डॉ हेमलता बबली वशिष्ठ तथा ग्रुप कैप्टन अखिलेश कुमार सिंह इत्यादि प्रमुख रहे।
अंतिम पड़ाव पर यशपाल मल्होत्रा द्वारा कार्यक्रम में देश-विदेश के सुदूर शहरों और क्षेत्रों से पधारकर सम्मिलित हुए प्रबुद्धजनों, विद्वतजनों एवं आगंतुकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए धन्यवाद और आभार ज्ञापित करने के साथ यह भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।
— कुमार सुबोध,
