“भरी गर्मी में काव्य की शीतल छाँव : अंतस् की 82वीं गोष्ठी बशीर बद्र को समर्पित”

28 मई की ‘नौ तपा’ की शाम 8 बजे आयोजित अंतस् की 82वीं गोष्ठी मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र जी को समर्पित रही। 15 फ़रवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे हर दिल अज़ीज़ शायर बशीर बद्र साहेब 28 मई 2026 को इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए। एक से बढ़कर एक शेर कहने वाले बशीर बद्र ने कभी कहा था, “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए” और आख़िरकार वो दिन आज का ही हुआ, जब उनकी ज़िंदगी की शाम हो ही गयी पर हम सभी जानते हैं कि अपने अशआर के ज़रिये वो हमारे बीच हमेशा रहेंगे। प्रसिद्द ग़ज़लगो डॉ. आदेश त्यागी जी के अनुपम सान्निध्य और प्रतिष्ठित कवयित्री श्रीमती सोनम यादव जी की गरिमामयी अध्यक्षता में आयोजित अंतस् की इस विशिष्ट गोष्ठी में मुख्य अतिथि रहे ‘नवांकुर साहित्य सभा’ के अध्यक्ष श्री अशोक कश्यप जी और विशिष्ट अतिथि का दायित्व निभाया ‘पथगामिनी’ संस्था की अध्यक्ष श्रीमती मंजुलता श्रीवास्तव जी ने। अंतस् की अध्यक्ष डॉ. पूनम माटिया के सुंदर संयोजन और सधे हुए रोचक संचालन में काव्य-प्रस्तुतियों का सुमधुर आरम्भ हुआ। संगीत शिक्षक एवं कवि श्री राम लोचन जी द्वारा सरस्वती वंदना से।
‘मृदु भाषिणी! हंसासिनी! माँ शारदे! वरदान दे हर कंठ को तू तान दे
माँ शारदे! वरदान दे, माँ शारदे! वरदान दे, हर छंद का लय ज्ञान दे’
डॉ. आदेश त्यागी ने गर्मियों में आराम के महत्त्व को रेखांकित करते हुए मज़ाहिया ग़ज़ल पढ़ी और उनके शृंगारिक गीत ने समां बाँध दिया।
देह के रेखागणित को ध्यान से पढ़ने लगे थे,
नेह के प्रतिमान नित नये गढ़ने लगे थे।
बस आराम करने को जी चाहता है, कि खर्राटें भर ने को जी चाहता है।
बस एसी के आगे ही लेटे रहें हम, कि दिन भर पसरने को जी चाहता है।
सोनम यादव जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में अंतस् की अबाधित उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान दे रहीं गोष्ठियों को सराहते हुए सभी कवियों के काव्य-वाचन पर सारगर्भित प्रतिक्रिया देते हुए उत्तम भाव रेखांकित करने के उपरान्त कुण्डलिया छंद और गीत प्रस्तुत किया।
मनभावन है फूल तो प्रेम-भाव से सींच
सीमाओं में बंध सके कहाँ प्रतिभाओं के तार
अपनी क़ुव्वत से कर लेते सात समुंदर पार। श्री अशोक कश्यप जी (गीत: सामने सूरज सूनामी, ज़िंदगानी है बचानी है समुन्दर दूर मीलों, आग फिर भी है बुझानी); श्रीमती मंजू लता श्रीवास्तव (छन्दमुक्त कविता: ये अजीबो-ग़रीब शोर! अचानक राख में समाती बस्तियाँ); डॉ. दिनेश कुमार शर्मा(स्वदेशी का महत्त्व: कोलगेट,पामोलिव छोड़ो/ नीम बबूल पुकार रहे/ भाव स्वदेशी अपनाने को छिड़ा आज अभियान है); श्री मनोज कामदेव(दोहे: धूप उतर कर खेत में लगा रही है आग/ मिट्टी भी चुपचाप से, देख रही है दाग़); श्री अनिल कपूर(ग़ज़ल: सपनें तैरेंगे और आँखों में/ मेरे ख़त का जवाब ले आया); कर्नल प्रवीण त्रिपाठी(छंद बद्ध: दिन-दिन गर्मी बढ़ती जाती, ओ पावस कब आओगे); श्री देवेद्र प्रसाद सिंह (मुक्तक एवं घनाक्षरी: दीदी के दामादों ने गर्क़ किया बेड़ा है/ कल वो फिरेंगे गाते ई. वी. एम. छेड़ा है); श्री राम लोचन जी (ये कौन अजनबी है जो मेरे घर में है/ यानी मेरा वुजूद अना के असर में है) और डॉ. पूनम माटिया ने दोहे तथा ग़ज़ल पढ़ी( भट्टी जैसी तप रही, मात धरा की देह/ प्यासी अँखियाँ तक रहीं, कब बरसेगा मेह) (निभाना था उसूलों को, झुका कर सर जिया मैंने/ जो बात उठ्ठी कभी तेरी, किया सब अनसुना मैंने मुहब्बत की रवायत का सदा ही पास रक्खा है/ कभी दुश्मन नहीं समझा, न की आलोचना मैंने)
रिपोर्ट :— डॉ. पूनम माटिया
