कविता के दो स्वर : छंदबद्ध एवं छंदमुक्त कविता पर सार्थक ऑनलाइन परिचर्चा


दिनांक : 21 जून 2026 हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा 21 जून 2026 को “कविता केदो स्वर : छंदबद्ध एवं छंदमुक्त” विषय पर एक ऑनलाइन परिचर्चा का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अविनाश भारती ने किया। परिचर्चा में वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. अरुणा गुप्ता, लेखिका एवं कवयित्री शारदा कनोरिया तथा प्रसिद्ध कवयित्री एवं मंच संचालिका, साहित्यकार अनीता वर्मा ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का आरंभ शारदा कनोरिया जी से संवाद के साथ हुआ। उनसे पहला प्रश्न पूछा गया कि छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता की अवधारणा क्या है? उन्होंने उत्तर देते हुए कहा कि छंदबद्ध कविता अपनी लय, नियमबद्धता तथा गेयता के कारण सुनने और गाने में अत्यंत प्रभावी होती है। वहीं छंदमुक्त कविता में रचनाकार अपने मनोभावों और संवेदनाओं को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता के साथ अभिव्यक्त कर सकता है। इसके बाद अनीता वर्मा जी से प्रश्न किया गया कि कविता की आत्मा छंद में बसती है या संवेदना में? उन्होंने कहा कि कविता मूलतः भावों और संवेदनाओं का समन्वय है। गीत, ग़ज़ल, दोहा, सोरठा आदि छंदबद्ध काव्य-विधाएँ निश्चित नियमों से बंधी होती हैं, जबकि छंदमुक्त कविता में कवि का स्वर सीधे पाठकों तक पहुँचता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि छंदमुक्त कविता भी लय से रहित नहीं होती; बिना लय के कविता की कल्पना संभव नहीं है। अगला प्रश्न डॉ. अरुणा गुप्ता से किया गया कि क्या आज की नई पीढ़ी छंदबद्ध कविता से दूर होती जा रही है? उन्होंने कहा कि आज का कवि स्वतंत्र अभिव्यक्ति को अधिक महत्व देता है। उसकी रचनाओं में भाव, अनुभूति, बिंब और लय सभी विद्यमान रहते हैं तथा उसका रचनात्मक संसार विस्तृत आकाश की भाँति व्यापक होता है। इसके उपरांत शारदा कनोरिया जी से पूछा गया कि क्या छंदमुक्त कविता का उदय कविता की स्वाभाविक विकास-प्रक्रिया का परिणाम है अथवा परंपरा के विरोध का स्वरूप? उन्होंने उत्तर दिया कि छंदमुक्त कविता मूलतः अभिव्यक्ति की एक शैली और लेखन-कला है। इसे केवल परंपरा के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसी प्रश्न पर अनीता वर्मा जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि छंदमुक्त कविता की आधुनिक परंपरा का प्रमुख श्रेय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि छंदमुक्त कविता में भी लय का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने निराला की प्रसिद्ध कविता “वह तोड़ती पत्थर” का उदाहरण देते हुए विषय को सरलता से समझाया तथा बताया कि हिंदी कविता ने मुक्त कविता से लेकर हाइकु जैसी लघु विधाओं तक सफल यात्रा की है। अगला प्रश्न डॉ. अरुणा गुप्ता से किया गया कि यदि छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता में व्याकरणिक तथा शिल्पगत भिन्नताओं को अलग कर दिया जाए, तो क्या दोनों में भाव और संवेदना समान रहती है? उन्होंने उत्तर दिया कि कविता एक सतत विकास-यात्रा है। दोनों ही रूपों में संवेदना समान रूप से विद्यमान रहती है। वास्तविक कविता वही है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का कार्य करे। उन्होंने कबीर के काव्य का उदाहरण देकर अपनी बात को स्पष्ट किया। इसके पश्चात अनीता वर्मा जी से पूछा गया कि आज की युवा पीढ़ी की साहित्यिक रुचियाँ क्यों बदल रही हैं? उन्होंने कहा कि यह समय के साथ होने वाला स्वाभाविक परिवर्तन है। आज के युवा रचनाकार गंभीर और सार्थक लेखन कर रहे हैं। जो रचनाएँ मौलिकता, आत्मीयता, बिंब, प्रतीक और संवेदनात्मक गहराई से युक्त होंगी, वही कालजयी सिद्ध होंगी। श्रोताओं की ओर से जिया-उर-रहमान जाफ़री ने प्रश्न किया कि क्या छंदमुक्त कविताएँ पाठकों को वास्तव में पसंद नहीं आतीं और क्या उन्हें अकादमिक संस्थानों द्वारा थोपा गया आख्यान माना जा सकता है? इस पर अनीता वर्मा जी ने अज्ञेय के साहित्य का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी रचनाओं की गंभीरता, संवेदना और वैचारिक गहराई उन्हें सभी सीमाओं से परे स्थापित करती है। उन्होंने कहा कि किसी विधा को अच्छा या बुरा कहना उचित नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि पाठक और लेखक के बीच संवेदनात्मक संबंध स्थापित हो तथा कविता के मर्म को समझा जाए। इसके बाद प्रश्न किया गया कि हिंदी कविता का भविष्य किस दिशा में अग्रसर है? डॉ. अरुणा गुप्ता ने कहा कि समय निरंतर परिवर्तनशील है। ऐसी रचनाएँ ही भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेंगी जो समाज को दिशा दें, उद्देश्य प्रदान करें, संवेदनशील हों तथा सार्थक शब्दावली के माध्यम से भविष्य की संभावनाओं को उद्घाटित करें। परिचर्चा के अंतिम चरण में साहित्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के सदुपयोग एवं दुरुपयोग पर चर्चा हुई। डॉ. अरुणा गुप्ता ने कहा कि एआई का प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिए। यह तकनीक सहायक अवश्य हो सकती है, किंतु मानवीय भावों और संवेदनाओं की वास्तविक अभिव्यक्ति का स्थान नहीं ले सकती। शारदा कनोरिया जी ने भी इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एआई के उपयोग में सतर्कता आवश्यक है। वर्तमान युग तकनीकी परिवर्तन का युग है, इसलिए एआई का संतुलित, विवेकपूर्ण एवं रचनात्मक उपयोग किया जाना चाहिए। अंत में संचालक डॉ. अविनाश भारती ने सभी वक्ताओं एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। यह परिचर्चा छंदबद्ध एवं छंदमुक्त कविता की प्रकृति, प्रासंगिकता, भविष्य तथा साहित्य में बदलते परिवेश पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श के रूप में अत्यंत सफल रही।
रिपोर्ट :— अजय शर्मा
