प्रवासी भवन (दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली) में उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी के कहानी-संग्रह “सोज़े वतन” पर चर्चा

“अखिल भारतीय साहित्य परिषद” के तत्वाधान में शुक्रवार, दिनांक ३१-०७-२०२६ को कथा-साहित्य के महान हस्ताक्षर मुंशी प्रेमचंद के कहानी-संग्रह “सोज़े वतन” पर सारगर्भित चर्चा हुई. इस अवसर पर प्रवासी भवन में आयोजित संगोष्ठी में हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार और विचारक उपस्थित थे।
प्रेमचन्द जयन्ती पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् से सम्बद्ध इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती के सुपरिचित लेखक डॉ. राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ ने कहा कि प्रेमचन्द के कहानी-संग्रह ‘सोज़े वतन’ में संकलित कहानियाँ भारतीयता और राष्ट्रीय चेतना की भावना से ओत-प्रोत हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द जन्मजात देशभक्त थे। वास्तव में, ‘सोजे वतन’ आजादी की भावना से अभिमंत्रित है। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने पुस्तक की लगभग 700 प्रतियाँ ज़ब्त कर ली थीं। यह संग्रह प्रतिबंधित होने के बावज़ूद, क्रान्तिकारी और आज़ादी के दीवाने, इस पुस्तक की बची प्रतियों को छिपाकर पढा करते थे ताकि उनमें देशप्रेम की भावना और अधिक प्रखर हो सके। डॉ. मणि ने क्षोभ प्रकट करते हुए कहा कि प्रगतिशील आलोचकों ने ‘गोदान’, ‘कफ़न’ या ‘पूस की रात’ को तो पाठ्यक्रम में स्थान दिया, लेकिन ‘सोज़े वतन’ को उपेक्षित रखा।
हिन्दी अकादमी, दिल्ली के पूर्व उपसचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा ने कहा कि ‘सोज़े वतन’ की कहानियों की विशेषता यह है कि वे पारम्परिक प्रेम की भावना से शुरू होती हैं, लेकिन उनका समापन देशभक्ति की भावना से होता है।
वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा ने कहा कि इस पुस्तक में राष्ट्रप्रेम कैसे जगाया जाए, इस पर बल दिया गया है। वास्तव में, इस पुस्तक ने मौन क्रान्ति पैदा की।
वरिष्ठ लेखिका शकुन्तला मित्तल ने कहा कि ‘सोज़े वतन’ का केंद्रीय भाव त्याग और समर्पण पर अवलंबित है। साथ ही उन्होंने अरोड़ा जी के वक्तव्य की सराहना करते हुए कहा कि पाठकीय दृष्टि से इसे कैसे पढ़ना चाहिए, इसको उन्होंने बेहतर ढंग से परिभाषित किया है। संगोष्ठी में उपस्थित विनय विक्रम सिंह ने कहा कि ‘सोज़े वतन’ की कहानियाँ प्रेमचन्द की आरम्भिक कहानियाँ हैं। इनमें राष्ट्रीयता की भावना पर जोर दिया गया है। साथ ही कहानियों में विधागत शिल्प, शब्द-प्रयोग व भाषायी दृष्टि से विविधता है।
युवा लेखक अविरल अभिलाष ने कहा कि ‘सोज़े वतन’ कहानी-संग्रह भौतिकवादी धारणा को ध्वस्त कर, राष्ट्रप्रेम की भावना को स्थापित करता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रप्रेम राजनीतिक नारों से नहीं, सच्चे बलिदान से उपजता है। इस पुस्तक की राख से उठी, राष्ट्रवाद की चिनगारी ने देश में क्रान्ति की ज्वाला प्रज्ज्वलित की थी। ‘सोज़े वतन’ पुस्तक यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र सर्वोपरि है।
इस संगोष्ठी का संचालन करते हुए विकास आनन्द ने कहा कि वर्ष 1908 में प्रकाशित ‘सोज़े वतन’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसमें मातृभूमि की मिट्टी और जड़ों के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाया गया है। इस पुस्तक में सभी कहानियाँ दुनिया का सबसे अनमोल रतन हैं. इस संग्रह में जो कहानियाँ संगृहीत हैं, वे इस प्रकार हैं: ‘यही मेरा वतन है’, ‘शेख मखमूर’, ‘शोक का पुरस्कार’, ‘सांसारिक प्रेम’ और ‘देशप्रेम’।
इस कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय कार्यालय सचिव श्री संजीव सिन्हा के साथ-साथ डॉ. विवेक विश्वास एवं अभय त्रिपाठी ने भी भाग लिया।
