महासमुंद में सजी ‘एक शाम लतीफ घोंघी के नाम’, छत्तीसगढ़ी में प्रकाशित हुई उनकी 24 रचनाएँ

महासमुंद, छत्तीसगढ़। महान व्यंग्यकार लतीफ घोंघी की साहित्यिक विरासत को समर्पित एक विशेष साहित्यिक संध्या का आयोजन महासमुंद में किया गया। ‘एक शाम लतीफ घोंघी के नाम’ शीर्षक से आयोजित कार्यक्रम में उनकी 24 रचनाओं के छत्तीसगढ़ी अनुवाद पर आधारित पुस्तक ‘एक कोरी चार’ का विमोचन किया गया। पुस्तक का छत्तीसगढ़ी अनुवाद प्रसिद्ध अनुवादक विवेक रहटगाँवकर ने किया है।
कार्यक्रम में रायपुर के प्रख्यात भाषाविद् डॉ. चित्त रंजन कर, डॉ. मानिक विश्वकर्मा नवरंग के साथ विशेष अतिथि के रूप में साहित्यकार एवं लेखक उपस्थित रहे। उल्लेखनीय है कि विवेक रहटगाँवकर इससे पूर्व लेखक की ग़ज़लों का भी छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर चुके हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ व्यंग्यकार ईश्वर शर्मा ने की। लतीफ घोंघी के साथ उनका वर्षों पुराना साहित्यिक जुड़ाव रहा है। दोनों ने पूर्व में ‘व्यंग्य की जुगलबंदी’ नाम से रचनात्मक साझेदारी की थी, जो बाद में पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुई।
पुस्तक विमोचन के अवसर पर मंच पर अनुवादक विवेक रहटगाँवकर के साथ लतीफ घोंघी के सुपुत्र एवं लेखक करीम घोंघी भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रभावी और यादगार संचालन कवि अशोक शर्मा ने किया।
इस साहित्यिक आयोजन में रहटगाँवकर परिवार और घोंघी परिवार सहित महासमुंद के अनेक प्रबुद्ध साहित्यप्रेमी, रचनाकार और पाठक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने लतीफ घोंघी के व्यंग्य साहित्य के महत्व और उनकी रचनाओं की व्यापक प्रासंगिकता पर चर्चा की।
लतीफ घोंघी के नाम पर सम्मान और ग्रंथालय की मांग
कार्यक्रम के दौरान मंच से दो महत्वपूर्ण मांगें भी उठाई गईं। पहली मांग थी कि महासमुंद में निर्माणाधीन जिला ग्रंथालय का नाम महान व्यंग्यकार लतीफ घोंघी के नाम पर रखा जाए। दूसरी मांग राज्य सरकार से की गई कि साहित्य और व्यंग्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए लतीफ घोंघी के नाम से एक प्रतिष्ठित सम्मान प्रारंभ किया जाए।
वक्ताओं ने कहा कि लतीफ घोंघी का साहित्य केवल व्यंग्य की परंपरा को समृद्ध करने वाला नहीं है, बल्कि वह समाज की विसंगतियों को देखने और उन पर सार्थक हस्तक्षेप करने की दृष्टि भी प्रदान करता है। उनकी रचनाओं का छत्तीसगढ़ी में अनुवाद उनकी साहित्यिक पहुँच को नए पाठक वर्ग तक ले जाने की महत्वपूर्ण पहल है।
‘एक कोरी चार’ का प्रकाशन और उसका विमोचन लतीफ घोंघी की साहित्यिक स्मृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया।
