वैश्विक हिंदी परिवार: गंगा-कावेरी संवाद शृंखला रविवारीय मंच अंतर्संबंध (विशेष संदर्भ: पारस्परिक अनुवाद)” विषयक पर आयोजित ऑनलाइन संगोष्ठी का प्रतिवेदन

09/08/2026। विश्व हिन्दी सचिवालय , केन्द्रीय हिन्दी संस्थान , अंतरस्त्रीय सहयोग परिषद , वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के तत्वाधान में वैश्विक हिन्दी परिवार कार्यक्रम का आयोजन 09 अगस्त 2026 संध्या 6 बजे किया गया। इस संगोष्ठी के माध्यम से हिन्दी और कन्नड भाषाओं के बीच अंतर्संबंधों को समझना और आपसी अनुवाद को बढ़ावा देकर दोनों भाषाई समुदाय को करीब लाना है।
सांस्कृतिक और भाषाई अंतर-संबंध: कार्यक्रम का बेहद आत्मीय और खूबसूरत आगाज सुश्री स्वरांगी साने जी ने मैसूर की सांस्कृतिक महक और दक्षिण भारत की आत्मीयता के सुंदर संस्मरणों के साथ की मालगुड़ी डेज’ की उस जानी-पहचानी धुन के साथ जब इस विशेष गोष्ठी की शुरुआत हुई, और देखते ही देखते श्रोताओं को गिरीश कर्नाड के नाटक ‘हयवदन’, एस. एल. भैरप्पा के उपन्यास ‘पर्व’ और मैसूर पाक की मिठास के सफर पर ले गईं। महाराष्ट्र और कर्नाटक की साझा संस्कृति पर बात करते हुए उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भाषाएँ कभी बाँटती नहीं, बल्कि हमेशा जोड़ती हैं और इस प्रकार माहौल में एक अलग ही अपनापन और सांस्कृतिक सोंधापन घुल गया। इस बौद्धिक और सांस्कृतिक समागम का बेहद सधा हुआ, ऊर्जावान और प्रवाहमयी मंच संचालन डॉ. सीमा शर्मा सहायक प्राध्यापक (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, एन एम के आर वी कॉलेज, बैंगलोर ) ने किया। डॉ. सीमा शर्मा ने अपनी कुशल और मार्मिक शैली से पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में पिरोए रखा। हिंदी और साहित्य के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता हर बात में झलक रही थी। उन्होंने न केवल सभी अतिथियों और वक्ताओं का सहजता से मार्गदर्शन किया, बल्कि अपने ओजस्वी वचनों से इस ‘गंगा-कावेरी’ सेतु को और भी अधिक मजबूत बनाया।

बीज वक्ता श्रीमती नर्मदा कुमारी जी ने हिंदी और कन्नड़ के अंतर-संबंधों तथा पारस्परिक अनुवाद की व्यावहारिक चुनौतियों और संभावनाओं पर अत्यंत सूक्ष्म एवं वैचारिक प्रकाश डाला, जिससे पूरे सत्र की एक अत्यंत सारगर्भित पृष्ठभूमि तैयार हुई और उनके वक्तव्य ने पूरे कार्यक्रम को एक ठोस अकादमिक और व्यावहारिक दिशा दी। युवा वक्ताओं की ओजस्वी प्रस्तुतियाँ: कार्यक्रम में वरिष्ठ विद्वानों के साथ-साथ बहुत मजबूत भागीदारी रही। भाषा और साहित्य की इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाली ऊर्जावान वक्ताओं—मैत्री एन.( केन्द्रीय विश्वविद्यालय कैटला ), कुमारी नवनीत (एन . एम.के.आर.वी कॉलेज , बैंगलोर ) और कुमारी अंशिका( डॉ. जी . शंकर शासकीय महविद्यालय , उड्डीपी )—ने बहुत ही अल्प समय में अत्यंत परिपक्व, वैचारिक और गहरे शोधयुक्त विचार प्रस्तुत किए । वैश्विक हिंदी परिवार के इस “गंगा-कावेरी संवाद कार्यक्रम में कई अन्य दिग्गज और ऊर्जावान वक्ताओं ने भी अपने विचारों से इस मंच को समृद्ध किया।
डॉ. एस . ए मंजूनाथ जी जो कार्यक्रम के प्रमुख वक्ताओं में से एक थे। डॉ. मंजूनाथ जी ने श्रवणबेलगोला पर अपने हालिया लेख के माध्यम से यह समझाया कि कैसे उत्तर भारत का जैन समुदाय कर्नाटक के मैसूर और श्रवणबेलगोला से सदियों से गहराई से जुड़ा हुआ है, जो हमारी सांस्कृतिक एकता का एक बहुत बड़ा प्रतीक है। उन्होंने अपने वक्तव्य से हिंदी और कन्नड़ के भाषाई व सांस्कृतिक अंतर्संबंधों पर महत्वपूर्ण विचार रखे जो उल्लेखनीय है। इस विशेष ऑनलाइन गोष्ठी (वैश्विक हिंदी परिवार) में श्री अनिल जोशी, श्रीलता जी, मैथिली जी और डॉ. बीना शर्मा जैसी प्रतिष्ठित हस्तियों की उपस्थिति और उनके योगदान ने इस कार्यक्रम को बेहद खास बना दिया। श्री अनिल जोशी जी इस संपूर्ण वैश्विक मंच के प्रेरणास्रोत हैं। उनके कुशल मार्गदर्शन और स्नेहिल नेतृत्व में यह परिवार दुनिया भर के हिंदी प्रेमियों को एक सूत्र में पिरोए हुए है। इस कार्यक्रम के दौरान भी उनकी गरिमामयी उपस्थिति और हिंदी भाषा के वैश्विक विस्तार के प्रति उनका समर्पण सभी वक्ताओं और श्रोताओं के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत रहा। श्रीलता जी जैसी समर्पित रचनाकारों व विद्वानों की सहभागिता इस बात का प्रतीक है कि कैसे यह मंच क्षेत्रीय सीमाओं से परे जाकर साहित्यिक संवाद को जीवंत बनाता है। आपने पारस्परिक अनुवाद की व्यावहारिक चुनौतियों और संभावनाओं पर अत्यंत सूक्ष्म व वैचारिक प्रकाश डाला। कार्यक्रम के आरंभ में ही यह विशेष उल्लेख किया गया कि डॉ. मैथिली पी . राव जी निरंतर कन्नड़ भाषा से हिंदी में बेहतरीन अनुवाद और सामग्री भेजती रहती हैं। हिंदी और कन्नड़ के बीच भाषाई सेतु (गंगा-कावेरी श्रृंखला) को मजबूत करने और दोनों संस्कृतियों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने में उनका योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इनके व्याख्यान से आने वाली पीढ़ी को एक नई दिशा मिलि है। उनके प्रेरणादायक वक्तव्य ने सभी के अंतर्मन में हिन्दी और कन्नड भाषाओं को और अधिक समृद्ध बनाने की इच्छा जागृत कर दी है।
अंत में डॉ. बीना शर्मा (पूर्व निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान) जो कार्यक्रम की अध्यक्ष थी। हिंदी भाषा, उसकी बोलियों (जैसे अवधी, ब्रज), लोकगीतों और भारतीय संस्कृति की जड़ों पर डॉ. बीना शर्मा का दृष्टिकोण हमेशा से बेहद समृद्ध रहा है। उनका यह मानना रहा है कि लोकसंस्कृति और बोलियों के बिना हिंदी की कल्पना अधूरी है। इस तरह के आयोजनों में उनकी वैचारिक उपस्थिति हिंदी की मूल आत्मा और संस्कारों को मजबूती प्रदान करती है। उनकी गरिमामय अध्यक्षीय वक्तव्य ने इस पूरे कार्यक्रम को एक सार्थक दृष्टि और दिशा प्रदान की।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. उर्मी दत्ता सहायक प्राध्यापक (एन एम के आर वी कॉलेज , बैंगलोर) ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम को एक बेहद सकारात्मक और ऊर्जावान समापन दिया और ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ की पूरी आयोजन समिति, तकनीकी टीम और इस ऑनलाइन पटल पर जुड़े सभी भाषा-प्रेमियों, विद्वानों व शोधार्थियों का कोटि-कोटि धन्यवाद ज्ञापन किया जिनकी उपस्थिति से यह कार्यक्रम सफल हुआ।
रिपोर्ट : डॉ. उर्मि दत्ता (सहायक प्राध्यापक एन एम के आर वी कॉलेज , बैंगलोर)
