दिन विशेष (प्रवासी रचना) में तिथि दानी की समीक्षा ‘राख’ सीरीज़

परिचय- आकाशिक रिकार्ड्स मास्टर टीचर, स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, अनुवादक, स्वयंसेवी शिक्षक; दो कविता संग्रह प्रकाशित; एक दर्जन से अधिक कविता संकलनों में कविताएं और सभी विधाओं में कथेतर गद्य, कहानी, संस्मरण आदि प्रकाशित; हिंदी कविताओं का बंगाली, मराठी, पंजाबी, नेपाली, रूसी, जर्मन, अंग्रेज़ी में अनुवाद।
सम्मान- वागीश्वरी सम्मान, प्रथम पांडुलिपि भारतीय उच्चायोग लंदन से चयनित और सम्मानित, हिंदी गौरव सम्मान, अंतरराष्ट्रीय साहित्य सेतु सम्मान।

“राख” सीरीज़ की समीक्षा

‘राख’ सीरीज़ देखने के बाद तो एक अजीब बेचैनी ने घेर लिया था। ऐसा लग रहा था कि शायद इस ब्रह्मांड को नापने की एक युक्ति हो सकती है लेकिन एक इंसान के गिरने के की कोई सीमा नहीं है। कुछ विक्षिप्तता और विकृति का मिला-जुला चित्रण है-मुख्य ख़ूनी का। लेकिन, हाल ही में ‘ग्राम चिकित्सालय’ देखा तो याद आया कि इस खलनायक (आकाश मखीजा) को तो इसकी पहली कड़ी में देखा था; लेकिन, “राख़” में इस तरह संक्रमण है कि मैं पहचान नहीं सकी। कमाल की एक्टिंग है खलनायक की। दर्शक घृणा किये बग़ैर रह नहीं सकता। कोई सीरीज़ यदि हमारे ऊपर अपनी छाप छोड़ती है तो उसके पीछे केवल नायक का नहीं, खलनायक का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। इसे नहीं भूलना चाहिए और हाल में आई कुछ हिट फिल्मों ने यह सिद्ध कर दिया है।

बहरहाल, जिन लोगों ने ‘ग्राम चिकित्सालय’ सीरीज़ का पहला भाग नहीं देखा है, वे इसे ज़रूर देखें क्योंकि उसकी सहजता आपका बरबस ही ध्यान खींचेगी। यह ऐसी वेब सीरीज़ है जिसमें एक ऐसे विरल डॉक्टर की कहानी है जो बहुत प्रतिभाशाली है, जिसके समक्ष करियर के चुनाव के अनेक अवसर हैं जिससे वह अपने लिए एक ख़ूबसूरत, आरामदायक, सुविधाजनक अस्पताल को काम करने के लिए चुन ले। लेकिन, वह चुनता है ग्राम चिकित्सालय जो उसके लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण साबित होता है। उसकी कोशिश होती है कि वह वहाँ गांववालों के लिए ख़ुद को एक डॉक्टर से ज्यादा, एक हमदर्द के रूप में स्थापित करे।
यह सीरीज इस जीवन मूल्य को भी पुनर्स्थापित करने में सफल हुई है कि यदि ईमानदारी से काम किया जाए तो परेशानियां बहुत होंगी, लोग आपके विरोध में खड़े होंगे लेकिन अंततः यदि ईमानदारी के साथ आपके अंदर योग्यता और आत्मविश्वास भी है तो लोगबाग भी एक दिन आपके सामने नतमस्तक होंगे, यानि आपके विरोधी भी आपके समर्थक बन जाएंगे। इसका जो मुख्य किरदार (अमोल पाराशर) है, वह इसी जज़्बे को बरक़रार रखने की मिसाल क़ायम करता है। इसमें विनय पाठक का अभिनय भी कमाल का है। यदि किसी ने इसको नहीं देखा है तो वह इसका पहला भाग जरूर देखे। दूसरा भाग भी अब आ गया है। लेकिन, पहला भाग बहुत-बहुत अच्छा है। वह आपको ‘पंचायत’ की भी थोड़ी याद दिलाएगा; लेकिन, ‘ग्राम चिकित्सालय’ मुझको ‘पंचायत-2’ से भी मुझे कुछ मामलों में बेहतर लगा है। यह पुस्तक अमेज़न प्राइम पर उपलब्ध है।

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