दिन विशेष विशेषांक : हिंदी दिवस — हिंदी हमारी पहचान, हमारा गौरव

विषय सूची
संपादकीय- डॉ. शैलजा सक्सेना (साहित्यकार, सह-संस्थापक निदेशिका: हिंदी राइटर्स गिल्ड कैनेडा)
कविताएँ
१. केदारनाथ सिंह (प्रसिद्ध कवि)
2. रघुवीर सहाय (प्रसिद्ध कवि)
३. अनिल जोशी (साहित्यकार, अध्यक्ष, वैश्विक हिन्दी परिवार)
४. स्वरांगी साने (लेखिका, महाराष्ट्र)
५. इन्द्रदेव भारती (लेखिका, सेवानिवृत्त कला शिक्षक, मूर्ति देवी सरस्वती इण्टर कालेज,नजीबाबाद)
६. दीक्षा चौबे (लेखिका, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय)
कहानी/ लघुकथा
७. दिव्या माथुर (प्रवासी लेखिका, अध्यक्ष: वातायन यू के, संपादक:’वातायनम’)
८. कृष्णा वर्मा (लेखिका, सह संपादक- हिंदी चेतना, कैनेडा)
आलेख
९ डॉक्टर हरीश नवल (प्रसिद्ध व्यंग्यकार, साहित्यकार, पूर्व प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय )
१०. प्रेम जनमेजय (प्रसिद्ध व्यंग्यकार, संपादक: व्यंग्ययात्रा, पूर्व प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय )
११. डॉ. सुनील देवधर (साहित्यकार, कार्याध्यक्ष, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति)
१२. डॉ.जवाहर कर्नावट (पत्रकारिता अध्येता, निदेशक: अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र,रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय)
१३. बालेन्दु शर्मा ‘दाधीच’ (कम्प्यूटर शिक्षण, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, एल्गो टेक्नोलॉजी, दुबई)
१४. डॉ. बरुन कुमार (लेखक, पूर्व निदेशक, रेल मंत्रालय एवं गृह मंत्रालय
१५. डॉ. मनोज मोक्षेंद्र (प्रतिष्ठित साहित्यकार, व्यंग्यकार, कथाकार, कवि, उपन्यासकार, नाटककार, संपादक, अनुवादक, चित्रकार और पत्रकार)
१६. प्रोफेसर विशाला शर्मा (लेखिका, प्राचार्य, चेतना कला वरिष्ठ महाविद्यालय हर्सूल, छत्रपति संभाजीनगर )
१७. डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त (सहायक प्राध्यापक, हैदराबाद)
संपादकीय

डॉ. शैलजा सक्सेना (साहित्यकार, सह-संस्थापक निदेशिका: हिंदी राइटर्स गिल्ड कैनेडा)
संपादकीय- हिंदी दिवस विशेषांक
“मेरी भाषा में तोते भी राम-राम जब कहते हैं
मेरे रोम-रोम में मानों सुधा-स्रोत तब बहते हैं।
सब कुछ छूट जाए, मैं अपनी भाषा कभी न छोडूँगा
वह मेरी माता है, उससे नाता कैसे तोडूँगा।“ (स्व. मैथिलीशरण गुप्त)
विश्व में ४२.५ करोड़ लोगों की मातृ भाषा हिंदी है और लगभग १२ करोड़ लोग इसका दूसरी भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं। लगभग ६४ करोड़ लोगों की भाषा है हिंदी और विश्व में इसका तीसरा स्थान माना गया है। तब भी अपने को बचाने के लिए, इसको विशेष प्रयत्न करने पड़ें, विशेष नारे लगाने पड़ें, यह आश्चर्य की बात है।
लगभग ४०- ५० वर्ष पहले तक की बात है जब हिंदी मीडियम वाले सरकारी स्कूल लोकप्रिय थे और ९० प्रतिशत से अधिक शहरी बच्चे इन स्कूलों में पढ़ते थे। हम विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, गणित आदि सभी विषय हिंदी में ही पढ़ते थे, हिंदी केवल साहित्य का विषय नहीं था लेकिन समस्या यह थी कि उच्च शिक्षा, इंजीनियरिंग, मेडिकल या कानून शिक्षा आदि अनेक ऊँची डिग्रियाँ अंग्रेज़ी में ही पढ़ने पर मिलती थीं। हिंदी मीडियम का बच्चा ऐसी डिग्री प्राप्त करने में भाषा की तकनीकी समस्या से जूझता था। आई-आई-टी, आई-आई-एम जैसी प्रतिष्ठित संस्थाएँ अंग्रेज़ी में ही शिक्षा दे रही थीं। यह अनुभव करवाया जाने लगा था कि अच्छॆ पदों और अच्छी शिक्षा के लिए अंग्रेज़ी पढ़ना अनिवार्य है। अंग्रेज़ी एक भाषा, केवल साहित्य की भाषा नहीं, सभी विषयों को पढ़ने का माध्यम बनने लगी। परिवार अपने बच्चों को अंग्रेज़ी में शिक्षा देने के लिए अपनी शक्ति से अधिक खर्च करने के लिए बाध्य होने लगे। अंग्रेज़ी भाषा परिवारों के लिए आर्थिक समृद्धि का चिन्ह बनने के साथ आर्थिक समस्या का कारण भी बनने लगा। अंग्रेज़ी में बातचीत करना सिखाने के लिए प्राइवेट स्कूलों में, बच्चों की हिंदी बोलने पर पिटाई होती, उन पर फ़ाइन लगते। माता-पिता अपने बच्चों को गलत-सही कैसी भी अंग्रेज़ी में बोलते देख वारी-वारी जाते।
इस तरह हिंदी मात्र साहित्य की भाषा बन कर रह गई और अंग्रेज़ी स्टेटस चिन्ह, ऊँची नौकरी का चिह्न, ऊँची सोसायटी का चिह्न बन गई। जो हिंदी राजभाषा बन कर भारत के अधिकांश को बाँधने का काम करने वाली थी, वह ही समाज के धनी और निर्धन के दो वर्गों के बीच भेद का एक और कारण बना कर पीछे धकेल दी गई।
कुछ वर्षों से फिर प्रयास हो रहा है कि हिंदी के प्रयोग को उच्च शिक्षा और उच्च परीक्षा का माध्यम बनाया जाए, हिंदी केवल साहित्य की या बोलचाल की भाषा न रहे अपितु हमारे ज्ञान, विज्ञान और गणित की भाषा भी बने। जब ऐसा होगा तो हिंदी में बोलना और कार्यालयों में हिंदी में ही काम करना गर्व की बात मानी जायेगी। यह हम सबका कर्तव्य है कि हम व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से इस ओर काम करें। विदेशों में हिंदी प्रसार के लिए विशेष श्रम किया जाता है ताकि इस भाषा को अगली पीढ़ी के पास पहुँचाया सकें, मुझॆ लगता है भारत में भी इस प्रकार के सचेत प्रयास लगातार किये जाने की आवश्यकता है। भारत में युवा वर्ग हिंदी में बोल तो रहा है, पर वह किस तरह की हिंदी बोल रहा है, उसकी भाषा का स्तर क्या है? क्या जो वह बोल रहा है उसे देवनागरी में बिना त्रुटि के लिख सकता है? क्या ’हिंग्लिश’ पर उसकी निर्भरता का कोई तोड़ है? ये सब महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनके कटु उत्तरों का सामना किये बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
हिंदी को उसके पद पर लौटाने के लिए एक कार्यप्रणाली चाहिए। नई शिक्षा नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है पर इसके लिए जितने संसाधनों की आवश्यकता है, उन्हें तैयार करने में कुछ समय लग रहा है। यह नीति एक सार्थक और भविष्य की ओर बढ़ा हुआ एक बड़ा कदम है। यह एक कदम ही है क्योंकि लक्ष्य बहुत बड़ा और रास्ता बहुत लंबा है।
हमें हिंदी को सभी विषयों की भाषा, कार्यालय की भाषा, स्टेटस की भाषा तो बनाना तो है ही साथ ही हिंदी साहित्य को समृद्ध भी करना है।
वैश्विक हिंदी परिवार ने पूरे विश्व के हिंदी प्रेमियों को एकत्र करने का काम किया है और इस संस्था की वेबसाइट अनेक लेखकों और विषयों को अपनी वेबसाइट पर प्रतिदिन स्थान देती है। हमारे लिए प्रति दिन ही हिंदी दिवस है पर यह भी आवश्यक है कि हम सबके साथ सितंबर १४ का विशेष ’हिंदी दिवस’ मनाएँ। यह विशेषांक इसी विशेष दिन को समर्पित है। इसमें आपको केदारनाथ सिंह, धूमिल, रघुवीर सहाय जैसे प्रसिद्ध लेखकों की कविताएँ पढ़ने को मिलेंगी तो डॉ. हरीश नवल, डॉ. प्रेम जनमेजय, डॉ. बालेंदु शर्मा ’दधीचि’, डॉ. वरुण कुमार, डॉ. जवाहर कर्नावट, डॉ. सुनील देवधर आदि के आलेख भी पढ़ने को मिलेंगे। इनके साथ ही हैं दिव्या माथुर, अनिल जोशी, मनोज मोक्षेन्द्र, स्वरांगी साने, दीक्षा चौबे, डॉ. रेनू यादव, कृष्णा वर्मा की रचनाएँ।
आप हिंदी भाषी और हिंदी प्रेमी हैं तभी आपने इस वेबसाइट पर इस विशेषांक को उत्सुकता से खोला है, हम आपके समय और विशेषांक में आपकी रुचि के लिए आपका धन्यवाद देते हैं और आशा करते हैं कि आप इस वेबसाइट पर अन्य लेखकों की रचनाएँ. शिक्षण सामग्री, शब्दकोशों को न केवल देखेंगे अपितु हिंदी के प्रसार-यज्ञ में अपनी आहुति डालते हुए अपने मित्रों से भी इसे साझा करेंगे।
हिंदी हमारी- आपकी माँ है और माँ से प्रेम करना सिखाया नहीं जाता, सबको आता ही है पर जैसे माँ को बनाए रखने के लिए उसके स्वास्थ्य और सुख के लिए काम करना पड़ता है वैसे ही हिंदी माँ को समृद्ध करने और उसका प्रसार करने के लिए भी काम करना होगा। आइये, हम सब मिलकर अपनी इस माँ पर गर्व करें और इसका मान बढ़ाने के लिए काम करें।
सादर – शैलजा
केदारनाथ सिंह (प्रसिद्ध कवि)

मातृभाषा
जैसे चींटियाँ लौटती हैं
बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई-अड्डे की ओर
ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूँ तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा
*********************
रघुवीर सहाय (प्रसिद्ध कवि)

रामदास
चौड़ी सड़क गली पतली थी
दिन का समय घनी बदली थी
रामदास उस दिन उदास था
अंत समय आ गया पास था
उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी
धीरे-धीरे चला अकेले
सोचा साथ किसी को ले ले
फिर रह गया, सड़क पर सब थे
सभी मौन थे सभी निहत्थे
सभी जानते थे यह उस दिन उसकी हत्या होगी
खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर
दोनों हाथ पेट पर रख कर
सधे क़दम रख करके आए
लोग सिमट कर आँख गड़ाए
लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी
निकल गली से तब हत्यारा
आया उसने नाम पुकारा
हाथ तौलकर चाक़ू मारा
छूटा लोहू का फ़व्वारा
कहा नहीं था उसने आख़िर उसकी हत्या होगी
स्रोत :
पुस्तक : रघुवीर सहाय संचयिता (पृष्ठ 31) संपादक : कृष्ण कुमार रचनाकार : रघुवीर सहाय प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन संस्करण : 2003
अनिल जोशी (अध्यक्ष, वैश्विक हिन्दी परिवार)

भटका हुआ भविष्य
उसने मुझे जब हिन्दी में बात करते हुए सुना,
तो गौर से देखा
और अपने मित्र से कहा–
‘माई लेट ग्रैंडपा यूज्ड टु स्पीक इन दिस लैंग्वेज’
इस भाषा के साथ
मैं उसके लिए
संग्रहालय की वस्तु की तरह विचित्र था
जैसे
दीवार पर टंगा हुआ कोई चित्र था
जिसे हार तो पहनाया जा सकता है
पर
गले नहीं लगाया जा सकता।
उसके जीवन का फलसफा
बिल्कुल साफ है,
उसके पास
चंद तस्वीरों का एक कोलाज है
भोग, कैरियर, उपभोग
इनसे जो तस्वीर बनती है
वह उसके लिए काफी है,
बेकार के पचड़ों के लिए
अभी उम्र बाकी है!
भारत उसके लिए एक पहेली है
वह भारत से ज्यादा
स्पेन के बारे में जानता है
क्योंकि स्पेन की एक लड़की
उसकी नवीनतम सहेली है।
उसके जीवन का घड़ा बिल्कुल रीता है
वह नहीं जानता
क्या सीता है
क्या गीता है
पर उसे यहाँ तक कौन लाया
कौन है
जिसने उसे
अपनी मां का
नाम और पता तक नहीं बताया ।
अगर वह अपनी भाषा नहीं जानेगा
विश्वास कीजिए
माँ को माँ
और
पिता को पिता को नहीं मानेगा।
उसके पिता जिस समय यहाँ आए
उस पीढ़ी के लोगों का यह सोच था
भाषा रंग और भारत
उनके लिए बोझ था
रंग का तो वे क्या करते पर
भाषा और भारत को उन्होंने जल्द से जल्द
जीवन से निकाला
और
दिमाग के कूड़ेदान में डाला।
उनका कहना है
यह तो दूसरा ही जहां है
तुम ये बताओ
भारत में भी भारत की भाषाएं कहां हैं?
वह तर्क थे या बहाने थे,
बबूल बोया था
तो आम कहां से आने थे,
अब सफलता तो है
पर किसके साथ मनाएं?
किसके साथ बैठकर
ख़ुशी के गीत गाएँ।
अब वह अश्वमेध का ऐसा घोड़ा है
जो दुनिया तो जीतजाएगा
पर जीतने के बाद
लौट कर क्या वापस घर आएगा?
वह एक शख्सियत है
जो जवाब भी बन सकती है और सवाल भी
वह एक चिंगारी है
जो राख भी बन सकती है और मशाल भी।
वह सुरंग के पास है
उसे पुकारो
उसे आवाज दो!
उसकी रगों में कुछ है
जो खौलता है
तुतलाता ही सही
अपनी भाषा तो बोलता है
उसे आवाज़ दो
भारत की जो भाषा और संस्कृति
देवताओं को
जमीन पर बुला सकती है
वह उसकी सोयी हुई शिराओं को भी
जगा सकती है
उसे आवाज़ दो।
उसने आना है,
और हमने बुलाना है
वह आएगा अवश्य,
क्योंकि वही तो है
अपना
भटका हुआ भविष्य।
*******************
स्वरांगी साने (लेखिका, महाराष्ट्र)

मैंने सीखा
मैंने सीखा ‘अ’ अनार का
अब मैं ‘अ’ अत्याचार का सीखना चाहती हूँ
और खड़ी हो जाना चाहती हूँ
झूठ के खिलाफ़ बेखौफ़
मैंने जाना ‘आ’ आम का
पर मुझे ‘आ’ आग का समझना है
अपने भीतर की चिंगारी को जलाना है
मुझे पता चला है ‘इ’ इमली की
पर क्या ‘इ’ इंकलाब की नहीं हो सकती
मैं ‘ई’ ईख की भी जान गई हूँ
पर मैं ‘ई’ ईमान की समझना चाहती हूँ
‘उ’ उल्लू का क्यों
और ‘ऊ’ ऊँट का ही क्यों
अब गढ़कर नई अ आ इ ई
मुझे अपनी बात कहनी है
मुझे भी लिखना है
पर वैसे नहीं
जो पढ़ाया गया
या रटाया गया
सदियों से।
*********************
इन्द्रदेव भारती (सेवानिवृत्त कला शिक्षक मूर्ति देवी सरस्वती इण्टर कालेज,नजीबाबाद)

१ . हिन्दी ही आधार सखे!
हिन्दी आखर !
‘व्यंजन औ’स्वर!
अक्षत, रोली और मलयज
यह अद्वितीय!
सकल राष्ट्रीय!
देव सुभाषा की वंशज
कहते ज्ञानी
कथा-कहानी,
हिन्दी गीत बहार सखे
हिन्दी ही आधार सखे!
*
‘अ’अनार के
‘ह’ से हल के
वर्णों का भंडार यही।
शब्द हैं सुंदर,
कोष बृहत्तर,
वाणी का श्रृंगार, यही।
माँ वाणी के
दिये हुए ये,
शब्द अनुपम उपहार सखे !
हिन्दी ही आधार सखे!
*
सबसे पहले,
जिसे उचारे,
शब्द वो पहला ‘माँ’ का है।
लिखना जो भी
पढ़ना वो ही,
बोलनी मातृ-सुभाषा है।
ज्ञान-ध्यान का,
संसाधन का,
हिन्दी ही संचार सखे
हिन्दी ही आधार सखे!
*
सरल, सहजता,
बोधगम्यता,
प्यासी- ज्ञान पिपासा की ।
फूल है हिन्दी
मूल है हिंदी,
भारत की हर भाषा की।
सम्प्रेषण की,
एक मात्र ‘ही,
हिन्दी ही एक तार, सखे ॥
हिन्दी ही आधार सखे!
२ . हिन्दी भारत माँ की बिंदी
हिन्दी भारत माँ की बिंदी
हिन्दी भाषा है मकरंदी ।
हिन्दी बोले आज अहिन्दी ।
हिन्दी पढ़ते-लिखते हिन्दी ॥
चहुँ दिश अभिगुंजित है हिन्दी,
हिन्दी ! हिन्दी ! हिन्दी हिन्दी !
हिन्दी माँ वाणी की वाणी।
हिन्दी अखिल विश्वकल्याणी।
हिन्दी भाषाओं की रानी।
हिन्दी गंगा जी का पानी।
हिन्दी जन-गण-मन की भाषा।
हिन्दी जन-जन की अभिलाषा।
हिन्दी हर भाषी की-भाषा।
हिन्दी आशा की प्रत्याशा ।
हिन्दी माँ पाणी का वंदन।
हिन्दी भाषा अपना चंदन।
हिन्दी सौ टकिया है कुंदन ।
हिन्दी भाषा का अभिनंदन।।
हिन्दी नव-रसों में घोली।
हिन्दी छन्दों की है झोली।
हिन्दी अलंकार की बोली।
हिन्दी व्याकरण की गोली ||
हिन्दी तुलसी, सूर कबीरा।
हिन्दी सीता, राधा,मीरा
हिन्दी गाते पीर-फकीरा
हिन्दी हर भाषा में हीरा।
हिन्दी अन्तस्थल में साजे
हिन्दी कोटिक कंठ बिराजे।
हिन्दी सुर-लय-ताल में बाजे।
हिन्दी दसों दिशा में गाजे |
हिन्दी उद्भव से ले अबतक
हिन्दी द्विपद, त्रिपद, चतुष्पद
हिन्दी दोहा, कुंडली, मुक्तक
हिन्दी गीत, कविता, तुक्तक॥
हिन्दी भाषा है व्यवहारी
हिन्दी भाषा है सत्कारी
हिन्दी भाषा सब पर भारी
हिन्दी भाषा सबको प्यारी
हिन्दी पूरब-पश्चिम सौरम।
हिन्दी उत्तर-दक्खिन कलरव।
हिन्दी रघुनन्दन और माधव
हिन्दी कोटि – कंठ का गौरव
हिन्दी सकल राष्ट्र का वाचन
हिन्दी अपना उर – स्पंदन
हिन्दी आखर – आखर शब्दन
हिन्दी स्वतः स्वयं अभिनंदन ॥
हिन्दी मन-मंदिर में पुजती।
हिन्दी हर बाली में सजती।
हिन्दी जिह्वा-जिह्वा बसती।
हिन्दी अधर- अधर पर हँसती ॥।
हिन्दी भाषा नहीं ठिठोली
हिन्दी भारत-वंशी बोली।
हिन्दी शब्द में जैसे घोली
हिन्दी चंदन, अक्षत, रोली ॥
हिन्दी तन-मन-प्राण हमारी
हिन्दी स्वाभिमान हमारी
हिन्दी है पहचान हमारी
हिन्दी शुभ वरदान हमारी।।
********************
डॉ. दीक्षा चौबे (लेखिका, छत्तीसगढ़)

हिंदी संस्कारधानी है
महज भाषा नहीं है हिंदी, सरस संस्कार धानी है ।
वेदों की अनुपम गाथा है, पुराणों की जुबानी है ।।
सूर कबीरा तुलसी मीरा, पद रसखान बसे इनमें,
बहती है भावों की सरिता, यह पुरखों की कहानी है ।।
रचयिता यह महाकाव्यों की, संतों की शुचि बानी है ।
श्रमिकों का स्वेद-बूँद इसमें, नयन-पीर का पानी है ।
कई धर्मों संस्कृतियों की, बहती है धारा इसमें,
संचित पिटारी अनुभवों की, उमंग भरी जवानी है ।।
जलनिधि-सी यह विशाल हृदया, सरिता आनी-जानी है ।
अपनाया राह में जो मिला, पावन गंगा का पानी है ।
एक सूत्र में बाँध रही है, भिन्न-भिन्न परिवेशों को,
सहज सरल हिंदी हैअपनी, विश्व-भाषा बनानी है ।।
सुदृढ समृद्ध भाषा है यह, शब्द-माधुर्य का क्या कहना ।
अलंकृता रस ,छंद अर्थ की, अभिधा लक्षणा व्यंजना ।
ताल राग भाव अनुगामिनी, अनुपमेय हृद-भाव कहे ।
शब्द-शब्द मोती बन खनके, प्रेम-सुधा बह जानी है ।।
******************
दिव्या माथुर (प्रवासी लेखिका, अध्यक्ष: वातायन यू के, संपादक:’वातायनम’)

3000
‘जैन्नी डार्लिंग, तुम्हारे वहम का तो भई मेरे पास कोई इलाज नहीं है. तापमान माइनस आठ है तो ठंड तो लगेगी ही न?’ पीटर ने जैन्नी को एक बार फिर समझाने की नाकाम कोशिश की.
‘अशोक-मीता और हैनरी-बृन्दा पड़ौस में रहते थे तो हमारा घर कैसा कोज़ी रहा करता था, है न?’ सुबह होते ही जैन्नी का प्रलाप शुरु हो जाता था. उनके दो पड़ौसियों की असमय मृत्यु हो चुकी थी, एक दंपत्ति ने आत्महत्या कर ली थी और अशोक और मीता के परिवार को वापिस भारत जाने पर मजबूर कर दिया गया था. उनके मकानों के दरवाज़ों और खिड़कियों पर झाड़-झंखाड़ ने पूरी तरह से कब्ज़ा जमा लिया था; आगे और पीछे के बगीचों की आदमक़द घास भी मकानों को निगलने की फ़िराक़ में थी.
क्रिकलवुड हाई-स्ट्रीट की दस-पाउंड-शौप से आधा दर्ज़न सैलोटेप्स ख़रीद कर पीटर ने पूरे घर के दरवाज़ों और खिड़कियों के सभी छेदों, सन्धियों और दरारों को अच्छी तरह से चेप दिया था. दस्तानों, गर्म मोज़ों और फ़र लगे जूतों के अलावा कपड़ों की पांच-पांच तहों से लदी-फ़दी जैन्नी को फिर भी यही लग रहा था कि कहीं न कहीं से सर्द हवा बैठक में आ रही थी. अपने चश्में को बार-बार साफ़ करती हुई जैन्नी बैठक का चप्पा चप्पा छान मारती और फिर भी जब उसे अपनी बैठक में कहीं कोई छेद नज़र नहीं आता तो ‘ब्लीडिंग हैल’ कहते हुए वह सोफ़े पर निढाल हो जाती.
‘सारी ज़िन्दगी हम इस घर के लिए मरे-खपे. फिर भी हमारे बच्चों का इस घर पर कोई हक़ नहीं होगा, हैं न पीट?’
‘काउंसिल वाले हमारी मृत्यु का ही इंतज़ार कर रहे हैं, जैन्नी; हमारे मरते ही यहां एक मल्टी-स्टोरी इमारत खड़ी कर दी जाएगी.’
‘वसीयत लिखने की बात तो अब इतिहास हो गई, वैसे भी बच्चों को देने के लिए हमारे पास अब बचा ही क्या है, क्यों पीट?’ एक मोटा और खुरदरा कम्बल लपेटे पीटर और जैन्नी सोफ़े पर एक दूसरे से चिपके बैठे बुझे हुक्के गुड़गुड़ाते रहते थे. करने को और था भी क्या? वे टेलिविज़न पर केवल दो चैनल्स देख सकते थे; जिन पर बाबा आदम के ज़माने की फ़िल्में और सीरियल्स बार-बार दिखाए जाते थे. एक अन्य चैनल की सदस्यता लेने की भी क्षमता उनमें नहीं थी. वही पीटर जो कुछ साल पहले तक जैन्नी के ‘ईस्ट-एंडर्स’ और ‘कोरोनेशन स्ट्रीट’ जैसे घिसे-पिटे सीरियल्स को मुस्तैदी से देखने के लिए उसका दिन रात मज़ाक उड़ाया करता था, अब चुपचाप बैठकर वही सीरियल्स देखने लगा था. ऐसी कड़ाके की ठंड में ख़ाली जेब लिए वह जाता भी तो कहां? एक दूसरे के बदन की बची-खुची गर्मी ही उन्हें ज़िन्दा रखे थी और यही सीरियल्स, जिनके चरित्र अब पीटर और जैन्नी के परिवार के सदस्य बन गए थे; उनका मनोरंजन का साधन थे. किसी चरित्र की मृत्यु हो जाती तो उनकी बैठक में शोक पसर जाता, किसी का विवाह होता तो वे बिन-बुलाए मेहमानों की तरह बाक़ायदा सज-धजकर सोफ़ों पर बैठे, पानी में बार्ली-वाटर मिलाकर चीयर्स करते और फिर पनीला सूप और सूखी डबलरोटी को ही पकवान समझ कर खाते और फिर थोड़ा बहुत नाच लेते. क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान भी घिसी पिटी फ़िल्मों को वे यूं देखते थे कि जैसे शुक्रवार को एक नई लगी फ़िल्म देखने निकलें हों.
मार्च 2085 में हुए ब्लैक-रिसेशन के उपरांत ब्रिटेन की कई मशहूर थियेटर कम्पनियों ने अपने दरवाज़े सदा के लिए बन्द कर दिए थे. जाने-माने स्टैंड-अप कमीडियन पीटर स्मिथ को अब भोजन का अभाव चुटकलों से पूरा करना पड़ रहा था. ‘ब्रावो’ कहती हुई तालियां बजा-बजा कर जैन्नी भी उसकी हौसला-अफ़ज़ाई करती रहती थी किंतु समय सचमुच ही बहुत ख़राब था. उनके बहुत से दोस्तों ने ठंड, भूख और निराशा से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी; कुछ एक ने आजिज़ आकर अपने जीवन-साथियों को ही जान से ही मार डाला था और अब जेलों में सड़ रहे थे, जिनकी हालत तो सुना था कि नर्क से भी बद्तर थी. वांडस्वर्थ के बड़े जेलखाने में महीने भर में चार या पांच क़ैदियों द्वारा आत्महत्या कर लेना आम बात थी.
बच्चों के स्कूल और कालेज की फ़ीस भरने के लिए पीटर और जैन्नी आधा पेट खाकर और औक्सफ़ैम जैसी धर्मार्थ संस्थाओं से पुराने और सस्ते कपड़े ख़रीदकर साल-दर-साल गुज़ारा करते रहे थे. इसके बावजूद, लाएनल और लाना की पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी; हुकूमत चाहती ही नहीं थी कि साधारण घरों के बच्चे ऊंची शिक्षा प्राप्त करें. सिर्फ़ पूंजिपतियों और मंत्रियों के बच्चे ही विश्वविद्यालयों तक पहुंच पाते थे. ऐसे कुत्सित वातावरण में भी उनके बच्चे अच्छे ही निकले; लाएनल नलसाज़ बन गया था और लाना एक शिशु-स्कूल में पढ़ाने लगी थी. विवाह और बच्चे पैदा करने जैसे विषयों के लिए अब किसी के पास न समय था न ही धन. पीटर और जैन्नी ने पोते-पोतियों के विषय में सोचना बन्द कर दिया था. उनके लिए तो बस यही काफ़ी था कि उनके बच्चे ज़िन्दा और सही सलामत थे.
पहली जनवरी 2088 के दिन सरकार ने यकायक काउंसलर-सेवाओं में भारी कटौती की घोषिणा कर दी. बच्चों और बूढ़ों की बात तो एक तरफ़, अब मानसिक बीमारियों से ग्रस्त युवक-युवतियों को भी काउंसलर-सेवाएं उपलब्ध नहीं थी. हताशारोधी दवाएं अब ‘औन-दि-काउंटर’ मिलने लगी थीं, जिन्हें बड़ी मात्रा में ख़रीदा जा सकता था. इन दवाओं के भयंकर दुष्प्रभाव जानते हुए भी लोग इनका सेवन ज़ोर-शोर से कर रहे थे क्योंकि इनसे सस्ते में तो उन्हें ज़हर भी नसीब नहीं था. कष्ट और ज़ुल्म इतने बढ़ गए थे कि छोटे तबक़ों में बच्चों की परवरिश करने की बनिस्बत उन्हें मार देना या मरवा देना बेहतर समझा जाने लगा था. सुदूर जंगल में बनाई गई कौलोनियों में बसे ग़रीब और बीमार लोग भूख से तड़प-तड़प कर मरने को छोड़ दिए गए थे, जो यदा कदा उपनगरों द्वारा फेंके गए शिशुओं के अलावा अपनी ही बस्ती में पैदा हुए अवांछित शिशुओं के ग़ोश्त पर निर्भर थे.
2092 के मई महीने में ब्रैडफ़र्ड, बर्मिंघम और लन्दन में हुए उपद्रवों को पुलिस ने मुस्तैदी से दबा दिया. सैंकड़ों उपद्रवियों को, जिनमें छात्रों की संख्या ही अधिक थी, एक पुरानी और ठंडी इमारत में भूखे चूहों के साथ बन्द कर दिया गया. हफ़्ते में दो या तीन मर्तबा बासी खाना फ़ेंका जाता; चूहे अथवा उपद्रवी जो भी लपक लें. हां, यही तो बताया था राधा और रघु ने; जो अशोक और मीता के बेटा-बेटी थे. वे लाएनल और लारा के साथ पले-बढ़े और पढ़े थे और चारों में ख़ूब पटती थी. बेटी लाना तो रघु की बचपन से ही दीवानी थी; उसने भारतीय खाना और पहनावा भी अपना लिया था. अशोक और मीता को भी वह बहुत प्यारी लगती थी.
ख़ैर, उपद्रवियों के अलावा उस जुलूस में सरकार के पालतु मुस्टन्टे और स्वयं-सेवक ग़ुंडे भी शामिल थे, जिन्होंने चुन-चुन कर छात्रों को उस ख़स्ता-हाल ठंडी इमारत में बन्द कर दिया था और उनके मां-बाप से फ़िरौती मांग रहे थे.
‘हम भी ब्रिटिश नागरिक हैं, आप हमारे साथ ऐसा सुलूक नहीं कर सकते.’ राधा के ऐसे जुमलों पर आततायी उस पर हंसते कि जैसे वह पागल हो गई थी.
‘राधा, चुप भी रहो, ये तुम्हें कहीं मैंटल-हौस्पिटल में ही न भेज दें. कम से कम अभी तुम हमारे साथ हो.’ जब-जब राधा पर ख़िलाफ़त का दौरा पड़ता, लाना राधा के साथ नारे लगाने से बाज़ नहीं आती थी. लाएनल और रघु उन्हें चुप कराने में लगे रहते थे; न जाने कब क्या अनर्थ हो जाए?
लाएनल और लाना को भी ख़ासा पीटा गया था, विशेषतः इसलिए कि वे राधा और रघु का साथ छोड़ने के लिए तैय्यार नहीं थे. अंततः लाना और लाएनल को अन्य गोरे छात्रों के साथ ज़बरदस्ती एक मानसिक अस्पताल में भेज दिया गया; जहां उन्हें बहला-फुसलाकर सरकारी गवाह बनाया जाना तय था. इसके पहले कि उन दोनों का इलाज शुरु होता, पीटर और जैन्नी ने एक तगड़ी रक़म देकर किसी तरह उन्हें छुड़ाकर स्विटज़र्लैंड भिजवा दिया था, जिसके लिए उन्हें अपनी पुश्तैनी तस्वीरें और बहुत सा अमूल्य सामान बेच देना पड़ा था. इसी दौरान उनके बैंक-मैनेजर ने भी उनके साथ बेईमानी की और रातों-रात उनके ख़ाते ख़ाली हो गए किंतु उन्होंने चूं तक नहीं की कि कहीं लाएनल और लारा पर कोई इल्ज़ाम लगाकर उन्हें वापिस इंग्लैंड न बुलवा लिया जाए.
अशोक और मीता ने भी अपना घर और क़ीमती सामान बेचकर राधा और रघु को छुड़ाया था; ऐशियाई बच्चों की फ़िरौती कहीं अधिक थी. रघु और राधा अपने शरीरों पर चूहों के काटने के सैंकड़ों निशान लेकर घर लौटे थे; उनके हौसले पस्त हो चुके थे. जेल के रहन सहन ने उनके दिमाग़ पर भारी असर छोड़ा था; चौबीसों घंटे वे अपने कमरे में बैठे कम्प्यूटर्स के पर्दों को घूरते रहते. अशोक और मीता, जो अभी तक इस देश में अपने को सुरक्षित समझते आए थे, पैंतीस साल की मेहनत और प्यार से बसाए घर को न चाहते हुए भी छोड़कर मुम्बई लौटना पड़ा था; घूस के अलावा उनके इसी वादे पर उनके बच्चों को जेल से रिहाई मिली थी.
‘अंकल आंटी, आप लोग भी हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहे तो ये लोग हमारे देश को बर्बाद कर डालेंगे. कम से कम लाएनल और लाना का साथ ही दीजिए, प्लीज़.’ चीखती चिल्लाती राधा को अशोक ने लगभग घसीटते हुए टैक्सी में ठूंस दिया था. जैन्नी और मीता दोनों के विचार में सरकार से दुश्मनी मोल लेने का कोई फ़ायदा नहीं था. जैन्नी ने यह सोचकर मन को समझा लिया था कि अच्छा ही हुआ राधा चली गई, उसी के भड़काने पर लाएनल और लाना ने छात्र आन्दोलन में भाग लिया था. यही क्या कम था कि बच्चों की जान बच गई!
मात्र एक शक पर छात्रों को गिरफ़्तार करके दूर-दराज़ जंगलों में बनी ख़स्ताहाल इमारतों में कड़ी निगरानी के अन्दर रखा जाता था; शहरों की जेलें तो पहले ही भर चुकी थीं. छात्रों के छुटपुट आंदोलन फिर भी जारी थे क्योंकि अन्दर थे या बाहर, उनका जीवन बद से बद्तर होता चला जा रहा था.
आगामी पांच वर्षों में अशोक और मीता ने मुम्बई में घर बसा लिया था. पिछले साल ही लाएनल और लाना की आर्थिक मदद से पीटर और जैन्नी राधा के विवाह में सम्मलित हुए थे. उन्हें लगा था कि लाएनल राधा के विवाह को लेकर उदास होगा किंतु उसने ख़ुशी ही ज़ाहिर की थी कि चारों में से एक का तो घर बसा.
यह एक इत्तफ़ाक ही था कि अगस्त 2099 की एक सुहानी शाम को पिकेडिली सर्कस स्टेशन पर उतरते समय लाएनल की भेंट कैथरीन से हुई, जिसके हैंडबैग की लटकन लाएनल की जैकेट के बटन में अटक गई थी. दोनों ‘एक्सक्यूज़ मी’ कहते ही रह गए कि गाड़ी के दरवाज़े बन्द हो गए थे; कैथरिन ने आपतकालीन स्विच दबाकर गाड़ी रुकवाई. दरवाज़े खुले तो कैथरिन ने बाहर आना चाहा और लायनल ने अन्दर; दोनों टकरा गए. उसके बाद मोबाइल-फ़ोन्स और ई-मेल्स के ज़रिए दोनों का परिचय गाढ़ा होने लगा; जब तब वे देश की दयनीय स्थिति पर बहस करने लगते.
भारत में गुज़ारे वे दस दिन पीटर और जैन्नी के दिमाग़ में एक सुन्दर सपने की तरह सुरक्षित थे. काश कि भारत सरकार ने उन्हें कुछ देर और रुकने की मोहलत दी होती! पेट-भर स्वादिष्ट भोजन, अच्छी शराब और आरामदायक बिस्तर; उन्हें लग रहा था कि वे जन्नत में थे. भारी मन लिए वे लन्दन लौट आए थे. भेंट में मिलीं मिठाइयों और नमकीन को उन्होंने एक ख़ज़ाने की तरह संभाल कर ख़र्च किया था. क्रिसमस के दिन जब उन्होंने बर्फी का आख़िरी टुकड़ा मुंह में रखा तो उन्हें लगा था कि उनके अच्छे दिन पूरे हुए. जैन्नी अपने बचपन की यादों में डूब गई जब छिपटियों की रौशनी और गर्माई में ज़ोर-शोर से क्रिसमस मनाई जाती थी. जैन्नी के होंठों पर एक सर्द आह ठहर गई; बच्चों से मिले एक ज़माना हो गया था. इस डर से कि कहीं लाना और लाएनल फिर न उपद्रवों में भाग लेने लगें, वे बच्चों को अपने पास आने के लिए भी नहीं कहते थे. उनसे मिलने जाना भी असम्भव था; वे तो एक कमरे की हीटिंग का बिल भी वहन नहीं कर पा रहे थे. सोफ़े से उठकर रसोई में जाकर भोजन बनाने तक के लिए भी उन्होंने बारियां लगा रखी थीं ताकि ऊर्जा बचाई जा सके.
दोपहर का भोजन तैय्यार करने के इरादे से पीटर रसोई में पहुंचा तो नल में पानी नहीं उतरा; उसे मानो काठ मर गया. वह कमरे में लौटा और चुपचाप कम्बल में घुस गया. जैन्नी ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा.
‘हनी, ठंड के मारे बेचारी पाइप भी अकड़ कर फट गई है.’ पीटर की मुस्कुराहट जैन्नी के लिए जानलेवा थी.
‘ओह नो पीट! अब क्या होगा?’ जैन्नी ने घबराकर पूछा.
‘प्लम्बर को बुलाएं तो वह डेढ़ दो सौ पाउंडस तो सिर्फ़ मुआयने के ही ले लेगा.’
‘कुछ तो करना ही पड़ेगा, पीट, हैं न? क्या लाएनल से पूछें?’ मरी हुई आवाज़ में जैन्नी फुसफुसाई.
‘क्या बात करती हो जैन्नी तुम भी? आने जाने में ही उसके पांच सौ पाउंड्स ठुक जाएंगे और कहीं लन्दन में लैंड करते ही पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया तो?’
‘ओ डियर, लाना को बताएंगे तो वह बेचारी अपना पेट काटकर पचास-साठ पाउंड्स भेज भी देगी तो हमारा काम नहीं चलने वाला, हैं न पीट?’
दोनों भूखे-प्यासे बैठे सोच रहे थे कि हीटिंग और पानी के बग़ैर कैसे काम चलेगा? काश कि उन्होंने बचे-खुचे बर्तनों में पानी भर लिया होता; दो-तीन दिन तो किसी तरह निकल ही जाते.
‘पाइप्स में दौड़ रहे पानी के रहते हीटिंग शायद एक आध दिन ही चल पाए.’
‘इससे तो हम पूरा घर गर्म करके बैठते तो कम से कम पाइप्स तो न फटतीं, हैं न, पीट?’
‘यह कैच-22 का चक्कर है, जैन्नी, दिन रात हीटिंग चलाते तो बिल कहां से भरते?’
‘चलो क्रिकल्वुड-बूढ़ा-घर में जाकर बैठते हैं, वहीं टोस्ट और कौफ़ी से पेट भी भर लेंगे.’ मुसीबतें उनके सिर पर चट्टानों सी टूट रही थीं. वे अपनी जान बचाने के लिए उसी बूढ़ा-घर की छत के नीचे पहुंचे जहां न जाने की उन्होंने कभी क़सम खाई थी. एक ज़माने में क्रिकलवुड निम्नवर्गीय इलाक़ा था, जहां अधिकतर नौकरीपेशा अश्वेत रहा करते थे. सन 2070 के आस पास उन्हें परिधियों पर खदेड़ कर यहां श्वेत लोगों को बसा दिया गया, जिनमें जैन्नी और पीटर भी थे. क्रिकलवुड-फ़िल्म स्टूडियो की स्थापना के बाद जब घरों के दाम आसमान छूने लगे तो बहुत से भारतीय मूल के अमीर लोग भी आकर यहां बस गए जिनमें हैनरी-वृंदा और अशोक-मीता भी थे.
ब्लैक-रिसेशन ने सब कुछ बदल दिया; क्रिकलवुड-फ़िल्म स्टूडियो क्या बन्द हुआ, एक के बाद एक छोटे बड़े सारे थियेटरों और सुपर-स्टोर्स के दरवाज़े बंद होते चले गए. सड़कों पर कूड़े के ढेर हफ़्तों-हफ़्तों तक साफ़ नहीं किए जाते. गैस, बिजली और पानी की कमी से लोगों ने नहाना धोना और खाना पकाना तक छोड़ दिया. आउट-औफ़-डेट गोश्त और गली-सड़ी सब्ज़ियां पका-पका कर ढाबे वाले शहर के निवासियों का पेट भरते थे. पूरा शहर दुर्गन्ध से खदकता रहता था. कमज़ोर और बूढ़े लोगों की पैंशंस छीन कर भाग जाने वाले नौजवानों को पुलिस मुंह नहीं लगाती थी और इसलिए जैन्नी जैसी सैंकड़ों महिलाएं अकेले घर से बाहर निकलते हुए भी डरतीं थीं.
बर्फ़ गिरनी बन्द हुई तो ठंड कुछ और बढ़ गई. जैन्नी के घुटने बहुत दुख रहे थे किंतु वह पीटर की बांह पकड़े कराहती हुई उसके पीछे घिसटती हुई चल दी. ऐसी ठंड में बाहर निकलने का बस एक ही अर्थ था; रात भर जैन्नी न सो पाएगी और न ही पीटर को सोने देगी. यदि कहीं पीटर का दमा उभर आया तो पीटर की सांसों और जैन्नी की हाय-हाय की जुगलबन्दी हफ़्तों छिड़ी रहेगी. उनकी हालत उन तिलचट्टों जैसी थी जो ज़हर-भरी पिचकारी के छिड़काव के बावज़ूद ज़िन्दा थे.
बेघर और ग़रीब लोगों से बूढा-घर खचाखच भरा था; अब तो अच्छे ख़ासे परिवार के लोग भी हीटिंग और भोजन का ख़र्च बचाने के लिए यहां आने लगे थे. जो थोड़ा बहुत भोजन यहां मिलता, उसी को खाकर वे ताश खेलते, नाचते गाते, रोते-कलपते अथवा आपस में लड़ते भिड़ते. बदबु के मारे पीटर और जैन्नी को अपनी नाक बन्द कर लेनी पड़ी; साठ-पैसठ बाशिन्दों में से शायद ही कोई नहाया हो या महीनों में किसी ने अपने कपड़े बदले हों. दो साफ़-सुथरे और स्वस्थ जनों को नाक बंद किए देख उनका क्रोधित होना स्वाभिक ही था.
‘सो यू रिमैम्बर्ड अस आफ़्टर औल!’ पीटर और जैन्नी को अपने बीच बैठा देख लोग ग़ुस्से में खुसर-पुसर करने लगे कि उनका स्थान और भोजन अब और बंटेगा. चुटकुले सुनाकर पीटर उनका ध्यान बंटाना चाह रहा था कि पनीली चाय के साथ बासी टोस्ट परोसे जाने लगे. सब कुछ भूलकर लोग खाने-पीने में जुट गए कि न जाने भोजन-गाड़ी फिर कब आए और क्या लाए.
घर पहुंचे तो देखा कि हीटिंग बन्द हो चुकी थी और सूरज के ढलते ही ठंड बढ़ने लगी. कोट और मफ़लर उतारे बिना वे लिहाफ़ों में घुस गए. टीवी चलाया तो ख़बर सुनी कि अगले हफ़्ते तापमान और गिरने वाला था.
‘पीट, अगर हम एक हफ़्ता बूढ़ा-घर में भोजन करें तो डेढ़ सौ पाउंडस तो बचा ही लेंगे, हैं न?’
‘और शुक्रवार को पैंशन मिलने पर हमारे पास सौ पाउंड्स और आ जाएंगे.’ उन दोनों ने एक दूसरे को यूं देखा कि जैसे वे एक दूसरे के दिमाग़ में चल रहे द्वन्द से भली-भांति परिचित हों.
‘शुक्रवार की रात को हम ख़ूब मज़ा करेंगे, हैं न पीट?’ जैन्नी शोख़ी से भर गई.
‘शराब की दो बोतलें काफ़ी होंगी, क्यों हनी?’ पीटर पर मानो जवानी उतर आई हो.
‘पीट डार्लिंग, दो बोतलों से तो हमारा गला भी तर नहीं होगा? कम से कम चार-चार तो हम-तुम पी ही सकते हैं, हैं न?’ बिना पिए ही जैन्नी पर ख़ुमार चढ़ रहा था.
‘जब से मुम्बई से लौटे हैं, चिकन टिक्का मसाला भी तो नहीं चखा है हमने, गार्लिक नान्स के साथ दो प्लेट्स चिकन टिक्का काफ़ी रहेगा, क्यों?’ दोनों की लार टपक रही थी.
‘मुझे आज बच्चों की बहुत याद आ रही है, पीट.’ जैन्नी ने तिपाए स्टूल पर रखी हुई एल्बम उठा ली और राधा के विवाह के चित्र देखने लगी. मीता ने कितने प्यार और आदर से उन दोनों के लिए विवाह में पहने जाने वाले राजसी वस्त्र सिलवाए थे, जिन्हें पहनकर वे दोनों राजा-रानी से कम नहीं लग रहे थे. मुम्बई से लौटकर जैन्नी ने उन्हें अपने विवाह की पोशाक में लपेट कर सहेज दिया था.
‘काश कि हम लाएनल और लाना को इन शाही कपड़ों में देख पाते. देखो तो पीट, कितनी प्यारी लग रही है अपनी राधा! यहां रहती तो हमारे लाएनल से उसका ब्याह होता, हैं न?’
‘मुझे तो लगता है कि हमारी लाना भी रघु के इंतज़ार में ही है. अभी तक उसका भी कोई ब्वौए-फ़्रैंड नहीं बना है.’
‘शायद वह अपना ब्याह इंडिया में जाकर ही करे और हमारे ये शाही लिबास एक बार फिर काम आ जाएं, हैं न पीट?’ जैन्नी की आंखों में आशा की एक किरण चमक कर सहम गई.
‘अब हम शायद कभी इंडिया न जा पाएं, जैन्नी. कल ही तो हमारे संस्कृति-मंत्रि ने वक्तव्य दिया था कि विदेशों में जाकर हमारे देशवासी अपनी ही सरकार की बुराइयां करते फिर रहे हैं.’ पीटर की आवाज़ में क्षोभ और निराशा थी.
‘ख़ैर, किसी तरह हमारी ये कुछ रातें अच्छी तरह से ग़ुज़र जाएं, फिर तो बस…’
‘पर जैन्नी, अगर सब हमारी ही तरह पलायनवादी हो जाएंगे तो देश का क्या होगा?’ उत्तेजित होते हुए पीटर ने पूछा.
‘याद है तुम्हें, पीट, घर छोड़ते समय राधा ने भी यही कहा था. उस जैसी ज़िद्दी लड़की तक को तोड़ डाला हमारी व्यवस्था ने तो हम दो बूढ़े क्या कर लेंगे?’
‘ख़ैर, अब तो हमने भी चलने का फ़ैसला कर लिया है…’ कहते हुए पीटर अपने दोनों हाथ सिर पर रखे सोफ़े पर धंस गया.
‘क्या करें, पीट डियर, हमारे पास और चारा भी क्या है?’ जैन्नी को समझ नहीं आ रहा था कि पीटर को एकाएक क्या हो गया था.
‘दो जानें तो हैं न हमारे पास, डार्लिंग?’ पीटर ने जैन्नी की आंखों में झांकते हुए पूछा.
‘ओह डियर पीट, तुम शायद ठीक कह रहे हो; यदि हमें अपनी जानें गंवानी ही है तो क्यों न हम इस दुष्ट सरकार को हिला कर दम तोड़ें. दो एक बम फोड़ दें इन कम्बख़्तों के सिर पर, हैं न पीट?’ जैन्नी ने जवाब दिया तो पीटर की आंखे चमक उठीं.
‘अब आएगा मज़ा, जैन्नी, हम भी कैसी मूर्खता करने जा रहे थे?’
‘आत्महत्या का विचार भी हमारे दिमाग़ में कैसे आया, पीट?’
‘हनी, कमज़ोरी में कायरता का हावी हो जाना स्वाभाविक है.’
‘तो चलो, आहुति के लिए तैय्यारी हो जाओ, मरने का फ़ैसला तो हमने कर ही लिया है, तो क्यों न बहादुरी और शान के साथ मरें, ताकि हमारे बच्चे हम पर नाज़ करें, हैं न पीट?’ अपने घुटनों का दर्द भूल कर जैन्नी उठ खड़ी हुई.
‘ठीक है जैन्नी, मैं कल सुबह ही समाजवादी पार्टी के लीडर टोनी वैबस्टर से मिलता हूं, सरकार से वह बेचारा अकेले की लड़ता रहा है अब तक.’
‘हमें अपना निर्णय बच्चों को बता देना चाहिए, हैं न पीट?’
‘हां, तुम ठीक कहती हो, हनी. बुज़दिली से हमने ही उन्हें यहां से दूर भेज दिया था. तब से मुझे एक दिन का भी सुकून नहीं मिला.’ पीटर ने कहा तो जैन्नी को लगा कि शायद पीटर यह बात अपने मन में छिपाए न जाने कब से घुल रहा था.
‘हमसे ग़लती हुई, जिसे हमें मरने से पहले सुधार लेना चाहिए, हैं न पीट?’ यह कैसे हुआ कि वह पति के मन की बात न जान सकी? उसके लिए तो बच्चों की सुरक्षा और सुख ही सर्वोपरि रहे. किंतु कैसी सुरक्षा? कैसा सुख? कौन सुखी था इस नर्क में?
पीटर ने उसी रात एक टेलिकान्फरैंस बुलाई, जिसमें लाना-लाएनल और राधा-रघु ने भी भाग लिया. ख़ूफ़िया विभाग को कहीं उनके इस मिलन की भनक न लग जाए इसलिए बात को संक्षिप्त रखा गया.
‘हम चारों आन्दोलन के काम में आज भी सक्रिय हैं. हमने आप दोनों को अंधेरे में इसलिए रखा ताकि आप लोग हमारी तरफ़ से बेफिक्र रहें.’ लाएनल ने कहा.
‘हमें अफ़सोस है कि हम कायर बने हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहे, तुम लोगों का साथ ही देते तो शायद हमने इस नर्क से कब की निजात पा ली होती.’
‘हम जैसे ही न जाने कितने और लोग होंगे जो इस आन्दोलन से जुड़ना चाहेंगे, हैं न पीट?’ जैन्नी की आवाज़ में एक नया जोश झलक रहा था.
‘हमें भी ऐसे ही लोगों की आवश्यक्ता है, जिन्हें अपनी जान की परवाह न हो किंतु आप लोगों को बहुत होशियारी से काम लेना होगा.’ रघु बोला.
‘आगे से आप हमें केवल बूढ़ा-घर से ही फ़ोन करेंगे, घर से नहीं.’ राधा ने कुछ यूं कहा कि जैसे वह उन सबकी लीडर हो.
‘ब्रिलिऐंट आइडिया, बूढ़ा-घर की बैकड्रौप में हम अपना आन्दोलन बिना किसी शक के चला सकते है.’ लाएनल ने कहा.
‘लिसन गाइज़, हमें और अधिक बात नहीं करनी चाहिए. अब कल बात होगी.’ राधा के कहते ही सबने झटपट फ़ोन रख दिए. चाहे फ़ोन के ज़रिए ही सही, सालों बाद दो परिवार फिर से इकट्ठे हुए थे. सभी की आंखें भरीं थीं और मन उल्लसित.
नींद की गोलियां जो पीटर और जैन्नी ने शुक्रवार की रात को अपनी आत्महत्या के लिए इकट्ठी की थीं, बूढ़ा-घर के मैडिकल-किट में रख दी गईं. उनके शरीरों में बरसों बाद एक ऐसी ऊष्मा जगी कि उन्हें हरारत सी महसूस हो रही थी. अगली ही सुबह पीटर और जैन्नी बूढ़ा-क्लब में जा बैठे; जैन्नी स्त्रियों के और पीटर पुरुषों के मध्य. जैसे ही उन्होंने सरकार के दमन और नाइंसाफ़ियों की बात उठाई, लोग जल्दी ही दो भागों में विभाजित हो गए. एक तो वे जो स्थिति को सुधारने के लिए कुछ करना चाहते थे और दूसरे वे जो यही कहे चले जा रहे थे कि सरकार से टक्कर लेना बेकार था. छोटे-छोटे समूहों में बंटकर लोग ज़ोर-शोर से बहस करने लगे और इस दौरान पीटर-जैन्नी जान गए कि उन लोगों में से कितने लोग उनके काम के थे; कितनों को समझा-बुझाकर राज़ी किया जा सकता था और किन-किन से सावधान रहना होगा.
इसी बीच एक स्थानीय अख़बार में गृहमंत्री नैश के साथ कैथरिन का फ़ोटो छपा, जिसे देखकर लाएनल और उसका परिवार अचम्भित थे. कैथरिन उनके दुश्मन की बेटी थी. लाएनल ने उससे नाता तोड़ लेना चाहा किंतु पीटर-जैन्नी और राधा-रघु के कहने पर कि कैथरिन उनके काम आ सकती थी, वह चुप लगा गया. कैथरिन झट जान गई कि उन लोगों को अब उसपर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा था. उसने उन सबको विश्वास दिलाने का पूरा प्रयत्न किया कि वह उन्हें कभी धोखा नहीं देगी. पीटर और जैन्नी को उसपर पूरा विश्वास था किंतु बाकी के सब लोग चौकन्ने हो गए थे.
लाएनल के एक फ़ोन ख़टकाने की देर थी कि टोनी वैब्स्टर सीधा बूढ़ा-घर में आ पहुंचा. उसे अपने बीच देखकर लोगों में कुछ हलचल हुई. अगले ही दिन बंदूकें, कारतूस और बम बनाने का सामान एक कूड़ा-गाड़ी के ज़रिए बूढ़ा-घर में पहुंचा तो लोगों में एक नई आशा और जोश का संचार हुआ; पीटर और जैन्नी को अब उनका खुला सहयोग मिलने लगा. कूड़ा-गाड़ी ने पूरे मुहल्ले के डस्ट-बिन्स भी ख़ाली किए ताकि लोगों को उनपर शक न हो जाए.
‘अंकल-आंटी, आप बहुत सोच समझकर क़दम उठाइएगा; न केवल हमारी योजना बल्कि हम सबका जीवन भी अब आप पर निर्भर है.’ गम्भीर होते हुए रघु बोला कि जैसे उसे विश्वास न हो कि वे दोनों इस काम के लिए उपयुक्त थे.
‘हमारी तरफ़ से तुम बिल्कुल बेफ़िक्र रहो, रघु. अपनी जानों की क़ीमत का अन्दाज़ा हमें हो गया है और तुम चारों की जानें तो हमसे कहीं बेशक़ीमती हैं.’ पीटर और जैन्नी एक स्वर में बोले.
पीटर और जैन्नी जैसे अवकाशप्राप्त बूढों पर किसी को शक न हुआ; उन दोनों की देखरेख में बूढ़ा-घर एकाएक क्रांति का गढ़ बन गया. मौत के कगार पर बैठे बूढ़े-बूढ़ियां कुछ कर गुज़रने के लिए झटपट तैय्यार हो गए और उनकी मदद और मनोरंजन के बहाने आन्दोलनकारी बूढ़ा-घर में बेरोक-टोक आने जाने लगे. बूढ़ा-घर के पिछवाड़े एक झाड़-झंखाड़ उग आया था, जिसे साफ़ करने के लिए न तो किसी के पास समय था और न ही ऊर्जा. उसी के पीछे टीन के गैरेज में क्रांति का ब्लू-प्रिंट तैय्यार हुआ; हथ-गोले और बम भी बनाए जाने लगे.
देखते ही देखते भ्रष्ट राजनीतिज्ञों और बैंकर्स के घरों पर बम यूं फटने लगे जैसे कि होली के रंग-भरे ग़ुब्बारे. एक हफ़्ते के अन्दर ही अन्दर सरकार घबरा उठी; उनके प्रतिनिधियों को चुन-चुन कर मारा जा रहा था; जो बचे थे उनमें भगदड़ मची हुई थी. उपद्रवियों की सहानुभूति पाने के लिए सरकार बूढ़ों और पैंशंनर्स के लिए जगह-जगह उनकी चिकित्सा और भोजन का प्रबन्ध कर रही थी. वही लोग जो बम फोड़ रहे थे, अब भर पेट खाना खा रहे थे. सुरक्षित स्थानों से छात्र भाषण दे रहे थे जो पूरे विश्व में वेबसाइट्स, ब्लौग्स और ट्विटर्स के ज़रिए प्रसारित हो रहे थे.
‘कमज़ोरों की मेहनत और कमाई का धन ये बैंकर्स और राजनीतिज्ञ कब तक उड़ाते रहेंगे?’
‘अध्यापकों को अल्प वेतन देकर और विद्यार्थियों से तगड़ी फ़ीस हासिल करके हमारी सरकार ब्रेन-ड्रेन पर तुली है.’
‘अध्यापकों के लिए फ़र्मान ज़ारी किया जा रहा था कि वे हड़ताल करें, विद्यार्थियों के साथ मिलकर जलूस निकालें और फ़ीस कम करने की मांग करें.’
‘मंत्रियों और बैंकर्स के वेतन में ज़बरदस्त कटौती की जाए. अरबपतियों को निर्देश दिया गया कि वे अपने अपार धन का पच्चीस प्रतिशत धन शिक्षा और देश में फैली अराजकता को हटाने के लिए दान दें, अन्यथा उनकी जान का ज़िम्मा उपद्रवी नहीं ले सकते.’ ऐसे ही सैंकड़ों संदेशों और ट्वीटस के पीछे राधा, रघु और कैथरिन का हाथ था. देश भर के युवक-युवतियां निडर होकर सड़कों पर निकल आए थे, ट्रफ़ाल्गर स्केव्यर, वैस्टमिंस्टर और बकिंघम पैलेस जहां देखो वहां आंदोलनकारियों के झंडे फहराते नज़र आ रहे थे.
‘राजनीतिज्ञ और बैंकर्स हमारे गाढ़े पसीने की कमाई उड़ा रहे हैं, जनता को इन्होंने बन्धुआ मज़दूर समझ रखा है, मुट्ठी भर वेतन देकर ये उनका ख़ून चूस रहे हैं.’
‘डाउन विद ब्लू-ब्लड’, ‘डाउन विद दि बैंकर्स’, ‘भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, शर्म करो शर्म करो.’ जैसे नारों से आकाश गूंज रहा था.
जिस बात का डर था वही हुई, लाना अभी किंग्स-क्रौस स्टेशन पर उतरी ही थी कि देशद्रोह के इल्ज़ाम में उसे गिरफ़्तार कर लिया गया. पीटर और जैन्नी को उससे पूरे दो दिन बाद मिलने की मोहलत दी गई; उसे देखकर उन्हें ऐसा लगा कि जैसे एक बड़े ज़ख़्म को बुर्का ओढ़ा दिया गया हो. अपनी टूटी फूटी शक्ति बचाए पीटर और जैन्नी उसे सीने से लगाए बस रो ही तो पड़े. उन्हें लगा कि जैसे लाना की शक्ति चूस ली गई थी; न वह रोई और न ही उसने मां-बाप से कुछ कहा; वह ख़तरे में थी.
सरकार को कहीं से जानकारी मिल चुकी थी कि इन उपद्रवों के पीछे छात्र ही थे. जल्दी ही उनके गुप्तचरों ने टोनी वैब्स्टर, लाएनल और लाना आदि के नाम भी उन्हें दे दिए. यह शुक्र था कि उन्हें बूढ़ा-घर का पता अभी नहीं मिला था किंतु रघु के सुझाव पर बम बनाने का सामान वहां से रातों रात हटवा दिया गया. क्रांतिकारी देश के कोने-कोने में फैल गए ताकि एक जगह पर उन्हें पकड़ा न जा सके.
राधा के भी ब्रिटेन आने पर पाबन्दी लगा दी गई थी किंतु रघु जल्दी ही एक ज़रूरी मीटिंग के बहाने लन्दन आ पहुंचा. वह एक वकील की हैसियत से लाना से मिला; उसे देखकर लाना की आंखों में एक चमक सी दिखाई दी. अगले ही दिन, लाना के चोट-खाए और सूजे हुए चेहरे के चित्र अख़बार में छपे तो छात्रों का एक बड़ा रेला जेल के बाहर धरने के लिए बैठ गया. चिल्ला-चिल्ला कर उन्होंने पार्लियामैंट की नींव हिला दी और बमों की बौछार ने एक बार फिर सरकार को हिला कर रख दिया. यथा-समय राधा एक फ़र्ज़ी नाम से ब्रिटेन में दाखिल हुई.
परिस्थिति की गम्भीरता को मद्दे-नज़र रखते हुए प्रधानमंत्री स्मिथ ने गृहमंत्री नैश को निर्देश दिया कि वह छात्रों को अपने निवास पर आमंत्रित करें ताकि समस्या का कोई हल निकाला जा सके. बूढ़ाघर में एक आपतकालीन मीटिंग बुलाई गई.
‘तुम क्या सोचते हो, रघु, कि कैथी पर विश्वास किया जा सकता है.’ पीटर ने पूछा.
‘अंकल, कैथी पर मुझे पूरा विश्वास है किंतु उसकी दी हुई सूचनाओं पर नहीं. ऐसा नहीं हो सकता कि नैश को अपनी बेटी के आचरण पर शक न हुआ हो.’
‘मुझे भी यही लग रहा है कि वे कैथी को ‘यूज़’ कर रहे हैं, हमें अपने सम्पर्क जल्दी-जल्दी बदलने होंगे.’ लाएनल बोला ही था कि कैथरिन ने चहकते हुए फ़ोन किया कि उसने अपने पिता को फ़ोन पर किसी से बात करते सुना था कि लाना को छोड़ दिया जाएगा.
‘लाना को इस समय छोड़ने का क्या अर्थ हो सकता है?’ अपना सिर खुजलाते हुए रघु ने पूछा.
‘मुझे तो लगता है कि नैश ने यह फ़ोन कैथरिन को सुनाने की ग़रज़ से ही किया होगा ताकि वह हमसे राबता क़ायम करे?’ जैन्नी बोली.
‘वे चाहते हैं कि हम किसी तरह कैथरिन पर विश्वास कर लें.’ राधा ने अपनी राय दी.
‘यह भी तो हो सकता है कि ये उपकार वे कैथरिन को अपने विश्वास में लेने को कर रहे हों.’
‘इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि हमने उसे अपनी सही योजना कभी बताई ही नहीं, क्यों लाएनल?’ रघु का सीधे उसी से पूछना लायनल को अच्छा नहीं लगा; क्या वह उसपर अविश्वास कर रहा था?
अगले दिन सचमुच लाना को बरी कर दिया गया. वह बहुत कमज़ोर हो गई थी पर हृदय से कहीं अधिक मज़बूत. यह तय किया गया कि गृहमंत्री के निवास पर बुलाई गई इस बैठक में वैब्स्टर, रघु और लाना को नहीं जाने दिया जाएगा ताकि यदि कोई दुर्घटना घटी तो ये लोग कमान सम्भाल सकें. रातों रात कुछ नए छात्र-नेता चुने गए, जिन्हें लाएनल, राधा, पीटर और जैन्नी की निगरानी में भेजे जाने का फ़ैसला लिया गया.
तभी कैथरिन का फिर फ़ोन आया कि उसे मंत्रियों की नीयत कुछ ठीक नहीं लग रही. यह कह कर उसने झट से फ़ोन रख दिया. भगदड़ मच गई. मोबाइल्स एक बार फिर नष्ट किए गए, आवास-व्यवस्था उलट-पलट हुई. लाएनल के अनुरोध पर रघु और राधा के भेस बदल दिए गए.
नैश को सूचना मिल चुकी थी कि उनकी अपनी बेटी ही उनके ख़िलाफ़ जासूसी कर रही थी.
‘कैथी, यदि तुम लाएनल को मना लो तो तुम्हारे पापा उसे शिक्षा-मंत्री का पद देने को भी तैय्यार हैं.’ पति के निर्देश पर श्रीमति नैश अपनी बेटी को पटाने का प्रयत्न कर रही थीं.
‘मां, लाएनल किसी पद के लालच में यह सब नहीं कर रहा है. हम सबको भी चाहिए कि देश की हालत सुधारने में उसकी मदद करें.’ मन ही मन कैथरिन को फ़िक्र हो रही थी कि न जाने कब से उसका फ़ोन टैप किया जा रहा था.
‘कैथी, तुम हम सब की जान ख़तरे में डाल रही हो. तुम्हारे पापा के हाथ में कुछ भी नहीं है.’ मिसेज़ नैश सचमुच भयभीत थीं.
‘अपनी जान बचाने के लिए हम दूसरों को मरने के लिए तो नहीं छोड़ सकते न, मम्मी,’ कैथरिन अपनी बात पर अड़ी रही.
‘कैथी, आज शाम तुम्हारे पापा ह्युबर्ट से तुम्हारी सगाई की घोषणा करने वाले हैं. तुम्हें यदि लाएनल और उसके परिवार की जान बचानी है तो तुम्हारा चुप रहना ही बेहतर होगा.’
‘मम्मी, फ़ौर ग़ौड्स सेक!’ कैथरिन को लगा कि उसका सारा ख़ून दिमाग़ की ओर दौड़ रहा था.
‘वी डोंट डू गौड, माइ डियर,’ मिसेज़ नैश ने कहा.
‘ठीक है, मैं लाएनल से बात करके देखती हूं,’ मां को बेवक़ूफ़ बनाकर कैथरिन किसी बहाने से लाएनल को आगाह करना चाहती थी.
‘शाम को ठीक से तैय्यार होकर आना; पुखराज और हीरे के यह हार और बुन्दे तुम्हारी हरी आंखों के साथ अच्छे जंचेंगे. वैसे भी आज तुम्हारे दोस्तों की ख़ूब ख़ातिर की जाएगी.’
‘ख़ातिर’ शब्द सुनकर कैथरिन के कान खड़े हो गए. लाएनल को उसे जल्दी से जल्दी आगाह करना होगा पर उसका मोबाइल-फ़ोन और लैपटौप दोनों नदारद थे. नौकरानी उसे खाना देने आई तो नैश की एक निजी सचिव उसके साथ थी. कैथरीन घबरा कर ज़मीन पर बैठ गई और लायनल द्वारा सिखाया गया लोटस-सूत्र, नामियोहो-रेंगे-क्यो, का जाप करने लगी, जिसका अर्थ था कि हर व्यक्ति महात्मा बुद्ध बनने की क्षमता रखता है. बुद्ध की ही तरह वह सब कुछ छोड़ने को तैय्यार थी पर कैसे निकले इस जंजाल से?
किसी तरह शाम हुई और मिसेज़ नैश की सचिव सैंडी चाय लिए आ पहुंची. सैंडी उसकी अच्छी दोस्त थी पर कहीं मां ने उसे जानबूझकर तो नहीं भेजा? इससे पहले कि कैथरिन कुछ पूछती, इधर उधर देखते हुए सैंडी उसके कान में फुसफुसाई, ‘कैथी, मैंने अभी अभी तुम्हारे पापा को किसी से यह कहते हुए सुना कि कोई भयानक दुर्घटना घटने वाली है…’
‘प्लीज़ सैंडी, डू समथिंग.’ क़दमों की आहट सुनकर सैंडी फ़ौरन चली गई. उसके बाहर निकलते ही दरवाज़े को फिर से बंद कर दिया गया. खिड़कियों के बाहर गार्ड्स तैनात थे, जिन्हें उसकी ‘हैल्प हैल्प’ की चीख़ों को न सुनने का आदेश था.
कैथरिन अपनी वफ़ा का सबूत देना चाहती थी. राधा और रघु के घोर विरोध के बावजूद वह अड़ गई थी कि यदि इस बैठक में भी छात्रों की बात नहीं सुनी गई तो ठीक एक घंटे बाद वह नैश का यानि अपना घर स्वयं उड़ा देगी. आंदोलनकारियों के मुताबिक सरकार को जड़ से हिला देने का यह एक अच्छा उपाय था. वे जानते थे कि कैथरिन और उसके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा क्योंकि उसी शाम को सात बजे प्रधानमंत्री निवास पर परिवार सहित पूरा मंत्रिमंडल भोजन पर आमंत्रित था.
बम बनाने का सामान धीरे धीरे रक-सैक में छिपा कर कैथरिन अपने शयनकक्ष में इकट्ठा करती रही थी; बम पर सिर्फ़ टाइमर लगाने भर की देर थी. उसके हाथ कांप रहे थे. कहीं उनकी योजना की उन्हें सूचना तो नहीं मिल गई? उसे बिना बताए कहीं बैठक का समय तो नहीं बदल दिया गया? कहीं वे सब के सब न मारे जाएं. हो सकता है कि उन्हें कैथरिन पर ही शक हो गया हो, राधा और रघु को तो उसपर बिल्कुल भरोसा नहीं था.
‘यू आर वांटेड इन दि हौल एग्ज़ैक्टलि इन फ़िफ़्टीन मिनट्स.’ नैश की खूसट सचिव ने कमरे में झांक कर कैथरिन को लगभग और्डर देते हुए कहा. ह्युबर्ट से विवाह करने से तो यह अच्छा ही होगा कि वह मर जाए. कम से कम लाएनल और उसके परिवार को तो विश्वास हो जाएगा कि अंतिम समय तक वह उनके प्रति वफ़ादार थी. अपने शयनकक्ष से निकलने से पूर्व धड़कते दिल से उसने टाइमर को सात बजे के लिए सेट कर दिया. अब वह शांत थी. उसने अपना वादा निभा दिया था; अब चाहे जो भी हो.
आंदोलनकारियों के मना करने के बावजूद गृहमंत्री-निवास से लिमोज़ींस उन्हें लिवाने आई थीं. क्रिकल्वुड-बूढ़ाघर से कुछ ही दूर था ट्राइसिकल थिएटर, जहां साढ़े चार बजे मिलना तय हुआ था. वैस्टमिंस्टर का एक चक्कर लगाते हुए लिमोज़ींस मेफ़ेयर पहुचीं, जहां बड़े बड़े आलीशान कसीनोज़ जगमगा रहे थे.
गृहमंत्री निवास पर उनका शानदार स्वागत किया गया. बढ़िया शराब की बोतलें खोली गईं. सैमन-मछली और चीज़-पाइनऐपल की कैनोपीज़ के अलावा मटन और चिकन की पैटसीज़ और दर्जनों तरह के केक्स देखकर छात्रों के मुंह में पानी भर आया था किंतु वे सावधान थे. घरातियों को खाते-पीते देखकर धीरे-धीरे छात्रों और उनके परामर्शदाताओं ने भी खाना पीना शुरु किया.
जिन छात्रों की उन्हें तलाश थी, वे मीटिंग में नहीं पहुंचे थे; मंत्रियों के मंसूबों पर पानी फिर चुका था.
कैथरिन ने जब कमरे में प्रवेश किया तो लोगों में सरसराहट दौड़ गई; वह बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी. लाएनल की नज़र कैथरिन पर होते हुए राधा की ओर चली गई तो कैथरिन को लगा कि वे उसके बारे में ही बात कर रहे थे.
नैश ने चम्मच से अपना गिलास बजाते हुए सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया.
‘गुड ईनिंग लेडीज़ ऐण्ड जेंटलमेन, मेरी पत्नी और मुझे आशा है कि आप सब लज़ीज़ भोजन का आनन्द उठ रहे होंगे. इस शानदार मौके पर और कैथरिन के दोस्तों की मौजूदगी में हम अपनी प्यारी बेटी की सगाई की घोषणा करना चाहते हैं.’ नैश ने कहा तो पूरी सभा में सन्नाटा छा गया.
‘आप सब तो जानते ही हैं कि ह्युबर्ट और कैथरिन बचपन से एक साथ पले-बढ़े और अब वे एक अटूट बंधन में भी बंधने जा रहे हैं. अधिक न कहते हुए हम उनके सुखद भविष्य की कामना करते हैं. ये जोड़ी फले फूले और सदा ख़ुश रहे.’ कहकर उन्होंने अपना गिलास हवा में उठा दिया.
‘टु ह्युबर्ट ऐण्ड कैथरिन.’ लोग गिलास उठाकर उन दोनों को शुभकामनाएं देने लगे; लाएनल के परिवार और दोस्तों को जैसे उन्हें सांप सूंघ गया हो; सभी जानते थे कि कैथरिन लाएनल की दीवानी थी. जैन्नी और राधा को लग रहा था कि जैसे आंखों ही आंखों में कैथरिन उन सबसे क्षमा याचना कर रही थी पर क्यों? क्या सगाई की घोषणा उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ की गई थी? क्या वह टाइमर सैट नहीं कर पाई थी? सभी ने उसे सावधान किया था कि अपने ही घर को उड़ाना ऐसा आसान नहीं था.
‘कैथरिन और ह्युबर्ट की सगाई की ख़ुशी में हमने तय किया है कि छात्रों की फ़ीस बीस प्रतिशत कम कर दी जाएगी, श्वेत और अश्वेत की रेशो बढ़ाने पर भी हम विचार कर रहे हैं.’ छात्रों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धी थी किंतु इससे पहले कि वे आश्वस्त होते या इस विषय में कोई धारणा बना पाते, संगीत शुरु हो गया; जोड़े थिरकने लगे.
ह्युबर्ट को छात्र-नेताओं से मिलवाने के बहाने कैथरिन लाएनल और पीटर के क़रीब आई; ह्युबर्ट उसका हाथ छोड़ने को राज़ी नहीं था.
‘आप दोनों को मैं दिली मुबारकबाद पेश करता हूं, बहुत बहुत बधाई,’ ह्यूबर्ट से हाथ मिलाते हुए लाएनल ने कहा.
‘फ़ीस में बीस प्रतिशत की छूट एक बड़ी उपलब्धि है, तुम्हें भी बधाई. यू शुड बी वाकिंग इन दि एयर टुडे.’ कैथरिन ने लाएनल को आगाह किया कि उन्हें वहां से पैदल ही निकलना चाहिए.
‘मिस्टर नैश सचमुच दयालु हैं,’ लाएनल ने बात बढ़ाते हुए कहा ताकि ह्यूबर्ट को कैथरिन पर शक न हो जाए.
‘भगवान तुम्हारी उम्रदराज़ करे, कैथी.’ जैन्नी ने कैथरीन का गाल चूमते हुए कहा.
‘लाएनल को पापा अपना शिक्षा मंत्री बनाना चाहते हैं.’ कैथरिन पीटर के कान में फुसफुसाई.
‘ओह, तो क्या इसलिए तुम्हें ह्यूबर्ट से सगाई करनी पड़ी है, कैथी?’ पीटर ने पूछा किंतु तभी ह्यूबर्ट कैथरिन को घसीटता हुआ घर के अन्दर ले चला, वह बहुत ख़ुश नज़र आ रहा था.
‘लाएनल का ध्यान रखना, राधा, ही इज़ वेरी स्पेशल.’
‘अरे, हम दोनों के बीच ऐसी कोई बात नहीं है कैथी.’ यकायक राधा को लगा कि कहीं कैथरिन ने यही सोचकर तो अपना बलिदान नहीं दे दिया कि लाएनल और उसका रास्ता साफ़ हो जाए.
‘अलविदा दोस्तों, शब्बा ख़ैर,’ जाते-जाते सभी पर अपनी एक भरपूर नज़र फेरते हुए कैथरिन ने अपनी उंगलियां होंठों से लगाते हुए कहा. वह सोच रही थी कि शायद नैश ने अपना इरादा बदल दिया हो; जब उनके वांछित नेता ही नहीं आए तो दुर्घटना करवाने से भी क्या फ़ायदा?
‘गाड़ियों के लिए धन्यवाद किंतु हम सब शियोना-बार में जश्न मनाने जा रहे हैं, जो यहीं मेफ़ेयर में ही है.’ पीटर ने मेज़बान से कहा, जो अड़े हुए थे कि वे सब उनकी मंगवाई गई विशेष मर्सीडीज़ में ही घर जाएं. मन ही मन सब पीटर की सूझबूझ की दाद दे रहे थे.
‘तो गाड़ियां आपका शियोना में ही इंतज़ार करेंगी.’ नैश ने ज़ोर देकर कहा और फिर वह भी पत्नी के साथ अन्दर चले गए. समय था छै बज कर पैंतालीस मिनट.
शियोना पहुंचकर वे सब चुपचाप पिछले दरवाज़े से निकलकर पतली गलियों से होते हाइड पार्क कौर्नर पहुंच गए, जहां बाकी के साथी उनका इंतज़ार कर रहे थे.
‘कैथी कह रही थी कि नैश कुछ शर्तों पर लायनल को शिक्षामंत्री का पद देने तक को तैय्यार है.’ पीटर ने कहा तो लाएनल और अन्य सभी लोग हैरानी से उसे देखने लगे.
‘मंत्री बनाकर वे लाएनल को कठपुतली की तरह नचाएंगे और फिर मौका लगते ही रास्ते से हटा देंगे.’ राधा ने कहा.
‘इस बैठक में कैथरिन और ह्यूबर्ट की सगाई की घोषणा करने के क्या तुक थी?’ रघु ने पूछा.
‘वे हमें आगाह करना चाहते थे कि ब्लू-ब्लड और कौमनर्स का मेल नहीं हो सकता.’ राधा बोली.
‘जैसे कि हम शादी करने जा रहे थे.’ लाएनल ग़ुस्से में बोला.
‘ख़ैर, तुझसे लाना बड़ी है. पहले तो हमें उसका विवाह करना है.’ जैन्नी रघु और लाना की ओर देखते हुए बोली.
राधा का अपने पति को छोड़ कर चले आना इस बात का सबूत था कि वह अब भी लाएनल को ही चाहती थी, यह अलग बात थी कि लाएनल को कैथरिन के साथ देखकर वह चुप लगा गई थी.
‘हम अभी किसी के विवाह की बात नहीं सोच सकते, मम, हम सबकी जान को ख़तरा है.’ रघु की ओर देखते हुए लाना ने बात ख़त्म करनी चाही.
‘अभी तो हमें देखना है कि ऊंठ किस करवट बैठता है. आज नैश ने जो वादे किए हैं, वे पूरे भी होंगे या नहीं.’ रघु ने जोड़ा.
‘ख़ैर, अभी तो हमें उस धमाके का इंतज़ार है जो सरकार को जता देगा कि आंदोलनकारियों को सरकार पर बिल्कुल विश्वास नहीं है.’ पीटर ने कहा.
‘अब जो नैश ने इतने सारे वादे एक साथ कर दिए हैं तो क्या ज़रूरी है कि उसका घर उड़ाया ही जाए?’ जैन्नी बोली.
‘आंटी, आप भी बहुत भोली हैं, एक तरफ़ तो उसने हमसे इतने सारे वादे कर लिए और दूसरी ओर वह हमें ख़त्म करने पर तुला है.’ राधा ने कहा.
‘प्रधानमंत्री निवास पर इस समय वे सब हमारे राम नाम सत हो जाने के इंतज़ार में होंगे.’ लाएनल ने कहा.
‘मुझे अभी-अभी सूचना मिली है कि प्रधानमंत्री का भोज अगले हफ़्ते के लिए मुल्तवी कर दिया गया है.’ वैबस्टर बोला.
सबके चेहरे भय से सिकुड़ गए.
‘इस बारे में कैथी को तो बता ही दिया गया होगा.’ लाएनल जैसे ख़ुद को समझाने की ग़रज़ से बोला.
‘तभी तो वह ह्यूबर्ट के साथ आराम से घर के अन्दर चली गई. नैश दम्पत्ति भी टहलते हुए अन्दर की ओर ही जा रहे थे.’ रघु ने बताया.
‘कैथी ने टाइमर लगाया होता तो वह हर्गिज़-हर्गिज़ अपने मम्मी-पापा को अन्दर नहीं जाने देती.’ राधा ने जैसे सबको आशावासन देना चाहा किंतु उसका दिल न जाने क्यों घबरा रहा था; कैथरिन ने उससे लाएनल का ध्यान रखने के लिए क्यों कहा था? इसलिए कि वह ह्यूबर्ट से विवाह करने जा रही थी? और नहीं तो किस लिए?
‘डोंट वरि, आज चाहे बम फटें या न फटें, कल वैस्टमिनिस्टर ऐसा गूंजेगा कि मंत्रियों के कानों में से ख़ून बह निकलेगा. आज दोपहर से ही वहां हज़ारों की तादाद में छात्र इकट्ठे होने शुरु हो गए हैं.’ वैब्स्टर ने सूचना दी.
‘सात बजने को हैं.’ रघु ने अपनी घड़ी देखते हुए कहा.
‘चलो वापिस चलें. कल सुबह-सुबह हमें वैस्टमिंस्टर पर धरने के लिए बैठना है.’ पीटर ने कहा किंतु सब दिल थामे खड़े रहे.
‘कल किसने देखा…’ जैन्नी की बात हवा में ही टंगी रह गई.
मेफ़ेयर में चल रही आतिशबाज़ी पिकैडिली से देखी जा सकती थी.
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कृष्णा वर्मा ( कवयित्री, सह संपादक, हिंदी चेतना पत्रिका)

भ्रम भंग
बीजी – “करमो चाची वापस आ गई है, आँगन में स्कूटर को स्टैंड पर लगाते हुए जमीत ने कहा।”
गुरलीन – आश्चर्य भरी आवाज़ में–“हैं, सच कह रहा है।”
“बिल्कुल सच कह रहा हूँ बीजी। अपनी आँखों से देख कर आ रहा हूँ चाचा जी को टैक्सी से सामान उतारते।”
खुशी में गुरलीन के हाथ काम में जल्दी-जल्दी चलने लगे। और मन में कई तरह के विचार।
रसोई से आवाज़ लगाते हुए–“जमीत अपने बापू को कह रोटी खा ले। तुम दोनों को रोटी खिला कर मैं ज़रा करमो से मिलकर आऊँ।”
जमीत – “ओ सबर करो बीजी, अमरीका कोई पास तो नहीं है ना। इतने लम्बे सफ़र से थक कर आए हैं वो। थोड़ी देर तो आराम करने दो उन्हें, शाम को मिल आना।” गुरलीन कुछ सोचते हुए – ” हाँ कह तो तू ठीक ही रहा है, चल कोई ना शाम को मिल आऊँगी। जैसे-तैसे दिन काटा। शाम को पति और बेटे को चाय-नाश्ता देकर सहेली को मिलने भागी। पाँव ज़मीन पर पड़ कहाँ रहे थे। खुशी के मारे उड़ी चली जा रही थी। कस कर सहेलियाँ गले मिलीं। दोनों के गले भर आए और आँखों से प्रेम बह गया। बढ़ी याद आती थी करमो तेरी। तेरे घर पर ताला देख कर हौल उठता था मेरे कलेजे में। शुकर है तू कुछ महीनों में ही मुड़ आई। मैंने तो सोचा था वहाँ पक्की हो गई है अब तू गई हमेशा के लिए।”
करमो – “पर वो क्यों?”
गुरलीन – क्योंकि दिन-रात बेटे की याद में रोती जो रहती थी। फिर सुना है बड़ा सुख आराम है उन देशों में, किसी स्वर्ग से कम नहीं।”
करमो – “सुना तो तूने ठीक ही है। आसमान से ज़मीन तक साफ़-सुथरा, सब कुछ ख़ूबसूरत, आकाश छूती इमारतें। और खुल्लमखुल्ला बेशरमाई, कोरे दिल, ठंडा ख़ून और औलादें तो समझ बस निरे खजूर के पेड़। अपने टूटे भरम का दुख हँसी में ढालते हुए, वहाँ माँ-बाप की सेवा के लिए नहीं, बल्कि संतान अपनी सेवा के लिए माँ-बाप को बुलाती हैं।”
करमो की चुप्पी संग लगातार उसका अफ़सोस में हिलता सिर और टपकती आँखों से गुरलीन को समझते देर न लगी कि “जो सुख छज्जू के चौबारे, वो ना बल्ख ना बुखारे।”
डॉक्टर हरीश नवल (पूर्व प्राध्यापक दिल्ली विश्वविद्यालय )

हिंदी नियुक्तियों के विविध आयाम
चालीस वर्ष से अधिक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाता रहा हूँ। इन वर्षों में हिंदी ऑनर्स, एम॰ए॰ हिंदी तथा अन्य हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थियों को पास से जानने का मौका मिला है। कक्षाओं के समापन वर्षों में वे अपेक्षाकृत अधिक गंभीर और चिंतित दिखते हैं। उन्हें परीक्षा की चिंता तो होती है साथ ही अपने ‘करियर’ की और भविष्य की भी चिंता उनके सिर पर सवार रहती है। उनकी आँखों में एक भय होता है कि “हिंदी पढ़कर कौन-सा कार्य हमें मिलेगा?”
यह विडंबना है कि भारत जैसे बड़े देश की राजभाषा जिसे राष्ट्रभाषा होने का गौरव भी प्राप्त है, अभी भी नियुक्तियों के लिए हिंदी पढ़ने वालों के लिए चिंता का विषय बनती है। यद्यपि बात ऐसी नहीं है हिंदी भारत में भी बहुत से जॉब देती है और विदेश में भी। देश-विदेश में हिंदी नियुक्तियों के बेशुमान चैनल हैं। आइए रिमोट दबाइए और इन चैलनों को मेरे संग देखिए।
भारत के सभी सरकारी-अर्द्धसरकारी संगठनों में हिंदी अधिकारी होते हैं जो उच्च श्रेणी के अधिकारी वर्ग के अंतर्गत आते हैं। हिंदी अधिकारी चुने जाने के लिए एम॰ए॰ हिंदी की योग्यता व अनुवाद प्रक्रिया की जानकारी अपेक्षित होती है।
भारत का सर्वोच्च नियुक्ति दर्ज़ा आई॰ए॰एस॰ है। सिविल सर्विस में हिंदी एक मुख्य विषय के रूप में लेकर परीक्षा दी जा सकती है विगत अनेक वर्षों से अब परीक्षा का माध्यम हिंदी भाषा हो सकती है। यही कारण है कि उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के अनेकानेक युवक-युवतियाँ हिंदी माध्यम के कारण आई॰ए॰एस॰ अधिकारी चुने जाते हैं। क्षेत्रीय सिविल परीक्षाओं में भी यही प्रतिशत है।
अध्यापन का क्षेत्र ऐसा है जिसे सब जानते हैं। हिंदी एक अनिवार्य विषय होने के कारण स्कूल कॉलेजों में अध्यापन के अत्यधिक अवसर देती है। कम विद्यार्थी जानते हैं कि भारतीय सेना में ‘शिक्षा कोर’ के अंतर्गत हिंदी भी पढ़ाई जाती है, वहाँ भी हिंदी का अध्यापक वर्ग सैनिक अधिकारी के रूप में होता है।
लेखन और पत्रकारिता दूसरा एक बड़ा जाना-माना क्षेत्र है जहाँ हिंदी का वर्चस्व है। देश में हिंदी की पत्र-पत्रिकाएँ सर्वाधिक हैं। सबसे अधिक रीडरशिप भी हिंदी के अख़बारों की है। समाचार-लेखन, रपट-लेखन, साक्षात्कार, सर्वेक्षण आदि लेखन के विविध आयाम हैं। आजकल विज्ञापन लेखन भी आय का बड़ा साधन है, यह कापीराइटिंग के अंतर्गत आता है जहाँ ‘सूक्तिपरक नारे’, ‘उपवाक्य’ या ‘वाक्य’ लिखने होते हैं जिनमें बहुत पैसा अर्जित किया जाता है ‘मस्ती के रंग पेप्सी के संग’, ‘ठंडे का तड़का’ ‘लाइफबॉय है जहाँ तंदरूस्ती है वहाँ’, ‘वहा ताज’, ‘सौंदर्य साबुन निरमा’ जैसी विज्ञापन कॉपीराइटिंग तथा नारों के उदाहरण रूप में ‘सब पढ़ें सब बढ़ें’, ‘जागो इंडिया जागो’, ‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ आदि कहे जा सकते हैं – इन सबके लिए प्रत्युत्पन्नमति और लेखन चेतना के साथ मनोविज्ञान समझने का ज्ञान होना चाहिए।
रेडियो, टी॰वी॰ और फ़िल्म लेखन भारत में एक बड़ा व्यवसाय है। स्क्रिप्ट, स्क्रीन प्ले लेखन, शूटिंग, स्क्रिट लेखन, संवाद लेखन और गीत लेखन की वृहत् परंपरा हिंदी के इन दृश्य मीडिया लेखन में है। धन कमाने की दृष्टि से यह एक बड़ा स्रोत है। कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, आनंद बख्शी, कादर खान, सलीम जावेद, गुलजार, कैफी आजमी, प्रदीप, नरेंद्र शर्मा आदि इसी लेखन के कारण धन और यश को प्रापत कर सके हैं।
मौलिक लेखन जो नहीं कर सकते उनके लिए हिंदी में डबिंग लेखन है। देशी व विदेशी सिनेमा व टी॰वी॰ धारावाहिक हिंदी में ‘डब’ करके अर्थात् हिंदी भाषा में रूपांतरित होकर प्रसारित होते हैं क्योंकि भारतीय हिंदी टी॰वी॰ 156 देशों में देखा जाता है तथा हिंदी सिनेमा हालिवुड के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर है।
रूपांतर और अनुवाद एक अन्य बड़ा क्षेत्र है जहाँ बहुत काम है। सैकड़ों भारतीय दूतावासों में हिंदी के दुभाषिये नियुक्त किए जाते हैं। हिंदी इंटरपरेटर की भारी माँग है यदि हिंदी के अतिरिक्त विश्व की अन्य दूसरी कोई सी भी बड़ी भाषा जैसे अंग्रेज़ी, स्पेनिश, फ्रेंच, रूसी, इतालवी, जर्मनी, डच या चीनी आदि का ज्ञान हो – हिंदी अध्येता के लिए कार्य-ही-कार्य है।
हिंदी वाचन एक लोकप्रिय क्षेत्र है। टी॰वी॰ रेडियो तथा अन्य कार्यक्रमों में हिंदी उद्घोषकों, समाचार पाठकों, रेडियो आदि की आवश्यकता बनी रहती है। अच्छी हिंदी को अच्छी तरह बोलकर अमिताभ बच्चन, शेखर सुमन, विनोद दुआ, रजत शर्मा, मृणाल पांडेय, मनोज रघुवंशी, अशोक चक्रधर, सरला महेश्वरी, मंजरी जोशी आदि ने बड़ी साख बनाई है व अर्थोपार्जन किया है।
यह था देशी चैनल, अब देखते हैं हिंदी नियुक्तियों का विदेशी चैनल।
विश्व में पौने दो सौ विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है—जहाँ भारत से भी हिंदी अध्यापकों को बुलाया जाता है। अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका महाद्वीपों के बड़े नगरों के अतिरिक्त दक्षिणी गोलार्द्ध के त्रिनिडाड के अलावा छोटे-छोटे लातानी (लैटिन) देशों जैसे बारबाडोस, सेंट लूशिया आदि में भी हिंदी अध्यापन होता है। मॉरिशस के समीप रेयूनियन (फ्रेंच कंट्री) और रोडरिग्ज़ जैसे छोटे देश हैं जहाँ हिंदी स्कूल हैं वहाँ बंगला और हिंदी थियेटर भी हैं।
खाड़ी के देश ओमान, आबूधाबी, दुबई, शारजाह, अलैन आदि में इंडियन स्कूल हैं जो अमीर शेखों द्वारा संचालित हैं इनमें नौवीं कक्षा तक हिंदी अनिवार्य है, आगे चलकर हिंदी और फ्रेंच में से एक चुननी होती है। केंद्रीय माध्यमिक बोर्ड का पाठ्यक्रम यहाँ पढ़ाया जाता है। अध्यापकों को बहु सुविधाएँ दी जाती हैं। फर्निश्ड वातानुकूलित घर, निःशुल्क बिजली, पानी, इनकम टैक्स की कटौती नहीं, भारत आने जाने का किराया पूरे परिवार को दिया जाता है। पैंतीस-चालीस हज़ार रुपये हिंदी अध्यापक को वेतन के रूप में प्राप्त होते हैं।
हिंदी में टंकण भी एक लाभप्रद एवं सुविधाजनक कार्य है। इसमें श्रम बहुत है परंतु यह कार्य कहीं भी स्वतंत्र रूप से—यहाँ तक कि अपने आवास में भी संपन्न किया जा सकता है। हिंदी लेख, हिंदी शोध-प्रबंध, लघु शोध-प्रबंध आदि टंकण की मांग रखते हैं। यह एक बृहत् कार्यक्षेत्र है। अदालती कार्यवाही, ज़मीन-जायदाद संबंधी कार्यों में भी हिंदी टंकण की आवश्यकता होती है। यह एक पूरक व्यवसाय के रूप में भी किया जा सकता है। साधारण टंकण अब इलेक्ट्रानिक से कंप्यूटरीकृत हो गया है—अतः कंप्यूटर में भी सहायक सिद्ध हो जाता है।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् प्रायः प्रति तीन वर्ष बाद विदेश में हिंदी पढ़ाने के लिए हिंदी के प्राध्यापकों का चुनाव करती है जो अनेक देशों में जाकर हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति का प्रसार करते हैं। कहीं-कहीं ऐसे नियुक्त प्राध्यापक भारतीय दूतावासों में प्रथम या द्वितीय सचिव के रूप में भी कार्य करते हैं। कहना न होगा, बिना भारतीय विदेश सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण किए भी ये हिंदी समर्थक प्राध्यापक विदेश सेवा के लाभ प्राप्त करने के हकदार सिद्ध होते हैं।
यूरोप के कई देशों में अफगान युवक व युवतियाँ (विशेषतः युवतियाँ) रेस्टोरेंट तथा बड़े स्टोरों में जहाँ भारत, पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात देशों के यात्री बहुतायत में आते हैं—हिंदी भाषा का प्रयोग करने वाले कर्मचारियों के रूप में कार्यरत हैं। दिलचस्प बात है कि विगत अनेक वर्षों से अफगानिस्तान में फैली बेरोज़गारी के कारण विदेश में रोज़गार पाने के लिए हिंदी सीखी जाती है। ऐसी नियुक्तियां फ्रांस, स्विटरजरलैंड, हालैंड और जर्मनी में अधिक होती है। संयुक्त अमीरात तथा ….. के अन्य देशों की संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का ‘हिंदुस्तानी’ रूप सर्वोपरि है। आजार में यही भाषा वहाँ चलती है।
अमरीका, कनाडा, इंग्लैंड जैसे संपन्न देशों में हिंदी के रेडियो व टी॰वी॰ चैनल हैं तथा अन्य कुछ चैनलों में एकाध कार्यक्रम हिंदी में भी प्रसारित होता है। इन चैनलों में हिंदी उद्घोषकों व साक्षात्कारकताओं की ज़रूरत रहती है। जर्मनी में दोएचे अमरीका में वॉयस ऑफ अमरीका और इंग्लैंड के बीबीसी हिंदी कार्यक्रम बहुत प्रसिद्ध रहे हैं। भारत से चुनकर श्रेष्ठतर हिंदी ब्राडकास्टरों को इन कंपनियों में भेजा जाता है। इनमें चयनित होना अपने आप में विशेष योग्यता है। इन महाधनाढ्य देशों में सामाजिक संस्कारकर्ताओं यथा मंदिरों के पुजारी, विवाह संस्कार के पंडित, यज्ञ, हवन विशेषज्ञों आदि की भी बहुत मांग है। वहाँ ऐसे पदों पर नियुक्त ज्ञानी बहुत सम्मान प्राप्त करते हैं, भारत की तरह वे वहाँ नकारे नहीं जाते अपितु अति यश के अधिकारी हो जाते हैं।
अनेक देशों में इंडोलॉजी (भारतीयता) अध्ययन केंद्र हैं। इन केंद्रों में भारतीयता संदर्भ के अंतर्गत जिन भाषाओं का आकलन और अध्ययन किया जाता है, उनमें हिंदी मुख्य है। बेल्जियम जैसे देश में जहाँ फादर कामिल बुल्के ने जन्म लिया था, इंडोलॉजी पाठ्यक्रम में पच्चीस प्रतिशत अंक हिंदी भाषा के लिए हैं। वहाँ हिंदी अध्यापन के पर्याप्त अवसर हैं। बल्गारिया में प्रख्यात हिंदी विदुषी श्रीमती योरदांका के निर्देशन में ‘ईस्ट-वेस्ट इंडोलॉजिकल फाउंडेशन’ मध्यकाल विषयक अध्ययन और अनुवाद संबंधी कार्य कर रही हैं। फाउंडेशन ने सोफिया विश्वविद्यालय के सहयोग से हिंदी का भाषाई और साहित्यिक अध्ययन का पाठ्यक्रम निर्मित किया है। उल्लेखनीय है कि वहाँ की कई बल्गारियन विदुषियों ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों से हिंदी में पीएच॰डी॰ की हैं। भारतीय अध्यापकों के लिए भी वहाँ अवसर हैं यह कहने की आवश्यकता नहीं है।
लोकप्रिय विदेशी फ़िल्म और टी॰वी॰ धारावाहिकों के हिंदी में डब किए प्रिंट भारतीय टी॰वी॰ चैनलों पर बड़े चाव के साथ देखे जाते हैं। विदेशी भाषाओं विशेषतः अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जापानी, चीनी और कोरियाई का हिंदी में रूपांतर और ‘डबिंग’ दोनों ही अच्छा हिंदी जानने वाले मीडियाकर्मियों के लिए विस्तृत आयाम और अवसर प्रदान करते हैं।
विदेशी भाषाओं से हिंदी में अनुवाद करने वालों के लिए ‘भारतीय अनुवाद परिषद’ जैसी संस्थाएँ भारत में हैं। मीडिया में दिलचस्पी लेने वाले हिंदी ज्ञानियों के लिए विज्ञापन की दुनिया में ‘कॉपीराइटिंग’ धनार्जन का श्रेष्ठ माध्यम है। ध्यान रहे कि भारत से की गई हिंदी कॉपीराइटिंग ही विदेश में जहाँ-जहाँ भारतीय हैं, वहाँ-वहाँ जाती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत जैसे वृहत् बाज़ार में हिंदी के माध्यम से प्रचार का महत्त्व सिद्ध हो चुका है।
मैं अपने विद्यार्थियों को कहता और प्रेरित करता रहा हूँ कि यदि वे हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी का प्रयोग करने का भी अभ्यास करें, सफलता उनके कदमों की ओर जल्दी बढ़ेगी। आज का युग फ्यूजन का युग है, अब किसी एक विषय, भाषा या जीवन शैली में दक्षता अधिक काम नहीं देती। युवा-वर्ग को कइयों में दक्षता हासिल करना ज़रूरी है। विदेशी में हिंदी द्वारा नियुक्ति चाहिए तो याद रखना चाहिए कि अंग्रेज़ी भाषा का पर्याप्त ज्ञान परमावश्यक है। अंग्रेज़ी के जानकारों ने हिंदी भाषा का अभ्यास कर हिंदी वालों के लिए निर्धारित स्थानों को प्राप्त करना आरंभ कर दिया है। सजग व्यक्ति जानता है कि हिंदी और अधिक दे सकती है, अतः वह हिंदी सीख-प्रयोग कर सामर्थ्य बढ़ा रहा है। यह तथ्य कम-से-कम मीडिया जगत में तो भरपूर दिखाई दे रहा है। हिंदी वालों को अपना स्थान प्राप्त करने हेतु अंग्रेज़ी वालों से यह सीख लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। एक बात और भी याद रखनी होती है, आगे वही बढ़ेगा जो अति प्रतिभावान है, सभी जगह प्रतिभा ही मूल्यांकित होती है चाहे वह मैनेजमेंट हो, सूचना तकनीक हो या फिर हिंदी।
प्रेम जनमेजय (सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंगकार)

प्रवास की भाषा और भाषा का प्रवास
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की काव्याभिव्यक्ति है—
घर कइनु बाहिर, बाहिर कइनु घर।
पर कइनु आपन, आपन कइनु पर॥
ये पंक्तियाँ व्यापक अर्थ में, किसी भी कारण से अपनी ज़मीन छोड़कर गए मनुष्य पर लागू होती हैं। यह मनुष्य की प्रकृति है कि जिससे आप जितना दूर होते हैं, उतना ही उसके करीब होते हैं। विदेश में देश की माटी की गंध तरसाती है, तो देश लौटने पर विदेश की सुविधाएं। माँ के पास रहने वाली संतान को उतना महत्त्व नहीं मिलता, जितना विदेश में रची-बसी संतान को मिलता है। विदेशी धरती को अपना देश बनाने वाली संतान को सब कुछ मिलता है, पर वह बहुत ढूँढ़ने पर भी माँ की गोद नहीं पा पाती। इस दर्द को वही जान सकता है, जिसके पैर बिवाई फटी हो (जिसने स्वयं पीड़ा सही हो)। आप कितने भी संपन्न हो जाएं, शरीर सुखी हो जाता है, पर मन—“जैसे उड़ि जहाज़ को पंछी फिरि जहाज़ पे आवै”।
और वह मन, जो बरसों पहले अनजाने द्वीप में गिरमिटिया मजदूर के रूप में गया हो, आज कितना भी कुलीन या संपन्न क्यों न हो गया हो, अपनी जड़ों को खोजता है और बार-बार अपनी माटी की गंध लेने को तरसता है।
हम भारतीय इतने ‘गतिशील’ (Mobile) कभी नहीं रहे, जितने पिछली दो-तीन शताब्दियों में रहे। हमने समुद्र-मंथन अवश्य किया, पर समुद्र पार की यात्रा शास्त्रों में वर्जित-सी थी। मान लिया जाता था कि सात समुंदर पार करने वाला बचकर नहीं आएगा। इतिहासकार भारतीयों को ‘घरघुस्सू’ और ज्ञान-विज्ञान से विहीन भी मानते रहे हैं। पर आज विश्व के बड़े-बड़े विद्वान इस बात पर सहमत हो चुके हैं कि आदिकाल में मानव का सर्वप्रथम प्रादुर्भाव भारत में ही हुआ था। इस संदर्भ में फ्रांस के क्रूज़र और जैकोलियट, अमेरिका के डॉ. डॉन, इंग्लैंड के सर वॉल्टर रिले के साथ-साथ इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड, भू-वैज्ञानिक मेडलीकॉट, ब्लैनफोर्ड आदि के कथन भी उल्लेखनीय हैं।
आज अधिकांश भारतीय प्रवासी संपन्न हैं। वे न केवल आर्थिक मोर्चे पर देश की रीढ़ बने हुए हैं, अपितु भारत की राजनीति में भी महत्त्वपूर्ण दखल रखते हैं। हिंदी साहित्य में प्रवासी साहित्य अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के साथ विद्यमान है। अनेक विश्वविद्यालयों में प्रवासी साहित्य पर शोध हो रहे हैं।
प्रवासी साहित्य के दो रूप हमारे समक्ष हैं । एक उन प्रवासियों का साहित्य, जो आज से सौ-डेढ़ सौ साल पहले कुलियों के रूप में विदेश ले जाए गए थे, जिन्हें गिरमिटिया मजदूर भी कहा जाता है। पाँच-छह पीढ़ियों के पश्चात् वे लोग वहाँ के बाकायदा नागरिक बन गए हैं। इतना ही नहीं, वहाँ की राजनीति का संचालन भी कर रहे हैं। वे अपने हाल में प्रसन्न हैं। भारत उनके हृदय में वास करता है, पर वे भारत में जाकर बसना नहीं चाहते। उनकी जड़ें अब वहाँ जम चुकी हैं। उन्होंने अपने ही देश में एक ‘लघु भारत’ का निर्माण कर लिया है। यहाँ तक कि कुछ देशों के प्रवासी भारतीयों ने ‘लघु गंगा’ का भी निर्माण कर लिया है। इन लोगों ने वहाँ पर मंदिर और मठ बनवाए हैं, जो वहाँ के धार्मिक और सामाजिक जीवन के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं। इन्हीं स्थानों पर शादी-विवाह भी होते हैं। वे लोग सांस्कृतिक और उससे भी ज़्यादा धार्मिक रूप से भारत के प्रति श्रद्धा रखते हैं। वे यहाँ एक तीर्थयात्री के तौर पर ही आते हैं।
दूसरी तरह के लेखक वे हैं, जो एक या दो पीढ़ी पहले ही नौकरी अथवा व्यापार करके कमाई करने के लिए बाहर गए। अभी भी उनके मन में यह आकांक्षा है कि वे किसी भी दिन वापस आ जाएंगे। कुछ अपने बेटे या बेटी की नौकरी विदेश में लगने के कारण प्रवासी हो गए हैं। ये आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं, इसलिए अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए प्रकाशक को नहीं ढूँढ़ते, बल्कि प्रकाशक इनको ढूँढ़ता है। ये प्रकाशक को सहयोग राशि डॉलर, पाउंड, यूरो आदि में देने की क्षमता रखते हैं। अपने देश में साहित्यिक आयोजन करते हैं और भारतीय लेखकों की, साहित्य के बहाने विदेश यात्रा की इच्छा को तृप्त करते हैं। बदले में कुछ भारतीय लेखक उनके भारत आगमन पर ‘रेड कार्पेट’ बिछाते हैं और उन्हें महान साहित्यकार घोषित करते हैं। इनके भारत आते ही साहित्य में जैसे वसंत छा जाता है, विदेश भ्रमण की कोयल कूकने लगती है तथा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों एवं सम्मेलनों के भँवरे गुनगुनाने लगते हैं। इनके कारण हिंदी की गूँज पूरे विश्व में सुनाई देने लगी है। यह दीगर बात है कि उस गूँज की प्रतिध्वनि भारत में अंग्रेजी के रूप में सुनाई देती है।
अनेक प्रवासी रचनाधर्मी अपनी सार्थक रचनाओं के साथ हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। साहित्यकार अपने विदेश प्रवास के कारण ही प्रवासी साहित्यकार नहीं होता, अपितु अपनी रचना के कथ्य और उसके ट्रीटमेंट के कारण होता है। जब आप एक भिन्न संस्कृति में जाते हैं और स्वयं को ‘मिसफ़िट’ पाते हैं, तो एक अलग परिवेश में आपकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और आपके संबंधों में आमूल-चूल परिवर्तन आ जाता है। यदि आप उस स्थिति का बयान करते हैं जो भारत की दुनिया से भिन्न एक अलग सोच और परिवेश को अभिव्यक्त करती है तथा हमारी सांस्कृतिक जिज्ञासाओं को बढ़ाती है, तो आप अपने द्वंद्व को अलग तरह से रेखांकित कर रहे होते हैं। यही विशिष्टता आपके प्रवासी मन को अलग शब्द, अर्थ और विचार देती है। यदि उसी परिस्थिति में आप अपने देश में भिन्न हो जाते हैं, तो आप एक अलग पहचान के अधिकारी बनते हैं।
मैंने दोनों प्रकार के हिंदी-सेवी प्रवासियों को बहुत समीप से देखा और जाना है। अनेक विश्व हिंदी सम्मेलनों में मेरी सहभागिता ने मुझे उनकी संगति और विसंगति के अनुभवों से समृद्ध किया है। इन्हीं अनुभवों के आधार पर मैं हिंदी भाषा और साहित्य की संगति-विसंगति का विश्लेषण आपके समक्ष रख रहा हूँ।
हिंदी भाषा को लेकर सकारात्मक एवं नकारात्मक—दोनों तरह की सोच विद्यमान है। जहाँ एक ओर सकारात्मक सोच के साथ हिंदी के स्वयंसेवी सैनिक हैं, जो तन, मन और धन से इसकी सेवार्थ युद्ध स्तर पर मोर्चे पर संनद्ध हैं तथा अपनी अस्मिता की पहचान मानकर गंगाजल की तरह इसे सहेजे हुए हैं। हिंदी के विश्व रूप को सुदृढ़ आधार देने के लिए देशी विद्वान ही नहीं, विदेशी विद्वान भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। अनेक प्रवासी भारतीय—चाहे अपने बच्चों के कारण या स्वयं के कारण—दूसरी माटी की गंध के साथ जी रहे हैं, वे भी हिंदी साहित्य में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए हिंदी का वातावरण बनाए हुए हैं। व्यक्ति, संस्था, समूह आदि के धरातल पर छोटे-छोटे प्रयासों से हिंदी की सीमा को असीम करने और विश्व में उसकी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति को रेखांकित करने के प्रयास जारी हैं।
प्रशासकीय धरातल पर सरकार भी हिंदुस्तान में हिंदी को उसका देय अधिकार देने के लिए तथा संयुक्त राष्ट्र संघ तक में हिंदी की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कटिबद्ध लगती है। राजभाषा विभाग द्वारा विविध विषयों पर आयोजित विचार-विमर्श नए झरोखे खोल रहे हैं।
एक समय था जब विश्व में ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य कभी नहीं डूबता था, आज हिंदी का सूर्य नहीं डूबता। विश्व के किसी न किसी कोने में लगातार हिंदी वायुमंडल को अपने शब्दों से भर रही है। भारत सोता है, तो त्रिनिदाद, सूरीनाम, अमेरिका, कनाडा जैसे देश जागते हैं और वहाँ हिंदी के शब्द वातावरण में प्रविष्ट होते रहते हैं। विश्व के 116 विश्वविद्यालयों में यदि हिंदी पढ़ाई जा रही हो, तो ऐसा कौन-सा क्षण होगा जब हिंदी उच्चरित न हो रही हो? हिंदी के संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनने में चाहे विलंब हो, पर हिंदी का अपना ‘राष्ट्र’ विकसित हो चुका है।
अस्मिता की पहचान बनी हिंदी को गिरमिटिया देशों में गंगाजल की तरह पवित्र मानकर अपने हृदय रूपी पात्र में सहेजा गया है। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, नॉर्वे, दुबई आदि जैसे अनेक देशों में बसे प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य का हिस्सा बनकर जन्मभूमि की गोद का ममत्व पाने के लिए आवागमन करते रहते हैं। प्रोत्साहन के लिए प्रवासियों के साहित्य पर न केवल विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं, अपितु प्रवासी साहित्य केंद्रित अनेक पुरस्कारों/सम्मानों की स्थापना भी की गई है और की जा रही है।
ऐसे में लगता है जैसे विश्व में हिंदी का वसंत आया हुआ है। पर प्रकृति तो परिवर्तनशील है, जिसमें सभी ऋतुएँ अपने रंग-रोगन या बदरंगी के साथ अपनी ‘छटा’ बिखेरती रहती हैं। हिंदी का वसंत है, तो पतझड़ भी है; हिंदी की बाढ़ है, तो सूखा भी है और ठिठुरन भी।
तुलसीदास ने प्रभु के लिए लिखा है: “जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी॥” आजकल हिंदी भी प्रभु की मूरति हो गई है और अनेक रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर रही है। किसी के लिए हिंदी विवशता है, किसी के लिए नौकरी, किसी के लिए अपनी अस्मिता की पहचान का प्रतीक, किसी के लिए अपनी अभिव्यक्ति को रचनात्मक एवं सौंदर्यपूर्ण आकार देने का माध्यम, और किसी के लिए राजनीति के अखाड़े में दंगल करने का यंत्र और मंत्र।
अपनी-अपनी भावना के अनुरूप कुछ हिंदी के चरणों में नतमस्तक हैं, तो कुछ के चरणों में हिंदी नतमस्तक है। जिनकी मातृभाषा हिंदी है, वे इस माता का उपयोग और तिरस्कार समान भाव से वैसे ही करते हैं, जैसे संयुक्त परिवार में रहने वाला विवाहित पुत्र अवसरानुसार एवं निर्देशानुसार करता है। वहीं जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं रही है, वे अपनी ‘विदेशी हो चुकी माँ’ का सम्मान वैसे ही करते हैं, जैसे हम विदेशी हिंदी विद्वानों का करते हैं।
भाषा का नया उपनिवेशीकरण हो रहा है। एक सोचे-समझे षड्यंत्र के तहत समाचार पत्रों और समाचार चैनलों की हिंदी भाषा को भ्रष्ट किया जा रहा है। हिंदी के लिए विपन्न, अक्षम, पुरातनपंथी एवं निर्बल बताकर देवनागरी लिपि को छोड़कर ‘सरल, सहज, सस्ती, टिकाऊ, सुंदर, मॉडर्न एवं संपन्न’ रोमन लिपि अपनाने की सलाह दी जा रही है। हिंदी की बढ़ती ताकत को देखते हुए उसे अशक्त करने की चालें चली जा रही हैं।
हिंदी का भूमंडलीकरण हो गया है। हिंदी मात्र अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक भाषा ही नहीं है, अपितु वह बाजार को विवश कर रही है कि वह उसकी ताकत को स्वीकार करे। कभी भाषा और पानी कुछ कोस पर बदल जाते थे, परंतु आज हालात यह हैं कि हर कदम पर बोतल में बंद एक ही स्वाद से युक्त तथाकथित मिनरल वॉटर मिलता है। विज्ञापनों की भाषा, समाचारों की भाषा, धारावाहिकों की भाषा और हिंदी फिल्मों से अपनी रोज़ी-रोटी चलाने वाले बेचारे हीरो-हीरोइन की कब्ज़युक्त हिंदी भाषा ने आपके कानों में अनेक प्रकार के रस घोले ही होंगे।
वैसे तो आपके ‘पब्लिक स्कूली’ होनहार की अध्यापिका या अध्यापक आपसे हिंदी में बात करके अपना स्तर नहीं गिराएंगे, और अगर गिरा भी लिया, तो जो हिंदी उनके श्रीमुख से निकलेगी, उसे सुनकर आप ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि हिंदी का जो होना है हो, पर भाषा के कारण इनका स्तर न गिरे! सरल/आसान/आम आदमी की भाषा आदि के नाम पर हिंदी के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, उसे एक अच्छे नागरिक की तरह आप नज़रअंदाज़ कर ही रहे होंगे।
हिंदी के समाचार पत्र तक भाषा की सरलता के नाम पर जो अंग्रेजी का कुमिश्रण कर रहे हैं, उसे देखकर तो यही लगता है कि बेचारी हिंदी बहुत गरीब है जिसके पास शब्द नहीं हैं, और समर्थ अंग्रेजी कितनी उदार है कि वह हिंदी को शब्द दे रही है! मैंने अनेक हिंदी समाचारों में ‘आसान हिंदी’ के नाम पर अंग्रेजी शब्दों का जो मिश्रण देखा है, उससे तो अनेक बार भ्रम होने लगता है कि यह समाचार हिंदी के हैं या अंग्रेजी के।
दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ते समय मैंने अक्सर अनुभव किया कि विद्यार्थी हिंदी और उसे पढ़ाने वाले को बहुत फ़ालतू-सी वस्तु समझते हैं। भाषा हमारे सामाजिक स्तर का पर्याय बन गई है। अति-संपन्न कॉलोनियों की भाषा—यहाँ तक कि उनके सेवकों की भाषा भी—अंग्रेजी है और निम्न आय वर्गीय कॉलोनियों की भाषा हिंदी है। बेचारा मध्यवर्ग इधर-उधर डोलता रहता है। हिंदी जानने वाले से वैभवयुक्त कार में बैठा कोई व्यक्ति अंग्रेजी में रास्ता पूछता है, तो बेचारा टूटी-फूटी अंग्रेजी में उत्तर देकर गौरवान्वित महसूस करता है। पाँच सितारा होटल में हिंदी के अखबार और पत्रिकाएं ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलतीं, तो क्या हुआ, हम ढाबे में अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकाएं कहाँ आने देते हैं!
क्या कभी आपने संभ्रांत, खूबसूरत पाश्चात्य परिधान (जींस आदि) में लिपटी सन्नारियों से हिंदी में बतियाने का साहस किया है? आपका बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है और उसका विज्ञान विषय कमजोर है, तो आपको उसे हिंदी वाले स्कूल में दाखिला कराने का सुझाव दिया जाता है। कमजोर विज्ञान है, पर सुझाव भाषा बदलने का दिया जाता है! इसलिए समझदार माँ-बाप चाहे आपस में और विशेषकर घर में अम्मा-बाऊजी से हिंदी बोलने के लिए विवश हों, अपने ‘बाल-गोपाल’ से अंग्रेजी में ही बतियाते हैं। गुलामी की जंजीरों को शहीदों ने अपने रक्त से काटा होगा, पर हम तो अपने बच्चों को हजारों रुपयों का डोनेशन देकर ‘पुनर्मूषको भव’ जैसी स्थिति का सुअवसर दे ही रहे हैं।
मार्क टुली भारत में बीबीसी के संवाददाता रहे और इस बीच उन्होंने भारत की नब्ज़ को अच्छी तरह से पकड़ा। भारत में रहते हुए उनके दृष्टिकोण में अंतर आया और उन्होंने एक विदेशी मानसिकता के साथ नहीं, अपितु एक सही विश्लेषक के रूप में परिस्थितियों को देखा-परखा और अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। हिंदी के विरुद्ध किए जा रहे इस षड्यंत्र को जैसे वे बहुत पहले सूँघ चुके थे। वे लगातार सावधान करते रहे हैं। उनके एक कथन को मैं यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ, और हिंदी के तथाकथित निर्माता ध्यान दें कि यह एक अच्छी अंग्रेजी जानने वाले का कथन है।
मार्क टुली लिखते हैं:“हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के इस दबदबे का कारण गुलाम मानसिकता तो है ही, उससे भी ज़्यादा ‘भारतीय विचार’ को लगातार दबाना और ‘चंद कुलीनों’ के आधिपत्य को बरकरार रखना है। इंग्लैंड में मुझसे अक्सर संदेहभरी नजरों से यह सवाल पूछा जाता है—‘तुम क्यों भारतीयों को अंग्रेजी के इस वरदान से वंचित करना चाहते हो जो इस समय विज्ञान, कंप्यूटर, प्रकाशन और व्यापार की अंतरराष्ट्रीय भाषा बन चुकी है? तुम क्यों दंभी-देहाती बनते जा रहे हो?’ मुझे बार-बार बताया जाता है कि भारत में संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी क्यों जरूरी है, गोया यह कोई शाश्वत सत्य हो। इन तर्कों के अलावा जो बात मुझे अखरती है, वह है भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी का विराजमान होना; क्योंकि मेरा यकीन है कि बिना भारतीय भाषाओं के भारतीय संस्कृति जिंदा नहीं रह सकती। निश्चित रूप से भारतीय राष्ट्र की इमारत किसी विदेशी भाषा की नींव पर नहीं खड़ी हो सकती। भारत—अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया की तरह महज भाषाई समूह नहीं है। यह उन भाषाओं की ‘सभ्यता’ है जिसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें सदियों की औपनिवेशिक गुलामी भी नहीं हिला पाई। अंग्रेजी का संभवतः सबसे खतरनाक पहलू है अंग्रेजी वालों में कुलीनता या विशिष्टता का दंभ। यहाँ सबसे बड़ी बाधा हिंदी के प्रति तथाकथित कुलीनों की नफ़रत है। आप बंगाली, तमिल या गुजराती पर नाज़ कर सकते हैं, पर हिंदी पर नहीं; क्योंकि कुलीनों की प्यारी अंग्रेजी को सबसे ज़्यादा खतरा हिंदी से है।”
हम भूल गए हैं कि भाषा संप्रेषण का माध्यम है, न कि हमारे सामाजिक स्तर की कसौटी। हमने माध्यम को ही कसौटी बना डाला है। हिंदी दरिद्र नहीं है और न ही हिंदी की स्थिति दयनीय है। इसे दयनीय वे सिद्ध कर रहे हैं, जिनके इसे दयनीय रखने में अपने स्वार्थ सधते हैं।
सूरीनाम, फ़िजी, गुयाना, जमैका, मॉरीशस, त्रिनिदाद और टोबैगो आदि ऐसे देश हैं जहाँ रहने वाले भारतवंशियों का चरित्र बहुत कुछ एक जैसा है। आर्थिक परिस्थितियों की विवशता में अपनों से दूर गए इन भारतवंशियों ने इन देशों में एक ऐसे ‘लघु भारत’ का निर्माण किया है तथा अपनी भाषा और संस्कृति को जो जिंदा रखा है, उसके कारण इन पर गर्व होता है। बाहर से देखने पर इनमें एक समानता दिखाई देती है—जैसे क्रिकेट में 11 कैरिबियाई देश ‘वेस्टइंडीज़’ के नाम से एक हैं, परंतु उनकी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था भिन्न है।
कैरेबियाई देशों में भारतीय संस्कृति, धर्म और हिंदी के प्रति भूख तो एक जैसी है, पर ग्रहण और प्रस्तुति के स्तर पर भिन्नताएँ भी हैं। हिंदी की जो स्थिति सूरीनाम में है, वह गुयाना में नहीं; और जो सूरीनाम में है, वह त्रिनिदाद में नहीं। कैरेबियाई देशों में हिंदी का स्वर मुख्य रूप से सूरीनाम, गुयाना, जमैका और त्रिनिदाद व टोबैगो में तो सुनाई देता ही है, साथ ही ग्वाडेलोप (Guadeloupe), बारबाडोस, कुराकाओ (Curaçao) जैसे अनेक छोटे द्वीपों में भी सुनाई देता है। पर एक बात इन सभी देशों में समान रूप से पाई जाती है—भाषा और संस्कृति के प्रति अनन्य अनुराग और सम्मान का भाव। यहाँ हिंदी बोलने वाला शर्मिंदा नहीं होता, अपितु गर्व से सिर उठाता है। हिंदी के अतिथि आचार्य के रूप में सम्मान और प्रतिष्ठा मुझे अपेक्षा से अधिक मिली है।
मुझे याद है कि त्रिनिदाद में पहली बार ‘हिंदी दिवस’ पर ‘हिंदू प्रचार सभा’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मैंने कहा था: “यह एक आश्चर्यजनक विसंगति है कि लगभग 48 प्रतिशत भारतीय मूल की आबादी वाले देश में मैं हिंदी को विदेशी भाषा के रूप में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने आया हूँ (Hindi as a foreign language)। क्या आपने सोचा कि कैसे विदेशी भाषा आपकी मातृभाषा और आपकी मातृभाषा विदेशी भाषा हो गई? आज भारतीय मूल की माँ अपने बच्चे को अंग्रेजी भाषा में तुतलाकर बोलना सिखा रही है।”
इस पर प्रख्यात पत्रकार एवं ‘हिंदू प्रचार सभा’ के अध्यक्ष रवि जी ने कहा— “डॉक्टर प्रेम जनमेजय, इट्स नॉट सो (It’s not so), वी हैव जस्ट लॉस्ट द टच (We have just lost the touch)।” इस बात पर उन्होंने ‘गार्जियन’ समाचार पत्र में विस्तृत आलेख भी लिखा। उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं त्रिनिदाद के इतिहास को पढ़ूँ और ‘जहाज़ी भाइयों’ के संघर्ष को जानूँ। इसके लिए उन्होंने मुझे प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. ब्रिंसले समरू (Dr. Brinsley Samaroo) से मिलने को कहा, जो वेस्टइंडीज़ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में थे। उन्होंने मुझे विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जेरार्ड बेसेन एवं ब्रिजेट ब्रेटन द्वारा संपादित पुस्तक ‘द बुक ऑफ़ त्रिनिदाद’ तथा मंगल पतेसर, कार्ल मोहम्मद, केनेथ रामचंद आदि को पढ़ने की सलाह दी।
लगभग दो वर्ष तक मैंने बहुत कुछ पढ़ा और ‘कुली से कुलीन’ होने के जहाज़ी भाइयों के संघर्ष को जाना। इसी के आधार पर मैंने रवि जी के आग्रह पर ‘जहाज़ी चालीसा’ लिखा, जिसकी पांडुलिपि का लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री बासदेव पांडेय ने दीवाली नगर में किया। बाद में रवि जी ने ‘जहाज़ी चालीसा’ की पचास हज़ार प्रतियाँ प्रकाशित कीं, और ‘इंडिया अराइवल डे’ (India Arrival Day) पर केंद्र की संगीत मंडली ने इसकी धुन बनाई और गायन किया।
त्रिनिदाद और टोबैगोवासियों की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अध्ययन के दौरान मुझे एक पुस्तक मिली—जेरार्ड बेसेन और ब्रिजेट ब्रेटन द्वारा संपादित ‘द बुक ऑफ़ त्रिनिदाद’। इस पुस्तक में जे. एच. कॉलिन्स के एक लेख को पढ़कर मैं हतप्रभ रह गया। लेखक ने भारतीय मूल के निवासियों के खान-पान, रहन-सहन, भाषा और संस्कृति आदि का भरपूर मज़ाक उड़ाया था। भारतीय दर्शन का मज़ाक बनाते हुए लेखक लिखता है: “इस उपनिवेश में रह रहे भारतीय कुलियों के पास वही दर्शन है जो इनके पूर्वजों ने आज से 2500 साल पहले अपनाया था। पुराण अनेक अंतर्विरोधों से भरे हुए हैं। त्रिनिदादियन कुली अपने को इन दर्शनों से युक्त ज्ञानी-ध्यानी मानते हैं। खेत में काम करने वाला एक मजदूर भी बहुत ज्ञानी होने का दावा करता है। शाम को सब बैठकर, जो कुछ छंद इन्हें याद हैं, उन्हें गाकर दोहराते हैं और सोचते हैं कि वे बहुत ज्ञानी हो गए हैं।”
साधुओं का मज़ाक बनाते हुए वही लेखक लिखता है: “भारत में सही मायनों में जो साधु होते हैं, वे या तो गुफाओं और कंदराओं में रहते हैं या फिर अपने ही साधु-समाज के बीच रहते हैं। त्रिनिदाद के साधुओं के लिए यह संभव नहीं है। जब भी कोई साधु बन जाता है, तो वह गांजा पीने लगता है, नकारा हो जाता है और दूसरों की कमाई पर जीता है। ऐसे ही एक साधु ने धर्म परिवर्तित लोगों को बताया कि थोड़ी-सी दक्षिणा देकर वे पुनः हिन्दू धर्म ग्रहण कर सकते हैं, और इस तरह उसने हजारों रुपये कमाए।”
तथाकथित कुलियों के रहन-सहन, रीति-रिवाजों, परंपराओं, वेश-भूषा आदि का भी इस लेखक ने उपहास किया है। उसके अनुसार, देखने में कुली सामान्य-से हैं, जो शारीरिक ताकत में अन्य समुदायों से कमजोर दिखते हैं। अपनी बचत की प्रवृत्ति के कारण वे अपने खान-पान में भी कंजूसी बरतते हैं। कुली-पति ईर्ष्यालु तथा निहायत शक्की मिजाज का होता है। अपनी पत्नी पर बेवफाई का शक होने मात्र से उसकी हत्या तक कर डालता है। इस समुदाय में तीन-चौथाई हत्याएं इसी कारण होती हैं। औरतें सामान्य कद-काठी से कम होती हैं तथा बहुत ही छोटी आयु में घर-गृहस्थी का बोझा ढोने लगती हैं। जिस उम्र में सामान्य अंग्रेज लड़की फ्रॉक जैसी ड्रेस पहनती है, उस उम्र में ये अपने को ओढ़कर (साड़ी/दुपट्टे में) रखती हैं और तीस वर्ष की आयु तक आते-आते बूढ़ी-सी लगने लगती हैं।
यदि मैं आपसे कहूँ कि ‘फतल रज़ाक’ (Fatal Razack) जहाज से 30 मई 1845 को पहुँचे त्रिनिदादियन गिरमिटियों ने लगभग 13 वर्ष तक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा, तो आप उन्हें बच्चों को 13 वर्ष तक शिक्षा से वंचित रखने का दोषी मानेंगे। पर यदि गहराई से उनके संघर्ष को देखें-परखें, तो आप पाएंगे कि आपकी सोच सतही है। वस्तुतः अपनी अस्मिता, संस्कृति, धर्म और भाषा को बचाए रखने के लिए यह ‘पलायन’ उनका सुरक्षा कवच था; श्रीकृष्ण की तरह ‘रणछोड़’ की भूमिका थी। उन दिनों तथाकथित पब्लिक स्कूल धर्म परिवर्तन के केंद्र थे। जहाज़ी भाइयों ने अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपनी भाषा की रक्षा के लिए यह विवेकसम्मत कदम उठाया। इसका परिणाम यह निकला कि इतने लंबे इतिहास में केवल 11 प्रतिशत ही धर्मांतरण हुआ। इस चुनौती से निपटने के लिए 1928 में ‘ऑल इंडिया हिंदू महासभा’ नामक संगठन बना। भारतीय परंपराओं को जीवित रखने, धर्म के बचाव तथा सांस्कृतिक उत्थान के लिए शिक्षा को आवश्यक समझा गया और इसके लिए रात्रि स्कूलों की व्यवस्था की गई। संस्था के अध्यक्ष सहदेव पंडित ने ऐसे स्कूल की आवश्यकता पर बल दिया, जहाँ हिंदी और उर्दू—दोनों की पढ़ाई हो। स्वयं को शिक्षित करने के संघर्ष की यह एक लंबी गाथा है।
भारतीय मूल के लोगों ने हर क्षेत्र में प्रगति कर ली है, पर भाषा का क्षेत्र अब भी पिछड़ा ही हुआ है। साथ ही आवश्यकता थी नई पीढ़ी में एक आत्मविश्वास पैदा करने की।
अन्य गिरमिटिया देशों को देखें, तो पाएंगे कि भाषा और साहित्य की दृष्टि से उनकी उपलब्धियाँ और कमियाँ भिन्न-भिन्न हैं। भारत के बाहर फ़िजी एकमात्र ऐसा देश है जहाँ की संसद में भी हिंदी को मान्यता प्राप्त है, इसीलिए वहाँ पर हिंदी अन्य देशों की तुलना में अच्छी स्थिति में है। यहाँ पर अवध क्षेत्र से गिरमिटिया मजदूर अधिकांशतः ले जाए गए थे, इसलिए यहाँ की भाषा में अवधी का प्रभाव बहुत अधिक है और उसे ‘फ़िजी हिंदी’ कहा जाता है। फ़िजी में आकर भारतीय मजदूरों को बहुत सी यातनाओं का सामना करना पड़ा, जिसे इन पंक्तियों से समझा जा सकता है। यहाँ के कवि कमला प्रसाद मिश्र हुए, जिन्हें फ़िजी का राष्ट्रीय कवि कहा जाता है। उनकी रचनाओं में व्यंग्य की उपस्थिति भरपूर मिलती है।
उनकी सत्तासीनों पर टिप्पणी देखिए:
बड़े-बड़े ठग कुटिल चोर, ऊँची कुर्सी पर बैठे।
केवल सोच रहे हैं किससे कब कितना धन ऐंठे।
गुलशन उजड़ रहा है, माली क्षण-क्षण बदल रहे हैं॥
एक बार वे भारत आए और मुंबई में हिंदी की दशा पर लिखा:
आज बंबई, अंगरेजी संस्कृति में है इतराती,
सागर भी पाश्चात्य तरंगों में ही अब लहराए।
अंग्रेजी शासन में भारत इतना दास नहीं था,
जितना दास आज वह जग की नजरों में दिखलाए॥
फ़िजी में प्रोफेसर सुब्रमनी के दो उपन्यास ‘डउका पुराण’ और ‘फ़िजी माँ’ फ़िजी हिंदी में लिखे गए हैं। ‘शांतिदूत’ अखबार में ‘बैठक’ नाम का कॉलम छपता था, जिसमें ‘गपोड़वार्ता’ के नाम से बातचीत के माध्यम से समसामयिक समस्याओं को रखा जाता था और जिसमें भरपूर व्यंग्य की मात्रा होती थी। इसके अतिरिक्त चंद्रदेव सिंह, पं. गुरदयाल शर्मा, पं. अमीचंद, जे. एस. कमल, माता प्रसाद, विवेकानंद आदि रचनाकारों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
मॉरीशस में रामदेव धुरंधर हिंदी व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, कविता के साथ-साथ व्यंग्य रचनाएँ भी लिखी हैं। उनके व्यंग्य संग्रहों के नाम इस प्रकार हैं: कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख। इसी प्रकार अभिमन्यु अनत की रचनाओं में चुटीला व्यंग्य देखने को मिलता है:
जिस दिन सूरज को
मजदूरों की ओर से गवाही देनी थी,
उस दिन सुबह नहीं हुई।
सुना गया कि
मालिक के यहाँ की पार्टी में
सूरज ने ज्यादा पी ली थी।
हेमराज सुंदर की रचनाओं में राजनीति की विसंगतियों पर व्यंग्य देखने को मिलता है। मॉरीशस में हिंदी साहित्य को प्रो. वासुदेव विष्णुदयाल, मुनीश्वरलाल चिंतामणि, प्रह्लाद रामशरण, सोमदत्त बखौरी, अजामिल माताबदल आदि पचास से अधिक सक्रिय भाषाविदों एवं साहित्यकारों ने समृद्ध किया है। यहाँ के विश्वविद्यालय में हिंदी में शोधकार्य होता है।
सूरीनाम का इतिहास हिंदी भाषा को लेकर काफी समृद्ध रहा है, यद्यपि वर्तमान में यहाँ भी अन्य देशों की तरह भाषाई संकट है। जब ‘चाँद’ पत्रिका का ‘प्रवासी अंक’ निकला था, तब महात्मा गांधी जी ने ‘चाँद’ पत्रिका के माध्यम से प्रवासियों को संदेश भी दिया था। ‘सूरीनाम दर्पण’ में अमर सिंह रमन की कविता की पंक्तियाँ हैं, जो सूरीनाम में रहने वाले भारतीयों की दशा को व्यक्त करती हैं। यहाँ भी राजनीति पर व्यंग्य देखने को मिलता है:
मैं हूँ कुर्सी का बेटा,
मेरा नाम चतुरी आनंदा।
मानो सबके गले का फंदा,
पर यही है मेरा जीवन-धंधा।
कोई कहता है नाक का नेटा,
कोई कहता है भैया-बेटा।
पॉलिटिकल भाषण मैं करता,
अगड़म-बगड़म खूब लपेटा।
कोई कहे अच्छा या गंदा,
पर है मेरा यही जीवन-धंधा।
इस प्रकार मुंशी रहमान खान, जीत नारायण सहित अनेक रचनाकारों की रचनाओं में व्यंग्य के पुट मिलते हैं।
त्रिनिदाद में हिंदी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। त्रिनिदाद में हरिशंकर आदेश जी ने काफी रचनात्मक कार्य किया और उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की। उनका झुकाव शास्त्रीय संगीत और अन्य विधाओं की ओर भी देखने को मिलता है। उन्होंने हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ की तर्ज पर ‘मदिरालय’ की रचना की। इसमें समाज की विसंगतियों को व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया गया है।
प्रसिद्ध ‘चटनी संगीत’ के मिश्रण में व्यंग्य के पुट बहुत अधिक मिलते हैं। त्रिनिदाद के लोगों के बारे में यह प्रसिद्ध कहावत है कि “यदि चम्मच भी गिर जाए तो वे उस पर भी नाच लेते हैं।”
प्राथमिक स्तर पर फिल्मी गीतों, बातचीत सभा, द्विभाषिक मासिक पत्रिका के माध्यम से हिंदी शिक्षण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। त्रिनिदाद में ‘हिंदी निधि स्वर’ पत्रिका एवं ‘बातचीत क्लब’ के प्रयोग सफल रहे हैं। अतिथि आचार्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका गिरमिटिया देशों में वहाँ के हिंदी शिक्षकों के लिए कार्यशालाएँ आयोजित करने एवं नए शिक्षकों को प्रशिक्षित करने में हो सकती है।
(9 अप्रैल 2026 को, गुजरात आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज और के. सी. जी. द्वारा आयोजित शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में दिए गए व्याख्यान का अंश)
डॉ. सुनील देवधर (कार्याध्यक्ष, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति)

“हिन्दी स्फूर्ति और चेतना की भाषा”
“हिन्दी के विशाल मंच की वीणा पाणी स्फूर्ति, चेतना, रचना की तुम नव कल्याणी”
ये पंक्तियाँ महाप्राण निराला ने महादेवी वर्मा के सन्दर्भ में कही थी। दूसरी पंक्ति अपने अर्थ में और भी व्यापक हैं, क्यूं कि नि:सन्देह हिन्दी, स्फूर्ति, चेतना, रचना नव कल्याण की भाषा है। हमारे स्वाधीनता आन्दोलन का सारा संघर्ष इस एक भाषा के माध्यम से हुआ। ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।” स्वतंत्रता हमारा जन्मसिध्द अधिकार है, और हम इसे लेकर ही रहेंगे। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ आदि अनेक जिवंत नारे लोगों की जबान पर थे।
आज़ादी के बाद गांधीजी के शब्द .. “गांधी अंग्रेजी भूल गया है” के मर्म को नहीं समझा गया। परिणाम आज सामने है। लेकिन कहना होगा कि इस भाषा का अपना सामर्थ्य है, कि तमाम दबावों, उपेक्षा, राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव आदि के बावजूद हिन्दी ‘जनभाषा’ के रुप में प्रतिष्ठित है। इसके सामर्थ्य का एक अच्छा उदाहरण महाभारत के प्रसंग से जोड़कर देखा/ दिया जा सकता है – अर्जुन के रथ पर सारथी के रुप में कृष्ण थे। अर्जुन बाण चलाता तो कर्ण का रथ कई गज पीछे धकेल दिया जाता और कर्ण के बाण से अर्जुन का रथ मात्र डगमगाता। तब भी कृष्ण कर्ण की प्रशंसा में वाह कह उठते। तब अर्जुन ने विस्मय से कृष्ण से पूछा आप मेरे सारथी हैं, मेरे बाण से कर्ण का रथ पीछे चला जाता है। आप कुछ नहीं कहते, पर कर्ण के बाणसे मेरा रथ मात्र थोडा हिलता है, तो आप उसकी प्रशंसा में वाह कह उठते हैं। तब कृष्णने कहा तुम्हारे रथ पर तीनो लोकों का भार लेकर मैं स्वयं बैठा हूँ। ऊपर हनुमान ध्वजा तुम्हारे रथ का रक्षण कर रही है। लेकिन कर्ण का सामर्थ्य तो देखो इस सबके उपरांत भी उसका बाण तुम्हारे रथ को हिला देता है।
यही सामर्थ्य हिन्दी का है। उसकी उपेक्षा, राजनीति की साजिश के बावजूद यह भाषा अपनी सहजता, सरलता और व्यापकता व सर्वग्राह्रयता के कारण जनमानस में प्रतिष्ठित है। और प्रतीक्षा है संयुक्त राष्ट्र की मान्य भाषाओं में स्वीकृत होने की। हिन्दी के विकास, प्रचार और प्रसार में आकाशवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। और आज भी है। रेडियोसे प्रसारित गीतों ने इस भाषा की लोकप्रियता को और बढ़ाया, मेरा सौभाग्य रहा कि एक लंबी अवधि तक इस विभाग में काम कर सका और इस माध्यम से मंच संचालन, रेडियो प्रसारण, अनुवाद, स्वतंत्र लेखन और विविध संस्थानों, संस्थाओं तथा विद्यालयों में व्याख्यानों के माध्यम से हिन्दी की सेवा का अवसर मिला।
विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन नि:संदेह एक सार्थक आयोजन है। और उसकी सार्थकता और गंभीरता को बनाये रखना प्रतिभागियोंका दायित्व। त्रिनिदाद की संस्था हिंदी निधि के अध्यक्ष चनाका सीताराम ने1992 में अध्यक्ष पद से बोलते हुए कहा था, ‘एक समग्र विश्व संस्कृति की भाषा हिन्दी ही हो सकती हैं। इस लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को अपनी सूची में हिन्दी को एक विश्व भाषा के रुप में जोड़ना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र संघ हिन्दी भाषा को स्वीकार किए बिना अधूरा है।”
मॉरिशस में सन 1976, 1993 में भी विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन हुआ था। और 2018 का तीसरा अवसर। भारत और मॉरिशस के बीच द्विपक्षीय संबंध प्रगाढ़ रहे हैं और आगे भी रहेंगे और उसमें इन सम्मेलनों की भूमिका को भी स्वीकारा जाना चाहिए।
मॉरिशस अन्य कई देशों की तुलना में आकार और संसाधनों के स्तर पर शायद कम हो मगर इस देश की इच्छाशक्ति और आयोजन क्षमता, सराहना और अभिनंदन के साथ ही एक प्रेरणा भी है।
डॉ.जवाहर कर्नावट (निदेशक,अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र ,रबींद्रनाथ टैगोर
विश्वविद्यालय,भोपाल (वैश्विक हिंदी पत्रकारिता के अध्येता)

हिंदी की वैश्विक पत्रकारिता- प्रिंट से ऑनलाइन की यात्रा
विश्व के अलग-अलग कोनों में हिंदी मीडिया के विस्तार ने हिंदी के वैश्विक प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। विदेश में हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत लंदन से 1883 में प्रतापगढ़ जनपद की एक देशी रियासत कालाकांकेर के राजा रामपाल सिंह ने ‘हिंदोस्तान’ नामक त्रैमासिक प्रकाशन से प्रारंभ की थी जो 1885 तक प्रकाशित होता रहा।वर्ष1898 में त्रिनिदाद-टोबेगो से ‘हिन्दोस्तान कोहिनूर अखबार’ दैनिक रूप में प्रकाशित हुआ। वर्ष1903 में दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित, साप्ताहिक ‘इंडियन ओपिनियन’ में महात्मा गांधी ने चार भाषाओं (हिंदी, गुजराती, तमिल और अंग्रेजी) का समावेश कर एक नया इतिहास बनाया। वर्ष 1913 में अमेरिका से प्रकाशित ‘गदर’ ने भारत की आजादी के संघर्ष हेतु हिंदी के अलावा अनेक भाषाओं में प्रकाशन निकाले। साधनाभाव के दौर में हस्तलिखित पत्रिकाओं ने भी हिंदी पत्रकारिता को सम्बल प्रदान किया। मॉरीशस से ‘दुर्गा’ ब्रिटेन से ‘प्रवासिनी’, अमेरिका से ‘विश्वा’, हंगरी से ‘दिन’ आदि पत्रिकाओं ने हिंदी की पताका को फहराए रखा। फिजी से ‘शांतिदूत’ साप्ताहिक का 1935से 85 वर्षों तक प्रकाशित होना एक ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज है। विदेश में हिंदी पत्रकारिता के 142 वर्षों के इतिहास में लगभग 200 पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन ने हिंदी को वैश्विक विस्तार प्रदान
किया। इंटरनेट पर भाषा प्रौद्योगिकी के नए स्वरूप और यूनिकोड के प्रयोग ने पिछले 30 वर्षों मेंविदेशों में हिंदी की मुद्रित पत्रकारिता से ऑनलाइन पत्रकारिता की ओर तेजी से कदम बढ़ाए हैं। न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर से श्री रोहित कुमार हैप्पी के संपादन में प्रकाशित ‘भारत दर्शन’ पत्रिका के वेब संस्करण को इंटरनेट पर विश्व की प्रथम हिंदी पत्रिका होने का श्रेय प्राप्त हुआ। दिसंबर 1998 में ‘भारत दर्शन’स्वयं के डोमेन (Bharatdarshan. co.nz) पर आरंभहो गया।
2. ‘भारत दर्शन’ के अंकों में काव्य, बाल साहित्य, कहानी,विविध आलेख, भारतीय त्यौहार एवं मेलों आदि पर सामग्री निरंतर 25 वर्षों से उपलब्ध कराई जा रही है। इस पत्रिका के डोमेन पर पुराने सभी अंक भी उपलब्ध हैं। इसी प्रकार वर्ष2000 में संयुक्त अरब अमीरात से श्रीमती पूर्णिमा बर्मन के संपादन में ‘अभिव्यक्ति’ और ‘अनुभूति’ पत्रिका की शुरुआत वेब माध्यम से हुई। उस समय हिंदी के मानक फॉण्ट नहीं होने के कारण सामग्री की इमेज बनाकर वेब पर अपलोड की जाती थी। यह पत्रिका विश्व के अनेक देशों में लोकप्रिय हुई। ‘अभिव्यक्ति’ पत्रिका को ई-मेल से बड़ी संख्या में कविताएं मिल रही थी। वेब पर कविताओं की प्रचुरता देख कविताओं की एक अलग पत्रिका ‘अनुभूति’ की शुरुआत 2001 में हुई। प्रारंभिक वर्षों में ही भारत, जापान,फ्रांस, यू.के., नार्वे, कनाडा, यूएसए, यूएई, मलेशिया आदि अनेक देशों के शौकिया और व्यावसायिक हिंदी कवि तथा लेखक इस पत्रिका से जुड़कर सहयोग करने लगे। 2007से दोनों पत्रिकाएं यूनिकोड में प्रारंभ हो गईं। ‘साहित्य, संस्कृति, पर्यटन, त्यौहार, ज्ञान विज्ञान, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, मनोरंजन, घर परिवार जैसे 30 से अधिक विषयों पर रोचक सामग्री से सुसज्जित पत्रिका के पाठकों की संख्या लाखों में है।
लंदन से 1997 में यू.के. हिंदी समिति द्वारा प्रारंभ की गई पत्रिका ‘पुरवाई’ अब ऑनलाइन पत्रिका के रूप में लोकप्रिय है। वर्ष2018 से यह पाक्षिक पत्रिका के रूप में जारी की जा रही है, जिसके संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा हैं। ब्रिटेन से ही जारी होने वाली एक और ‘ई’ पत्रिका है ‘लेखनी’। लेखिका डॉक्टर शैल अग्रवाल के संपादन में यह पत्रिका सन 2007 से मासिक तथा 2014 से द्विमासिक रूप में जारी हो रही है। इस पत्रिका के 162 अंक जारी हो चुके हैं और 500 से अधिक समकालीन लेखकों की रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है। हाल ही में इंग्लैंड की सुप्रसिद्ध संस्था ‘वातायन’ ने अप्रैल 2025 से ‘वातायनम्’ तिमाही पत्रिका की शुरुआत लंदन से की है। इसका प्रथम अंक भारत के और ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख रचनाकारों से सजा हुआ है। दिव्या माथुर जी के संपादन में इस पत्रिका के 2 अंक जारी हो चुके हैं।
3.कनाडा से ‘साहित्य कुंज’ ऑनलाइन पत्रिका पिछले 22 वर्षों से जारी हो रही है। इस मासिक पत्रिका के संपादक श्री सुमन घई हैं। पत्रिका में कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, भारत आदि अनेक देशों के रचनाकारों की रचनाएं भी प्रकाशित होती हैं। अभी तक इसके 282 अंक प्रसारित हो चुके हैं। काव्य, साहित्य, शायरी, कथा साहित्य, व्यंग, अनूदित साहित्य, बाल साहित्य, नाट्य साहित्य, समीक्षा, साक्षात्कार आदि विधाओं का समावेश ‘साहित्य कुंज’में होता है। कनाडा के टोरंटो शहर से ही वर्ष 2019 से‘पुस्तक रिसर्च जनरल’ प्रत्येक तिमाही ऑनलाइन प्रकाशित हो रहा है। इस शोध त्रैमासिक पत्रिका में हिंदी, संस्कृत, भारतीय संस्कृति आदि विषयों पर आलेख सम्मिलित होते हैं।‘पुस्तक भारती’ के संस्थापक श्री रत्नाकर नराले इस पत्रिका के संपादक हैं। जापान से डिजिटल रूप में प्रकाशित तिमाही पत्रिका ‘हिंदी की गूंज’ मुद्रित के साथ ही डिजिटल रूप में भी जारी होती है। इस 64 पृष्ठीय पत्रिका में साहित्य की विभिन्न विधाओं पर रचनाएं प्रकाशित होती है किंतु अधिकांश रचनाकार भारत के ही होते हैं। अमेरिका हिंदी की ऑनलाइन पत्रिकाओं के लिए सर्वाधिक समृद्ध देश है। यहाँ से 1999 में ‘उद्गार’ ऑनलाइन पत्रिका की शुरुआत हुई। कुछ और भी ऑनलाइन पत्रिकाएँ छुटपुट व्याक्तगत प्रयासों से जारी हुई किंतु अल्पजीवी रहीं। वर्ष2016 से श्री अनुराग शर्मा के मुख्य संपादन में पिट्सबर्ग से हिंदी-अंग्रेजी में जारी पत्रिका ‘सेतु’ ने अनेक कीर्तिमान बनाए हैं। विश्व भर के प्रवासी और स्थानीय साहित्यकार, लेखक, पत्रकार और विशेषज्ञ इसमें लेखन करते हैं। इस पत्रिका ने अपने विशिष्ट तेवर और शब्दानुशासन से अलग पहचान बनाई है। इस पत्रिका को अभी तक 51 लाख 31 हजार हिट्स मिल चुके हैं। विश्व हिंदी ज्योति संस्था, केलिफोर्निया से हिंदी ‘कोस्तुभ’ त्रैमासिक पत्रिका की शुरुआत मार्च 2021 में ‘रंग विशेषांक’ के साथ हुई। इसके अनेक विशेषांक (आस्था, फुहार, ज्योतिर्गमय, गुरू, शिष्य, नव कोपल, मकरंद आदि) जारी हो चुके हैं। जून 2022 में न्यूजर्सी के स्वयं सेवी समूह ‘हिंदी से प्यार’ द्वारा श्री अनूप भार्गव के संपादन में ‘अनन्य’ पत्रिका का प्रथम अंक जारी हुआ।
4. इस आनलाइन पत्रिका को न्यूयार्क स्थित भारत के प्रधान कौंसलावास की वेबसाइट पर भी रखा गया है। ‘अनन्य’ पत्रिका के ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, चीन, रूस, सिंगापुर, तंजानिया, केन्या, न्यूजीलैंड और कैनेडा संस्करण भी जारी हो रहे हैं। सन् 2018 में सिंगापुर से प्रथम हिंदी पत्रिका ‘सिंगापुर संगम’ की शुरुआत ऑनलाइन ही हुई। नेशनल यूनिविर्सिटी ऑफ सिंगापुर की हिंदी प्राध्यापक डॉ. संध्या सिंह के संपादन में पत्रिका हिंदी के वैश्विक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। पिछले 8 वर्षों से प्रवासी विशेषांक, भोजपुरी विशेषांक विश्व में हिंदी विशेषांक, लघु कथा विशेषांक आदि के साथ पत्रिका के 29 अंक जारी हो चुके हैं। सन् 2022में नॉटनल (शीर्ष ई-बुक प्लेटफार्म) के अन्तर्गत जापान, जर्मनी, इटली, चीन, पुर्तगाल, कनाडा आदि के हिंदी प्राध्यापकों के सहयोग से ‘अंतरदेश’ हिंदी पत्रिका की शुरुआत ‘जर्मनी विशेषांक’ के रूप में हुई। वर्ष2024में इस पत्रिका के जापान और कनाडा विशेषांक अत्यंत लोकप्रिय हुए। वर्ष2025 में विश्व सिनेमा विशेषांक और अनुवाद विशेषांक भी प्रशंसनीय रहे। वर्तमान में इस
पत्रिका का संपादन कनाडा से डॉ. हंसा दीप और जापान से डॉ. वेदप्रकाश सिंह कर रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया से डॉ. भावना कुंवर के संपादन में ‘ऑस्ट्रेलियांचल’ त्रैमासिक ई पत्रिका का प्रथम अंक 15 अगस्त 2020 को स्वतंत्रता दिवस विशेषांक के रूप में जारी हुआ। पत्रिका का उद्देश्य विश्व भर में हिंदी साहित्य का प्रसार है। इस पत्रिका के भी अनेक विशेषांक (यथा प्रवासी, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, दीपावली, होलीआदि) जारी हो चुके हैं। विक्टोरिया, ऑस्ट्रेलिया से ही ‘सृजन ऑस्ट्रेलिया’वेब पत्रिका वर्ष2020 से सुश्री गरिमा मनीषी द्वारा जारी की जा रही है। यह एक बहुविषयक, विशेषज्ञों द्वारा समीक्षित अन्तरराष्ट्रीय ई पत्रिका है। इसकी मुख्य संपादक श्रीमती पूनम चतुर्वेदी तथा मार्गदर्शक डॉ. शैलेशशुक्ला हैं।
5. वैश्विक हिंदी अभियान के अन्तर्गत इस पत्रिका के बैनर तले 300 से अधिक कार्यकम वैश्विक स्तर पर आयोजित
हो चुके हैं। दोहा(कतर) से ‘नवचेतना’ त्रैमासिक पत्रिका 2020 से निरंतर जारी हो रही है। कतर के अलावा अन्य देशों से रचनाकार इसमें अपनी रचनाएं भेजते हैं। पत्रिका कतर के हिंदी विद्यार्थियों के लिए प्रतियोगिताएँ भी आयोजित करती है। इसी प्रकार साइप्रस से भी ‘अभिव्यक्ति’ ई पत्रिका के कुछ अंक सन् 2004 में जारी हुए। अब संपूर्ण विश्व में ऑनलाइन पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य का व्यापक प्रसार देखने को मिलता है।
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बालेन्दु शर्मा ‘दाधीच’ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी, एल्गो टेक्नोलॉजी, दुबई)

कंप्यूटर तथा इंटरनेट की क्रांति से अलग है एआई की क्रांति
यंत्रबुद्धि (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पिछले तीन साल से खबरों और दिमागों में छाई हुई है- एक तरफ उम्मीदों की रोशनी है तो दूसरी तरफ चिंताओं का कुहासा। डिजिटल तकनीक की दुनिया 1980 की कंप्यूटर क्रांति, 1995 की इंटरनेट क्रांति और 2008 की स्मार्टफोन क्रांति के बाद आजकल, शायद उन सबसे बड़ी क्रांति से गुजर रही है जिसके केंद्र में है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस।
कंप्यूटरों के आने पर लोगों में उत्साह बहुत ज्यादा था, डर अपेक्षाकृत कम। लोग धड़ाधड़ कंप्यूटर सीख रहे थे, अच्छे भविष्य की उम्मीदों के साथ अपने बच्चों को इंस्टीट्यूट भेज रहे थे। कुछ दफ्तरों में हड़तालें भी हो रही थीं, यह सोचकर कि कंप्यूटर कर्मचारियों की नौकरियों को प्रभावित करेगा। लेकिन कुल मिलाकर युवाओं का उत्साह बुजुर्गों की चिंताओं पर भारी था। इंटरनेट और स्मार्टफोन क्रांति के समय चिंता जैसी कोई विशेष बात नहीं थी। दुनिया सिमट रही थी, अवसर खुल रहे थे और संवाद की जबरदस्त ताकत हमारे हाथों में आ गई थी। हाँ, छोटे दुकानदारों के कामधंधे पर इ-कॉमर्स कंपनियों के असर, निजी प्राइवेसी, साइबर सुरक्षा, लत लग जाने आदि की चिंताएँ थीं लेकिन ऐसी कोई बहुत बड़ी बात नहीं जो वैश्विक स्तर पर परेशान कर रही हो।
अलबत्ता, इस बार की क्रांति पिछली डिजिटल क्रांतियों से अलग है। पिछली क्रांतियों ने नौकरियों और कारोबारों को ध्वस्त करने का डर नहीं दिखाया जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दिखा रही है। उन क्रांतियों ने भी दुनिया की कई परिपाटियों और तौरतरीकों को बदला लेकिन मौजूदा क्रांति तो कायाकल्प करने की काबिलियत रखती है। उन क्रांतियों ने भी छोटे स्तर पर नौकरियों को प्रभावित किया लेकिन फिर कई गुना नई नौकरियाँ पैदा भी कीं। मगर इस बार समस्या यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हमारे कामकाज को बेहतर, तेज और सस्ता बनाने के साथ-साथ खुद इंसान की जगह लेने में सक्षम दिख रही है।
बड़ी संख्या में लोग आशंकित दिखाई देते हैं। न सिर्फ आम लोग बल्कि काबिल, अनुभवी और तार्किक लोग भी। दर्जनों आईटी, बीपीओ, सेल्स, डेटा एंट्री, मार्केटिंग, कंटेंट निर्माण, मनोरंजन, दूरसंचार और क्रिएटिव कंपनियों में लाखों कर्मचारियों की छँटनी हुई है। इन सबसे अलग और बेपरवाह, एआई कंपनियों के बीच नए से नए मॉडल लाने की गलाकाट होड़ मची हुई है- न सिर्फ एक दूसरे को पीछे छोड़ने की बल्कि इंसान को पीछे छोड़ देने की। तकनीकी दुनिया के दो दिग्गजों- ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और एक्सएआई के सीईओ इलोन मस्क का मानना है कि आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस कुछ ही महीने दूर है। यह एआई का सबसे उन्नत संस्करण है जो लगभग हर मायने में इंसान की बराबरी करने में सक्षम होगा। इधर ओपनएआई ने ‘एस्ट्रा’ नामक मॉडल और क्लॉड ने ‘फेबल’ नामक मॉल लांच किए हैं जिन्हें देखकर लोग भौंचक्के रह गए हैं। ऐसा लगता है कि यह एजीआई के आगमन की आहट है।
नई रिपोर्टों के अनुसार, जेनरेटिव एआई इंसान के काम का 60-70% हिस्सा खुद कर सकता है। फर्क यह है कि पहले मशीनें हाथ का काम हथियाती थीं जबकि अब मशीनें दिमाग का काम भी हथिया रही हैं- वह काम जिसके लिए लोग वर्षों पढ़ाई करते हैं। मैने कई सर्वेक्षणों पर नजर डाली। आधे से ज़्यादा युवा मानते हैं कि आने वाले वर्षों में एआई उनकी नौकरी को प्रभावित करेगी। दुनिया की सिर्फ एक-तिहाई आबादी को भरोसा है कि एआई कंपनियाँ समाज के हित को अपने मुनाफ़े से ऊपर रखेंगी।
माना कि अंततः इंसान, जो कि एआई का निर्माता है, निर्णायक भूमिका में रहेगा। अब तक हुई सभी औद्योगिक और डिजिटल क्रांतियों में हमने देखा कि जब भी कोई क्रांतिकारी तकनीक आई तो शुरू में उसने लोगों के लिए तकलीफ पैदा की। लेकिन कुछ समय बाद उसी ने इंसानी विकास में हाथ बँटाया। मानव उन तकनीकों को अपने औजार में तब्दील करते हुए देखा गया है जिन्होंने शुरू में उसे डरा दिया था। यही बात देर-सबेर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी लागू होगी, ऐसा मानने में मुझे कोई हर्ज नहीं है। एआई से अनगिनत नए अवसर भी खुलेंगे और वे ऐसे होंगे जिन्हें फिलहाल हम नहीं जानते। लेकिन हममें से कोई नहीं जानता कि वे अवसर कब सामने आएंगे। इस बीच जिन लोगों की नौकरियाँ और रोजगार प्रभावित हो रहे हैं वे इन संभावनाओं के खुलने तक कैसे अपनी आर्थिक सुरक्षा को बचाए रखेंगे, यह यक्ष प्रश्न सामने है। कुछ नई नौकरियाँ आने लगी हैं लेकिन वे बेहद विशेषज्ञता वाली हैं। दूसरी जगहों पर फिलहाल नई नौकरियों के सृजन की गति धीमी है। हम एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं।
इन सबसे अलग एक नई चिंता आर्थिक दुनिया में खड़ी हो रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विकास में सैकड़ों अरब डॉलर की रकम झोंक दी गई है। बड़ी तकनीकी कंपनियों का शेयर मूल्य और बाजार मूल्य आसमान पर है। एआई के विकास पर इन कंपनियों का विशेषाधिकार है क्योंकि इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है जो सबके बस की बात नहीं। लेकिन इन चुनिंदा कंपनियों को छोड़कर बाकी कंपनियाँ मंदी के प्रभाव से जूझ रही हैं। एआई के आर्थिक लाभ कुछ को मिल रहे हैं जबकि नुकसान कई को उठाना पड़ रहा है। अगर एआई में किया जा रहा प्रचंड निवेश गलत साबित होता है तो बाजार पर इसका क्या असर होगा, वह डर इन दिनों दुनिया भर के निवेशकों को परेशान कर रहा है।
और भी बहुत सारी चिंताएँ हैं जिनमें एआई से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव, पारदर्शिता, प्राइवेसी, साइबर सुरक्षा, जवाबदेही, पक्षपात, कॉपीराइट विवाद, गलत सूचनाओं का प्रसार आदि शामिल हैं। फिलहाल एक विरोधाभासी नजारा है- एक तरफ चिंताओं का दौर है तो दूसरी तरफ एआई कंपनियाँ तरक्की के चरम पर हैं। आम निवेशक और यूजर ज्यादा नहीं जानता कि भीतर हो क्या रहा है। अगर एआई ने मानवीय हितों को आगे नहीं बढ़ाया तो यह क्रांति चंद लोगों को तो अमीर बनाएगी लेकिन मानवता को एक तूफान के बीच लाकर छोड़ देगी।
डॉ. बरुन कुमार (पूर्व निदेशक, रेल मंत्रालय एवं गृह मंत्रालय)

संसद में हिंदी में पहला संबोधन
हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में 14 सितंबर 1949 को स्वीकार किया गया था। संविधान में कहा गया कि संसद का कार्य हिंदी या अंग्रेजी में किया जा सकेगा। सांसदों को अंग्रेजी या हिन्दी में, या अध्यक्ष की अनुमति से अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति प्रदान की गई। स्वभावतः यह जिज्ञासा होती है कि संसद में हिंदी में पहली बार संबोधन कब और किसने किया था। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही राजभाषा संबंधी प्रावधान भी लागू हुए। किंतु हिंदी को संसद में संबोधन की भाषा के रूप में व्यवहार होने में सवा दो साल और लगे। आजादी के बाद देश का नेतृत्व कांग्रेस ने संभाला था। जवाहरलाल नेहरु देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे। नेहरू जी इलाहाबाद के थे और हिंदी उनकी मातृभाषा थी। स्वाभाविक अपेक्षा तो यही होती है कि नेहरु जी संसद को हिंदी में पहली बार संबोधित करते। या फिर उनकी पार्टी कांग्रेस का ही कोई सदस्य संसद को हिंदी में संबोधित करने की शुरुआत करता। किंतु नहीं, इसका श्रेय जाता है उस समय की विपक्षी पार्टी ‘अखिल भारतीय राम राज्य परिषद’ के एक सांसद श्री नंदलाल शर्मा को। अखिल भारतीय राम राज्य परिषद भारत की एक परम्परावादी हिन्दू पार्टी थी, जिसकी स्थापना स्वामी करपात्रीजी ने सन् १९४८ में की थी। इस दल ने सन् १९५२ के प्रथम लोकसभा चुनाव में तीन सीटें प्राप्त की थी। नंदलाल शर्मा राजस्थान के सीकर नामक स्थान से निर्वाचित हुए थे।
वह दिन था १५ मई १९५२। लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष श्री जी वी मावलंकर संसद के प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे। सत्र शुरू हुए आज दूसरा दिन था। लोकसभा सचिवालय के दस्तावेजों के अनुसार अपनी बारी आने पर श्री शर्मा ने सदन को हिंदी में संबोधित करते हुए कहा, “मैं आज जान-बूझकर हिंदी में बोल रहा हूं. क्योंकि यह भारतीय संसद कहलाती है और मैं केवल ‘अखिल भारतीय राम राज्य परिषद’ नहीं बल्कि सारे संसद को रिप्रेजेंट करता हूं।” सांसदों का ध्यान उनके हिन्दी संबोधन की ओर आकृष्ट हुआ। श्री शर्मा ने सदन के उद्देश्य और कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए कहा, “यह न समझा जाए कि हाउस ऑफ कॉमंस की कन्वेंशन का ही पालन करना संसद का कर्तव्य है। बहुत समय पूर्व जब इंग्लैंड का जन्म हुआ था और यूरोप भी अंधकार में पड़ा था… उस समय भारत में राजनीति ऊंचे से ऊंचे शिखर तक पहुंची हुई थी।… आप (यानी लोकसभा अध्यक्ष) न केवल पश्चात विरोधियों का, बल्कि भारतीय रूढ़ियों और राजनीतिक तत्वों का भी ध्यान करें और चाणक्य, विदुर, वशिष्ठ, वामदेव आदि के अनुरूप इस प्रकार आगे बढ़ाएं कि थोड़े ही दिन में यह वस्तुतः भारतीय संसद बन जाए और हम भारतीय सभ्यता और संस्कृति को ऊंचे से ऊंचा उठा सकें।”
श्री शर्मा ने आगे कहा, “यही कारण है कि विरोधी दल में होने पर भी न किसी दल विशेष से हमारा विरोध है, न ही किसी दल के साथ हम किसी तरह का विरोध रखते हैं। हम यह विश्वास रखते हैं कि आप सबकी और विशेष तौर पर भारतीय संस्कृति की उन्नति करने की इच्छा रखनेवालों के अधिकारों की रक्षा करेंगे और थोड़े ही दिनों में संसद को ऐसा रूप देंगे कि वह वस्तुतः भारतीय संसद कहला सके।…. मैं शक्तिशाली दल कांग्रेस से निवेदन करूंगा कि वह किसी दल को अपना विरोधी न समझे क्योंकि भारत का विरोध करना किसी की इच्छा नहीं है। सभी लोग चाहते हैं कि भारत उन्नति करे। हमलोगों में आपस में केवल दृष्टिकोण का भेद है।”
पहला कदम उठानेवाले का बड़ा महत्व होता है, क्योंकि वही मार्ग प्रशस्त करता है। नेहरु जी के सामने या कांग्रेस के सामने समूचे देश की भाषाओं के प्रति एक समान भाव दर्शाने के लिए हिंदी के प्रयोग के प्रति जो भी संकोच रहा हो, राम राज्य परिषद पार्टी केशव नंदलाल शर्मा ने उस हिचक को दूर कर संसद में हिंदी में संबोधन की शुरूआत की। हिंदी पर आज भी यह आरोप दबी जुबान से ही सही लगाया जाता है कि इसे राजभाषा बनाने से देश के अन्य भाषाओं के प्रति भेदभाव हुआ। किंतु यह काबिले गौर है कि हिंदी में किया गया उपर्युक्त संबोधन किसी भाषा विशेष या क्षेत्र विशेष की तरफदारी नहीं करता था। इसमें भारतीय संस्कृति और भारतीयता पर ही जोर था। इसमें भारत के उच्च मूल्यों पर संसद को चलाने का आग्रह था।
आज वैश्वीकरण का बल पाकर अंग्रेजी नई शक्ति से शासन और जन-जीवन में दखल जमा रही है। हिंदी पर पक्षपात का आरोप लगाकर अंग्रेजी की दुराग्रहपूर्ण तरफदारी करनेवालों के लिए संसद में हिंदी का प्रथम निष्पक्ष और अखिल भारतीय स्वर गौर करने और स्मरण रखने लायक है।
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डॉ. मनोज मोक्षेंद्र (प्रतिष्ठित साहित्यकार, व्यंग्यकार, कथाकार, कवि, उपन्यासकार, नाटककार, संपादक, अनुवादक, चित्रकार और पत्रकार)

प्रादेशिक भाषाओं के साथ हिंदी का समन्वयन अत्यावश्यक है
यह तो तय है कि यदि हिंदी को राजभाषा के सिंहासन पर स्थायी रूप से आरूढ़ देखे जाने की राष्ट्रीय इच्छा है तो जो अब तक संभव नहीं हो सका है, उसे संभव करना होगा अर्थात इसे देश के हर भाग में एक सर्वप्रिय भाषा बनाया जाना होगा। विभिन्न प्रांतों में एकाधिक प्रांतीय भाषाएं जनमानस में अति प्राचीन काल से गहरी पैठ बनाए हुए हैं और उनसे उनका आत्मिक रिश्ता बना हुआ है। उनसे संबंधित प्रांतों की सांस्कृतिक विरासत मुखर होती है। ऐसे में एक सवाल उठना लाज़मी है कि क्या वहां की सांस्कृतिक विरासत हिंदी से मुखर हो सकती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि इससे उनकी भावनाएं आहत हो रही हैं! वैसे इस बात पर चर्चा की जा चुकी है और ज़्यादातर विद्वानों का मत है कि हिंदी की स्वीकार्यता-दर विशेषतया हिंदीतर क्षेत्रों में हिंदीभाषी क्षेत्रों से किसी भी मायने में कम नहीं है। आप अगर दक्षिण के कुछ हिस्सों अर्थात हैदराबाद, सिंकदराबाद, पांडिचेरी, कन्याकुमारी आदि में जाएं तो आप यह पाएंगे कि वहाँ हिंदी को पर्याप्त सम्मान दिया जा रहा है। वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर हिंदी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। वास्तव में, ज़्यादातर प्रांतीय भाषाओं में हिंदी एक कड़ी की तरह काम करती है।
यों तो आज़ादी के कोई तीन दशकों बाद तक दक्षिण भारतीयों में हिंदी के प्रति अरुचि रही है और इसकी कई वज़हें रही हैं। इनके मनोवैज्ञानिक तह तक जाते हुए मैं कुछ वज़हों पर नज़र डाल रहा हूँ। ग़ौरतलब है कि काफी लंबे समय से मुख्य हिंदीभाषी क्षेत्रों के नागरिक प्रायः दक्षिण भारत से कटे-कटे रहे हैं। यद्यपि उन्हें कभी रोज़ी-रोटी की फ़िराक़ में भी दक्षिण जाने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि उनके लिए उत्तर भारत ने रोज़ग़ार के जखीरे खोल रखे हैं तथापि उन्होंने दक्षिण भारत में अपनी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। जब हमने विशेषतया सात-आठ दशकों से वहाँ आना-जाना शुरू किया तो देखिए, कितनी आसानी से दक्षिण भारतीयों के गिले-शिकवे मिट गए! आप उत्तर भारत के हिंदीभाषी नागरिक के रूप में दक्षिण भारत में जाएं तो लोग आपकी भाषाई, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को यथेष्ट सम्मान देते हैं। मैसूर जैसे शहर में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में स्तुत्य कार्य किया जा रहा है। हैदराबाद में भी यही आलम है। हिंदी की गंध तो केरल तक में सर्वत्र मिलती है। दक्षिण मूल के कई हिंदी विद्वान उल्लेखनीय हिंदी-सेवा कर रहे हैं। हाँ, वे हमारे अन्य पक्षों की नुक़्ताचीनी करते अवश्य सुने जाते हैं। यह सब चमत्कार कोई आधी सदी की संक्षिप्त अवधि में ही हुआ है। अर्थात आज़ादी के बाद…अब तो वहाँ हमारे उत्तर भारत के इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, प्रोफ़ेसर आदि बहुतायत में जाकर बसने लगे हैं और वहाँ से भी ऐसी प्रतिभाओं का उत्तर भारत में आगमन हो रहा है–न केवल रोज़ी रोटी और बेहतर जीवन की तलाश में अपितु राष्ट्रीयता की भावना से राष्ट्र-निर्माण में अपना अमूल्य योगदान करने के लिए भी। इन देशवासियों के परस्पर भौतिक सामीप्य और सामंजस्य ने इन क्षेत्रों में राष्ट्रीयता का संचार किया है। हमारी साँस्कृतिक विरासत पर शुद्ध भारतीयता का मुलम्मा चढ़ाया है। हम एक-दूसरे की ज़बान में शौक से बोलना चाहते हैं ताकि आपसी समझ में अभिवृद्धि हो और भ्रातृत्त्व एवं प्रेम बढ़े। किसी संस्थागत शिक्षण-प्रशिक्षण के बिना हम तमिल और कन्नड़ सीख रहे हैं और वे हिंदी। दिल्ली के दक्षिण भारतीयों को हिंदी माध्यम से वाकपटुता में जो महारत हासिल है, उसे सुनकर तो बेहद ताज़्ज़ुब होने लगता है। यह सब साबित करता है कि वहाँ बेशक! किसी भाषाई वज़ह से पारस्परिक वैमनष्यता नहीं है; अगर है तो राजनीतिक कुचक्रों के कारण।
इन दोनों हिंदी और हिंदीतर क्षेत्रों के बीच जो कटुता पैदा हो रही है, उसका कारण मुख्य रूप से राजनीतिक है। या तो राज्यीय सीमाओं का विवाद है या नदी-जल के बँटवारे का ज्वलंत प्रश्न या कोई अन्य मुद्दा जिनका समाधान राजनीतिक लाभ पाने के लिए नहीं किया जाता। इन समस्याओं को आश्वासनों का आक्सीज़न देकर जिलाए रखने की कोशिश की जाती है ताकि समय आने पर जनता को राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ बरगलाया जा सके और अपने वोटबैंक को पुख़्ता बनाया जा सके।
वहाँ आंग्लसत्ता के दौरान अंग्रेज़ी का कुछ सौ सालों से बोल-बाला होने के कारण भी हिंदी को आज़ादी के दिन तक स्वीकार्यता नहीं मिल पाई थी। अंग्रेज़ी माध्यम से वे उत्तर भारत के आगंतुकों के साथ भी संवाद-संपर्क स्थापित कर लेते थे। लेकिन, जब संविधान द्वारा हिंदी को राजभाषा के रूप में क्रियान्वित करने की कोशिश की गई तो यह बात उन्हें बिल्कुल अलपटप-सी लगी क्योंकि अंग्रेज़ी माध्यम से वे अपने सारे कार्यालयीन कार्य करने में समर्थ थे। किंतु आज़ादी के बाद आए संक्रमणशील दौर के कारण जब उन्होंने आसानी से हिंदी सीख ली तो उन्हें अंग्रेज़ी को छोड़ने में कोई शिकायत नहीं रही। अगर वे अंग्रेज़ी छोड़ नहीं सके तो उन्होंने हिंदी को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं की। इसके बाद भाषाई विरोध के दौर का धीरे-धीरे पटाक्षेप हो गया। आज लोग वहाँ भाषाई सौहार्द के मैत्रीपूर्ण वातावरण में जी रहे हैं।
देश में अधिकतर राज्यों का विभाजन भाषाई आधार पर हुआ है और इसे सभी ने अर्थात केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के साथ-साथ जनता ने भी मूक स्वीकृति दी। आज तक किसी भी स्तर पर यह चर्चा नहीं हुई है कि ऐसा क्यों किया गया है यानी भाषा को आधार बनाकर राज्यों को क्यों विभाजित किया गया है; किसी और आधार पर भी तो राज्यों को बाँटा जा सकता था। इसके चलते दक्षिण के राज्यों में सरकारी कामकाज प्राथमिक तौर पर अंग्रेज़ी में होता है। कभी-कभी वहाँ के स्थानीय प्रशासनों में राज्यीय भाषाओं का प्रयोग होता है। चूँकि हमारी नीति प्रांतीय और क्षेत्रीय भाषाओं को भी उतना ही प्रोत्साहन देना है जितना कि हिंदी को, इसलिए हम वहाँ हिंदी को बढ़ावा देने की नीति को जारी रखते हुए उनकी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ इसके साथ तालमेल बैठाने पर बल दे सकते हैं। वास्तव में, लोकसंस्कृति को लोकभाषा में, क्षेत्रीय संस्कृति को क्षेत्रीय भाषा में और प्रांतीय संस्कृति को प्रांतीय भाषा में मुखर किया जा सकता है। इस महत्त्वपूर्ण कार्य में हिंदी को एक कड़ी के रूप में तैनात किया जाना चाहिए।
राज्यों की बहुभाषिता के कारण भाषाई खाइयों को पाटने के लिए हिंदी विद्वानों ने सदैव उदार दृष्टिकोण अपनाया। हिंदी-प्रेमियों का यह गुण श्लाघ्य है। पंडित रामविलास शर्मा तो राजभाषा के रूप में चार भाषाओं को लाने की वकालत करते हैं। उनके ही शब्दों में:
“…भारत में एक दक्षिण की भाषा, एक उत्तर की भाषा, एक-एक पूर्व और पश्चिम की भाषा। इन सबको समान रूप से राजकाज की भाषा बनाया जा सकता है। हिंदी बोलने और समझने वालों की संख्या अन्य भाषाभाषियों से बहुत ज़्यादा है। इसलिए उत्तर से यह भाषा ले सकते हैं। दक्षिण में तमिल साहित्य सबसे प्राचीन है और समृद्ध भी है। दक्षिण से उसे ले सकते हैं। पश्चिम में मराठी, अंग्रेज़ी राज से पहले महाराष्ट्र की राजभाषा रह चुकी है। पश्चिम से उसे ले सकते हैं और पूर्व से इसी तरह बांग्ला भाषा ले सकते हैं। चार भाषाएं समान रूप से सरकारी कामकाज में इस्तेमाल की जाएं तो किसी को यह शिकायत न हो कि हिंदी के राजभाषा बनने से हिंदी वालों को विशेष लाभ होगा और दूसरे पीछे रह जाएंगे…”
(भाषा, बहुभाषिता और हिंदी, सं. प्रणव कुमार बंद्योपाध्याय और रमाकांत अग्निहोत्री, शिलालेख प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली, पृ. 14)
यहाँ हिंदी-प्रेमियों और हिंदी-विद्वानों के उस लिज़लिज़े मनोविज्ञान की ओर ध्यान आकृष्ट करना उचित होगा जिसे शिष्ट शब्दों में भाषागत विनम्रता तो कह सकते हैं; किंतु, इसे हिंदी के लिए सेहतमंद कभी नहीं मान सकते हैं। उनकी भाषागत विनम्रता की मानवीय दृष्टि से भले ही प्रशंसा की जाए, यह राजभाषा के लिए कभी सेहतमंद साबित नहीं हुई है। संविधान-निर्माण के समय से ही राजभाषा की दीर्घजीविता और सुस्वास्थ्य के लिए एक सख़्त नीति अपनाई जा सकती थी; लेकिन, वैसा नहीं किया गया। संभवतः हिंदी-प्रेमियों का यह भाषागत लचीलापन संविधान-निर्माताओं की आत्मा में भी अंतरित हो गई थी। तभी तो अंग्रेज़ी को बार-बार सह-राजभाषा के रूप में अध्यादेशित किया गया। इस बात का एहसास सभी हिंदी-विद्वानों को रहा है। किंतु, उनमें भाषागत आंदोलन चलाने की दमखम का पूर्ण अभाव रहा है। संभवतः अपनी इसी कमजोरी के कारण वे अपने आंग्ल शासकों का स्तुति-गान भी करते रहे हैं। हिंदी के भारतेंदु युग ने महारानी विक्टोरिया, लार्ड रिपन, लार्ड मैयो, प्रिंस आफ़ वेल्स आदि की खुलकर प्रशंसा की गई थी। खुद भारतेंदु हरिशचंद्र भारतीय शिक्षा पर अंग्रेज़ी के नियंत्रण की तहेदिल से प्रशंसा करते हैं। यह सब आख़िर क्या था? शायद हमारी भाषाई हताशा थी। हमारी हीन भावना थी। क्योंकि हम सदियों से अंग्रेज़ी के प्रति नतमस्तक रहे थे और हिंदी पर अंग्रेज़ी के वर्चस्व को स्वीकार करते थे।
दक्षिण भारतीयों ने उत्तर भारतीयों के अंग्रेज़ी के प्रति इस आकर्षण को ग़ुलामी के दौर में ही भाँप लिया था। ऐसे में उनका झुकाव भी अंग्रेज़ी की ओर होना स्वाभाविक था। अन्यथा, वे हिंदी को समय रहते अपनी प्रांतीय भाषा के साथ व्यवहार में लाने लगे होते और इस तरह देश की विभिन्न प्रांतीय भाषाओं के बीच हिंदी संपर्कभाषा की भूमिका भलीभाँति निभा रही होती! किंतु, उनके मनोविज्ञान में अज़ीबोग़रीब बदलाव आया। वे यह समझने लगे कि चूँकि स्वयं उत्तर भारत के लोग अंग्रेज़ी को अपना रहे हैं इसलिए हिंदी एक अशक्त-सी भाषा है जिसे वे अपने साथ लंबे समय तक नहीं रख सकते हैं; इससे उनका भविष्य अंधकारपूर्ण हो जाएगा। प्रकारांतर से, वे अंग्रेज़ी पर ज़्यादा निर्भर रह सकते हैं और इस पर भरोसा करना उनकी एक मनोवैज्ञानिक दुर्बलता बन गई। इस संबंध में यह बेबाक टिप्पणी की जा सकती है कि दक्षिण भारतीयों द्वारा काफी लंबे समय तक हिंदी को दरकिनार करने से संबंधित मनोविज्ञान को अनुकूल हवा देने में खुद हिंदीभाषियों ने अहम भूमिका निभाई है।
ख़ैर, सह-अस्तित्त्व के हमारे काल-परीक्षित प्राचीन आदर्श के अनुसरण में हिंदी को प्रांतीय भाषाओं के साथ रहना सीखना होगा। उसे विभिन्न राज्यों के बहुभाषी नागरिकों की सभी आमचर्या में अपनी अभिव्यक्तियों को न केवल लोकप्रिय बनाना होगा अपितु उनकी ज़बान पर स्वाभाविक रूप से कुछ इस तरह विराजमान होना होगा कि उनकी भाषाओं को कोई क्षति पहुँचाने के बज़ाए उन्हें अपने पास इसकी उपस्थिति से फ़ायदा पहुँचे। उनमें सुरक्षा की भावना का विकास हो। इसके अपने भविष्य के लिए भी यह आवश्यक है। यह न केवल प्रांतीय भाषाओं में अपनी पैठ बनाए बल्कि प्रांतीय भाषाओं की सुगंध को खुद में समोने की कोशिश करे। यह कोशिश अवश्य सफल होगी क्योंकि भाषाई संदर्भ में हम सभी अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भलीभाँति समझने लगे हैं।
(मेरी पुस्तक “मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा हिंदी” के एक अध्याय से)
प्रोफेसर विशाला शर्मा (लेखिका, प्राचार्य, चेतना कला वरिष्ठ महाविद्यालय हर्सूल, छत्रपति संभाजीनगर)

हिंदी की गंगा अपनी राह स्वयं बना रही है।
एक राष्ट्र के रूप में हम अपनी भाषा के प्रति कितने संवेदनशील हैं-यह प्रश्न कितना महत्त्वपूर्ण है इसका अनुमान लगाने के लिए औपनिवेशिक दासता से मुक्ति पाने के लिए लड़े गए स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का एक विहंगावलोकन ही पर्याप्त होगा। विदेशी सत्ता से लड़ाई में हमारा सबसे धारदार हथियार हमारी भाषा थी ।उस समय भी भारत बहुभाषी देश था, किंतु लड़ाई के लिए जो भाषा चुनी गई वह हिंदी ही थी। इसलिए नहीं कि बाकी की भाषाएँ हिंदी से कहीं कमतर थीं, बल्कि इसलिए के हिंदी समूचे देश की वाणी का प्रतिनिधित्व कर रही थी। वह भारत की समस्त भाषाओं के मध्य सेतु थी ।स्वाधीनता के पश्चात् भाषा का प्रश्न राजनीति की भेंट चढ़ गया और उसके दुष्परिणाम से हम सब परिचित है। और भारतीय भाषाओं के बीच विवाद देश को कमजोर करने की सजिश बन गए। वस्तुस्थिति के साथ-साथ यह भी सत्य है कि तमाम विरोधों-व्यवधानों के वजूद भी देश के भीतर भी और वैश्विक स्तर पर भी हिंदी के प्रति लगाव बढ़ा और बढ़ता चला गया। समाचार पत्रों और चैनलों की पाठक-दर्शक संख्या की दृष्टि से यह स्पष्ट हो जाता है कि देश का आमजन हिंदी में सोचता-सुनता और समझता है।हिंदी भाषा विविध संस्कृतियों, भाषाओं, व्यक्तियों एवं मानव समुदायों की अभिव्यक्ति को चेतना के नव क्षितिज प्रदान करने के लिए संपर्क भाषा के रूप में उभरी है । महात्मा गांधी का काशी विश्वविद्यालय में 1948 में दिया गया भाषण “विदेशी भाषा की गुलामी “इस और संकेत करता है कि भाषा के साथ दृढ़ इच्छा शक्ति और स्वाभिमान का होना जरूरी है । और हिंदी में
यह गुण विद्यमान है।
भारत की समस्त समृद्ध भाषाओं के साथ हिंदी स्वतंत्रता संग्रामआदोलन में राष्ट्रीय एकता की मिसाल बनती है। हिंदी की बढ़ती साहित्यिक शक्ति को लक्ष्य कर उसके भावी विकास की स्वर्णिम संभावनाओं से तो हम सब परिचित हैं ही, यह हिंदी की शक्ति का मात्र एक पक्ष है। अब हिंदी साहित्य के साथ-साथ प्रशासन, बाज़ार, सिनेमा, अनुवाद, संचार आदि विविध क्षेत्रों में उत्तरोत्तर समृद्ध करते हुए भारत ही नहीं विदेशों के हृदय में भी धड़कने लगी है।भारतीय संस्कृति आध्यात्मिकता, नैतिकता ,सार्वभौम दर्शन और ज्ञान विज्ञान विश्व में हिंदी के माध्यम से प्रकाशित प्रसारित हो रहे हैं। हिंदी भारत और विश्व के मध्य संपर्क का स्वर्ण सूत्र है। मानवीय संवेदना सद्भावना और प्रेम की बेजोड़ भाषा ,विश्व मैत्री की भाषा, दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली, भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली स्वतंत्रता संग्राम में जनमानस को आंदोलन करने वाली , भारतीय साहित्य, गीत ,संगीत विभिन्न लोक कलाओं को विश्व भर में पहुंचने वाली हिंदी भाषा नहीं अभिव्यक्ति है। हिंदी विश्व का विस्तार अपार है। हिंदी शताब्दियों से भारत की जनभाषा रही है और सदा से अन्य देशों में उसका स्थान रहा है। ऐतिहासिक स्तर पर और भौगोलिक स्तर पर इस विस्तार को रेखांकित किया गया ।इसके लिखित साहित्य का प्रथम साक्ष सरहपा की रचनाओं के रूप में सन 760 ईसवी में मिलता है ।हिन्दी में समुद्र के समान ही सभी भाषाओं के शब्दों को अपनाने की सामर्थ्य है। हिन्दी भारत की बुनियादी भाषा है। यह सुलभ संस्कृत है। तुलसीदासजी ने रामचरितमानस जैसा ग्रंथ लिखकर संस्कृत को बहुत आसान बना दिया, जिसे बच्चे, जवान, बूढ़े सभी सरलता से बोल सकते हैं, समझ सकते हैं। बंकिमचंद्र चटर्जी ने ‘वंदेमातरम्’ और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘जन-गण-मंगलदायक’ लिखा। इसमें अधिसंख्य शब्द संस्कृत के हैं, परंतु पूरे देशवासी एकसाथ खड़े होकर राष्ट्र-वंदना करते हैं। हिन्दी की एक ओर विशेषता है कि वह सभी प्रकार के बोलने, लिखने वालों को सहज अपनाती है।मुझे तो वह दिन दूर नहीं दिखाई दिता, जब हिंदी साहित्य अपने सौष्ठव के कारण जगत साहित्य में अपना विशेष स्थान करेगा और हिंदी भारतवर्ष जैसे विशाल देश की राष्ट्रभाषा की हैसियत से न कवल एशिया महाद्वीप के राष्ट्रों की पंचायत में, किन्तु संसार भर के देशों की पंचायत में एक साधारण भाषा के समान न केवल बोली भर जाएगी, किन्तु अपने बल से संसार की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर भरपूर प्रभाव डालेगी। हिंदी की अविरल बहती इस गंगा को स्वच्छ-निर्मल रखने की चुनौतियों के साथ-साथ इसका पाट चौड़ा करने की भी आवश्यकता है। हिंदी का क्षेत्र प्रसार और वैश्विकता समयानुसार नये-नये कोणों से विचार की आवश्यकता है, और हम सभी भारतीय इस अघोषित किंतु जनसम्मत राष्ट्रभाषा के पति पूर्ण समर्पण भाव के साथ एकजुट होकर काम हिंदी की सेवा देश की सेवा है ।
डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त (सहायक प्राध्यापक, हैदराबाद)

चौखट की जंग लगी घंटी
आलीशान बहुमंजिला इमारत के फ्लैट नंबर चार सौ चार की संगमरमरी चौखट के बाहर बहत्तर साल के रामगोपाल जी हर इतवार की शाम ठीक पाँच बजे अपनी लाठी टेकते हुए आकर खड़े हो जाते थे। आधुनिक वास्तुकला की इन ऊंची इमारतों में नैतिकता का कद अक्सर इतना बौना हो जाता है कि ऊपर पहुंचने के लिए लिफ्ट की नहीं बल्कि ज़मीर की नीलामी की ज़रूरत पड़ती है। उनके कांपते हाथों में पीतल की एक छोटी पुरानी साइकिल वाली घंटी होती थी जिस पर गहरे जंग के मोटे चकत्ते पड़े थे क्योंकि हमारे देश में पुरानी यादों और बूढ़े मां बाप पर जंग लगना एक अनिवार्य नागरिक कर्तव्य बन चुका है। इमारत का नया सुरक्षाकर्मी जब भी उन्हें सीढ़ियों के कोने में खड़े देखता तो अपनी मूंछों पर ताव देते हुए ठहाका लगाकर कहता कि बाबा जब इस फ्लैट पर बिजली का आधुनिक म्यूजिकल डोरबेल लगा हुआ है तो इस जंग लगी घंटी को रोज़ अपनी हथेली पर बजाकर यहाँ लिफ्ट के सामने क्या तमाशा खड़ा करते हो। उस बेचारे गार्ड को क्या पता कि जिस समाज में संवेदनाएं मर चुकी हों वहां म्यूजिकल डोरबेल केवल अंतिम संस्कार का संगीत बजाती है। रामगोपाल जी अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को धोती के छोर से साफ करते और बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराकर कहते कि बेटा यह जंग लगी घंटी केवल पीतल का टुकड़ा नहीं है बल्कि इस पूरे शहर की उस बहरी संवेदना का वो अलार्म है जिसे तुम्हारे ये सेंसर वाले बटन कभी नहीं बजा पाएंगे। सेंसर के बटन केवल बाहरी आहट पहचानते हैं जबकि इंसानियत को पहचानने के लिए जिस आंतरिक रडार की ज़रूरत होती है वह भ्रष्टाचार और भौतिकता के कोहरे में कब का गायब हो चुका है। आसपास से गुजरने वाले तमाम संभ्रांत लोग उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि लगता है इस बुढ़ापे में दादाजी की याददाश्त खो चुकी है। भारत में जिसे याददाश्त खोना कहते हैं असल में वह सत्ता और संपत्ति के नशे में चूर लोगों के लिए एक सुविधाजनक बहाना है ताकि वे अपनी जिम्मेदारियों को भूल सकें। रामगोपाल जी किसी की कड़वी बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस पीतल की घंटी के लीवर को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप उस बंद दरवाज़े को टकटकी लगाए देखते रहते थे।
उस पॉश रिहायशी सोसायटी के तमाम निवासी रामगोपाल जी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें एक सनकी बुजुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। सभ्य समाज की परिभाषा यही है कि यहाँ दूसरों के दुख को सनक और अपनी बेईमानी को कुशलता माना जाता है। इमारत का बड़ा सेक्रेटरी जब भी हाथ में मेंटेनेंस बिलों का पुलिंदा लेकर लिफ्ट की तरफ बढ़ता तो रामगोपाल जी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि बाबू जी क्या आज उस बंद कमरे की बत्ती जली। सेक्रेटरी के चेहरे पर वह विशिष्ट कुटिलता थी जो केवल उन लोगों में आती है जिन्होंने फाइलें दबाकर और चंदा खाकर धर्म का चोला ओढ़ रखा हो। वह गुस्से में अपनी चाबियों का गुच्छा खनखनाते हुए डांटकर कहता कि अरे बाबा जब तक फ्लैट का मालिक विदेश से नहीं लौटेगा और बैंक का कर्ज़ पूरा नहीं चुकाएगा तब तक यह दरवाज़ा नहीं खुलेगा। बैंक का कर्ज़ चुकाना आज के युग का सबसे बड़ा पुण्य है भले ही उसके लिए बाप की हड्डियां गिरवी रखनी पड़ें। रामगोपाल जी बिना किसी शिकायत के वापस अपनी जगह पर जाकर खड़े हो जाते और उस पीतल की घंटी को अपने कांपते अंगूठे से ट्रिन ट्रिन बजाने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे जिसकी आवाज़ उस बंद फ्लैट के भारी लकड़ी के दरवाज़े से टकराकर वहीं दम तोड़ देती थी। जिस समाज में पैसे की खनक ही एकमात्र भाषा हो वहां पीतल की घंटी की आवाज़ वैसे ही बेअसर है जैसे किसी ईमानदार आदमी की गवाही। सुरक्षा गार्ड आपस में खुसर पुसर करते कि शायद बाबा का कोई पुराना उधारी का पैसा इस फ्लैट में अटका है क्योंकि स्वार्थ के चश्मे से देखने वालों को हर रिश्ता केवल लेन देन का हिसाब किताब ही नज़र आता है।
एक दिन अचानक जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और समाज कल्याण विभाग की टीम वरिष्ठ नागरिक सुरक्षा अभियान के तहत उसी बहुमंजिला इमारत का जायज़ा लेने पहुँच गई। प्रशासन की सक्रियता अक्सर तभी दिखती है जब या तो चुनाव पास हों या फिर किसी बड़े उद्घाटन का फीता काटना हो। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरी सोसायटी में खलबली मच गई और आनन फानन में स्वागत के लिए रेड कारपेट बिछाया जाने लगा। यह रेड कारपेट असल में उन तमाम गंदगियों को ढंकने का एक सरकारी तरीका है जिन्हें समाज देखना नहीं चाहता। निरीक्षण पूरा करके जब साहब लिफ्ट से नीचे उतरने लगे तो उनकी नज़र फ्लैट नंबर चार सौ चार के सामने दीवार से टिके खड़े रामगोपाल जी पर पड़ी जिनकी हथेली में वही जंग लगी पीतल की घंटी दबी थी। अपनी संवेदनशील छवि का प्रदर्शन करने के लिए साहब तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर रामगोपाल जी के पास पहुँचे क्योंकि कैमरा सामने न हो तो दया का भाव जागना सरकारी नियमों के खिलाफ माना जाता है। साहब बड़े आदर से बोले कि बाबा आप इस उम्र में यह पुरानी घंटी हाथ में लिए इस बंद फ्लैट के बाहर क्यों खड़े हैं क्या आपको परिवार से कोई सहायता नहीं मिल रही है। साहब का यह सवाल वैसा ही था जैसे कोई कसाई मुर्गे से उसकी सेहत का हाल पूछे। रामगोपाल जी ने अपनी सूजी हुई आँखों से साहब को देखा और अपने कांपते हाथों से वह पीतल की घंटी साहब की हथेली पर रखते हुए बोले कि साहब जी अगर वाकई इंसाफ़ करना चाहते हैं तो ज़रा इस घंटी के नीचे खुदा हुआ नाम और इस बंद फ्लैट का पट्टा देख लीजिए।
साहब ने जब उस पीतल की घंटी को उलटकर देखा तो उस पर रामगोपाल जी के बेटे का नाम और वह तारीख खुदी थी जब उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा पूंजी लगाकर अपने बेटे को विदेश में पढ़ाने के लिए यह फ्लैट खरीदकर दिया था। आज की पीढ़ी के लिए माता पिता बैंक की उस फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह हैं जिसका मैच्योरिटी पीरियड खत्म होते ही उन्हें विड्रॉ करके वृद्धाश्रम में जमा कर दिया जाता है। रामगोपाल जी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस जंग लगे पीतल पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि साहब तीस साल पहले जब मेरा बेटा पहली बार स्कूल जाता था तो इसी घंटी वाली साइकिल से मैं उसे रोज़ छोड़ने जाता था। उसने बड़ा अफ़सर बनकर मुझे इस फ्लैट में रखा लेकिन चार साल पहले जब उसे विदेश की बड़ी कंपनी में नौकरी मिली तो वह इस फ्लैट पर बाहर से ताला लगाकर चला गया और कह गया कि जब घंटी बजेगी तब दरवाज़ा खुलेगा। विदेश जाना आज के दौर का ऐसा मोक्ष है जहां जाने के बाद इंसान को अपने पितरों के जीवित होने का भी अहसास नहीं रहता। वह चार साल से कभी नहीं लौटा और मैं रोज़ वृद्धाश्रम से पाँच किलोमीटर पैदल चलकर यहाँ सिर्फ यह घंटी बजाने आता हूँ ताकि शायद बंद कमरे के भीतर कैद उसके बचपन का कोई संस्कार जाग जाए। लेकिन संस्कार आजकल सॉफ्टवेयर की तरह होते हैं जिन्हें अपग्रेड करते समय पुरानी फाइलें डिलीट कर दी जाती हैं। यह सुनते ही साहब का सिर शर्म से पूरी तरह झुक गया और पूरे गलियारे में ऐसा सन्नाटा छा गया जिसने वहाँ खड़े हर इंसान के ज़मीर को झकझोर कर रख दिया। ज़मीर का झकझोरना भी अक्सर अस्थायी होता है क्योंकि थोड़ी देर बाद सबको उसी भ्रष्ट व्यवस्था की चाय पीकर फिर से ड्यूटी पर लौटना था जहां रिश्तों की नीलामी आम बात है।
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