दिन विशेष युवा लेखन में अक्षय आनंद झा की कविताएँ

परास्नातक (हिंदी), विश्व-भारती, शांतिनिकेतन
पता — शेखपुरा, बिहार
मोबाइल — 8579993222
ईमेल — anandakshay1810@gmail.com
1. अदालत की धूप छांव
(एक दृश्य-कथा)
पचास सीढ़ियाँ चढ़कर आए लोग,
अपनी छायाओं को समेटते हुए,
जैसे उनके पाँवों में बँधी हो दशकों की धूल—
कोई कागज़ों की मकड़जाल में उलझा,
कोई सूरज की रोशनी से भरी फाइल लिए,
अँधेरे को चीरती हुई एक उम्मीद।
खिड़की से झाँकती धूप की किरणें
दीवार पर टँगे पीले फैसलों को पढ़ती रहतीं,
मानो समय ने स्वयं लिख दी हो न्याय की परिभाषा।
वकीलों की बहसें तलवार-सी चमकती हैं,
जज की नज़रों में जमी है कानून की बर्फ़,
और मुवक्किल—
एक जड़ पत्थर, जिस पर खुदेगा भाग्य:
“गुनहगार” या “निर्दोष”।
फैसले की हर लकीर उसकी नसों में उतरती है,
जैसे लोहार की हथौड़ी लाल लोहे पर।
एक आदमी घड़ी की टिक-टिक गिनता है,
उसकी साँसें अटकी हैं सेकंडों के फंदे में।
दूसरा चाय की चुस्कियों में घोलता है इंतज़ार का ज़हर,
जबकि तीसरा गिन रहा है सीढ़ियों के जीर्ण पत्तर—
शायद उनकी संख्या में छिपा है न्याय का गणित।
तभी गलियारे से टकराती हैं हथकड़ियों की ठनठन:
एक कैदी के कदमों की आवाज़,
खालीपन की सुरंगों में गूँजती हुई,
तोड़ देती है प्रार्थनाओं का मौन।
मेज़ पर पड़ी थपकी से काँपता है हवा का बोझ।
कागज़ का टुकड़ा बन जाता है भाग्य:
एक हथेली पर खिलता है गुलाब,
दूसरी पर स्याही का धब्बा रिसता है ज़मीन में।
फुसफुसाती हैं दीवारें:
“क्या यह न्याय है,
या कानून का चाकू जो काटता है बेचारगी को?”
यह देखकर याद आता है ‘त्यागपत्र’ का न्यायाधीश प्रमोद—
जिसने तराजू को संभाला तो था ईमानदार हाथों से,
पर हर फैसले के साथ झुकती गई उसकी रीढ़।
समाज की कठोरता, कानून की धीमी चाल,
और अपने ही लिखे वाक्यों का बोझ
उसे चबा गया था धीरे-धीरे।
जब त्यागपत्र दिया, तो छोड़ गया एक प्रश्न—
“क्या न्याय की देवी को भी त्याग सकते हैं हम?
या वह हमें यूँ ही पकड़े रखेगी अपने अंधेपन में?”
न्याय की देवी आँखों पर पट्टी बाँधे खड़ी है।
कहते हैं, वह अंधी है—
शायद बहरी भी।
उसके हाथ में तराजू है,
जो संतुलन खोजता है हर पल,
जैसे तिनके पर लटका हो कोई पहाड़।
पर प्रश्न यह है कि
जब सब चंगा है कागज़ों में,
तो मैं क्यों नहीं देख पाता हूँ
उन काले अक्षरों को साफ़ और सही?
शायद इसलिए ही कि
मैं भी इन प्रतीक्षित लोगों में शामिल हूँ—
लाल और स्याह!
और शायद इसलिए भी कि
न्यायालय की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते हुए,
हम सब छोड़ जाते हैं अपनी परछाइयाँ
उन पचास सीढ़ियों पर—
न्याय की धूप में धीरे-धीरे मिटने के लिए।
2. अब सिर्फ़ तांडव
तू फिर वही पुराना पाठ पढ़ना,
कि दहलीज लांघी तो साया भी मैला होगा,
कि रात की गोद में सिर्फ खौफ पलता है।
पर उनसे मत पूछना कुछ भी—
जिनकी आँखों में भूखी नीयतें तैरती हैं,
जिन्हें अँधेरा नहीं, ढका हुआ सच चुभता है।
मैं वही समाज हूँ,
जो पत्थर की मूरत पर दूध बहाता है,
और जीती-जागती साँसों पर
‘चरित्र’ का पहरा लगाता है।
जब-जब तेरी देह पर खरोंचें आएँगी,
मैं तराज़ू लेकर बैठूँगा—
तेरे कपड़ों की लंबाई नापने,
तेरे बाहर निकलने का समय गिनने।
अपराधी? वह तो बस एक ‘भटकाव’ था,
पर तू… तू तो एक सवाल थी!
अब किताबों के पन्ने पलटना बंद कर।
सीता की अग्निपरीक्षा का चुपचाप पाठ मत कर,
द्रौपदी का चीर-हरण सहकर न्याय की भीख मत माँग।
तुझे अगर पूजना ही है,
तो अपनी रीढ़ की हड्डी को पूज।
शास्त्र बहुत पढ़ लिए,
अब अपनी चीख को शमशीर बना।
लक्ष्मी और सरस्वती के आवरण उतार,
क्योंकि जहाँ दया को कमज़ोरी समझा जाए,
वहाँ सिर्फ़ तांडव का ही आदर होता है।
सुरक्षा कोई भीख नहीं जो मैं तुझे दूँगा,
यह मेरा वह ऋण है—
जो चुकाए बिना, मैं इंसान होने का हक़ खो देता हूँ।
