दिन विशेष कविता में डॉ. निधि अग्रवाल की कविताएँ

१. स्थायी पता
कोलाहल भरी दुनिया में
कैसे सुन ली मैंने एक धड़कन
आश्चर्यों से भरे संसार में
तुम्हारी सहजता पर ही
जा कर रुकी मेरी नजर
अनेक भाषाओं के लोकगीत
सहम कर मौन हुए
जब तुम्हारे पदचापों की
बे-ताल पर
नाच उठा मेरा मन
तुम समझते थे कि
सत्य और समर्पण
दोनों से ही अकिंचन
तुम्हारा हृदय
मिथ्या प्रेम के आवरण से
रोके रहा है मुझे
किंतु तुम्हें कब ज्ञात था
घरों की सम्पन्नता
अनुरागजन्य होती है
मैं स्वयं भी नहीं जानती
किस जन्म तुम्हारे
मन वृक्ष के कोटर में,
मैंने बनाया था अपना नीड
सुधियों की पगडंडिया तलाशती
हर जन्म….
मैं तुम तक पहूँचती हूँ
अवचेतन की स्मृतियों में
गहरे लिखे हैं हम सब के
स्थायी आवासों के पते
२. शोक-पुष्प
दुख कभी सुख का विलोम नहीं होता
हर दुख में घुली रहती है
सुख की एक अनचीन्ही कनी,
हम दुख से उतने विचलित नहीं होते
जितना पूर्व में मिले सुख की स्मृतियों से
सुखद स्मृतियों के कोंपल ही
दुर्दिनों में प्रस्फुटित हो
शोक पुष्प बन जाते हैं
मैं नहीं चढ़ाती हूँ उन्हें
किसी देव के चरणों में
कि शोक पुष्प की चुभन से
छिल जाएँगे देवों के तलवे,
मैं उन्हें नहीं दबाती
किसी फूलों की क्यारी में
कि इनकी वेदना हर लेगी
अल्हड कलियों का रंग-रूप,
न ही सँजोती हूं मैं इन्हें
किसी डायरी की पीली छाती पर
कि इनके गीलेपन से गल जाएँगे सब पृष्ठ,
मैं इन्हें अपने जूड़े में खोंस लेती हूँ
आस की एक तितली इन पर आ बैठती है
इस तितली से रंग उधार ले
मुस्कुरा उठते हैं मेरे अधर
तब निर्झर झरती है शिउली
शिउली का सुवासित हार
नित्य पहनाती हूँ मैं अपने प्रिय को
३. पुकार
द्रुत गति से भागती ट्रैन से
बिना पढ़े ही छूटते जाते हैं
जैसे कई स्टेशनों के नाम
यूँ ही कई स्नेहिल लोग
जीवन की गति में
अनजाने ही छूट जाते हैं
ज्यों विपरीत दिशा में
भागते पेड़ यथार्थ में
अचल होते हैं
यूँ ही हमारे विपरीत खड़े लोग
तटस्थ भी हुआ करते हैं
विरोधी उन्हें हमारी गति बना देते हैं
किसी दिन किसी नीरव
अपरिचित स्टेशन पर
उतर जाऊँगी मैं
जहाँ कोई मेरे नाम का
प्लैकार्ड लिए नहीं खड़ा होगा
वहाँ नहीं बताऊँगी
मैं किसी को अपना नाम
प्रतीक्षा करूँगी
किसी अनजान पुकार की
वह पुकार ही मेरा
कमाया हुआ नाम होगी
