दिन विशेष विजयादशमी कविता – “विजयादशमी : रावण बाहर भी है, भीतर भी है!” – प्रीति साहू

आज फिर विजयादशमी आई है,
फिर सत्य ने विजय की अलख जगाई है।
फिर जलेंगे पुतले, फिर जय श्रीराम का उद्घोष होगा,
पर क्या इस बार भीतर का रावण भी खामोश होगा?
रावण के दस सिरों को जलाना सरल है,
अपने भीतर के विकारों को हराना कठिन है।
वह अहंकार है, जो दूसरों को छोटा समझता है,
वह अन्याय है, जो शक्तिशाली होकर भी नहीं थमता है।
राम होना केवल राम का नाम जपना नहीं,
राम होना है—सत्य के पथ से कभी न हटना।
राम होना है—शक्ति पाकर भी विनम्र रहना,
अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर कर्तव्य निभाना।
राम होना है—निर्बल के अधिकार की रक्षा करना,
और अन्याय के सम्मुख निडर होकर डट जाना।
आज झूठ, भ्रष्टाचार और नफ़रत के रावण खड़े हैं,
कहीं स्त्री के सम्मान पर, कहीं इंसानियत पर पहरे पड़े हैं।
केवल पुतले जलाने से समाज नहीं बदल पाएगा,
जब तक विचार नहीं बदलेंगे, नया भारत नहीं बन पाएगा।
याद रखो! देश केवल सीमाओं से महान नहीं होता,
देश अपने नागरिकों के चरित्र से महान होता है।
आओ, इस विजयादशमी पर संकल्प उठाएँ,
अपने भीतर के अहंकार और द्वेष को जलाएँ।
सत्य को अपनाएँ, न्याय का साथ निभाएँ,
नारी का सम्मान करें, मानवता के दीप जलाएँ।
मत पूछो कि कितने रावण जलाए गए,
यह पूछो कि कितने मन बुराइयों से मुक्त हुए।
विजय का उत्सव तभी सार्थक कहलाएगा,
जब हर मनुष्य अपने भीतर के राम को जगाएगा!
