साहित्य, कला एवं संस्कृति के मंच कस्तूरी द्वारा दिनांक 13 दिसंबर 2025 को साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जो दो सत्रों में संपन्न हुआ। इस संगोष्ठी का विषय सुप्रसिद्ध कथाकार डॉ. नीरजा माधव के रचना-संसार पर केंद्रित था। परिचर्चा का विषय “जीवन की दीपरेखा” तथा “अंतर्यात्रा की ध्वनियाँ” पर आयोजित की गई।

नीरजा माधव हिन्दी साहित्य कि आधुनिक पीढ़ी प्रमुख महिला रचनाकार हैं। डॉ. नीरजा माधव की रचनात्मकता के अनेक फलक हैं। उनके लेखन में भारतीय समाज और संस्कृति के बहुविध विषय भारतीय संस्कृति के वैभव, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अवमूल्यन विषय अभिव्यक्त हुए हैं। उन्होंने उपन्यास, कहानी, निबंध, कविता, आलोचना, शोध आदि विधाओं में साहित्य-सृजन कर हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र की अध्यक्षता जेएनयू प्रोफेसर वंदना झा जी ने की। वक्ताओं में प्रो. वेद प्रकाश वत्स जी, प्रो. चैताली सिन्हा जी, प्रो. संघमित्रा आचार्य जी उपस्थित रही। साथ ही कथाकार नीरजा माधव जी का सानिध्य प्राप्त हुआ कार्यक्रम का संचालन साहित्य एवं कला अध्येता विशाल पाण्डेय जी द्वारा किया गया।

चैताली जी ने रचनाकार के लेखन की सादगी पर विशेष रूप से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रचनाकार की तटस्थ दृष्टि उनके साहित्य को न केवल संतुलित बनाती है, बल्कि पाठकों के लिए प्रेरणास्रोत भी सिद्ध होती है।

वेद प्रकाश जी ने रचनाकार के संदर्भ में कहा कि उनकी रचनाओं में किशोरावस्था से लेकर साठोत्तरी तक के जीवनानुभवों का व्यापक और सजीव विस्तार दिखाई देता है। उन्होंने परंपरा को अपनी कलम का सुदृढ़ आधार बनाया है।

डॉ. संघमित्रा आचार्य जी ने रचनाकार के संदर्भ में कहा कि उन्होंने अत्यंत मार्मिकता और संवेदनशीलता के साथ समाज के बहिष्कृत एवं तिरस्कृत वर्गों के जीवन को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाया है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में वंदना जी ने रचनाकार की सराहना करते हुए कहा कि उन्हें सरस्वती का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है। उन्होंने अपनी आयु के समान ही विपुल संख्या में रचनाएँ साहित्य जगत को समर्पित की हैं। उनकी रचनाओं में भारत-भाव, प्रकृति की समृद्ध संपदा, गहरी संवेदना और सशक्त शब्द-निर्माण का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. चंदन चौबे जी ने की। वक्ताओं में प्रो. अर्चना त्रिपाठी जी, चैताली सिन्हा जी उपस्थित रही। साथ ही कथाकार नीरजा माधव जी का सानिध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन साहित्य अध्येता आदित्य नाथ तिवारी जी द्वारा किया गया।

अर्चना जी ने रचनाकार के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए स्त्री लेखन तथा उनके ललित निबंधों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला।अर्चना जी के अनुसार, लेखक की सक्रिय और सजग उपस्थिति समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

चैताली जी ने रचनाकार की तथ्यात्मक जानकारी की सराहना करते हुए कहा कि वे अपने लेखन में धर्म और राजनीति जैसे जटिल विषयों को संतुलन के साथ समाहित करते हुए आगे बढ़ते हैं। यही विशेषता उनके लेखन को विचारोत्तेजक और सार्थक बनाती है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में चंदन जी ने कहा कि साहित्य की आयु सत्ता से कहीं अधिक होती है, इसलिए बड़े रचनाकार को अपने समाज की सीमाओं से बाहर जाकर व्यापक दृष्टि विकसित करनी चाहिए, जिसे रचनाकार ने सफलतापूर्वक किया है। उन्होंने यह भी कहा कि स्मृति इतिहास का अनिवार्य अंग है और इतिहास के अभाव में वही उसके निर्माण का आधार बनती है।

संगोष्ठी का समापन साहित्यिक संवाद और रचनात्मक विमर्श की सार्थक उपलब्धि के साथ हुआ। जिसमें प्रसिद्ध कथाकार, संपादक,आलोचक और शोधार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे ।

यह एक दिवसीय संगोष्ठी साहित्यिक चेतना को समृद्ध करने तथा डॉ. नीरजा माधव के रचना-संसार को गहराई से समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास सिद्ध हुई।

रिपोर्ट : सृष्टि असवाल

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