अनुवाद नया परिप्रेक्ष्य – विशेष संदर्भ -अनुवाद और प्रौद्योगिकी(रिपोर्ट)

इस कार्यक्रम में अध्यक्षता के लिए प्रो. पूरन चंद टंडन, अध्यक्ष भारतीय अनुवाद परिषद को आमंत्रित किया गया था लेकिन अपरिहार्य कारणों से उनका आना संभव नहीं हो पाया। इस कार्यक्रम में दीर्घ अनुभव के धनी श्री विजय कुमार मल्होत्रा, पूर्व निदेशक, राजभाषा, गृह मंत्रालय भी उपस्थित थे, उन्होंने अनुवाद व्याकरण पर विशेष टिप्पणी देते हुए विशेषत: व्यतिरेकी विश्लेषण पर एक ज्ञानवर्धक वक्तव्य देते हुए कहा – दो भाषाओं की समानताओं एवं असमानताओं का तुलनात्मक अध्ययन ही व्यतिरेकी विश्लेषण कहलाता है। प्रथम उदारण देते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजी SVO आधारित भाषा है अर्थात कर्ता, क्रिया और फ़िर कर्म आता है जबकी हिन्दी में, एवं अधिकांश एशियाई भाषाओं में कर्ता, कर्म और फ़िर क्रिया आती है। अंग्रेजी एक प्रस्थापना संबंधी भाषा है और इसका प्रारूप स्थिर होता है, जबकि ज़्यादातर एशियाई और भारतीय भाषाएँ कार्यात्मक होती हैं और स्थिर नहीं होतीं। इसी वजह से अंग्रेजी में वो लचीलापन नहीं दिखता जो भारतीय भाषाओं में होता है। उन्होंने ’से’ के माध्यम से अपने आप को स्पष्ट किया। हिंदी एवं भारतीय भाषाओं में ’से’ का प्रयोग अपादान एवं करण से भी अलग होता है जबकि अंग्रेजी में उसका प्रयोग हमेशा होता भी नहीं है। सम्राट अशोक एवं उनके शिलालेखों की भाषा ब्राह्मी ही, हमारी अधिकांश भाषाओं की लिपि का आधार रही है। यहाँ भी उदाहरणों के माध्यम से यह सिद्ध किया गया कि किस प्रकार लिपि एवं वर्णमाला के दृष्टिकोण से भी भारतीय भाषाओं एवं अंग्रेजी की वर्णमाला के क्रम में कोई अंत:संबंध नहीं है। उदाहरण के लिए “गिलास तोड दिया या गिलास टूट गया” में ’टूटने और तोड़ने’ के लिए अंग्रेजी में सिर्फ़ एक ही प्रयोग है Broken। उसी प्रकार उड़ना / उड़ाना का प्रयोग है । यह प्रेरणात्मक प्रवृत्ति सिर्फ़ भारतीय भाषाओं में दिखती है। उसी प्रकार रंजक क्रिया में भी दोनों में अंतर है।
इस विषय को बहुत ही हास्यास्पद रूप में प्रकट करते हुए उन्होंने उदाहरण दिया – “बैठ जाओ” “सो गया” – इन पदों के दो शब्दों में विरोधाभास लगता है जो प्राय: विश्व के अन्य भाषा-भाषियों को विचित्र लगता है। अपने वक्तव्य के माध्यम से हिंदी एवं भारतीय भाषाओं के वैज्ञानिक स्वरूप को प्रकाशित किया।
मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. मंजू मुकुल काम्बले, निदेशक हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने वक्तव्य का प्रारंभ करते हुए ही स्पष्ट किया कि किस प्रकार विकसित भारत 2047 के सपने में भाषा, अनुवाद और तकनीक की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करता है। उन्होंने यह तर्क दिया कि विकसित राष्ट्र बनने से पहले विकसित समाज बनना आवश्यक है, और यह ज्ञान, अनुभव व नवाचार के साझापन से संभव है—जिसका आधार भाषा है। भारत की बहुभाषिक समृद्धि को तकनीक, विशेषकर एआई-आधारित अनुवाद उपकरणों ने नई शक्ति दी है, जिससे भाषिक बाधाएँ टूट रही हैं। अनुवाद अब केवल सूचना नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, सशक्तिकरण और समावेशी विकास का माध्यम बन रहा है। शिक्षा, सोच और शिक्षण-प्रणालियाँ तकनीक के साथ बदलेंगी और भारत की भाषाएँ इस परिवर्तन का आधार बनेंगी।
मुख्य वक्ता के रूप में ही डा. बुद्धा चंद्रशेखर, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अनुवादिनी एआई, शिक्षा मंत्रालय और मुख्य समन्वय अधिकारी, एआईसीटीई, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार को आमंत्रित किया गया। उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण अंशों की ओर श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया। प्रथमतः यह कि पिछले वर्ष विश्व में प्रकाशित हुई 180 मिलियन पुस्तकों में 95% अंग्रेजी में थीं। डिजिटल दुनिया में भी अंग्रेजी का ही वर्चस्व है, जबकि 80-85% उपभोक्ता भारतीय भाषाओं में सब कुछ देखते-समझते हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस दिन भारत ने अपनी भाषाओं के साथ समझौता करते हुए अंग्रेजी को स्वीकार किया उस दिन से वो विकसित से विकासशील देश बन गया । हमारी ज्ञान परंपरा ताड़पत्रियों में सीमित रह गई और विश्व ने हमें विश्वास दिला दिया कि हम असभ्य और अज्ञानी हैं। इसने हमारे विकास की गति को अवरुद्ध कर दिया। इस बात के लिए विश्व के अनेक राष्ट्र गवाह हैं कि जो भी देश अपनी मातृभाषा के माध्यम से सर्वाधिक कार्य करता है, शिक्षा प्रदान करता है वे सब आज विकसित देश हैं। चीन, जर्मनी, रूस, अमरीका कुछ ऐसे ही देश हैं। डिजिटल की दुनिया में भी सब कुछ लातिनी लिपि पर आधारित होने के कारण उनमें अनेक चुनौतियाँ एवं सीमाएँ हैं। अंग्रेजी, शब्द पर आधारित भाषा है तो भारतीय भाषाएँ वाक्य-आधारित हैं। मौजूदा एआई व अनुवाद टूल शब्द-आधारित और अंग्रेज़ी-केंद्रित हैं, जो भारतीय भाषाओं की वाक्य-आधारित संरचना को सही तरह नहीं समझते। उससे भी बढ़ कर चिंता का विषय यह भी है कि अधिकांश साफ़्टवेयर अमरीका से आते हैं जिसके कारण हम जब भी उनका उपयोग करते हैं अमरीकियों को पता चल जाता है कि हम क्या कर रहे हैं। सुरक्षा की दृष्टि से भी यह चिंताजनक हो जाता है। विश्व में उपलब्ध ज्ञान/जानकारी में दूसरी भाषा है फ़्रेंच और तीसरी है मंदारिन। हिंदी विश्व में बोली जाने वाली चौथी भाषा है लेकिन इसके बावजूद भारत में 85% प्रकाशन अंग्रेजी में होता है। इससे प्रतिभाशाली लोग भी पीछे रह जाते हैं। साथ में अन्य भाषाओं की तुलना में संस्कृत की शक्ति को भी स्पष्ट करते हुए सिद्ध किया कि किस प्रकार लार्ज लर्निंग माडल के लिए संस्कृत कितना प्रभावशाली है।
श्री. चंद्रशेखर जी ने फ़िर अनुवादिनी और भाषिनी की अनिवार्यता, उपलब्धि एवं प्रभाव-क्षमता को प्रकाशित करते हुए अनेक उदाहरण दिए और यह भी प्रदर्शित किया कि किस प्रकार ये उपक्रम, गूगल आदि अन्य सभी उपक्रमों से कहीं अधिक शक्तिशाली एवं बेहतर हैं। अनुवादिनी इस कमी को दूर करते हुए 87 विदेशी भाषाओं से 22 भारतीय भाषाओं में सटीक अनुवाद, डिजिटाइजेशन, ऑडियो-आधारित कंटेंट और सरल पुस्तक-निर्माण प्लेटफॉर्म प्रदान करता है। लेकिन हमारे सामने अनेक चुनौतियाँ भी हैं। इस बृहद भारतीय ज्ञान परंपरा को किस प्रकार से डिजिटल अनुवाद के माध्यम से उपलब्ध करवाया जा सकता है? जमीनी स्तर पर कौनसी चुनौतियाँ हैं? लिखित सामग्री को किस प्रकार से श्रव्य सामग्री में परिवर्तित किया जा सकता है? इससे भी बढ़कर भारतीयों को अपनी मातॄभाषा के प्रति प्रेम, श्रद्धा एवं आत्मविश्वास कैसे बढ़ाया जा सकता है? अपने इस वक्तव्य के माध्यम से उन्होंने भी स्पष्ट किया कि किस प्रकार भारत में भाषा-अवरोध को विकास की सबसे बड़ी बाधा बन सकता है। लक्ष्य है ज्ञान को मातृभाषा में सुलभ बनाकर कौशल, रोजगार और व्यापार बढ़ाना।
अंतत: संयोजक श्री मोहन बहुगुणा, भाषाविद एवं अनुवादक ने इस विषय पर अपने विचारों के माध्यम से कहा कि अनुवाद की परंपरा हमारे वांग्मय में बहुत प्राचीन है। एवं इसमें वाणी और अर्थ का संगम एक विशेष स्थान रखता है इसलिए कोई भी शब्द निरर्थक नहीं हो सकता। ’हाँ” या ’ना’ कहना भी अपने आप में पूर्ण वाक्य भी होते हैं और अर्थ होता है। पाणिनी, तुलसीदास सभी ने सिद्ध किया है कि किस प्रकार वर्ण और अर्थ का विशेष अंत:संबंध है। अन्य सभी श्रमसाध्य कार्यों के समान अनुवाद को भी आसान करने की इच्छा से मशीन से काम लिया जाने लगा। 1997-98 में राजभाषा विभाग एवं सीडैक के सहयोग से “मंत्रा” नामक साफ़्टवेयर बना। उस प्रक्रिया का वैग्यानिक प्रक्रिया को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया। फ़िर उन्होंने अनुवाद के आधारों को प्रकाशित किया कि वो सर्च के आधार पर, डाटा के आधार पर होते थे जिसके कारण अनेक त्रुटियां होना स्वाभाविक था। परंतु न्यूरल आधारित अनुवाद थोडा और सटीक होने लगा। उदाहरण के लिए “आइए, आ जाइए, आ जाइए ना” में समानता भी है और अंतर भी है जिनके प्रयोग से आदर एवं व्यक्तिगत भाव व्यक्त होता है। अब कृत्रिम बौद्धिकता के आधर पर बने साफ़्टवेयर जैसे चैट जीपीटी में 100 ट्रिलियन आधार हैं जिससे वो बहुत ही प्रभावशाली हो गया है। लार्ज लैंग्वेज माडल इस द्रुष्टिकोण से बहुत ही सहायक होते हैं। उदाहरण के लिए अनुवादिनी साफ़्टवेयर के कारण आई आई टी जोधपुर से पिछले वर्ष छात्रों का दीक्षांत समारोह में यह पता चला कि किस प्रकार हिन्दी में उपलब्ध पाठ्यक्रम के कारण जिन बच्चों ने हिन्दी माध्यम से पढाई की थी उनके लिए यह बहुत ही सरल हो गया। इसी प्रकार वैद्यकीय ग्यान भी हिन्दी में, अन्य भारतीय भाषाओं में , उपलब्ध करवाया जा रहा है। ये सभी स्मृति पर आधारित उपक्रम हैं। लेकिन फ़िर भी एक अनुवादक के लिए उस सामग्री का पुन: परिशीलन करना अनिवार्य होता है। मशीन से गल्तियां होना संभव है। उदा. के लिए अंग्रेजी का शब्द है मूवमेंट जिसके संदर्भ के अनुसार अर्थ बदल जाते हैं। अर्थात हम यह समझ लें कि हम मशीन के स्वामी हों मशीन को अपना स्वामी न बनाएं।
अंतत: दर्शिनी प्रिया जी ने भाषिनी पर एक परिचयात्मक, संक्षिप्त प्रस्तुति दी एवं काशी तमिल संगम के सम्मेलन में इसके प्रयोग के माध्यम से मान्य प्रधान मंत्री जी ने जब भाषण हिन्दी में दिया तो वह लगातार तमिल में भी सुनाई दे रहा था। इसकी एक अन्य विशेषता यह भी है कि चाहे हम बोलें, सुनें या लिखें इस उपक्रम के माध्यम से अनुवाद शीघ्र एवं सरल हो जाता है। इसके अंतर्गत भारत की 22 भाषाओं को संलग्न किया गया है। अंतत: उन्होंने सभी श्रोताओं से अनुरोध किया कि भाशिनी एप को डाउनलोड करके उसका प्रयोग करें।
इस कार्यक्रम का संचालन– डॉ विवेक कुमार शर्मा ने किया, सह संयोजन था डॉ. शिवम शर्मा का और प्रबंधन का दायित्व आरुषि ठाकुर ने देखा। यह एक ज्ञानवर्धक और महत्वपूर्ण सत्र था।
सत्र – अनुवाद नया परिप्रेक्ष्य – विशेष संदर्भ -अनुवाद और प्रौद्योगिकी
स्थान –उमंग सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
सत्र दिनांक –10 जनवरी, 2026
समय – 11:30 से 1:00 तक
