विदेश में हिंदी शिक्षण – प्रविधि और दिशाएँ(रिपोर्ट)

विदेश में हिंदी शिक्षण: प्रविधि और दिशाएँ विषय पर एक सारगर्भित एवं ज्ञानवर्धक अकादमिक सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र का उद्देश्य वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी शिक्षण की वर्तमान स्थिति, उसकी प्रविधियों, चुनौतियों तथा संभावनाओं पर विमर्श करना था।
इस सत्र की अध्यक्षता की प्रो. हिरोयुकि सातो (पूर्व हिंदी अध्यापक, टोक्यो विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, जापान) ने। उन्होंने अध्यक्षीय वक्तव्य कहा कि हिंदी शिक्षण के उद्देश्य और प्रेरणा को और बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने जापान में हिंदी शिक्षण के अनुभव साझा करते हुए संस्थागत स्तर पर हिंदी के विकास और अध्यापन की प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. वेद प्रकाश सिंह (एसोसिएट प्रोफेसर, ओसाका विश्वविद्यालय, जापान) के कुशल संचालन में हुआ। उन्होंने मंचासीन अतिथियों का स्वागत करते हुए सत्र की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर पद्मश्री तोमिओ मीजोकामी का स्वागत सुश्री शिवांगी सिंह द्वारा किया गया। तत्पश्चात पद्मश्री तोमिओ मीजोकामी ने पीपीटी प्रस्तुति के माध्यम से हिंदी भाषा की सर्वप्रमुख विशेषता विषय पर अपनी प्रस्तुति दी। हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला, सिंधी और जापानी भाषाओं की संरचनात्मक विशेषताओं, भाषाई समानताओं एवं भिन्नताओं पर विस्तार से चर्चा की। उनका वक्तव्य भाषावैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी एवं रोचक रहा।
सत्र को आगे बढ़ाते हुए डॉ. उनीता सच्चिदानंद ने जापान में हिंदी शिक्षण के इतिहास विषय पर वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने जापान में हिंदी के प्रति बढ़ते आकर्षण, संस्थागत प्रयासों और भाषाई-सांस्कृतिक चुनौतियों का विश्लेषण किया।
यूरोप में हिंदी शिक्षण एवं उसके सांस्कृतिक संदर्भों पर डॉ. विवेक शुक्ल (एसोसिएट प्रोफेसर, आरहुस विश्वविद्यालय, डेनमार्क) ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने यूरोपीय देशों में हिंदी के अकादमिक स्वरूप और उसमें विद्यार्थियों की कम होती संख्या पर अपनी चिंता जाहिर की। हिंदी शिक्षण की अपनी प्रविधियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात की भी चर्चा की कि कैसे अंतर-सांस्कृतिक संवाद को बढ़ाया जाए।
इसके बाद सृजन कुमार (असिस्टेंट प्रोफेसर, बुसान विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, दक्षिण कोरिया) ने कोरिया में हिंदी शिक्षण के व्यावहारिक एवं रोजगारपरक आयाम विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि कैसे कोरिया की सरकार ने सॉफ्ट पावर के रूप में कोरियाई संस्कृति और कोरियाई भाषा की लोकप्रियता को बढ़ाया है वैसे ही हमें भी हिंदी के लिए करना होगा। विदेश में हिंदी शिक्षण को व्यवस्थित करने और इस पर भारत में पाठ्यक्रम बनाने पर भी बल देने की जरूरत है। तभी हिंदी को करियर-उन्मुख भाषा के रूप में विकसित किया जा सकता है।
अंतिम वक्ता के रूप में सुश्री शिखा रस्तोगी (हिंदी अध्यापिका, थाई भारत कल्चरल लॉज, थाईलैंड) ने प्रवासी समुदाय एवं सांस्कृतिक संस्थानों में हिंदी शिक्षण विषय पर वक्तव्य दिया। उन्होंने थाईलैंड में हिंदी के स्वरूप और हिंदी शिक्षण में अपनाई जाने वाली चार प्रविधियों की चर्चा की।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. वेद प्रकाश सिंह द्वारा धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। उन्होंने सभी वक्ताओं, अतिथियों, प्रतिभागियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए सत्र की सफलता के लिए सभी के सहयोग की सराहना की। इसके साथ ही इस सत्र का समापन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
सत्र – विदेश में हिंदी शिक्षण – प्रविधि और दिशाएँ
स्थान – उमंग सभागार – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली
सत्र दिनांक -11 जनवरी 2026
समय 09:30 से 11:00 बजे तक
