हिंदी शुद्ध क्यों नहीं चाहिए

मेरे पिता का बचपन पुणे में बीता इसलिए मेरा भी पुणे से लगाव रहा। यह बात अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के निदेशक जवाहर कर्नावट ने कही। शुक्रवार को पुणे में उन्होंने श्रोताओं से तीखा सवाल पूछा कि हमें हवा शुद्ध चाहिए, भोजन शुद्ध चाहिए, पानी शुद्ध चाहिए तो हिंदी शुद्ध क्यों नहीं चाहिए। हम हिंदी को देवनागरी के बजाए रोमन में क्यों लिखते हैं?
मॉर्डन कला, विज्ञान और वाणिज्य महाविद्यालय (स्वायत्त) तथा महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के तत्वावधान में वैश्विक हिंदी परिवार (पुणे) के महाविद्यालय के शिवाजी नगर स्थित आयोजन में बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे। हिंदी भाषा- लोकल से ग्लोबल विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में उन्होंने स्थानीयता पर ज़ोर देते हुए कहा कि लोकलाइजेशन को भूलाकर ग्लोबलाइजेशन नहीं हो सकता। कर्नावट ने 70 देशों की यात्रा को अपने व्याख्यान में समेटा। उन्होंने कहा कि केवल हिंदी ही नहीं, मराठी-गुजराती आदि कई भाषाएँ विदेशों में विस्तार पा रही है। वैश्विक हिंदी परिवार की प्रांत संयोजक स्वरांगी साने ने बताया कि वैश्विक परिवार की ओर से पूरे देश में मातृभाषा दिवस के आयोजन हो रहे हैं। उसी कड़ी में पुणे में व्याख्यान व युवा रचना पाठ का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर युवा रचनाकारों ने कुमाऊंनी, कश्मीरी ,तमिल, मराठी, हिंदी आदि भारतीय भाषाओं में कविता पाठ किया। युवा कवियों में मुकेश रावत, साक्षी कांबले, योगेश काले, विद्या सराफ, कश्मीरी छात्र शाहिद, मो. उस्मान, श्रीलंका की विद्यार्थी सुदर्शना को विशेष रूप से सराहा गया।
कार्यक्रम की प्रस्तावाना करते हुए समिति के कार्याध्यक्ष डॉ. सुनील देवधर ने कहा कि इजराइल में 40 भाषाओं का संमिश्रण था लेकिन जब वहाँ हिब्रू को अनिवार्य कर दिया गया तो मृतप्रायः होने की कगार पर खड़ी भाषा पुनर्जीवित हो गई। हमें भी खुद से पूछना चाहिए कि कश्मीर,केरल, से परिचित मगर, कितने लोगों को पता है भारत वर्ष। महाविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रेरणा उबाले ने विभाग की ओर से किए जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी देने के साथ संचालन भी किया। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. दामोदर खडसे ने की। उन्होंने राजभाषा के उत्थान में विभिन्न महानुभवों के योगदान पर प्रकाश डाला। सान्निध्य प्रवासी रचनाकार डॉ. नीलम जैन का था। उन्होंने हिंदी के स्वाभिमान को भारत के स्वाभिमान से जोड़कर कहा कि हिंदी भाषा से रोशनी आती है। इस अवसर पर कथाकार डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव, डॉ. रमेश मिलन, सुमित पॉल, सुप्रिया शेरे, ममता जैन, लतिका जाधव, मंजू चोपड़ा, अनूप अकेला, हितेश व्यास, अनिता जठार, सूरज बिरादर आदि गणमान्यों के साथ बड़ी स्ंख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे। सरस्वती के चित्र को माल्यार्पण के साथ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ। महाविद्यालय की विशेष परंपरा में युवा रचनाकारों ने पौधे को पानी देकर जल, जमीन, प्रकृति के महत्व को रेखांकित कर अपने पाठ का आगाज़ किया।
रिपोर्ट – स्वरांगी साने

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