पत्र-साहित्य का अकाल सांस्कृतिक क्षरण है।

राजस्थान की वरिष्ठ साहित्यकार बसंती पँवार को ” संभवम्” सम्मान से नवाजा गया – इस अवसर पर बोलते हुए–पत्र- साहित्य का अकाल सांस्कृतिक क्षरण है– प्रोफेसर बीना शर्मा
कल दिनांक 10 मार्च को आगरा की बहुप्रसंशित ” संभवम् ” संस्था ने राजस्थान की वरिष्ठ साहित्यकार बसंती पँवार जी को सम्मानित किया ।दीप- प्रज्जवलन और सरस्वती वंदना के पश्चात, सर्वप्रथम संस्था का परिचय व सत्कार -अतिथि बसंती पँवार का परिचय संस्थाध्यक्ष डाॅ शुभदा पांडेय ने दिया। इस अवसर पर नगर का शिक्षा, साहित्य और कला- प्रेमी प्रबुद्ध वर्ग उपस्थित रहा।
प्रोफेसर बीना शर्मा ने समारोह की अध्यक्षता की ।उन्होंने अपने संबोधन में पत्र- साहित्य की चर्चा करते हुए– इससे जुड़े अनेक साहित्य, साहित्यकारों की चर्चा करते हुए कहा– ” हमारी पत्र शैली परंपरा साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा थी, जो विलुप्तप्राय है- जिससे भावनात्मक संवादों के अभावों अलावा सांस्कृतिक मूल्य क्षरण भी हुआ है, जो बहुत बड़ी क्षति है। “
विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर ज्योत्सना रघुवंशी ने शिक्षा और कला के नाम पर जेन्जीज में बढ़ती रील बनाने की कुप्रथा पर अपनी बात रखते हुए कहा कि– ” युवकों में अपूर्व संभावनाएँ होती हैं, उनके अंदर कला भी है और ऊर्जा भी, लेकिन उसका सही उपयोग नहीं हो पा रहा है, उनको दिशा निर्देश की आवश्यकता है। रील जैसी प्रथाएँ दुष्प्रभावी हैं , अपनी शैली को व्यक्त करने का यह कोई सार्थक जरिया नहीं है। रील और रीयल का द्वंद्व घातक है। “
विशिष्ट वक्ता के रूप में प्रोफेसर शिव नारायण शर्मा ने बताया कि-” भाषाओं की अभिव्यक्ति सिमटती जा रही है, जिससे लिखने का चलन विलुप्त होते जा रहा है। फारवर्ड करने की सोच केवल मोबाइली संस्करण है, जिससे मौलिकता की निरंतर हानि होती जा रही है। “
प्रोफेसर डाॅ सपना गुप्ता ने सत्कार मूर्ति के बृहद लेखकीय जीवन की सरहना करते हुए कहा कि–” लेखन एक परिष्कृत सोच और मर्यादित मानसिकता का पर्याय होता है, जिसे बसंती पँवार जी ने भरपूर जीने का प्रयास किया है। वे उत्कृष्ट लेखकीय सम्मान की अधिकारिणी हैं। “
बसंती पँवार जी को शाल, श्रीफल, उत्तरीय, अंगवस्त्र, पुष्पगुच्छ आदि देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर साहित्यकार बसंती ने बताया कि आज से सत्तर साल पहले उनके भीतर लेखकीय प्रतिभा को अभिव्यक्ति के संघर्ष में जीना पड़ा और उसने ही लिखने की जिजीविषा को बढ़ावा दिया। ब्रजभूमि में आने की मेरी वर्षों की साध पूरी हुई, मैं अभिभूत हूँ। यहाँ से प्राप्त हुआ स्नेह अधिक ऊर्जावान बना दिया है। आगे सतत लिखने के संकल्प से आबद्ध हुई हूँ।
आगरा लीडर्स संस्था की ओर से पधारे अधिकारीगण सुनील जैन और सुनील बग्गा जी ने संस्था का अंगवस्त्र पहनाकर बसंती जी को सम्मानित किया।
संगीत के प्रोफेसर देवाशीष गांगुली ने होली गीत से सबको थिरकाया।अलीगढ़ की प्राध्यापक किरण सक्सेना ने सरस्वती वंदना, भूतनाथ की होली, रसिया, मृगनयनी जैसे गीतों से सबका मन मोह लिया। एकल अभिनय के अंतर्गत अलीगढ़ के नाट्य शिक्षक प्राध्यापक हितेंद्र दीक्षित ने अश्वस्थामा के संताप का अभिनय करते हुए– जीवंत प्रस्तुति देकर सबकी सराहना प्राप्त की।
कपूर साहब, भारत वार्ष्णेय , अनुश्रुति गांगुली आदि की विशेष उपस्थिति रही।आभार ज्ञापन शुभदा पांडेय ने किया।
