हवालात-ए-हुस्न (व्यंग्य)

जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी पर ऐसे विराजमान थे जैसे किसी सल्तनत के आखिरी वारिस हों और मैं उनकी प्रजा का सबसे फर्जी फरियादी। मैंने जैसे ही हांफते हुए कहा कि “सर, लूट हो गई,” उन्होंने अपनी मूंछों को कड़क चाय के भाप से सहलाया और बोले, “अबे ओ केस डायरी के फटे हुए पन्ने, ये जो तू सांसें उखाड़कर ‘मुलजिम’ जैसी शक्ल बना रहा है, इसके लिए कोई अलग से ‘धारा’ लगवाऊं या सीधे ‘रोजनामचा’ में तेरी किस्मत का एनकाउंटर कर दूँ?” मैंने दलील दी कि सर चार नामालूम बदमाशों ने मेरा रास्ता रोका, तो उन्होंने बगल में खड़े सिपाही को इशारा किया, “देख हवलदार, प्रार्थी को वारदात से ज्यादा अपनी स्टोरी की चिंता है। लिखो इसमें—मजकूर शख्स अपनी लापरवाही की नुमाइश कर रहा था और बदमाशों ने इसे सरकारी माल समझकर कुर्क कर लिया।” उनके चेहरे पर वो दफा-302 वाली गंभीरता थी, जिससे लग रहा था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मेरा ‘पंचनामा’ पक्का है।
मुंशी जी ने अपना वो खानदानी रजिस्टर ऐसे निकाला जैसे वो किसी मुजरिम की हिस्ट्रीशीट हो। दरोगा जी ने पेन की निब से मेज पर दस्तक देते हुए कहा, “बेटा, ये जो तूने बैग छिनने की दास्तान सुनाई है, इसमें ‘सबूत’ कम और ‘सिनेमा’ ज्यादा है। बैग में क्या था? कोई ‘खुफिया दस्तावेज’ या बस तेरी ‘बेरोजगारी’ का कच्चा चिट्ठा?” मैंने जैसे ही लैपटॉप और गैजेट्स की लिस्ट गिनानी शुरू की, उन्होंने हाथ उठाकर मुझे बरामदगी के पहले ही खामोश कर दिया। बोले, “इतना तामझाम लेकर तू इस गली में ‘गश्त’ कर रहा था जैसे तू इस इलाके का ‘बीट ऑफिसर’ हो? ये तो वही बात हुई कि ‘माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम’। चोरों ने तो तुझ पर एहसान किया है कि तुझे बोझ से आजाद कर दिया, वरना तू तो ताजीरात-ए-हिंद की किताब बनकर ही घूमता रहता।” वहां मौजूद स्टाफ ऐसे ठहाके लगा रहा था जैसे थाना न होकर कॉमेडी सर्कस का रिमांड रूम हो। मुंशी जी ने चुटकी ली, “साहब, लिख दो कि बैग को जमानत मिल गई है, इसलिए वो प्रार्थी के पास से फरार हो गया।”
जब मेरी आंखों से आंसू मुलजिम की तरह टपकने ही वाले थे, तभी दरोगा जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और मेज के नीचे से वही बैग निकाल कर मेरे सामने पटक दिया। मेरी तो जैसे शिनाख्त ही खो गई! वो मुस्कुराकर बोले, “अबे ओ ‘चश्मदीद गवाह’, ये बैग बाहर बेंच पर लावारिस पड़ा था। हम तो बस ये देख रहे थे कि अगर सच में तेरी ‘कुर्की’ हो जाए, तो तू थाने में बयान दर्ज कराएगा या सीधा सुसाइड नोट लिखेगा? ये जो अभी तूने सस्पेंस ड्रामा झेला है, ये तेरी सुरक्षा का चालान था।” मैंने कांपते हाथों से बैग उठाया, तो उन्होंने पीछे से आवाज दी, “अरे सुन, जाते-जाते इस मुठभेड़ की मिठाई तो खिलाता जा, वरना अगली बार हम तेरी एफआईआर में ‘क्लाइमेक्स’ ऐसा डालेंगे कि तू खुद को ही मुजरिम घोषित कर देगा!” मैं बैग लेकर ऐसे नौ-दो-ग्यारह हुआ जैसे कोई सजायाफ्ता कैदी जेल तोड़कर भागा हो, और पीछे से पूरा थाना ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के बजाय ‘हाहाकार जिंदाबाद’ के नारों से गूँज रहा था।

-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

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