परजीवी तिलचट्टे – विनयशील चतुर्वेदी ( कविता )
बहुत ही खतरनाक हैं ये
ढूंढ लेते हैं अंधरे
घुस जाते है
दरारों में
गटरों में
हर उस जगह जहाँ होता है
अंधेरा
………
लाखों लाठियाँ लेकर भागो
इनके पीछे
हज़ारों तरह के झाड़ू लेकर दौड़ो
इनके पीछे
जूतों और चप्पलों से
धावा बोलो
इनके पीछे लगा दो तमाम
पुलिस
प्रशासन
जासूस
कैमरे
नहीं खत्म होगे ये….
अंधकार में जन्मे, पले और बढ़े
ये परजीवी तिलचट्टे
…….
ये घुस जाएंगे
हर एक उस जगह
जहाँ होगा अंधकार
चाहे हो…
राजनीति का
व्यवस्था का
न्याय का
प्रशासन का
शिक्षा का
धर्म का
जहाँ कहीं भी होगा अंधेरा, होंगी दरारें
ये घुसे मिलेंगे
परजीवी तिलचट्टे
………
ये घुस जाएंगे अतीत के अंधकार में
ये घुस जाएंगे जिंदा कब्रों के बीच
और निकाल लाएंगे गुनाहों के सबूत
ये घुस जाएंगे बंद फ़ाइलों में
ये छुए रहेंगे खूंटी पर टंगी वर्दियों में
ये घुस जाएंगे हर उस जगह
जहाँ रहने दिया जाएगा अँधेरा
जहां छीना जाएगा उजाला
…………..
इन्हें खत्म करने के लिए
बंद करनी होगी दरारें
राजनीति की
न्याय की
व्यवस्था की
प्रशासन की
शिक्षा की
धर्म की
लानी होगी पारदर्शिता
राजनीति में
न्याय में
व्यवस्था में
प्रशासन में
शिक्षा में
धर्म में
……..
शर्त है कि बंद करनी होंगी
सभी दरारें
साफ करने होंगे
सभी गटर
ये पैदा होते हैं अंधरे में
इसलिए
छोड़ना होगा उजाले को
फैलाना होगा प्रकाश
लानी होगी पारदर्शिता
अपने आप खत्म हो जाएंगे
परजीवी तिलचट्टे
