दुख-विनिमय केंद्र (व्यंग्य)
चंदनपुर गांव के महान रणनीतिकार ‘झपटल बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का पर्चा भरा, तो उन्होंने विकास के सारे पुराने मापदंडों को खूँटी पर टांग दिया। उनका चुनावी मुद्दा था—’ग्लोबल वॉर्मिंग का ग्रामीण समाधान’। झपटल बाबू का तर्क था कि गांव की असली समस्या सड़क या पानी नहीं, बल्कि ‘इमोशनल ओवरलोड’ है। उन्होंने घोषणा की कि जीतते ही वे गांव में एक ‘दुख-विनिमय केंद्र’ खोलेंगे, जहाँ ग्रामीण अपने व्यक्तिगत दुख (जैसे पत्नी का झगड़ा या भैंस का दूध न देना) जमा करके उसके बदले सरकारी ‘सुख-कूपन’ प्राप्त कर सकेंगे। उनका दावा था कि वे गांव के सामूहिक रुदन को पाइपलाइन के जरिए शहर भेजेंगे, जहाँ अमीर लोग इसे ‘नेचुरल डिप्रेशन थेरेपी’ के नाम पर खरीदेंगे और उस पैसे से गांव में एयर-कंडीशन्ड खलिहान बनवाए जाएंगे। गांव के लोग, जो अब तक अपने दुखों को मुफ्त में झेल रहे थे, अचानक इस ‘आँसुओं के बिजनेस प्लान’ को सुनकर विकास के नशे में झूम उठे।
प्रचार के अंतिम दौर में झपटल बाबू ने गांव के मुख्य चौराहे पर एक ‘दुख-मापक यंत्र’ स्थापित किया। यह वास्तव में एक पुराना खराब हो चुका तराजू था, जिसे उन्होंने बिजली के रंगीन तारों से लपेट दिया था। उन्होंने गांव वालों को पट्टी पढ़ाई कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने का संकल्प लेकर इस तराजू के एक पलड़े पर हाथ रखेगा, उसका आधा मानसिक बोझ तुरंत ‘डिजिटल क्लाउड’ में ट्रांसफर हो जाएगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘बुधई राम’ परेशान थे; वे खाद और बीज की सब्सिडी की बात कर रहे थे, जबकि जनता को अपने पुराने दुखों से मुक्ति का शॉर्टकट दिख रहा था। झपटल बाबू ने एक लड़के को ढोल के साथ खड़ा कर दिया था, जो हर व्यक्ति के ‘दुख मापने’ के बाद ज़ोर से चिल्लाता था— “बधाई हो, आपका दुख अब सरकारी संपत्ति है!” जनता को लगा कि अब रोने के भी दिन फिर गए हैं और वे अपनी झोली भरकर झपटल बाबू की जय-जयकार करने लगे।
जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और झपटल बाबू की ऐतिहासिक जीत हुई, पूरा गांव अपने ‘सुख-कूपन’ लेने के लिए उनके दफ्तर पर उमड़ पड़ा। झपटल बाबू ने एक बड़ा सा संदूक खोला और उसमें से छोटे-छोटे प्याज के टुकड़े सबको बांटना शुरू कर दिया। जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, यह क्या है? हमें तो सुख चाहिए था!” झपटल बाबू ने अपनी सुनहरी ऐनक ठीक की और कड़क आवाज़ में बोले— “मूर्खों! सुख तो एक मानसिक भ्रम है। असली सुख तो इन प्याजों में है; इन्हें आंखों के पास ले जाओ और जी भर कर रोओ। जितना ज्यादा रोओगे, मेरा ‘दुख-निर्यात’ का धंधा उतना ही फलेगा-फूलेगा। और रही बात कूपन की, तो वह ‘वोट’ ही था जो आपने मुझे दे दिया और उसके बदले मैंने अपना ‘सुख’ सुनिश्चित कर लिया।” जनता सन्न खड़ी अपनी आंखों से निकलते असली आँसुओं को देख रही थी, जबकि झपटल बाबू अपनी नई एसयूवी का सायरन बजाते हुए ‘इमोशनल एक्सपोर्ट’ का नया टेंडर पास कराने शहर रवाना हो गए।
–डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
