सत्य और असत्य की मुलाक़ात

(संदर्भ : काल्पनिक, चिन्तनशील, परिहास)

कहावत है पाप और पुण्य एक ही सिक्के के दो पार्श्व हैं अर्थात् एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है और न उनकी सामाजिक मान्यता l अकेले रहकर दोनों एक निर्गुण अदृश्य छाया की तरह भटकते रहते, उनका सगुण रूप या प्रभाव भी लुप्त रहता है l फिर मानव जगत में उनका क्या प्रयोजन होता? आज के संदर्भ में देखें तो इन्हीं ‘सत्य और असत्य’ के मूर्त रूप को देखने के लिए आशातीत धन-दौलत, बुद्धि, विवेक, तर्क-वितर्क इत्यादि संसाधनों का उपयोग होता है, जिसमें व्यक्ति और सरकारों की असीम भागीदारी होती है l क्या सत्य है या क्या असत्य है इसे प्रामाणिक रूप से स्थापित करने के लिए न्यायालयों के युद्ध क्षेत्र में वकीलों की कलावाजी सर्वविदित है l जो धन जनता की उन्नति और देश के विकास पर खर्च होता वह प्रायः बर्वाद हो जाता है l राजनीति के बदलते मूल्यों ने सत्य और असत्य की पहचान को धूमिल बना दिया है, उनको तौलने का तराज़ू यानी न्यायतंत्र भी कभी-कभी भूल कर बैठता है l

एक बार छद्मवेश में सत्य और असत्य दोनों उच्चतम न्यायालय में मौजूद थे, वे केवल सुन सकते थे किंतु बोल नहीं सकते थे l उनकी अदृश्य छाया प्रकाश के चंगुल से दूर थी l चूँकि मामला सनसनीजनक था, दोनों तरफ़ से मशहूर वकील बहस कर रहे थे और अन्य उपस्थित वकीलों की संख्या भी कम नहीं थी l लम्बी बहस के पश्चात प्रधान न्यायाधीश ने निर्णय सुनाया, जिसे सुनकर एक पक्ष उत्साहित था और दूसरा पक्ष मायूस l अदालत के बाहर कुछ लोग मिठाई बाँट रहे थे, तो कुछ लोग न्यायालय मुर्दावाद का नारा लगा रहे थे – यह थी भाषण की मौलिक आज़ादी अर्थात् ‘फ़्रीडम ऑफ इक्स्प्रेशन’ l
सत्य और असत्य भी कुछ दूर से यह दृश्य देख रहे थे, उनके माथे पर चिंता की रेखा थी, किसी अज्ञात आकर्षण वश एक दूसरे के क़रीब आ गए l सत्य ने कहा ‘सत्यमेव जयते’ किंतु आज मेरी पराजय हुई है l असत्य बोल उठा ‘सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यं अप्रियं’ l इस दार्शनिक विषय की सार्थक विवेचना करना उनके लिए असम्भव था, कोई भी निर्णय किसी संदर्भ विशेष के आलोक में होता है l दोनों ने कहा, “हमें ब्रह्मा के पास चलना चाहिए, वे सृष्टिकर्ता हैं, सर्वज्ञाता हैं, हमारा सृजन भी उन्होंने ही किया होगा l हमारा भौतिक अस्तित्व स्थूल नहीं है, हम अदृश्य हैं परन्तु मानव की तरह संवेदनशील हैं l वस्तुतः हम दोनों भी पंचतत्व की तरह मानव सृष्टि के अभिन्न आधार हैं l”
कुछ दिनों के बाद दोनों ब्रह्मा के दरबार तक पहुँचे l दरवाज़े पर तैनात द्वारपाल ने उनकी पहचान सुनिश्चित करने के लिए रोका l “हम सत्य और असत्य हैं, अदृश्य हैं, हमारी कोई स्थूल पहचान नहीं है l मृत्युलोक से आए हैं, मानव के अस्तित्व के अभिन्न अंग हैं l हम अपने सृजन का रहस्य समझने आए हैं l” थोड़ा सहमते हुए दोनों ने द्वारपाल से पूछा, “हम अदृश्य हैं, फिर भी आपने हमें कैसे देख लिया? अन्यथा हम सीधे ब्रह्मा के दरबार में हाज़िर हो जाते और उनसे अपने मन की बात कह डालते l”
“आप दोनों मृत्युलोक में अदृश्य हैं, किंतु देवलोक में नहीं l ठीक उसी तरह जैसे मृत्युलोक में आत्मा निराकार है लेकिन ब्रह्मा के सामने नहीं l आपने सुना होगा कि मृत्यु पश्चात स्वयं यमराज उन्हें यहाँ लेकर आते हैं ताकि उनके कर्मों का फल निर्धारित हो सके l”
“हम समझ गए l कृपया सहयोग करें ताकि हमारी यात्रा सफल हो,” सत्य और असत्य बोल उठे l
“आप दोनों यहीं रूकें, मैं ब्रह्मा जी को आपके आने की सूचना देता हूँ l”
कुछ देर के बाद द्वारपाल ने ब्रह्मा के आदेशानुसार पहले सत्य को उनके दरबार में प्रस्तुत किया और स्वयं बाहर चला गया l केवल सत्य और ब्रह्मा आमने सामने थे l विनम्रता पूर्वक सत्य ने असत्य के साथ आने का प्रयोजन बताया l
ब्रह्मा ने गम्भीर स्वर में सत्य से कहा, “तुम्हें ज्ञात होगा कि सृष्टि के आरम्भ में समुद्र मंथन से अमृत और विष दोनों एक साथ निकले थे, विपरीत गुणों के धारक ! यही प्रकृति का नियम है, मानव जीवन की सच्चाई है l सत्य और असत्य का सृजन भी इसी के अनुरूप है l इसी बीच तुम्हें अपना प्रभाव बढ़ाना है ताकि मानव जाति में नैतिक मूल्यों का संबर्धन हो, और उसके जीवन में छल कपट ईर्ष्या के ऊपर नियंत्रण हो l”
“यह कैसे सम्भव है जब मैं अदृश्य हूँ, मूकदर्शी हूँ? स्वभाव से दुष्ट अहंकारी व्यक्ति सत्य का दमन करना अपना अधिकार समझता है, मैं अपमानित होकर भी उसका विरोध करने में असमर्थ हूँ l”
थोड़ी देर सोचने के पश्चात ब्रह्मा ने कहा, “मैं तुम्हें एक श्वेत टोपी देता हूँ जिसे पहनने पर तुम्हारे मस्तिष्क से निकली तरंगें उस व्यक्ति की सोच को प्रभावित कर सकती हैं, तुम्हारी टोपी भी अदृश्य रहेगी l जब वह व्यक्ति सुसुप्ता अवस्था में होगा तब वे तरंगें अधिक प्रभावी होंगी, बार-बार उसे संदेश सुनाई देगा कि वह असत्य का तिरस्कार करे l कुछ दिनों के प्रयोग से तुम्हारा काम सुलभ हो जाएगा l असत्य को बिल्कुल पराजित करना असम्भव है, लेकिन उस पर अंकुश लगाने में तुम सफल हो सकते हो l व्यक्ति विशेष का चुनाव तुम अपनी बुद्धि से करोगे l”
“जी महाशय, मेरा विनम्र अभिवादन स्वीकार करें l मैं धन्य हुआ l” सत्य की आँखों में ख़ुशी की चमक आ गयी | “तुम मृत्युलोक जा सकते हो, अपने कर्तव्य पथ पर चलते रहो l”
थोड़ी ही देर में असत्य ने सत्य को ब्रह्मा के दरबार से बाहर निकलते देखा, उसके दिल की धड़कन तेज हो गयी l वह जानना चाहता था कि ब्रह्मा और सत्य में क्या बात हुई l लेकिन इसी बीच द्वारपाल ने असत्य से निवेदन किया,
“ब्रह्मा आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, कृपया शीघ्र चलें l”
“क्या दो-चार मिनट सत्य से बात कर सकता हूँ?”
“इसके लिए समय नहीं है, ब्रह्मा जी को चित्रगुप्त जी से मिलना है l”
असत्य को आते देख ब्रह्मा बोल उठे, “मेरे दरबार में तुम्हारा स्वागत है l यहाँ आने का प्रयोजन? कोई जिज्ञासा?”
“महाराज, सत्य से आप मिल चुके हैं l उसने हम दोनों के आने का प्रयोजन बताया ही होगा l”
“किंतु मैं तुमसे सुनना चाहता हूँ l तुम अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र हो l”
असत्य ने गम्भीरता पूर्वक कहा, “आप सम्पूर्ण मानव जाति के सृष्टिकर्ता हैं, जिसमें सत्य और असत्य का निवास होता है l मनुष्य के बिना हम दोनों का कोई अस्तित्व नहीं है l फिर हम दोनों विपरीत गुणों के परिचायक हैं, ऐसा क्यों? एक का आधिपत्य दूसरे का हनन है, ऐसा क्यों? इसका क्या रहस्य है? मेरी दृष्टि में सत्यवादी और मिथ्यावादी दोनों अहंकार से ग्रसित हैं, कोई कम कोई ज़्यादा l पृथ्वीलोक पर तो मानो उनके बीच युद्ध चल रहा है, किसकी कहाँ जीत होगी इसका अनुमान लगाना कठिन है l”
“मनुष्य के जीवन के अनेकों आयाम हैं जिसमें धर्म-कर्म, शिक्षा-दीक्षा, पूजा-पाठ, पालन-पोषण, स्वाध्याय, चिंतन, अध्यात्म इत्यादि शामिल हैं l इनके संदर्भ में वैचारिक मतभेद होते हैं जो स्वाभाविक है परन्तु इसमें तर्क और विवेक की प्रधानता होती है, सत्य और असत्य का टकराव दिखाई नहीं देता है l यदि टकराव है भी, तो वह नगण्य है l फिर दोनों के बीच युद्ध तुम्हें कहाँ दिखाई देता है?” ब्रह्मा के कथन में उनका मूर्त विचार था, और एक प्रश्न भी l
असत्य ने संयमित स्वर में कहा, “मनुष्य एक सामाजिक जानवर है अर्थात् सामाजिक व्यवस्था उसके व्यक्तिगत जीवन को संचालित करती है l इसके अपवाद भी हैं, कुछ लोग अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और कर्मठता के बल पर समाज में प्रचलित अवधारणाओं की अवहेलना कर सकते हैं l लेकिन मैं जिस व्यवस्था की चर्चा कर रहा हूँ वह आज समाज पर हावी है, वह है राजनैतिक व्यवस्था और इससे उत्पन्न आचरण l इसने समाज को टुकड़ों में बाँट दिया है; पदलोभ सर्वोपरि है, नैतिकता और अनैतिकता का मापदंड समाप्त हो गया है, राजनैतिक टकराव वस्तुतः सत्य और असत्य के बीच का जंग हो गया है l प्रजातंत्र के युद्ध में एक ही पक्ष जीतता है, सत्य और असत्य भी इसके भुक्तभोगी हैं l समझ नहीं आता मैं क्या करूँ? क्या सत्य को पराजित करूँ या अपना पराजय स्वीकार करूँ?”
“तुम्हारा प्रश्न जटिल है l क्या तुम सत्य को पराजित करने के लिए मुझसे कोई वरदान माँगने आए हो? या कोई मंत्रणा? जैसा तुमने कहा है मैं ही सत्य और असत्य का सृष्टिकर्ता हूँ, दोनों की उत्पति प्रकृति के नियम के अनुकूल है, दोनों अमर हैं l लेकिन सत्य का संबर्धन मेरा धर्म है, यही देवलोक की नीति है l पृथ्वी पर सत्य और असत्य के बीच युद्ध चलता रहता है, जय-पराजय के चक्र से दोनों को गुजरना पड़ता है l समय बलवान होता है, उसी के अनुसार तुम कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हो l”
“आपके दर्शन हुए, यह सौभाग्य की बात है l मेरा नमन स्वीकार करें l” असत्य ब्रह्मा के दरबार से निकल गया l
बाहर निकलते ही सत्य पूछ बैठा, “क्या बात है? देर हो गई l कुछ चिंतित भी दिखते हो?”
“ब्रह्मा का सामना करना एक मुश्किल कार्य है l उनकी दृष्टि पैनी है, उनकी सोच में उदारता के साथ दृढ़ता भी है l”
“कैसी उदारता? कैसी दृढ़ता? मैं समझा नहीं l क्या तुमने कोई विशेष आग्रह किया था? किसी प्रश्न का सीधा उत्तर
माँगा था?”
असत्य ने कोई जवाब नहीं दिया l सत्य ने भी दबाव डालना उचित नहीं समझा l
“थोड़ा विश्राम कर लेते हैं l फिर अपने देश की ओर प्रस्थान करेंगे l”

दोनों एक रम्य सुंदर शांतिमय बगीचे में एक वृक्ष की शीतल छाया के नीचे बैठ गए l रमणीक स्थान, सुरभित पुष्पों की मोहकता, और मंद पवन के आग़ोश में दोनों को नींद आ गयी l क़रीब एक पहर के बाद जब उनकी निद्रा खुली तो उनके सामने एक युवती फलों से भरी थाली और जल से भरा कलश लेकर खड़ी थी l अनायास दोनों बोल उठे, “हे सुंदरी, आप कौन हैं? किसने आपको यहाँ भेजा है l”
“मैं इस बाग की मलिका हूँ l जो कोई इस देवलोक के ऊद्यान में आता है उसका स्वागत करना मेरा उतरदायित्व है, यही ब्रह्मा का आदेश है l आप थक गए होंगे, अल्पाहार ग्रहण करें, आपको नयी ऊर्जा मिलेगी और आगे की यात्रा भी सहज होगी l”
“क्या तुम जानती हो कि हम दोनों कौन हैं? जानने के पश्चात शायद तुम्हारा निर्णय बदल जाए l”
“नहीं, और मैं जानना भी नहीं चाहती l यहाँ कोई भेदभाव या पक्षपात नहीं किया जाता है l”
सत्य और असत्य ने अल्पाहार ग्रहण किया l फलों का स्वाद अद्भुत था, स्वच्छ जल स्फूर्तिदायक था l युवती को धन्यवाद देने के पश्चात दोनों पृथ्वीलोक की ओर चल पड़े l
थोड़ी देर में असत्य ने सत्य से पूछा, “ब्रह्मा से तुम्हारी क्या बात हुई? कोई ख़ास बात या सुझाव?”
सत्य का स्वभाव था सच्चाई का पालन करना, आज भी उसने वही कर्तव्य निभाया l उसने ब्रह्मा से हुई चर्चा का संक्षिप्त विवरण कर डाला, जिसमें उनके द्वारा दी हुई ‘टोपी’ और इसके सम्भावित प्रभाव की सूचना शामिल थी l
“मुझे आश्चर्य है कि ब्रह्मा ने तुम्हें मुझे पराजित करने का एक शस्त्र दे दिया है,” असत्य ने क्रोधपूर्ण स्वर में कहा l
“मैं इसका प्रयोग असाधारण अवस्था में ही करूँगा, तुम आस्वस्थ रहो l”
असत्य ने बात आगे नहीं बढ़ाई, उसके दिमाग़ के भीतर एक द्वंद्व चल रहा था – वह इस शस्त्र के प्रभाव को निरस्त करने की युक्ति खोज रहा था l इसी बीच उसे प्रसिद्ध विद्वान मार्क ट्वेन (Mark Twain) का कथन याद आया : “A lie can travel halfway around the world while the truth is putting on its shoes.” अर्थात् “असत्य आधी दुनिया का चक्कर लगा सकता है जब तक सत्य अपने जूता का फ़ीता बाँधता है l” वह मन ही मन मुस्कुरा उठा, जनता के बीच उसकी पैठ आसान होगी l
दोनों अब पृथ्वी पर पहुँचने वाले थे l असत्य ने सुझाव दिया कि उन्हें जनता के बीच जाने से पहले गंगा नदी में स्नान करना चाहिए ताकि वे किसी भी प्रदूषण के दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाएँ l गंगा का स्वच्छ शीतल जल सुखदायी होता है, और ग्राह्य भी l सत्य ने हामी भर दी, मुझे स्वीकार है l “मान्यता के अनुसार हरिद्वार में गंगा का जल पवित्र होता है, उसमें स्नान करना एक शुभ कार्य करने के समान है l वह स्थान उपयुक्त होगा, वहाँ के वन-उपवन में देवता निवास करते हैं l”
शीघ्र ही वे गंगा के किनारे पहुँच गये, स्थान मनोरम था, उनके अतिरिक्त अभी कोई नहीं था l पहले असत्य ने अपना वस्त्र उतारकर किनारे रखा दिया और गंगा की धारा में प्रवेश कर गया, सत्य को वस्त्र की निगरानी करने की ज़िम्मेदारी दे गया l फिर बार-बार जल में डुबकी लगाकर स्नान करने के पश्चात प्रसन्नचित होकर बाहर निकल आया l “गंगा में स्नान करने से पूरी थकावट दूर हो गई, अब तुम्हारी बारी है l”

सत्य ने भी वैसा ही किया l उसने भी अपना वस्त्र उतारकर किनारे रख दिया जिसमें ब्रह्मा प्रदत्त टोपी भी थी l गंगा की पारदर्शी पावन धारा में उसने देर तक स्नान किया, और मंत्रोचरण भी किया l जब वह बाहर निकला तो असत्य लापता था और उसकी टोपी भी ग़ायब थी ! उसने इधर-उधर देखा, आवाज़ भी दी, लेकिन असत्य का कहीं पता नहीं था l निष्कर्ष स्पष्ट था, असत्य कपट पूर्वक चालाकी से उसकी टोपी चुराकर भाग गया था l सत्य अपनी सद्भावना पर पश्चाताप करते हुए धीरे-धीरे चल पड़ा l आज असत्य स्वतंत्र है, निर्भीक है, और तीव्र गति से समाज में फैल रहा है l सत्य पंगु बन गया है !

लेखक :— डॉ कौशल किशोर श्रीवास्तव

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