खादी पंखों वाली आत्मा (व्यंग्य)
सत्ता की रीढ़ जितनी लचीली होती है, चापलूसी के सुर उतने ही मधुर सुनाई देते हैं। उस दोपहर महामहिम की कचहरी में एक ऐसी ही जादुई चिड़िया लाई गई, जिसके पंख पूरी तरह खादी के रंग में रंगे थे। राजा को हमेशा से ऐसे ही वफादारों की तलाश थी जो बिना कुछ सोचे-समझे वही कहें जो सिंहासन सुनना चाहता है। राजा ने अपनी मूछों पर ताव देते हुए उस नन्हें जीव की तरफ देखा और अपनी प्रशासनिक धाक जमाने के लिए पूछा कि कहो मियां, हुकूमत का क्या हाल है। चिड़िया ने एक बार अपनी गर्दन घुमाई, दरबारियों की सूनी आँखों में झांका और सीधे सच का तेजाब उगल दिया। उसने कहा कि हुजूर, आपके महलों की चमक असल में झोपड़ियों के अंधेरे की कतरन से बनी है और आपकी नीतियां जनता की जेब काटने का सबसे सुसंस्कृत औजार हैं। राजा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया क्योंकि सिंहासन कभी भी यथार्थ का नग्न नृत्य बर्दाश्त नहीं करता। राजा ने तुरंत मालिक की तरफ देखा और गरजते हुए पूछा कि क्या यही मेरे मन की बात है जो यह बदतमीज जीव सरेआम बोल रहा है। मालिक ने बहुत ही मखमली मुस्कान के साथ कहा कि हुजूर, आप इसके स्थान का भूगोल बदल कर देखिए, इसका वैचारिक इतिहास तुरंत बदल जाएगा।
जैसे ही उस जीव को मंत्रियों की कतार में एक मखमली और खाली कुर्सी पर बिठाया गया, उसके भीतर का विद्रोही अचानक आत्मसमर्पण कर बैठा। उसकी आँखों में वह दिव्य श्रद्धा तैरने लगी जो केवल मुफ्त के भत्तों और मलाईदार विभागों को देखकर पैदा होती है। राजा ने दोबारा वही सवाल दोहराया तो इस बार चाटुकारिता की ऐसी गंगा बही कि पूरा दरबार उस कीचड़ में नहा गया। उसने कहा कि अन्नदाता, आपके पैरों की धूल चंदन से ज्यादा पवित्र है और आपके शासन में भुखमरी भी एक आध्यात्मिक साधना जैसी लगती है। राजा इस जादुई परिवर्तन को देखकर हैरान था क्योंकि उसने अपनी पूरी जिंदगी में इतनी जल्दी निष्ठा बदलते केवल इंसानों को देखा था। व्यवस्था का यह चरित्र देखकर राजा ने अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए उसे एक छोटे सिपाही के लकड़ी के स्टूल पर रखवा दिया। वहाँ बैठते ही उस जीव की रीढ़ फिर से तन गई और वह शोषितों की भाषा में विद्रोह के गीत गाने लगा। राजा ने चकित होकर कहा कि यह कैसा अद्भुत प्राणी है जिसका चरित्र कुर्सी की ऊंचाई और गहराई तय करती है। मालिक ने हाथ जोड़कर कहा कि महाराज, यह कोई जादू नहीं है बल्कि यह जीव बचपन से एक बड़े राजनीतिक दल के दफ्तर में पला-बढ़ा है।
तभी दरबार के सबसे बूढ़े और अनुभवी वजीर ने मुस्कुराते हुए कहा कि हुजूर, असली तमाशा देखना है तो इसे उस अंतिम पायदान पर बैठाइए जहाँ इस मुल्क की नब्बे फीसदी आबादी सांस लेती है। राजा के आदेश पर उस जीव को महल के सबसे अंधेरे कोने में जमी धूल पर, जहाँ एक आम नागरिक फटेहाल खड़ा था, वहाँ रख दिया गया। जमीन को छूते ही उस जीव के पंख कांपने लगे और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी पसर गई जो किसी भयानक सन्नाटे की तरह चुभ रही थी। उसने रोते हुए कहा कि यहाँ सिर्फ भूख का साम्राज्य है और टैक्स की अंतहीन कतारों में खड़ी जनता केवल मरने का अधिकार मांग रही है। राजा को लगा कि यह खेल अब मनोरंजन से आगे बढ़कर सत्ता की साख पर सीधा हमला कर रहा है। राजा ने गुस्से में आकर कहा कि इस कड़वे सच को तुरंत बंद करो क्योंकि हुकूमत को आईने से सख्त नफरत होती है। दरबारियों ने तालियां बजाकर राजा के इस गुस्से का स्वागत किया क्योंकि चापलूसी की दुनिया में सच बोलना सबसे बड़ा राजद्रोह माना जाता है। व्यवस्था के ठेकेदारों ने उस जीव को तुरंत वहां से हटाने की वकालत शुरू कर दी ताकि महल की सुख-शांति में कोई खलल न पड़े।
फिर उस जीव को एक ऐसे मां की गोद में बिठाया गया जो अस्पताल के बाहर अपने बीमार बच्चे के इलाज के लिए सुबह से भीख मांग रही थी। वहाँ बैठते ही उस जीव ने न तो राजा की बड़ाई की, न ही क्रांति का कोई बड़ा नारा बुलंद किया। वह सिर्फ उस बच्चे के नंगे बदन को अपने नन्हे पंखों से ढंकने की नाकाम कोशिश करने लगा, जैसे वह सत्ता की सारी नाकामियों को छुपाना चाहता हो। उसकी आँखों से गिरते हुए आंसू उस ज़मीन को गीला कर रहे थे जहाँ हुकूमत के बड़े-बड़े वादे दम तोड़ चुके थे। उसने बेहद धीमी आवाज़ में कहा कि जिस देश का बचपन फुटपाथ पर दम तोड़ दे, वहाँ के राजा को मुकुट पहनने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होता। यह सुनते ही राजा के अंगरक्षक उसे मारने के लिए आगे बढ़े क्योंकि दरबार में दर्द की आवाज़ उठाना मना था। पूरी कचहरी में एक अजीब सी कड़वाहट और सन्नाटा पसर गया था जिसे कोई भी दरबारी अपनी झूठी हंसी से नहीं भर पा रहा था।
मालिक ने तड़पकर उस जीव को अपने हाथों में उठा लिया और राजा से कहा कि हुजूर, इसकी इस भाषा पर हैरान मत होइए क्योंकि यह दर्द का वह यूनिवर्सल व्याकरण है जिसे कोई भी सत्ता कभी सीख नहीं पाती। राजा ने खीझते हुए कहा कि मुझे ऐसा भविष्यवक्ता नहीं चाहिए जो मेरी रातों की नींद हराम कर दे और मेरे वैभव पर सवाल उठाए। उसने सिपाही को आदेश दिया कि इस जीव को तुरंत राजकोष से भारी रकम देकर हमेशा के लिए कैद कर लिया जाए ताकि यह दोबारा किसी मंच पर न बोल सके। मालिक ने रोते हुए वह पिंजरा राजा के सामने रख दिया और खुद दरबार से बाहर निकल गया, जैसे उसने अपनी आत्मा का सौदा कर लिया हो। दरबार फिर से अपनी पुरानी लय में लौट आया जहाँ केवल राजा की जय-जयकार के झूठे नारे गूंज रहे थे। हर तरफ एक नकली खुशहाली का मुखौटा पहनकर लोग घूम रहे थे और राजा अपनी पीठ खुद थपथपाने में व्यस्त था।
तभी राजा ने उस भारी तिजोरी को खोला जिसमें उस जादुई जीव को बंद किया गया था ताकि वह अकेले में अपनी प्रशंसा सुन सके। लेकिन जैसे ही तिजोरी का भारी दरवाजा खुला, राजा के होश उड़ गए और पूरा दरबार हतप्रभ रह गया। पिंजरे के भीतर कोई जीवित पक्षी नहीं था बल्कि खादी के कपड़ों में लिपटा हुआ एक आईना रखा था जिसमें राजा को खुद अपना ही चेहरा दिखाई दे रहा था। वह जीव कोई और नहीं बल्कि राजा की अपनी सोई हुई अंतरात्मा थी जो कुर्सी बदलते ही अपना बयान बदल देती थी और जिसे राजा ने खुद अपने हाथों से हमेशा के लिए राजकोष के अंधेरे में दफन कर दिया था।
-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
