मुखौटों का बाज़ार ( व्यंग्य ) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

लाइब्रेरी की पुरानी लकड़ी की महक के बीच सुधीर चश्मा ठीक करते हुए एक पुरानी फाइल पलट रहे थे। सामने मिसेज खन्ना बैठी थीं, जो अपनी मखमली शॉल को बार-बार सहेज रही थीं। यहाँ न कोई फ्लैट था, न कोई युवा जोड़ा। यहाँ अनुभव की वे रेखाएँ थीं जो उम्र के साथ गहरी हो गई थीं।

“सुधीर जी, क्या आपको नहीं लगता कि हम दोनों इस उम्र में एक ‘एक्सपेरिमेंट’ कर रहे हैं?” मिसेज खन्ना ने अपनी चाय की चुस्की लेते हुए पूछा।

सुधीर ने सिर उठाया। उनकी मुस्कुराहट में व्यंग्य की एक महीन धार थी। “एक्सपेरिमेंट? खन्ना जी, इस उम्र में तो लोग दवाइयों के कॉम्बिनेशन के साथ एक्सपेरिमेंट करते हैं। हम तो बस इस अकेलेपन के डर को ‘लिव-इन’ का आधुनिक लेबल लगाकर ढकने की कोशिश कर रहे हैं।”

मिसेज खन्ना थोड़ा झेंप गईं। “दुनिया इसे प्रगतिशीलता कहेगी। हमने समाज के डर से शादी नहीं की, बस साथ रहने का फैसला किया। क्या यह हिम्मत की बात नहीं है?”

“हिम्मत और जरूरत के बीच एक बहुत बारीक धागा होता है,” सुधीर ने फाइल बंद करते हुए कहा। “हम प्रगतिशील नहीं, दरअसल हम स्वार्थी हो गए हैं। हम चाहते हैं कि सुबह की चाय के वक्त कोई सामने बैठा हो, पर हम यह नहीं चाहते कि उसकी वसीयत या उसकी बीमारियों की जिम्मेदारी हमारे कंधों पर आए। हमारा यह साथ उस नो-पार्किंग ज़ोन की तरह है, जहाँ गाड़ी खड़ी तो है, पर ड्राइवर इंजन बंद नहीं करता कि कभी भी भागना पड़ सकता है।”

मिसेज खन्ना ने खिड़की के बाहर गिरती बर्फ को देखा। “पर क्या यादें काफी नहीं हैं? हम एक-दूसरे के अतीत में दखल नहीं देते, यही तो इस रिश्ते की खूबसूरती है।”

“यही तो इसकी सबसे बड़ी विडंबना है,” सुधीर का स्वर अब और भी गहरा हो गया था। “बिना अधिकार के अनुराग कैसा? हम दोनों एक ही छत के नीचे रहते हैं, पर हमारे बीच का फासला उस सरकारी फाइल जैसा है जो एक टेबल से दूसरी टेबल तक पहुँचते-पूँछते दम तोड़ देती है। हम साथ तो हैं, पर वैसे ही जैसे किसी म्यूजियम में रखी दो मूर्तियाँ—पास-पास, पर संवाद शून्य। हमने समाज को तो जीत लिया, पर अपनी ही जड़ों से कट गए।”

मिसेज खन्ना उठीं और अपना पर्स सँभाला। “चलिए, घर चलते हैं। काफी ठंड हो गई है।”

सुधीर भी खड़े हो गए। उन्होंने कोट के बटन बंद किए और धीमी आवाज़ में बोले, “घर? वह घर नहीं है खन्ना जी, वह बस एक ‘को-वर्किंग स्पेस’ है जहाँ हम साथ मिलकर बुढ़ापा काटने की कोशिश कर रहे हैं। हम मरेंगे नहीं, हम तो बस धीरे-धीरे अपनी ही आदतों में सिमटते चले जाएँगे।”

वे दोनों लाइब्रेरी से बाहर निकले और अलग-अलग दिशाओं से आती अपनी-अपनी टैक्सियों की ओर बढ़ गए। उस शाम शिमला की बर्फ ने उनके पदचिह्नों को उतनी ही जल्दी ढक दिया, जितनी जल्दी वे एक-दूसरे की स्मृतियों से ओझल होने वाले थे। न कोई शोर हुआ, न कोई पछतावा—बस दो चलते-फिरते साये थे, जो भीड़ में खोने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र थे।

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