फूल – एक अहसास ( कविता ) : मंजु गुप्ता

फूल तो मात्र एक अहसास होते हैं
पानी की एक बूँद या मात्र एक घूँट नहीं
तृप्ति का अनंत, अथाह सागर होते हैं
कामनाओं का एकाकार होना ही तो हैं फूल
फूल मात्र फूल नहीं,प्रभु का आशीष होते हैं
माली की मनुहार/ माँ का दुलार/ बगिया की बहार होते हैं
कपोलों पर खिला सुर्ख गुलाब, अधरों पर अनार की कली
नासिका पर खिला शुभ्र कुंद पुष्प
केशों में गुंथा मोतिया का गजरा होते हैं
गले में पहनी पुष्पमाल/ आँखों में खिले नील कमल होते हैं
धरती का मीठा, मधुर सपना हैं फूल
नायिका का श्रृंगार हैं फूल
आशिक का धुक- धुक धड़कता दिल हैं फूल
जो खिलकर भर देते हैं माँ धरती का आँचल
फूल सचमुच कमाल होते हैं
विधाता के हाथों का चमत्कार होते हैं
गुलशन के हृदय का ख्वाब होते हैं
वे भला क्या- क्या नहीं होते/ फूल तो बस बेमिसाल होते हैं.
सुमन कहो, या कुसुम/ पुष्प कहो या फूल
वे तो बगिया की बहार होते हैं
मन के सहज, सरल, मृदुल भाव हैं फूल
कुचले, मसले या तोड़े जाकर भी/ देते हैं सुगंध का उपहार
माँ धरती का श्रृंगार हैं फूल/ विधाता का अमूल्य वरदान हैं फूल
जीवन चक्र की कुंजी हैं फूल
फूल तो बस फूल होते हैं
एक सुखद, मधुर, सुरभित अहसास हैं फूल…….

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