অধিকার – प्रीति अग्रवाल : अधिकार – आशा बर्मन : अनुवाद (लघुकथा)
अधिकार
रश्मि अपनी दो बरस की बिटिया को अपने से चिपका कर, नजरें झुकाए, ऐसे सिमट कर बैठी थी मानो कोई अपराध कर के आई हो, जबकि उसी सूजी हुई आँखे और बाहों पर नील के निशान कुछ और ही कहानी सुना रहे थे।
बाबा ज़मीन पर ऊकड़ू बैठे अपनी पगड़ी हाथ में लिया, विलाप कर रहे थे, ‘है भगवान, अब क्या होगा। अभी तीन बरस पहले ही तो जैसे तैसे सिर से बोझ उतारा था…’
भैया भी गुस्से में चक्कर काटते बुड़बुड़ा रहे थे, ‘ऐसे कैसे घर से निकाल देंगें…वही तेरा घर है, अब तू उनकी ज़िम्मेदारी है…मैं जाकर उनसे बात करूँगा…’ माँ भी अपना राग आलापने में लगी हुई थी, ‘ अरी तेरे तो भाग ही फूट गए…अब क्या होगा तेरा…छोरी और गले में बंध गई…’
ये सब अपने-से लगने वाले लोग जाने कैसी अजीब सी बातें कर रहे थे, रश्मि का दिल बैठा जा रहा था और उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो करे, तो क्या और जाए, तो कहाँ!
अब तो बस रह सह कर भाभी ही बची थी, और वो ठहरी पराई जाई, भला वो क्या समझेगी उसकी पीर। रश्मि की आँखों के आगे मायूसी और आशंका के बादल और गहराते जा रहे थे…तभी कमला भाभी तेज़ी से कमरे से निकली, रश्मि की गोद
से मुन्नी को ले, बड़े प्यार से बोली, ‘चलो जीजी, अंदर चल कर हाथ मुँह धो कर कुछ खा लो, कितनी देर से बाहर बरामदे में बैठी हो…’
अम्मा ने खिसियानी आवाज़ में फिर अपना राग छेड़ा, ‘अरे, पढ़ाया, लिखाया, घर के सब काम काज सिखाएं…दहेज भी हैसियत से ज्यादा ही दिया…फिर पता नहीं किस बात की कमी रह गई…’
विमला भाभी बीच में ही टोकते हुए, बड़ी करारी आवाज़ में बोली, “माँ जी, कमी इस बात की रह गई कि हम अपनी बेटियों को ज़िम्मेदारियाँ निभानी तो खूब सिखाते है, पर उन्हें यह बताना भूल जाते हैं कि उनके कुछ अधिकार भी हैं!”
অধিকার
রশ্মি নিজের দু বছরের মেয়েকে বুকের সাথে জড়িয়ে, চোখ নামিয়ে, এমন হয়ে বসে ছিল যেন কোনো অপরাধ করে এসেছে। অথচ তার ফোলা চোখ আর হাতে নীল দাগগুলো অন্য গল্পই বলছিল। ওর বাবা মাটিতে বসে ওর পাগড়ি হাতে নিয়ে বিলাপ করতে লাগলেন, “হে ঈশ্বর, এখন কী হবে? মাত্র তিন বছর আগেই , আমি কোনওভাবে আমার মেয়ের বিয়ে দিয়ে আমার মাথা থেকে বোঝাটা নামিয়ে দিয়েছিলাম…” ওর দাদাও রাগে পায়চারি করতে করতে, বিড়বিড় করে বলছিল, ওরা তোকে এই ভাবে বাড়ি থেকে বের করতে পারে না ……… তোর শশুর বাড়িই তোর বাড়ি, তুই এখন ওদের দায়িত্ব……. আমি গিয়ে ওদে র সাথে কথা বলব…’ ওর মাও আপন মনে কথা বলতে ব্যস্ত ছিলেন , ‘আরে, তোর কপাল পূড়েছে …… এখন তোর কী যে হবে….. আবার ‘এই ছোটো মেয়েটা ও তোর গলায় বাঁধা…’
রশ্মি মনে মনে ভাবছিল, এরা সব তো আমার নিজের লোক, এরা এত অদ্ভুত কথা কেন বলছে ? বুঝতে পারছিল না, তার কী করা উচিত । রশ্মির বুক ধড়ফড় করছিল, ওর বৌদির কথা মনে পড়ল ।
যে ছিল একজন অপরিচিত মানুষ, এবং সে এক অন্য পরিবার থেকে এসেছে , তাহলে সে কী ভাবে তার কষ্ট বুঝতে পা,রবে? রশ্মির চোখের সামনে হতাশা আর শঙ্কার মেঘ আরও ঘনীভূত হতে লাগল ।
ঠিক তখনই কমলা বউদি নিজের ঘর থেকে দ্রুত বেরিয়ে এল, রশ্মির কোল থেকে মুন্নিকে নিয়ে আদর করে বললেন, ‘চলো দিদি, ভেতরে গিয়ে হাত-মু হাত-মুখ ধুয়ে, কিছু খেয়ে নাও, কতক্ষণ ধরে বাইরে বারান্দায় বসে আছ…’ মা আবার বারান্দায় বসে রয়েছ …’
মা গম্ভীর গলায়, বলতে লাগলেন, , ‘আরে, লেখাপড়া শেখালাম, ঘরের সব কাজকর্ম শেখালাম… যৌতুকও সাধ্যের বেশি দিলাম… তবু জানি না কিসের কমতি রয়ে গেল…’
এই শুনে বিমলা বউদি বাধা দিয়ে বেশ জোর গলায় বলল, ‘মা, কমতি এই জায়গায় রয়ে গেল, যে আমরা আমাদের মেয়েদের দায়িত্ব পালন করতে তো খুব শেখাই, কিন্তু তাদের এটা বলতে ভুলে যাই, “যে তাদের কিছু অধিকারও আছে!”
