दिन विशेष विमर्श में डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे की कविता का पाठ

डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे भारत की बेटी, सूरीनाम की बहू एवं नीदरलैंड की स्थायी निवासी हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगठन, नीदरलैंड की अध्यक्ष हैं। वे नीदरलैंड में निवास करने वाली हिंदी भाषा की प्रमुख प्रवासी लेखिका, अनुवादिका, शिक्षिका और समीक्षक हैं। वे भारत और यूरोप के बीच साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संवाद स्थापित करने के लिए जानी जाती हैं। डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे ने मौलिक लेखन के साथ-साथ अनुवाद के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है और हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर समृद्ध करने में योगदान दिया है। वे हिंदी परिषद, नीदरलैंड की संयोजिका के रूप में विदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति उनका समर्पण भारत तथा यूरोप के बीच साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संपर्क RituS0902@gmail.com

जलते सपनों का देश

जल रहा है भविष्य, जल रहे अरमान हैं,
दिल्ली-लखनऊ की आग में झुलसे नौजवान हैं।
उजड़ रही हैं कोखें, माताएँ रो रही हैं,
बुझ गए घरों के दीप, आँखें भिगो रही हैं।
कंधों पर किताबें थीं, मन में था आकाश,
लपटों ने छीन लिया उनका सारा विश्वास।
किसने यह व्यवस्था की, किसने किया यह व्यापार,
शिक्षा के मंदिरों में क्यों बैठा बाज़ार?
ऊँची-ऊँची इमारतें, भीतर मौत का जाल,
सपनों की गलियों में घूम रहा काल।
न निकास का मार्ग था, न सुरक्षा का ज्ञान,
फिर भी खुले हुए थे शिक्षा के प्रतिष्ठान।
सरकारों के कानों तक क्यों नहीं पुकार गई?
क्यों हर चीख़ दीवारों से टकराकर हार गई?
जब-जब कोई बेटा यूँ अग्नि में समाता है,
भारत माँ का आँचल भी राख-राख हो जाता है।
नेताओं! अब जागो, जनता का दर्द सुनो,
सत्ता के सिंहासन से नीचे उतर चुनो।
ऐसे नियम बनाओ जो जीवन बचा सकें,
शिक्षा के हर भवन को सुरक्षित बना सकें।
पहले सुरक्षा अनिवार्य, फिर अनुमति का नाम,
वरना हर दुर्घटना पर होगा तुम पर इल्ज़ाम।
हर कमरे में रोशनी, हर मंज़िल पर द्वार,
हर बच्चे के जीवन का हो पूरा अधिकार।
शिक्षा यदि व्यापार बनी, लाभ हुआ भगवान,
तो फिर हर वर्ष जलेंगे ऐसे ही अरमान।
देश नहीं चलता केवल भाषण और प्रचार,
देश बनाता है उसको पढ़ता हुआ परिवार।
जिस दिन छात्र सुरक्षित होंगे, होगा सच्चा विकास,
वरना झूठे नारों का मिट जाएगा इतिहास।
मत पूछो कितने मरे, यह संख्या का खेल नहीं,
हर बच्चा एक ब्रह्मांड है, कोई साधारण मेल नहीं।
उठो, समय की माँग यही, अब मत और विलंब करो,
भारत के भविष्य की रक्षा का संकल्प धरो।
वरना आने वाली पीढ़ी यह प्रश्न उठाएगी
“जब सपने जलते थे तब सत्ता कहाँ सो पाई थी?”
और इतिहास तुम्हारे माथे पर यह लिख जाएगा,
“जिसने बच्चों को खोया, वह राष्ट्र रोता रह जाएगा।”

नीदरलैंड की सैर

आओ तुमको आज चलें,
नीदरलैंड घुमाएँ,
सपनों-सा यह सुंदर देश,
मिलकर तुम्हें दिखाएँ।
जहाँ हवाओं में घुली हैं
मीठी-मीठी कथाएँ,
राजा-रानी, परियों वाली
बचपन की स्मृतियाँ गाएँ।
पवनचक्कियाँ गुनगुनातीं
मधुर पवन के गीत,
सरल हृदय के लोग यहाँ,
जैसे सच्चे मीत।
नहरों, पुलों, सागर का
अनुपम सुंदर मेल,
साइकिल की मुस्कान
लिए चलता जीवन-रेल।
ऐम्सटर्डम राजधानी,
रंगों का उत्सवधाम,
कला-संग्रहालयों से
जग में पाया ऊँचा नाम।
दिन हो चाहे रात सुहानी,
जीवन रहता जाग,
हर संस्कृति को बाँहों में भर,
देता प्रेम अनुराग।
देनहॉग प्रशासन का केंद्र,
राजमहल की शान,
यहीं से संसद करती
पूरे देश का सम्मान।
मदुरोदाम की छोटी दुनिया,
अद्भुत उसका रूप,
एक ही पल में देख लो,
पूरे देश का स्वरूप।
हरे-भरे खेतों में लहराएँ
सुनहरी फसलें,
ऋतुओं संग मुस्काती
रहतीं धरती की हलचलें।
ट्यूलिप की रंग-बिरंगी
सौ-सौ से भी अधिक जात,
धरती ओढ़े इंद्रधनुषी
फूलों की सौगात।
समुद्र तट पर लहरें गाएँ
जीवन का संगीत,
स्खेवनीगेन ( स्केवेनिंगन) के
तट पर खिल उठता मन-गीत।
नीले जल की गहराई में
अद्भुत जीव अपार,
प्रकृति जैसे खोल रही हो
अपना अनुपम द्वार।
आलू, गाजर, चीज़,
हारिंग मछली सबके मन के मीत,
हर भोजन में घुला हुआ
अपनापन का प्रीत।
लकड़ी के जूते, बौनों वाली
बचपन की पहचान,
लोककथाएँ आज भी
देतीं संस्कृति का मान।
प्रेम यहाँ की सबसे बड़ी
जीवन की पहचान,
माता-पिता, दादा-दादी
पाते ऊँचा सम्मान।
संस्कारों की अमिट
धरोहर पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाए,
अपनी भाषा, अपनी संस्कृति
हर मन में बस जाए।
दुनिया भर से आए लोग
रहते मिलकर साथ,
भेदभाव की धूप न छूती
प्रेम भरी हर बात।
ईमानदारी, सौहार्द्र और
विश्वासों की छाँव,
मानवता का पाठ पढ़ाता
यह सुंदर-सा गाँव।
गर्मी जब मुँह छिपा लेती,
शीत बने तब रानी,
चारों ऋतुएँ लिखती
रहतीं प्रकृति की नई कहानी।
बारिश, धूप और इंद्रधनुष
का अनूठा है व्यवहार,
इसीलिए तो लगता
सबको यह देश बड़ा सुकुमार।
ऐसे प्यारे देश में मैं अपना घर पाती हूँ,
हर ऋतु में इसकी खुशबू
अपने मन में गाती हूँ।
अब विदा की बेला आई,
फिर होगी मुलाकात,
“दुई दुई !” कहकर देती
हैं प्रेम भरा यह साथ।

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