पाँच मुक्तक ( गीत ) : बालस्वरूप ‘राही’

1.

मेरा विश्वास पराजय को ज़हर होता है
मेरा उल्लास उदासी को क़हर होता है
मुझे घिरते हुए अँधियारे की परवाह क्या
मेरी हर रात का अंजाम सहर होता है

2.

आज बदली है ज़माने ने नई ही करवट
नई धरा ने विचारों का छुआ है युग तट
तुम जिसे मौत की आवाज़ समझ बैठे हो
नए इनसान के क़दमों की है बढ़ती आहट

3.

इन चमकदार कतारों पे नज़र रखती हूँ
सुर्ख़ बेदाग अँगारों पे नज़र रखती हूँ
दे के मिट्टी के खिलौने मुझे बहकाओ न तुम
मैं जवानी हूँ सितारों पे नज़र रखती हूँ

4.

दूर तक एक भी आता है मुसाफ़िर न नज़र
ये भी मालूम नहीं रात है ये या के सहर
मेरे अस्तित्व के बस दो ही चिह्न बाक़ी हैं
एक बुझता-सा दिया, एक उजड़ती-सी नज़र

5.

जिसके जीने से जी रहे थे हम
दर्द का दम निकल गया शायद
एक मुद्दत में नींद आई है
मौत का दिल पिघल गया शायद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »