प्रदक्षिणाम पदे पदे : डॉ. गरिमा संजय दुबे

संसार का आदि तीर्थ, आदि कर्मकांड कदाचित परिक्रमा ही है। परिक्रमा अथवा प्रदक्षिणा की परंपरा और महत्व देखने चलते हैं तो पता लगता है इस ब्रह्मांड की पहली आध्यात्मिक यात्रा परिक्रमा या प्रदक्षिणा ही है । समस्त गृह, नक्षत्र, तारे, आकाशगंगा एक वर्तुल घेरे में एक दूसरे की परिक्रमा ही तो कर रहे हैं, यह परिक्रमा ही गति है, यही ऊर्जा, यही परिणाम। सामान्य जीवन में भी किसी वस्तु को वर्तुल आकार में जोर जोर से घुमाया जाए तो ऊर्जा उत्पन्न होती है। देख लीजिए हर मशीन का कल पुर्जा वर्तुल गति में ही गतिमान है, यह प्रदक्षिणा ही ऊर्जा उत्पत्ति का मूल सिद्धांत है। पवन चक्कियां गोल गोल ही घूमती हैं, टरबाइन गोल गोल घूमते हैं पंखे गोल गोल ही घूमते हैं, रसोई में भोजन को मिलाती गृहणी का हाथ गोल गोल ही घूमता है, वाहनों के चक्के गोल गोल घूमते हैं, ऊर्जा उत्पन्न करने वाले जितने यंत्र हैं वे सामान्यतः गोलाकार ही होते हैं। संपूर्ण सृष्टि वृताकार मार्ग में ही गति कर रही है, प्रकारांतर से ब्रह्मांड का हर तत्व किसी न किसी केंद्र की परिक्रमा ही कर रहा है, यही परिक्रमा उसकी जीवनी शक्ति है और केंद्र उसकी परिक्रमा का हेतु। केंद्र न हो तो… तनिक विचार करके देखिए जो केंद्र न हो तो। संपूर्ण संसार का नाभि स्थल उसकी ऊर्जा का जनक है, और ऊर्जा उसी केंद्र के आसपास वर्तुल क्षेत्र में विस्तार पाती है। विज्ञान कहता है हर क्षण हर पल हर परिक्रमा का केंद्र भी परिवर्तित हो रहा है, जिसकी हम परिक्रमा कर रहे हैं वह भी किसी न किसी की परिक्रमा में ही है, उसी से परिवर्तनशील है जगत, कुछ परिवर्तन बहुत प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं जैसे दिन और रात, जैसे मौसम का बदलाव, किंतु इतने विस्तृत अनंत ब्रह्मांड में और भी बहुत कुछ बदलता है जो हमारी दृष्टि में नहीं आता ।
यही परिक्रमा ब्रह्मांड की चालाक शक्ति है, कदाचित इन्हीं सबको सोचकर मनुष्य के मन में आया होगा कि जो परिक्रमा ही कर रहे हैं तो अब अपने देवों की, तीर्थों की परिक्रमा से भी ऊर्जा पाई जा सकती है, वे भी तो केंद्र ही हैं, तबसे वह धरती की तरह ही परिक्रमा करने लगा, स्वयं के अक्ष पर वह कहीं न कहीं तो घूम ही रहा है, और घूमते घूमते उसने अपने देवों की मंदिरों की, नदियों की, पर्वतों की परिक्रमा प्रारंभ कर दी। देव घर चाहे किसी भी धर्म के हों मनुष्य निर्मित हैं, किंतु नदी, पहाड़, वृक्ष तो मनुष्य ने नहीं बनाए, ये सब प्रकृति के स्थिर तत्व हैं। जब सम्पूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है तो ये स्थिर दिखाई देते हैं, जैसे वे स्वयं केंद्र हों, तो चलायमान सृष्टि के बीच ये स्थिर तत्व उन्हें देवताओं से ही जान पड़े और उन्होंने इनकी परिक्रमा प्रारंभ कर दी। पर्वतों की परिक्रमा उनसे जुड़ी कथाओं से प्रभावित होकर की मनुष्य ने की या उनकी स्थिरता से अपने जीवन में स्थिरता पाने का जतन था, या अपनी गति से उन्हें गति देने का प्रयास, कौन जाने। नदियों की गति से अपने जीवन को गति देने की चेष्टा थी या नदी के समानांतर चलते चलते गतिहीनता के आभास के साथ स्थिरता पाने का जतन, कौन जाने। आइंस्टाइन का सापेक्षता का सिद्धांत कहता है न एक गति से समानांतर दो पिंड गति कर रहे हों तो एक दूसरे के सापेक्ष वे गतिहीन दिखाई देते हैं, तो नदी की धार के साथ चलते चलते कब स्थिरता उपलब्ध हो जाती है यह प्रदक्षिणा वालों के अनुभव से जाना जा सकता है। चल तो दोनों रहे होते हैं किंतु गतिहीनता का अनुभव आत्म साक्षात्कार सा अनुभव ही देता है। पर्वत की स्थिरता के सापेक्ष चलते चलते कब गतिमान दिखाई देने लगता है पर्वत पता ही नहीं चलता, जैसे चलती बस से स्थित पर्वत वृक्ष गतिमान दिखाई देते हैं।
तो क्या यह कहा जा सकता है कि जीवन में गति से स्थिरता प्राप्त करने का जतन है परिक्रमा।
स्थिरता में भी गति का साधन है परिक्रमा।

किंतु इतना तो निश्चित है कि मनुष्य परजीवी प्राणी है और देने से अधिक लेने की कामना से युक्त होता है, जब स्वयं के जीवन में घूर्णन अधिक होने लगे तो एक परिक्रमा कर भीतर के घूर्णन को स्थिरता प्रदान करने का विचार ही किया होगा उसने। भीतर के घूर्णन को बाहरी घूर्णन से संयत करने के जतन, यही परिक्रमा का फल भी है, सब घूर्णन शांत हो जाते हैं।
परिक्रमा का शब्द साम्य पराक्रम से भी बनता है। उसमें कुछ भी गलत नहीं है, पराक्रमी ही परिक्रमा कर सकता है, नि:संदेह यह देह का पराक्रम नहीं है, यह मन का, आत्मा का, अध्यात्म का पराक्रम है जो परिक्रमा की राह पर लेकर जाता है। किंतु देह का निरादर भी ठीक नहीं, देह भी स्वस्थ तो होनी ही चाहिए, उतने भर के पराक्रम का यश देह के हिस्से आया है, क्योंकि हमने बहुत जर्जर देह वालों को भी बहुत ऊर्जा से परिक्रमा करते पाया है, यह भीतर का ताप ही है, यह आत्मा का पराक्रम ही है जो देह की सीमा का अतिक्रमण कर जाता है ।
देह के नाभि स्थल के आस पास ही तो ऊर्जा चक्र है, यूं कुंडलिनी भी तो वर्तुल ही है, उसकी वर्तुल ऊर्जा ही तो उर्ध्वगामी होकर चक्र भेदती हुई सहस्त्रार तक पहुंचती है, चक्र की परिक्रमा, ऊर्जा का घूर्णन। कहते हैं वह भी घूमती हुई ही उर्ध्वगामी होती है, हरिकेन की तरह, स्प्रिंग के आकर में गति करती हुई। तो देह अथवा तन तो प्रथम साधन है, मन दूसरा, चित्त तीसरा और चेतना अंतिम, तो करना ही है तो सर्वप्रथम स्वयं की अंत: परिक्रमा की जानी चाहिए, वैसे देखा जाए तो एक उलटबांसी के रूप में अपनी बात कहूं, अपनी परिक्रमा करने को ही, अपने भीतर की गति मति को जानने के लिए ही तो मनुष्य बाहरी परिक्रमा करता है, है ना। जो स्वयं की परिक्रमा कर लेता है उसे बाहरी परिक्रमा या प्रदक्षिणा की क्या आवश्यकता। किंतु हर कोई इतना चेतना सम्पन्न तो नहीं होता, इसलिए मन के थोड़े से धक्के से भी किसी भौतिक प्रदक्षिणा का प्रारंभ कर देता है कोई तो धीरे धीरे अपने को पा ही लेगा इसलिए बाह्य प्रदक्षिणा का महत्व भी अनंत है। इसलिए ही तो हमारे सभी धर्मों में किसी एक को केंद्र मानकर प्रदक्षिणा की परंपरा है। या तो स्वयं को केंद्र मानकर, अपने सूक्ष्म को केंद्र मानकर अपनी यात्रा प्रारंभ हो, या किसी बाह्य अवलंब से प्रदक्षिणा प्रारंभ हो, मूल कारण है स्वयं द्वारा स्वयं के केंद्र का परिचय पा लेना। केंद्र से जुड़कर होने वाली प्रदक्षिणा पूर्णता पाती है, केंद्र से विमुख होने वाली गति का परिक्रमा मार्ग उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है, वह केंद्र से दूर होता हुआ अंततः ब्लैक होल में समा जाता है। जो केंद्र से विमुख हुआ वह कहीं का नहीं रहा, प्रदक्षिणा इसलिए अपने केंद्र की स्मृति का भी एक साधन है। जो मनुष्य अपने केंद्र को अपने मूल को जान लेता है वह उसी की प्रदक्षिणा से तर जाता है। अंतरिक्ष में भटकते हुए, भूल वश यदि अपनी परिधि से बाहर कोई निकल जाता है तो वह अनंत काल तक भटकता ही रहेगा, कोई वापसी संभव नहीं। केंद्र से विमुखता विनाश रचती है, अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा, अपने ध्येय से विमुख होना भी विनाश ही रचता है। आशा तो यही की जाती है कि मनुष्य अपनी मानवता के केंद्र से विमुख न हो, किंतु व्यवहार में देखने में आता है कि मनुष्य समस्त काल्पनिक केंद्रों से जुड़ने का जतन अधिक करता है मानवता के केंद्र से विमुख तो मनुष्य हो ही चुका है और यही इस संसार की नहीं, इस पूरी सृष्टि की त्रासदी है। मानवता के केंद्र से विमुख मनुष्य सम्पूर्ण सृष्टि में हाहाकार उत्पन्न करता है। मुझे तो समस्त आसुरिक प्रवृत्तियां केंद्र से विमुख शक्तियां ही जान पड़ती हैं। जो केंद्र से विमुख है वह असुर है।

कबीर ने कस्तूरी की बात कही,

कस्तूरी कुंडली बसै मृग ढूंढे बन माहि।
ऐसे घटी घटी राम हैं दुनिया देखै नाहि ।।

उसी कस्तूरी की खोज के लिए मनुष्य परिक्रमा करता है, और परिक्रमा से अपनी नाभि का ज्ञान पा लेता है।
प्रदक्षिणाम पदे पदे, फाया कुन फाया कुन,
गोवर्धन परिक्रमा, नर्मदा परिक्रमा, पांच कोशी, अष्ट विनायक, नर्मदा, गंगा, कैलाश परिक्रमा और हर देव स्थल के समीप बने हुए प्रदक्षिणा मार्ग वस्तुतः मानव जीवन की उस अनंत यात्रा के मार्ग ही हैं जिसमें वह इन यात्राओं और प्रदक्षिणाओं के माध्यम से अपने मूल को जानने का अभिलाषी होता है। नृत्य की भंगिमाएं भी परिक्रमा पथ ही तो रचती हैं, वह भी तो एक साधन है, अपने मूल को जानने का। विवाह में अग्नि की परिक्रमा, यज्ञ की परिक्रमा, मृत्यु पश्चात शव की परिक्रमा, चिता की परिक्रमा, यहां भी परिक्रमा से परम तत्व को याद किया जाता है।

यूं परिक्रमा या प्रदक्षिणा का व्यावहारिक भौतिक पक्ष देखें तो यह प्रकृति के निकट जाने का, संस्कृतियों के मेल मिलाप का, और सात्विक जीवन शैली के महत्व को जानने का प्रयास भी रहा। न केवल आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए अपितु परिक्रमा, प्रदक्षिणा पथ से होकर गुजरना आपको सांस्कृतिक, राष्ट्रीय, लोक जीवन, विविध परंपराओं और सरल ग्राम्य जीवन की झांकी देखने का, जीवन के आदर्श, मूल्य और सरलता से परिचित भी करवाता है।
सर्वप्रथम परिक्रमा का उल्लेख आर्ष ग्रंथों में पाया जाता है, श्री गणेश ने तो पिता महादेव और माता पार्वती की परिक्रमा करके ही अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी थी। यूं महादेव पार्वती ही तो केंद्र हैं समूची सृष्टि का आप उन्हें किसी भी नाम से पुकारें, शिव और शक्ति, कल्याण और ऊर्जा, क्या यही दो केंद्र नहीं होने चाहिए जीवन के, ऊर्जा का कल्याण हेतु प्रयोग, क्या यही अर्थ नहीं है इनका। धर्म कहां आड़े आता है इसमें, ऊर्जा का क्या धर्म होता है, कल्याण की क्या कोई जाति होती है।
अब यदि नाम से आप उसे केवल सनातन हिन्दू परम्परा का ही हिस्सा मानें तो यह बहुत संकीर्ण दृष्टि होगी।
न केवल भारतीय संस्कृति अपितु विश्व की हर संस्कृति में विभिन्न परिक्रमा, प्रदक्षिणा मार्ग सभी मनुष्यों की जीवन, मृत्यु, स्वयं के अस्तित्व, ईश्वर, शांति के प्रति तीव्र जिज्ञासा का ही तो प्रमाण है। “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” से आकुल होकर ही जीव इस खोज में निकलता है, समस्त कर्मकांड, यात्राएं परिक्रमा इसी जिज्ञासा की पूर्ति का साधन मात्र हैं। यूं जीवन स्वयं एक प्रदक्षिणा ही तो है, जन्म से लेकर मृत्यु तक, आगमन से लेकर निर्गमन तक और पुर्नआगमन तक क्या मानव स्वयं, नित्य एक परिक्रमा में नहीं है।
यही मंत्र पढ़ा जाता है न, परिक्रमा ईश्वर प्राप्ति, आत्म साक्षात्कार और प्रायश्चित स्वरूप एक साधन ही तो है,
यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणा पदे-पदे

यदि इस जीवन रूपी परिक्रमा को ही संपूर्ण समर्पित भाव से कर सकें तो प्रदक्षिणा का फल निश्चित है, और वह फल है उसी केंद्र में समा जाना जिसकी प्रदक्षिणा कर रहे हैं, जिसे जिज्ञासु साधक मोक्ष कहते हैं।

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