दिन विशेष विमर्श में शालिनी वर्मा की कविता-पाठ
पिछले 25 वर्षों से दोहा, कतर में हिंदी लेखन, भाषा एवं साहित्य में सेवारत शालिनी वर्मा के लेखन में भारतीय संस्कृति और भारतीय जनमानस छलकता है। शालिनी जी का मानना है कि जिसकी जड़ रहती है, वही वृक्ष बचता है। उनकी कविताओं जड़ों की ओर लौटने की कविताएँ हैं।

स्त्रियों का मन
ये स्त्रियाँ क्यों कभी मन की नहीं करती
क्यों कभी अपने दिल की नहीं कहती?
टाँक देती हैं फूलों को हर पैबंद पर
दीवारों से गिरती पपड़ी को ढक देती है
तुरप देती है उधड़न होती जिंदगी
सबके सपनों को बुनती जाती हैं
घर को संभालती हैं ,सहेजती हैं
घर को घर सा ये बना देती हैं
कभी ये सूटकेस के ताले की पासवर्ड सी
खुद को बंद कर लेती हैं
पर जब खुलती है तो माँ के बटुए जैसी
लुटाती जाती हैं सब कुछ एक मुस्कान पर
पहाड़ सा भार मन में दबा लेती है
फूलों सी दिखती हैं पर चट्टान उठा लेती हैं
नमक की डली आँखों में छिपा खिलखिलाती हैं
दुपट्टे के छोर में गठान बाँध के खींच लाती बारिशों को
पल-छिन की सुई में डाल के धूप का धागा
एक नरम सी सुबह को बुन लाती हैं
हवा को बांध स्कार्फ़ के जैसे तितली सी उड़ जाती हैं
कुछ नहीं करती बस सबसे प्रेम करती जाती है
सोचती बहुत है बोलती बहुत है
पर अंदर से कहीं चुप होती जाती है
सूनी आँखों में उठते प्रश्नों को देखती है
पर उम्मीद को अपने में जिंदा रखती हैं
न मन हो फिर भी मुस्कराती जाती हैं
आँसू छिपा दर्द के ख़ुशी छलकाती जाती हैं
ख़ुशी बिखराती जाती हैं
चाहे अनचाहे सवालों में घुटती जाती हैं
एक तारीफ के बोल को तरस जाती हैं
खुश करने को सबको बस
करती ही जाती हैं बस करती ही जाती हैं
ये स्त्रियाँ क्यों सबके मन की करती हैं
ये क्यों कभी अपने मन की नहीं करतीं l
पर मैं बाकी स्त्रियों सी नहीं बनना चाहती
रानी लक्ष्मी बाई सी लड़ना चाहती हूँ,
बस आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।
हाथ फैलाना नहीं है मंज़ूर मुझको,
इसलिए आत्मनिर्भर बनना चाहती हूँ।
अपने निर्णय स्वयं लेना चाहती हूँ,
कभी अपने भी मन का करना चाहती हूँ,
स्त्री हूँ पर आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।
समाज में सबका अधिकार है,
पत्नी माँ और बेटी से अलग भी,
मेरी पहचान है, अपनी पहचान को,
पूरे जग को बताना चाहती हूँ,
स्त्री हूँ पर आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।
बोलने का अधिकार चाहती हूँ,
पहनावे पर, अकेले सफ़र करने पर,
कोई कटाक्ष नहीं चाहती हूँ,
स्त्री हूँ पर आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।
अब अपने भी मन का करना चाहती हूँ,
मेरे बाबा
बाबा तुम मुझे बहुत याद आते हो
तुम हम बच्चों को डराते थे पर
फिर प्यार से गले भी मिलाते थे
तुम्हारा बात बात पर मुस्कुराना
और फिर कहना
अरे ललली तू तो मेरे गले का हार है
अब ये कहने वाले तुम नहीं मिलते
बात बात पर प्यार जताते, दौड़कर आते, अपनी छोटी छोटी बातें बताते,
मेरी चीजों को देखकर इतराते
मेरे बाबा, अब तुम नहीं मिलते
मुझे याद है जब तुम मुझे डराते थे
मेरी हालत देखकर तुम कितना मुस्कुराते थे, पर अब हँसी आती है उन नादानी पर
अब मैं छोटी बच्ची नहीं, पर बाबा आपकी वही बच्ची बनना चाहती हूँ,
उन गलियों में फिर से खेलना चाहती हूँ
वे गलियाँ तो वही हैं पर उस
गली के नुक्कड़ पर खड़े अब तुम नहीं मिलते
मेरे लिए अलग से चीजें लाने वाले और
मुझे आँखों से ही समझाने वाले अब तुम नहीं दिखते
मैं कब ये कहती हूँ कि तुम ग़ुस्से वाले नहीं थे
हाँ तुम ग़ुस्से वाले भी थे
चार बात सुनाने वाले भी तुम थे,
पर बात सुनाने के बाद मुस्कुराने वाले भी तुम थे
हाँ बाबा अब तुम उस ग़ुस्से के साथ भी नहीं मिलते,
मेरे बाबा अब तुम मुझे नहीं मिलते
जो ये कहते थे बात -बात पर,
लो बिटिया तू तो विदेश चली जाएगी
कहाँ हमारे गाँव तू आएगी
वो बात बात पर बातें सुनाने वाले
मेरे बाबा अब तुम नहीं मिलते
अब अम्मा के पास जब जाती हूँ
तुम्हारी खटिया ख़ाली दिखती है
अपने हाथों को मलती मेरी अम्मा अब पहले सी नहीं लगती है
सूने चेहरे से मुझे देखती मेरी अम्मा अब बदल सी गयी हैं
घंटों बातें करने वाली पाँच मिनट भी मुश्किल से बतियाती है
पर अब बस सुनती है
बात बात पर सब सही है यही बताती हैं
शायद वे सोचती होंगी कि तुम कहाँ चले गए
पर मैं कुछ नहीं कहती आँखें ही सब कह देती हैं
बाबा के ख़ाली कोने को घूरती अम्मा की आँखें ही सब कह देती हैं
मेरे बाबा अब कहीं नहीं मिलते
पर ये हर बिटिया के मन में रह जाती है
जब उसे उसके बाबा नहीं मिलते
दरवाज़े पर खड़े हाथ हिलाकर विदा करते
जब बाबा नहीं दिखते
मुझे गले का हार बताने वाले मेरे बाबा अब मुझे नहीं मिलते
