दिन विशेष विमर्श में युवा रचनाकार गोलेन्द्र पटेल की कविताएं

गोलेन्द्र पटेल समकालीन हिन्दी के महत्त्वपूर्ण युवा कवि-लेखक हैं, जिनकी रचनाधर्मिता जनपक्षधरता, प्रतिरोध और सामाजिक न्याय की प्रखर चेतना से निर्मित है। उनकी कविताएँ शोषित, दलित, किसान, स्त्री, आदिवासी, अल्पसंख्यक, गरीब और मेहनतकश समाज की सशक्त आवाज़ बनकर व्यवस्था की विसंगतियों को बेनकाब करती हैं। वे सत्ता के गुणगान के बजाय उसके विवेकपूर्ण प्रतिरोध के कवि हैं, जिनके लिए साहित्य सत्य की प्रतिष्ठा और जनजागरण का माध्यम है। उनकी भाषा सहज, तीक्ष्ण और लोकजीवन से संपृक्त है, जो कृत्रिम रूमानीपन से मुक्त होकर जनता के दुःख और संघर्ष को अभिव्यक्ति देती है। गाँव, श्रम, सामाजिक यथार्थ और मानवीय अस्मिता उनकी कविता के मूल सरोकार हैं। गोलेन्द्र पटेल की रचनाएँ सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विडम्बनाओं पर सशक्त आलोचनात्मक हस्तक्षेप करती हैं तथा समतामूलक, मानवीय और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना का स्वप्न प्रस्तुत करती हैं। उनकी साहित्यिक दृष्टि भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और परिवर्तन का विश्वसनीय स्रोत है। – प्रखर शर्मा

परिचय: उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के ग्राम खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय के निवासी हैं। साहित्य एवं रचनात्मक अभिरुचियों से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत में निवासरत हैं। ईमेल corojivi@gmail.com

प्रेम-तीर्थ के पथ पर प्रेमचंद से प्रार्थना

प्रिय धनपतराय!
अपनी पीढ़ी की सीढ़ी पर चढ़ता हुआ
मेरा कवि मुझसे कह रहा है कि
काश कि सभी को पता होता कि
विश्वास के आकाश में गजब का प्रकाश है
पर भयभीत भाषा में यथार्थ का विनाश है!

हे रव के रवि!
क्या कथा में चरित्र की छद्म छवि
उद्देश्य की ‘सौत’ है?

जब भी देखा
जर्जर वस्त्र में देह का दीपक अधिक देखा
फटे जूते में अनंत ‘समर-यात्रा’ का पथिक देखा
शायद पिता अजायबराय प्रसिद्ध पोस्टमैन थे
बाल्यकाल में ही दुनिया के लेखकों से परिचित
कलम का सच्चा सिपाही देखा

जब भी सुना मैंने
‘सूरा’ और ‘होरी’ की तबाही सुनी
‘गोबर’ और ‘धनिया’ की गवाही सुनी
‘बुधिया’ की चीख सुनी
मनुष्यता की मिट्टी में उगी ईख की सीख सुनी

और सुना
‘सोजेवतन’ में ‘बलिदान’ का गान
सार्थक स्वर का स्वाभिमान
‘अफसाना कुहन’, ‘कफ़न’ ,’सद्गति’, ‘सेवासदन’, ‘निर्मला’
‘प्रेरणा’, ‘कायाकल्प’, ‘सवा सेर गेहूँ’, ‘प्रेम-पचीसी’,
‘ईदगाह’, ‘पंच-परमेश्वर’, ‘परीक्षा’ , ‘बालक’ , ‘नमक का दरोगा’, ‘प्रेमाश्रम’
‘बड़े घर की बेटी’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘रंगभूमि’, ‘गोदान’, ‘गबन’ व ‘कर्बला’
‘आत्माराम’! इनमें भारतीय आत्मा की आवाज़ है
सारे संसार की स्याह संस्कृति का संपूर्ण समाज है

तुम्हारी स्वतंत्रता की चाहत में
एक अलग तरह का स्वराज है
‘सोफिया’ से लेकर ‘मालती’ तक, ‘विनय’ से लेकर ‘मेहता’ तक
सभी के बीच ‘गोविंदी’ के गुणों की चर्चा है
बहुत मिठी मिठाई मर्चा है
कुर्सी पर ‘जॉन’ की जगह ‘जयसिंह’ का परचा है
स्वच्छंद, निस्पृह और विचारशील व्यक्ति की दृष्टि
सृष्टि की सेवा में दृश्य धुनती है
और सुबह-शाम सागर में मोती चुनती है
जहाँ विचारोत्कर्ष है सौंदर्य का वास्तविक शृंगार

‘सर्वहारा वीर’ तो तुम नहीं थे
दिशाहारा तो तुम नहीं थे
राहहारा तो तुम नहीं थे
हे गद्य के तुलसी! हे कथा सम्राट! हे कहानीकार!
थे तुम ‘बलिदान-पथ’ के चिरंजीवी चिंतक
तुम्हारे सोच की सृजन में शामिल रहे
‘गोर्की’ और ‘लूशुन’ के विचार

हे दलित के दीपक! हे गाँव के गायक!
हे नर के नायक!
दोस्त-दुश्मन की पहचान थी तुम्हें खूब
बूढ़ी महाजनी सभ्यता और
मरजाद की बेड़ियों को काटने की कला
भला कौन नहीं सीखना चाहता है?
तुमने सीखाया क्रांति के पक्ष में खड़ा होना
तुमने सीखाया बुरे वक्त में बुद्धि से बड़ा होना

हे चेतना के चिराग!
तुमने लगाई शोषकों के महल में आग
तुमने गाया सदा रोशनी का राग
तुमने सीधी-साधी बात सीधी-साधी जनता को
सरल-सहज-सरस भाषा में समझाया

हे सत्य के साधक!
परिवर्तन के युद्ध के बुद्ध!
स्नेह, समता, न्याय से प्रतिबद्ध, साहित्य के सूर्य!
ज़िन्दगी की तान के तूर्य!
तुम्हारी कथा की धमनियों में धरती की धुन,
खेतों की ख़ुशबू, विविध फूलों के रंग, नदी की उमंग
और भोर का भक्त नक्त है, संवेदना सशक्त है
शहर का राजनीतिक रक्त है, वाया वक्त है

हे ‘शतरंज के खिलाड़ी’!
अँधेरे में मानवता की मणि!
गगन भी गाता है तुम्हारा गौरव गीत, हे मुंशी मीत!
लमही से आ रही है जय की लय
तुम्हारे शब्द दुख की दुपहरी में वृक्ष बन गए
और तुम्हारी प्रोक्ति ‘लाल फीता’ का बंधन तोड़ने की ‘प्रेम-प्रतिज्ञा’
तुमसे हर आदमी आदमी होने का हुनर हासिल करता है

हे ‘प्रेम सरोवर’ के अरुण कमल!
तुम स्वप्न, संघर्ष व साहस के स्रष्टा हो
तुम भविष्य द्रष्टा हो
तुमने बताया, ‘एक गिलास पानी’ का महत्व
__’नवजीवन’ का तत्व
चारों ओर दुविधा और दहशत का धुआँ है
‘गंगी’ के पति ‘जोखू’ के सामने मौत का कुआँ है
जी हाँ, जो एक ‘ठाकुर का कुआँ’ है

हे ऋषि-कथाकार प्रेमचंद!
कहानी के अद्वितीय छंद!
संकल्प के अभियान में तब्दील होना
असल में आगामी प्रलय की प्रयोगशाला में पुरखों को बोना है
हवा नहीं है अनुकूल
परिवेश है प्रतिकूल
मैं तुम को बो रहा हूँ कविता की क्यारी में किसान की तरह
तन-मन से बहुत जतन से, साधना के सपूत!

हे मानस के हंस!
‘नवनिधि’ के ‘मंगल सूत्र’!
नये ‘संग्राम’ में ‘प्रेम की वेदी’ पर चढ़ने की शक्ति दो मुझे!
मैं ‘कर्मभूमि’ में ‘पूस की रात’ का ‘हल्कू’ हूँ
‘प्रेम-प्रमोद’ की गोद में ले लो मुझे
आज ‘प्रेम-पंचमी’ है परसों नागपंचमी
‘प्रेम-तीर्थ’ के पथ पर
मुझ अबोध पाठक की यही प्रार्थना है रोज़
कि हर सुबह हर घर खिले ‘सप्तसुमन’ व ‘सप्त सरोज’!

मेरा दुःख मेरा दीपक है

जब मैं अपनी माँ के गर्भ में था
वह ढोती रही ईंट
जब मेरा जन्म हुआ वह ढोती रही ईंट
जब मैं दुधमुंहाँ शिशु था
वह अपनी पीठ पर मुझे
और सर पर ढोती रही ईंट

मेरी माँ, माईपन का महाकाव्य है
यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उसका बेटा हूँ
मेरी माँ लोहे की बनी है
मेरी माँ की देह से श्रम-संस्कृति के दोहे फूटे हैं
उसके पसीने और आँसू के संगम पर
ईंट-गारे, गिट्टी-पत्थर,
कोयला-सोयला, लोहा-लक्कड़ व लकड़ी-सकड़ी के स्वर सुनाई देते हैं

मेरी माँ के पैरों की फटी बिवाइयों से पीब नहीं,
प्रगीत बहता है
मेरी माँ की खुरदरी हथेलियों का हुनर गोइंठा-गोहरा
की छपासी कला में देखा जा सकता है

मेरी माँ धूल, धुएँ और कुएँ की पहचान है
मेरी माँ धरती, नदी और गाय का गान है
मेरी माँ भूख की भाषा है
मेरी माँ मनुष्यता की मिट्टी की परिभाषा है
मेरी माँ मेरी उम्मीद है

चढ़ते हुए घाम में चाम जल रहा है उसका
वह ईंट ढो रही है
उसके विरुद्ध झुलसाती हुई लू ही नहीं,
अग्नि की आँधी चल रही है
वह सुबह से शाम अविराम काम कर रही है
उसे अभी खेतों की निराई-गुड़ाई करनी है
वह थक कर चूर है
लेकिन उसे आधी रात तक चौका-बरतन करना है
मेरे लिए रोटी पोनी है, चिरई बनानी है
क्योंकि वह मजदूर है!

अब माँ की जगह मैं ढोता हूँ ईंट
कभी भट्ठे पर, कभी मंडी का मजदूर बन कर शहर में
और कभी-कभी पहाड़ों में पत्थर भी तोड़ता हूँ
काटता हूँ बोल्डर बड़ा-बड़ा
मैं गुरु हथौड़ा ही नहीं
घन चलाता हूँ खड़ा-खड़ा

टाँकी और चकधारे के बीच मुझे मेरा समय नज़र आता है
मैं करनी, बसूली, साहुल, सूता, रूसा व पाटा से संवाद करता हूँ
और अँधेरे में ख़ुद बरता हूँ दुख

मेरा दुख मेरा दीपक है!

मैं मजदूर का बच्चा हूँ
मजदूर के बच्चे बचपन में ही बड़े हो जाते हैं
वे बूढ़ों की तरह सोचते हैं
उनकी बातें
भयानक कष्ट की कोख से जन्म लेती हैं
क्योंकि उनकी माँएँ
उनके मालिक की किताबों के पन्नों पर
उनका मल फेंकती हैं
और उनके बीच की कविता सत्ता का प्रतिपक्ष रचती है।

मेरी माँ अब वही कविता बन गयी है
जो दुनिया की ज़रूरत है!

चोकर की लिट्टी

मेरे पुरखे जानवर के चाम छीलते थे
मगर, मैं घास छीलता हूँ

मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ
मेरे सिर पर
चूल्हे की जलती हुई कंडी फेंकी गयी
मैंने जलन यह सोचकर बरदाश्त कर ली
कि यह मेरे पाप का फल है
(शायद अग्निदेव का प्रसाद है)

मैं पतली रोटी नहीं,
बगैर चोखे का चोकर की लिट्टी खाता हूँ

चपाती नहीं,
चिपरी जैसी दिखती है मेरे घर की रोटी
मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ

मुझे हमेशा कोल्हू का बैल समझा गया
मैं जाति की बंजर ज़मीन जोतने के लिए
जुल्म के जुए में जोता गया हूँ
मेरी ज़िंदगी देवताओं की दया का नाम है
देवताओं के वंशजों को मेरा सच झूठ लगता है
मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ

मैं कैसे किसी देवता को नेवता दूँ?
मेरे घर न दाना है न पानी
न साग है न सब्जी
न गोइंठी है न गैस
मुझे कुएँ और धुएँ के बीच सिर्फ़ धूल समझा जाता है
पर, मैं बेहया का फूल हूँ
देवी-देवता मुझे हालात का मारा और वक्त का हारा कहते हैं
मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ

देखो न देव, देश के देव!
मैं अब भी चोकर का लिट्टा गढ़ रहा हूँ,
चोकर का रोटा ठोंक रहा हूँ
क्या तुम इसे मेरी तरह ठूँस सकते हो?
मैं भाषा में अनंत आँखों की नमी हूँ
मैं दक्खिन टोले का आदमी हूँ

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