पद्मश्री कैलाशचंद्र पंत : स्मृति शेष — मनोज कुमार श्रीवास्तव

मनुष्य की मृत्यु का समाचार हमेशा एक ही बात नहीं कहता। कभी वह केवल यह बताता है कि एक शरीर ने अपना काम पूरा कर लिया। कभी वह किसी परिवार के शोक का कारण बनता है। और कभी-कभी वह ऐसा मौन रच देता है जिसमें एक पूरे युग की पदचाप सुनाई देने लगती है। ऐसे अवसरों पर लगता है कि मृत्यु किसी व्यक्ति को नहीं ले गई; उसने हमारे जीवन का एक ऐसा हिस्सा काट लिया है जिसके सहारे हम स्वयं अपने अतीत को पहचानते थे। कुछ लोग जीवन भर सामने नहीं खड़े रहते, वे हमारे पीछे खड़े रहते हैं। हम आगे देखते रहते हैं, पर हमारी पीठ पर रखा उनका विश्वास हमें गिरने नहीं देता। उनके चले जाने के बाद पहली बार पता चलता है कि हमारी यात्रा में वह अदृश्य सहारा कितना बड़ा था।

दादा कैलाशचंद्र पंत के जाने का समाचार मेरे लिए ऐसा ही है। अभी तो तीन दिन पहले ही उनसे मिलकर लौटा था। समय कभी-कभी इतना निर्मम होता है कि स्मृति और वर्तमान के बीच कोई दूरी ही नहीं रहने देता। तीन दिन पहले की वह मुलाक़ात अब अंतिम मुलाक़ात बन चुकी थी—यह बात स्वीकार करने में ही मन को समय लग रहा था।

उस दिन उनके कमरे में प्रवेश करते ही एक ऐसी निस्तब्धता मिली जो सामान्य बीमारी की नहीं थी। देह जैसे अपने भीतर किसी अदृश्य संघर्ष से गुजर रही थी। आँखों में पहचान थी, स्नेह भी था, पर एकाग्रता बार-बार छूट जा रही थी। शब्द होंठों तक आते थे, किन्तु स्पष्ट ध्वनि में नहीं बदल पाते थे। जीवन भर जिसने भाषा की सेवा की हो, जिसकी साधना ही शब्द रही हो, उसकी वाणी का इस प्रकार धीरे-धीरे मौन में विलीन होना भीतर तक विचलित कर देने वाला अनुभव था। ऐसा लग रहा था मानो शब्द अपने साधक से विदा लेने में संकोच कर रहे हों।

उस क्षण मुझे कोई बड़ी बात सूझी नहीं। मनुष्य जब अत्यन्त असहाय हो जाता है तब उसके भीतर के संस्कार उसके लिए निर्णय लेते हैं। मैं उनके समीप बैठ गया। उनके कान के निकट झुका और धीरे-धीरे हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा। मुझे नहीं मालूम कि उस समय वे कितना सुन पा रहे थे। यह भी नहीं जानता कि उनके चित्त तक वे शब्द पहुँच रहे थे या नहीं। परन्तु यह अवश्य अनुभव कर रहा था कि जीवन भर हिन्दी के अक्षरों को अपनी साधना का माध्यम बनाने वाले उस तपस्वी के लिए विदा की बेला में शब्दों का सबसे पवित्र रूप यही हो सकता था—भक्ति, विश्वास और स्मरण का रूप।

कभी-कभी मनुष्य बोल नहीं पाता, पर सुनता रहता है। और कभी वह सुन भी नहीं पाता, फिर भी उसके भीतर संस्कार सुनते रहते हैं। मुझे लगता है कि उस दिन मैं दादा को नहीं, उनके भीतर जीवन भर जागती रही उस भारतीय सांस्कृतिक चेतना को हनुमान चालीसा सुना रहा था जिसने उन्हें गढ़ा था। शायद अंतिम क्षणों में मनुष्य भाषा नहीं सुनता, भाषा के पीछे का विश्वास सुनता है।

आज वे नहीं हैं।

किन्तु क्या सचमुच नहीं हैं?

यह प्रश्न मृत्यु के बाद बार-बार उठता है। देह का न होना और व्यक्ति का न होना एक ही बात नहीं है। कुछ लोग अपने जीवन का इतना बड़ा अंश दूसरों में बाँट देते हैं कि उनके जाने के बाद उन्हें खोजने के लिए श्मशान नहीं जाना पड़ता; उन लोगों के पास जाना पड़ता है जिनके जीवन को उन्होंने छुआ था। उनके बनाए हुए संस्थानों में जाना पड़ता है। उन पुस्तकों के पन्ने उलटने पड़ते हैं जिन्हें उन्होंने जन्म दिया। उन विद्यार्थियों की आँखों में झाँकना पड़ता है जिन्हें उन्होंने अवसर दिया। उन सभागारों में बैठना पड़ता है जहाँ उनकी आवाज़ अब भी दीवारों में गूँजती रहती है।

दादा उन्हीं लोगों में थे।

जब से उनके जाने का समाचार मिला है, मेरे भीतर बार-बार हिन्दी भवन की सीढ़ियाँ उतरती-चढ़ती रही हैं। ऐसा लगता है कि स्मृति भी किसी भवन की तरह होती है। उसमें कई कमरे होते हैं। एक कमरे में छात्र जीवन बैठा रहता है। दूसरे में गुरु। तीसरे में मित्र। चौथे में संघर्ष। पाँचवें में उपलब्धियाँ। और इन सबके बीच कहीं एक ऐसा कमरा होता है जहाँ कोई व्यक्ति नहीं, केवल उसकी उपस्थिति रहती है। दादा की स्मृति मेरे भीतर ऐसे ही एक कमरे में रहती है।

मैं सोचता हूँ, मेरे जीवन का कितना बड़ा भाग अनजाने ही हिन्दी भवन से जुड़ता चला गया। छात्र जीवन में शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो जब मैं भोपाल की किसी न किसी पुस्तकालय में न गया होऊँ। उस समय पुस्तकालय मेरे लिए केवल किताबें रखने की जगह नहीं थे; वे संसार को समझने की प्रयोगशाला थे। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अनुभव होता है कि मेरी जितनी शिक्षा विश्वविद्यालयों ने नहीं दी, उससे कहीं अधिक उन पुस्तकालयों ने दी जहाँ कोई उपस्थिति दर्ज नहीं होती थी, कोई अंक नहीं मिलते थे, कोई प्रमाणपत्र नहीं दिया जाता था। वहाँ केवल मनुष्य अपने और पुस्तकों के बीच बैठा रहता था। वही सबसे बड़ा विश्वविद्यालय था।

हिन्दी भवन मेरे महाविद्यालय के सबसे निकट था। इसलिए वहाँ जाना एक सुविधा से आरम्भ हुआ और धीरे-धीरे एक संस्कार बन गया। उस समय कहाँ मालूम था कि यह भवन आगे चलकर मेरे जीवन की आत्मकथा का भी एक अध्याय बन जाएगा। तब मैं केवल एक विद्यार्थी था। पुस्तकों के बीच घूमता, पत्रिकाएँ उलटता, लेखकों के नाम याद करता, नए विचारों के पीछे भागता हुआ एक जिज्ञासु युवक। मुझे यह भी नहीं मालूम था कि इन गलियारों में चलने वाला यह युवक एक दिन उसी भवन में सम्पादकीय दायित्व निभाएगा।
जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह पहले बीज बोता है, अर्थ बाद में बताता है।
उस समय हिन्दी भवन केवल एक भवन था। आज समझ में आता है कि वह भवन नहीं, एक संस्कार-पीठ था। वहाँ केवल पुस्तकें नहीं थीं; वहाँ उन लोगों का तप संचित था जिन्होंने हिन्दी को अपना जीवन बना दिया था। उन दिनों मैं जिन अलमारियों के सामने खड़ा होकर पुस्तकें खोजता था, आज लगता है कि वे केवल लकड़ी की अलमारियाँ नहीं थीं; वे अनेक पीढ़ियों की साधना की मौन साक्षी थीं।

और उन सबके बीच एक दिन दादा कैलाशचंद्र पंत भी मेरे जीवन में उसी सहजता से आ गए, जैसे किसी पुराने वृक्ष की छाया धीरे-धीरे चलने वाले पथिक को बिना बताए अपने भीतर ले लेती है। उस समय शायद मैं भी नहीं जानता था कि आगे चलकर यह परिचय केवल परिचय नहीं रहेगा; वह आत्मीयता में बदलेगा, विश्वास में बदलेगा और अन्ततः ऐसी स्मृति में बदल जाएगा जिसे मृत्यु भी छीन नहीं सकेगी।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मनुष्य का जीवन घटनाओं से नहीं बनता, उन व्यक्तियों से बनता है जो उन घटनाओं को अर्थ देते हैं। यदि हिन्दी भवन मेरे लिए एक तीर्थ है, तो इसलिए नहीं कि वहाँ पुस्तकें हैं, व्याख्यान हैं या सभागार हैं। इसलिए कि वहाँ दादा जैसे लोग थे जिन्होंने ईंटों और पुस्तकों के बीच एक आत्मा प्रतिष्ठित की थी।

इमारतें बनाना कठिन है, संस्थाएँ बनाना उससे कठिन; पर सबसे कठिन है किसी संस्था के भीतर ऐसा वातावरण रचना कि वहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को सम्मानित, प्रेरित और अपने से बड़े किसी उद्देश्य का सहभागी अनुभव करे। दादा का सबसे बड़ा चमत्कार यही था। उन्होंने हिन्दी भवन को केवल संचालित नहीं किया; उसमें एक नैतिक ताप, एक सांस्कृतिक ऊष्मा और एक आत्मीयता का ऐसा वातावरण बनाया कि जो भी वहाँ आता, वह अपने भीतर कुछ लेकर लौटता।
आज जब वे नहीं हैं, तब पहली बार समझ में आता है कि संस्थाएँ भवनों से नहीं, मनुष्यों के चरित्र से जीवित रहती हैं।

और कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं जो स्वयं किसी संस्था की आत्मा बन जाते हैं। दादा कैलाशचंद्र पंत ऐसे ही मनुष्य थे। किसी भी मनुष्य के जीवन में कुछ स्थान ऐसे होते हैं जिनका पता हम किसी नक्शे पर नहीं खोजते। वे भीतर बस जाते हैं। वर्षों बाद भी यदि आँखें बंद कर लें, तो उनके बरामदे, उनकी सीढ़ियाँ, उनकी खिड़कियों से आती धूप, पुरानी पुस्तकों की मिली-जुली गंध और वहाँ बैठे हुए लोगों के चेहरे वैसे ही दिखाई देने लगते हैं जैसे कल की बात हो। वे स्थान भौगोलिक नहीं रह जाते; वे स्मृति के भूगोल का हिस्सा बन जाते हैं।
मेरे लिए हिन्दी भवन ऐसा ही एक स्थान है।
आज जब दादा कैलाशचंद्र पंत की स्मृतियाँ भीतर उमड़ रही हैं, तब अनुभव होता है कि मैं वास्तव में दादा को याद नहीं कर रहा; मैं अपने जीवन के उस पूरे कालखंड को फिर से जी रहा हूँ जिसके बीच वे एक शांत, अविचल और स्नेहमय उपस्थिति की तरह विद्यमान थे। स्मृति का भी अपना न्याय होता है। वह व्यक्तियों को अलग-अलग नहीं रखती; वह उन्हें उनके परिवेश, उनके समय और उनके संस्कारों के साथ याद करती है। इसलिए दादा की स्मृति आते ही हिन्दी भवन सामने आ खड़ा होता है।
छात्र जीवन में मेरा एक विचित्र-सा नियम था। कक्षाओं से जितना सीखता था, उससे अधिक सीखने के लिए पुस्तकालयों की ओर निकल पड़ता था। भोपाल का शायद ही कोई बड़ा पुस्तकालय रहा होगा जहाँ मैं नियमित न गया होऊँ। उस समय यह केवल पढ़ने का आग्रह था; आज समझ में आता है कि वह अपने समय के श्रेष्ठ मस्तिष्कों के साथ मौन संवाद करने की साधना थी। पुस्तकें कभी केवल जानकारी नहीं देतीं; वे मनुष्य के भीतर प्रश्न पैदा करती हैं। और प्रश्न ही अंततः व्यक्ति को उसके वास्तविक बौद्धिक जीवन की ओर ले जाते हैं।
उस समय भोपाल का सांस्कृतिक वातावरण भी कुछ और था। पुस्तकालयों में बैठना किसी विचित्र शौक़ की बात नहीं मानी जाती थी। व्याख्यानों में युवा चेहरे दिखाई देते थे। साहित्य, रंगमंच, संगीत और विचार—इन सबके बीच एक स्वाभाविक आवाजाही थी। शहर केवल बसाहट नहीं था; वह एक जीवित सांस्कृतिक संवाद था। उसी संवाद के बीच हिन्दी भवन मेरे लिए धीरे-धीरे एक दूसरे घर की तरह बनता चला गया।

मेरे महाविद्यालय से उसकी दूरी इतनी कम थी कि वहाँ जाना किसी विशेष योजना का विषय नहीं होता था। कभी कोई नई पत्रिका देखने चला गया, कभी किसी पुस्तक की खोज में, कभी किसी व्याख्यान को सुनने और कभी केवल वहाँ के वातावरण में कुछ समय बैठने के लिए। तब यह कहाँ मालूम था कि एक दिन यही भवन मेरे जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण साहित्यिक संबंधों का केन्द्र बन जाएगा।

मैं आज की पीढ़ी को यह बात शायद पूरी तरह समझा भी न सकूँ कि उस समय किसी पुस्तकालय में जाकर एक नई पत्रिका या पुस्तक हाथ लग जाना भी किसी उत्सव से कम नहीं होता था। पुस्तकें उस समय केवल बाज़ार की वस्तु नहीं थीं; वे खोजी जाती थीं, प्रतीक्षा की जाती थीं। किसी नए लेखक का लेख मिल जाए, किसी दुर्लभ पुस्तक का संस्करण दिखाई दे जाए, किसी व्याख्यान की सूचना मिल जाए—ये सब घटनाएँ थीं। ज्ञान तब उपभोग की वस्तु नहीं था; वह अर्जित किया जाने वाला सौभाग्य था।

हिन्दी भवन की अलमारियों के बीच चलते हुए मुझे अक्सर लगता था कि पुस्तकों के भी अपने-अपने स्वभाव होते हैं। कुछ पुस्तकें बुलाती हैं, कुछ चुनौती देती हैं, कुछ चुपचाप प्रतीक्षा करती हैं कि कब कोई उन्हें पढ़े। उन्हीं अलमारियों के बीच मेरी अपनी बौद्धिक दृष्टि आकार ले रही थी। आज यदि मेरे भीतर विविध विषयों के बीच संबंध देखने की प्रवृत्ति है, यदि साहित्य मेरे लिए केवल साहित्य नहीं बल्कि इतिहास, समाज, दर्शन और संस्कृति का भी द्वार है, तो उसकी जड़ें उन दिनों की अनगिनत दोपहरों में हैं।

मनुष्य अपने जीवन में बहुत-सी डिग्रियाँ प्राप्त करता है, पर कुछ शिक्षाएँ ऐसी होती हैं जिनका कोई प्रमाणपत्र नहीं मिलता। हिन्दी भवन ने मुझे ऐसी ही शिक्षा दी। उसने यह सिखाया कि पुस्तकें पढ़ना पर्याप्त नहीं, पुस्तक-संस्कृति में जीना भी आवश्यक है। किसी समाज की आत्मा उसकी भाषा में बसती है, और भाषा की आत्मा उसके साहित्य में। इसीलिए जो समाज अपने पुस्तकालयों को जीवित रखता है, वह वास्तव में अपनी स्मृति को जीवित रखता है।

इन्हीं दिनों मेरे जीवन में एक और सौभाग्य आया—डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय का सान्निध्य। गुरु केवल वह नहीं होता जो ज्ञान देता है; गुरु वह होता है जो किसी युवा के भीतर छिपी संभावना को उससे पहले पहचान लेता है। मेरे साहित्यिक जीवन में प्रभाकर जी का स्थान ऐसा ही रहा। जब हिन्दी भवन से ‘अक्षरा’ निकालने का निर्णय हुआ और वे उसके प्रथम सम्पादक बने, तब उन्होंने जो विश्वास मुझ पर किया, वह मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था।

पहले अंक के मुद्रण का कार्य लेकर मुझे उज्जैन जाना था। आज की पीढ़ी को यह साधारण बात लग सकती है, पर मेरे लिए वह यात्रा केवल एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा नहीं थी। वह मेरी साहित्यिक यात्रा का पहला पड़ाव था। पहली बार भोपाल से बाहर निकलना, एक पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया को इतने निकट से देखना, शब्दों के जन्म के पीछे छिपे श्रम को समझना—इन सबने मेरे भीतर लेखन के प्रति एक नया सम्मान पैदा किया।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि किसी युवा को दिया गया छोटा-सा उत्तरदायित्व भी उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। गुरु ने केवल मुझे उज्जैन नहीं भेजा था; उन्होंने मुझे विश्वास की एक ऐसी राह पर भेजा था जहाँ से लौटकर मैं पहले जैसा नहीं रह सकता था।

कुछ समय बाद ‘अक्षरा’ के तीसरे अंक में रामचंद्र सिंहदेव की पुस्तक Civilisation in a Hurry का मेरे द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद ‘सभ्यता हड़बड़ी में’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। पहली बार अपने अनुवाद को उस गरिमा के साथ छपा हुआ देखना आज भी स्मृति में ताज़ा है। किसी लेखक के लिए अपनी पहली प्रकाशित रचना केवल प्रकाशित शब्द नहीं होती; वह स्वयं अपने अस्तित्व की एक सार्वजनिक स्वीकृति होती है। ऐसा लगता है कि अब आपकी आवाज़ केवल आपके भीतर नहीं रही; वह समाज के संवाद का भी हिस्सा बन गई है।

उस समय मुझे यह अनुमान भी नहीं था कि आगे चलकर यही ‘अक्षरा’ मेरे जीवन में बार-बार लौटेगी। कभी लेखक के रूप में, कभी सहयोगी के रूप में और अंततः उसके सम्पादकीय दायित्व के रूप में। जीवन कितना अद्भुत वृत्त बनाता है! जो युवक कभी उस पत्रिका का अंक हाथ में लेकर प्रसन्न हुआ था, वही वर्षों बाद उसके भविष्य की चिंता करने वालों में शामिल होगा—यह तब किसने सोचा होगा?

इन सब स्मृतियों के बीच दादा कैलाशचंद्र पंत का व्यक्तित्व धीरे-धीरे उभरता है। उस समय वे मेरे जीवन के केन्द्र में नहीं थे, पर जैसे किसी विशाल वृक्ष की छाया धीरे-धीरे बिना शोर किए फैलती जाती है, वैसे ही उनकी उपस्थिति भी हिन्दी भवन के वातावरण में अनुभव होने लगी। कुछ लोग बोलकर प्रभाव नहीं छोड़ते; वे अपने काम करने के ढंग से, अपने व्यवहार से और अपनी निरंतरता से एक ऐसी विश्वसनीयता अर्जित कर लेते हैं कि समय स्वयं उनका परिचय बन जाता है।

बाद के वर्षों में मैं शासकीय दायित्वों के कारण भोपाल से दूर चला गया। नियुक्तियाँ बदलती रहीं, नगर बदलते रहे, जीवन नई-नई दिशाओं में बहता रहा। प्रत्यक्ष संपर्क स्वाभाविक रूप से कम हुआ। पर आज सोचता हूँ कि कुछ संबंध दूरी से टूटते नहीं, केवल मौन हो जाते हैं। वे भीतर अपनी जगह बनाए रखते हैं और उचित समय आने पर वहीं से फिर बोलने लगते हैं जहाँ से कभी रुके थे।

मुझे तब कहाँ पता था कि इस मौन के उस पार दादा लगभग अठारह वर्षों तक हिन्दी भवन की ज्योति को बिना किसी प्रदर्शन के जलाए रखे हुए हैं। वे केवल एक संस्था नहीं चला रहे थे; वे एक सांस्कृतिक परंपरा की लौ की रक्षा कर रहे थे। और मैं, अपनी-अपनी यात्राओं में व्यस्त, अभी उस तप की गहराई को पूरी तरह पहचान नहीं पाया था।

समय को शायद यही स्वीकार्य था कि दादा को मैं पहले संस्था के माध्यम से जानूँ, व्यक्ति के माध्यम से नहीं। क्योंकि कुछ व्यक्तित्वों को समझने के लिए उनके शब्द पर्याप्त नहीं होते; उनके द्वारा निर्मित वातावरण को पढ़ना पड़ता है। दादा उन्हीं दुर्लभ लोगों में थे। उन्हें जानना, हिन्दी भवन की आत्मा को जानना था; और हिन्दी भवन को समझना, उस मौन तप को समझना था जो बिना किसी शोर के दशकों तक जलता रहा।

समय मनुष्य को अनेक दिशाओं में ले जाता है। कभी वह हमें लोगों से मिलाता है, कभी उन्हीं लोगों से दूर भी कर देता है। बीच के वर्षों में मैं अपनी शासकीय जिम्मेदारियों में उलझा रहा। स्थान बदलते रहे, दायित्व बढ़ते रहे, जीवन का अधिकांश भाग प्रशासनिक व्यस्तताओं में बीतता गया। साहित्य से संबंध कभी टूटा नहीं, पर उसका स्वरूप बदल गया। लेखक भीतर बना रहा, किन्तु अधिकारी बाहर अधिक दिखाई देता था।

उधर भोपाल में एक और साधना बिना किसी शोर के चल रही थी।

दादा कैलाशचंद्र पंत लगभग अठारह वर्षों तक हिन्दी भवन के प्रहरी बने रहे थे। आज जब उस अवधि के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि उन्होंने केवल किसी संस्था का प्रशासन नहीं संभाला; उन्होंने समय के एक अत्यन्त कठिन मोड़ पर एक सांस्कृतिक परंपरा को जीवित रखा। किसी संस्था को स्थापित करना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक कठिन है उसे निरन्तर जीवित रखना। आरम्भ में उत्साह साथ देता है; बाद में केवल तप साथ देता है। दादा ने वही तप किया।

‘अक्षरा’ का नियमित प्रकाशन, व्याख्यानमालाओं की परंपरा, साहित्यकारों का सम्मान, नए लेखकों को अवसर, पत्रकारिता और साहित्य के बीच संवाद, हिन्दी भवन की सार्वजनिक विश्वसनीयता—ये सब अपने-आप नहीं बने रहे। इनके पीछे एक ऐसा व्यक्ति था जो प्रतिदिन अपने हिस्से का श्रम चुपचाप करता था और कभी उस श्रम का श्रेय नहीं माँगता था।

मुझे अनेक बार लगता है कि हमारे समाज में हम भवनों का उद्घाटन करने वालों को याद रखते हैं, पर उन लोगों को भूल जाते हैं जो वर्षों तक प्रतिदिन दरवाज़े खोलते और बंद करते हैं, जिनके कारण संस्थाएँ साँस लेती रहती हैं। इतिहास प्रायः शिलान्यास लिखता है; पर सभ्यता उन लोगों के कंधों पर टिकी रहती है जो प्रतिदिन बिना किसी घोषणा के उसकी देखभाल करते हैं। दादा ऐसे ही लोगों में थे।
उनका व्यक्तित्व मुझे हमेशा एक बात के कारण विलक्षण लगता था—वे अपने काम को कभी अपने व्यक्तित्व का विस्तार नहीं बनने देते थे। आज का समय व्यक्ति को संस्था से बड़ा बना देने का समय है। लोग संस्था का उपयोग अपने नाम के लिए करते हैं। दादा इसके ठीक विपरीत थे। वे अपने नाम को संस्था में इस प्रकार विलीन कर देते थे कि अंततः दोनों एक-दूसरे के पर्याय बन जाते थे। यदि कोई हिन्दी भवन कहता, तो अनायास दादा का स्मरण हो जाता; और यदि कोई दादा का नाम लेता, तो उसके पीछे हिन्दी भवन की पूरी सांस्कृतिक यात्रा दिखाई देने लगती।

इसी बीच मेरे लेख अक्षरा में प्रकाशित होते रहे। पावस व्याख्यानमाला हो या शरद व्याख्यानमाला, उनका निमंत्रण समय-समय पर आता रहता। वर्षों की दूरी के बाद भी आत्मीयता में कभी कोई औपचारिकता नहीं आई। यह दादा की एक अद्भुत विशेषता थी। वे संबंधों को निभाते नहीं थे; वे उन्हें जीते थे।
संस्कृति विभाग में सचिव के रूप में जब मेरा उनसे अधिक निकट संपर्क हुआ, तब मैंने उनके व्यक्तित्व का एक और आयाम देखा। प्रशासन में प्रायः व्यक्ति और पद के बीच दूरी समाप्त हो जाती है। लोग पद से संवाद करते हैं, व्यक्ति से नहीं। दादा उन विरले लोगों में थे जो हर पद के पीछे बैठे मनुष्य से बात करते थे। उनके लिए आपका वर्तमान पद महत्त्वपूर्ण नहीं था; आपकी आंतरिक प्रतिबद्धता महत्त्वपूर्ण थी। इसीलिए उनसे बातचीत में कभी औपचारिकता का बोझ नहीं आता था। वे विषय पर बात करते थे, व्यक्ति पर विश्वास करते थे और उद्देश्य को केंद्र में रखते थे।

उनके भीतर राष्ट्र के प्रति गहरी निष्ठा थी। पर वह निष्ठा घोषणाओं की नहीं थी। उसमें एक शांत आत्मविश्वास था। वे बार-बार कहते थे कि राष्ट्र केवल राजनीतिक संरचना नहीं है; वह अपनी भाषा, अपने साहित्य, अपनी स्मृतियों, अपने तीर्थों, अपने लोकगीतों और अपने जीवन-मूल्यों का समुच्चय है। इसीलिए वे ‘राष्ट्रवाद’ शब्द से अधिक ‘भारत-बोध’ कहना पसंद करते थे। उस समय यह शब्द उतना प्रचलित नहीं था जितना आज है, पर दादा के लिए वह केवल शब्द नहीं, जीवन-दृष्टि था।

मैंने उनके भीतर कभी किसी भाषा के प्रति अवमानना नहीं देखी। वे हिन्दी के लिए संघर्ष करते थे, पर अन्य भारतीय भाषाओं के विरुद्ध नहीं। उनके मन में एक गहरी समझ थी कि भारतीय भाषाएँ किसी वृक्ष की अलग-अलग शाखाएँ नहीं, बल्कि एक ही जड़ से निकली हुई जीवन-धाराएँ हैं। हिन्दी यदि बड़ी होगी तो सबको साथ लेकर; यदि अकेली खड़ी होगी तो वह भी छोटी हो जाएगी। यह दृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

फिर समय ने एक ऐसा दृश्य रचा जिसे मैं अपने जीवन की सबसे मूल्यवान स्मृतियों में गिनता हूँ। मैं सेवा से निवृत्त हो चुका था। कोरोना की विभीषिका धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी। लोग फिर मिलने लगे थे। संस्थाएँ अपने पुराने जीवन की ओर लौट रही थीं। ऐसे ही एक दिन सूचना मिली कि दादा आने वाले हैं।
मैंने सहज ही सोचा कि शायद किसी कार्यक्रम या किसी औपचारिक चर्चा के लिए आ रहे होंगे।

पर वे जिस उद्देश्य से आए थे, उसने मुझे भीतर तक छू लिया।

आज भी वह दृश्य उतनी ही स्पष्टता से आँखों के सामने उपस्थित हो जाता है। दादा घर में प्रवेश करते हैं। वही सरल मुस्कान। वही संयत चाल। वर्षों का अनुभव, आयु का गौरव और जीवन-भर की साधना उनके व्यक्तित्व में एक अद्भुत गरिमा भर चुके थे; किन्तु उस गरिमा में कहीं भी दूरी नहीं थी। वह ऐसी गरिमा थी जो सामने वाले को छोटा नहीं करती, उसे अपने बराबर बैठा लेती है।

कुछ औपचारिक बातें हुईं। फिर उन्होंने बिना किसी भूमिका के कहा—
“हम तो आपके सेवानिवृत्त होने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। अब आप ‘अक्षरा’ के प्रमुख संपादक का दायित्व संभालिए।”

मैं कुछ क्षण उन्हें देखता ही रह गया।

वास्तव में मुझे शब्द नहीं मिले।

क्योंकि उस समय मेरे सामने कोई प्रस्ताव नहीं था; मेरे सामने विश्वास बैठा था।

मैं सोच रहा था— वे चाहते तो एक संदेश भेज देता। फ़ोन कर देते। किसी सहयोगी से कहलवा देते कि अमुक दिन आ जाइए। मैं उसी क्षण चला जाता। आयु का, पद का, अनुभव का—हर दृष्टि से उन्हें यह अधिकार था।

पर वे स्वयं आए थे।
यही दादा थे।

उनके लिए आग्रह का सबसे विश्वसनीय रूप स्वयं चलकर जाना था।

उनके भीतर शायद यह संस्कार था कि यदि किसी से सहयोग माँगना है तो उसे सम्मान देकर माँगना चाहिए। आदेश से सहयोग मिल सकता है; आत्मीयता नहीं। दादा आत्मीयता अर्जित करते थे।

उस दिन मेरी पत्नी ने उन्हें पहली बार इतने निकट से देखा। वे जैसे ही बैठक में आए, वह सहज ही उनके चरणों में झुक गई। मैंने उसके चेहरे पर जो भाव देखे, वे केवल किसी वरिष्ठ व्यक्ति के प्रति सम्मान के नहीं थे। वह उस तेजस्विता के प्रति स्वाभाविक प्रणति थी जो बिना किसी प्रदर्शन के जीवन-भर की साधना से जन्म लेती है।

संयोग भी कितना अद्भुत था!

हिन्दी भवन ही वह स्थान था जहाँ छात्र जीवन में हम दोनों पहली बार मिले थे। हमारे जीवन की एक अत्यंत निजी स्मृति भी उसी भवन से जुड़ी थी। मेरे गुरु की स्मृतियाँ भी वहीं थीं। मेरी साहित्यिक यात्रा का आरम्भ भी वहीं से हुआ था। और अब उसी भवन का प्रतिनिधि बनकर दादा मेरे घर आए थे। ऐसा लगा मानो हिन्दी भवन स्वयं अपने एक पुराने विद्यार्थी को पुकारने आया हो।

किन्तु उस दिन का सबसे मार्मिक क्षण अभी शेष था।

जब बातचीत समाप्त होने लगी, तब दादा ने अत्यन्त सहज स्वर में कहा—
“मैं आपकी सहमति लेकर ही यहाँ से जाऊँगा।”

यह वाक्य मैंने सुना, पर उसके भीतर छिपे संस्कार को समझने में मुझे वर्षों लग गए।

आज के समय में लोग अधिकार लेकर आते हैं। दादा विश्वास लेकर आए थे।

आज लोग कहते हैं—”यह निर्णय हो चुका है।”
दादा ने कहा—”आपकी सहमति लेकर ही जाऊँगा।”

यही एक वाक्य उनके पूरे व्यक्तित्व का परिचय है।

विनम्रता को लोग प्रायः कमजोरी समझ लेते हैं। पर भारतीय परंपरा में विनम्रता दुर्बलता नहीं, आत्मबल का सर्वोच्च रूप है। जो व्यक्ति अपने भीतर से निश्चिंत होता है, वही झुक सकता है। असुरक्षित व्यक्ति हमेशा अकड़ा रहता है। दादा इसलिए झुकते थे क्योंकि उनके भीतर किसी प्रकार का भय नहीं था—न पद खोने का, न प्रतिष्ठा कम होने का, न अहं के आहत होने का।

उस दिन मैंने अनुभव किया कि संस्थाएँ केवल नियमों से नहीं चलतीं, वे विश्वास से चलती हैं। और विश्वास आदेश देकर नहीं कमाया जाता; उसे अपने आचरण से अर्जित करना पड़ता है।
दादा ने जीवन भर वही अर्जित किया था।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस दिन वे मुझे केवल अक्षरा का दायित्व सौंपने नहीं आए थे। वे एक परंपरा मेरे हाथों में रख रहे थे। वे कह रहे थे—”इसे केवल संपादित मत करना, इसे जीवित रखना।”

आज जब वे स्वयं नहीं हैं, तब उस दिन का वह वाक्य और भी अधिक गूंजता है।

कुछ लोग दायित्व सौंपते नहीं, उत्तराधिकार सौंपते हैं।

दादा ने मुझे पद नहीं दिया था।उन्होंने विश्वास दिया था।

और मनुष्य के जीवन में विश्वास से बड़ा कोई पुरस्कार नहीं होता।

मनुष्य के विचार पुस्तकों से बनते हैं, पर उसके संस्कार भूमि से बनते हैं। विचार बदले जा सकते हैं; संस्कार धीरे-धीरे पीढ़ियों के रक्त में उतरते हैं। किसी व्यक्ति के भीतर यदि कोई मूल्य सहज रूप से दिखाई देता है, तो उसके पीछे केवल उसका निजी पुरुषार्थ नहीं होता; उसके पीछे उसके घर का वातावरण, उसकी मातृभाषा, उसके लोकगीत, उसके पर्व, उसके पहाड़, उसकी नदियाँ और उसकी सभ्यता का दीर्घ संस्कार काम करता है।

दादा कैलाशचंद्र पंत को जितना निकट से जानने का अवसर मिला, उतना ही यह अनुभव गहरा होता गया कि उनके व्यक्तित्व को केवल हिन्दी-सेवा, पत्रकारिता या संस्था-निर्माण के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उनके भीतर एक ऐसी सांस्कृतिक धारा प्रवाहित थी जिसकी जड़ें बहुत गहरे उत्तराखण्ड की देवभूमि में थीं। वे उस भूमि के केवल निवासी नहीं थे; वे उसके संस्कारों के वाहक थे।

मुझे आज भी अपनी उत्तराखण्ड-यात्रा स्मरण है। पत्नी के साथ अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए बार-बार एक बात मन को छूती रही थी। वहाँ केवल मंदिरों में ही देवत्व नहीं था; साधारण मनुष्यों के व्यवहार में भी एक अनकही पवित्रता थी। किसी छोटे से चायघर में बैठा व्यक्ति, किसी पगडंडी पर मिलता ग्रामीण, किसी धर्मशाला का सेवक—उनके व्यवहार में एक ऐसी विनम्रता थी जो किसी औपचारिक शिष्टाचार से नहीं आती। वह जीवन के भीतर बसे हुए धर्म से आती है। वह धर्म जो उपदेश नहीं देता, व्यवहार बनकर जीता है।

दादा से मिलते हुए मुझे बार-बार उसी देवभूमि की स्मृति आती थी।

उनकी विनम्रता बनावटी नहीं थी। वह अर्जित भी नहीं थी। वह उनके व्यक्तित्व से वैसे ही निकलती थी जैसे हिमालय से नदियाँ निकलती हैं—स्वाभाविक, निस्पृह और जीवनदायिनी।

आज के समय में जब हम किसी व्यक्ति की पहचान उसके विचारों के आधार पर करने लगे हैं, तब दादा का जीवन हमें याद दिलाता है कि विचारों से पहले मनुष्य का आचरण बोलता है। उन्होंने भारत की बात कही, पर उससे कहीं अधिक भारत को जिया।

मैंने अनेक अवसरों पर उन्हें ‘राष्ट्रवाद’ शब्द की अपेक्षा ‘भारत-बोध’ शब्द का प्रयोग करते हुए सुना। पहली दृष्टि में यह केवल शब्दों का अंतर प्रतीत हो सकता है, किन्तु वास्तव में यह दो दृष्टियों का अंतर है। राष्ट्रवाद कभी-कभी राजनीति की भाषा में भी व्यक्त हो सकता है; भारत-बोध राजनीति से कहीं व्यापक सांस्कृतिक अनुभव है। उसमें वेद भी हैं, बुद्ध भी हैं; कबीर भी हैं, तुलसी भी; शंकर भी हैं, नानक भी; तमिल की संगम परंपरा भी है और कश्मीर का शैव दर्शन भी। भारत-बोध किसी एक विचारधारा का घोष नहीं, सहस्राब्दियों की सांस्कृतिक स्मृति का अनुभव है।

दादा का भारत इसी व्यापक अर्थ में भारत था।
इसीलिए उनका हिन्दी-प्रेम भी किसी प्रकार की भाषायी स्पर्धा पर आधारित नहीं था। वे हिन्दी को उसका सम्मान दिलाना चाहते थे, पर किसी दूसरी भारतीय भाषा की कीमत पर नहीं। वे समझते थे कि भारत की भाषाएँ परस्पर प्रतिद्वन्द्वी नहीं, परस्पर अनुवादक हैं। वे एक-दूसरे की शत्रु नहीं, एक-दूसरे की सहयात्री हैं। यदि बांग्ला, मराठी, तमिल, कन्नड़, असमिया, मलयालम, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत और हिन्दी एक-दूसरे को समृद्ध करेंगी, तभी भारत की सांस्कृतिक आत्मा समृद्ध होगी। हिन्दी का वैभव अकेले नहीं बढ़ सकता; वह तभी बढ़ेगा जब वह अपने भीतर समूचे भारत की भाषिक चेतना के लिए स्थान बनाए रखे।
यह दृष्टि आज के समय में और भी अधिक महत्त्वपूर्ण लगती है।

भाषा यदि केवल अधिकार की भाषा बन जाए तो वह विभाजन उत्पन्न करती है; यदि वह आत्मीयता की भाषा बने तो वह सेतु बन जाती है। दादा हिन्दी को सेतु बनाना चाहते थे।
इसी प्रकार वे हिन्दी भवन को भी केवल वरिष्ठ साहित्यकारों के संवाद का मंच बनाकर संतुष्ट नहीं थे। वे जानते थे कि यदि कोई संस्था केवल अपने अतीत का उत्सव मनाती रहे और भविष्य की पीढ़ियों से संवाद न करे, तो वह धीरे-धीरे अपने ही वैभव का संग्रहालय बन जाती है। परंपरा का अर्थ केवल संरक्षण नहीं, संवर्धन भी है; और संवर्धन का अर्थ है—नई पीढ़ी को उसमें सहभागी बनाना।

शायद इसी चिंता ने उन्हें बार-बार युवाओं की ओर लौटाया।

एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि हिन्दी भवन को युवाओं के बीच जाना चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले प्रतिभाशाली युवाओं को मार्गदर्शन मिलना चाहिए। साहित्य और समाज के बीच जो दूरी बढ़ती जा रही है, उसे कम करना होगा। उनके आग्रह पर हमने निःशुल्क मार्गदर्शन की योजना आरम्भ की। बहुत-से युवा आए। उन्हें केवल परीक्षा की तैयारी नहीं मिली; उन्हें यह भी अनुभव हुआ कि साहित्यिक संस्थाएँ केवल कविताएँ सुनाने की जगह नहीं, जीवन गढ़ने की जगह भी हो सकती हैं।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि यह निर्णय भी दादा के दूरदर्शी व्यक्तित्व का प्रमाण था। वे जानते थे कि यदि हिन्दी भवन केवल साहित्यकारों का भवन बना रहेगा, तो उसकी उपयोगिता सीमित हो जाएगी। पर यदि वही भवन युवाओं की आकांक्षाओं, उनके संघर्षों और उनके भविष्य का साथी बन जाए, तो वह फिर से समाज के बीच अपना स्वाभाविक स्थान प्राप्त कर लेगा।

यह सोच किसी प्रशासकीय रणनीति से नहीं आती।

यह सोच उस व्यक्ति के भीतर जन्म लेती है जो संस्था को अपने जीवन का विस्तार नहीं, समाज की धरोहर मानता है।

जीवन में ऐसे अवसर भी आए जब कुछ लोगों ने उनकी सहजता को उनकी दुर्बलता समझ लिया। यह संसार की पुरानी प्रवृत्ति है। जो व्यक्ति विश्वास करता है, वही सबसे पहले छल का शिकार होता है। कुछ लोगों ने उनके विश्वास का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास किया। उन्हें पीछे धकेलने, उनके कंधों पर चढ़कर स्वयं ऊँचा दिखाई देने की चेष्टा भी हुई। पर उस समय एक अत्यन्त अर्थपूर्ण दृश्य सामने आया।

भोपाल का पूरा साहित्यिक समाज उनके साथ खड़ा हो गया।

यह किसी प्रशासनिक आदेश से संभव नहीं था। यह किसी संगठन की शक्ति भी नहीं थी। यह उन असंख्य संबंधों का प्रतिफल था जिन्हें दादा ने दशकों तक अपने व्यवहार से अर्जित किया था। संकट मनुष्य का सबसे सच्चा परिचय नहीं देता; संकट यह बताता है कि उसने अपने जीवन में कितने हृदयों में स्थान बनाया है।

दादा के पक्ष में खड़े लोग केवल उनका समर्थन नहीं कर रहे थे; वे अपने ही सांस्कृतिक विवेक की रक्षा कर रहे थे।

फिर इस वर्ष भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

समाचार सुनते ही मेरे मन में सबसे पहले यह विचार आया कि यह सम्मान बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। किन्तु पुरस्कारों का भी अपना समय होता है। कभी वे व्यक्ति को सम्मानित करते हैं, कभी वे स्वयं सम्मानित हो जाते हैं। दादा को मिला पद्मश्री केवल एक अलंकरण नहीं था; वह उन असंख्य अनाम साधकों का सम्मान था जो बिना किसी प्रचार के भारतीय भाषाओं, भारतीय संस्कृति और भारतीय स्मृति की रक्षा करते रहते हैं।
मुझे लगा, मानो यह सम्मान हिन्दी का नहीं, हिन्दी के पीछे खड़ी उस समूची भारतीय आत्मा का सम्मान है जिसे दादा अपने जीवन में इतने सहज ढंग से जीते थे।

और आज, जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब यह पद्मश्री उनके वक्ष पर सजा हुआ कोई पदक भर नहीं लगता; वह उनके जीवन का एक प्रतीक बन गया है। उसने मानो राष्ट्र की ओर से यह स्वीकार किया है कि ऐसे लोग केवल अपने परिवार या अपने नगर की धरोहर नहीं होते; वे पूरे देश की सांस्कृतिक पूँजी होते हैं।
दादा का स्मरण करते हुए बार-बार एक ही उपमा मन में आती है।

हिमालय की ऊँचाइयों पर अनेक दीपक नहीं जलते। वहाँ एक छोटा-सा दीप भी बहुत दूर तक दिखाई देता है, क्योंकि उसके चारों ओर अँधेरा अधिक होता है।

दादा भी ऐसे ही दीप थे।
वे शोर नहीं करते थे।
वे बस जलते रहते थे।

और शायद इसी कारण, आज उनके न रहने पर, हमें पहली बार उस प्रकाश की वास्तविक ऊँचाई का अनुमान हो रहा है।

भारतीय परम्परा में मृत्यु को कभी केवल अन्त नहीं माना गया। हमारे यहाँ कहा गया—”न जायते म्रियते वा कदाचित्।” इसका अर्थ केवल आत्मा की अमरता का दार्शनिक प्रतिपादन नहीं है। इसका एक सांस्कृतिक अर्थ भी है। जो मनुष्य अपने जीवन को केवल अपने लिए नहीं जीता, वह अपनी मृत्यु के बाद भी अपने कर्मों, अपने संस्कारों और अपनी स्मृतियों के रूप में जीवित रहता है। उसका शरीर चला जाता है, पर उसका प्रभाव समय की नसों में बहता रहता है।

दादा कैलाशचंद्र पंत को स्मरण करते हुए यह सत्य बार-बार अनुभव होता है।

आज यदि मैं अपने जीवन की ओर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो उसमें अनेक नगर दिखाई देते हैं, अनेक दायित्व दिखाई देते हैं, अनेक पद, अनेक यात्राएँ, अनेक पुस्तकें, अनेक लोग। किन्तु उन सबके बीच कुछ ऐसे स्थिर बिन्दु हैं जिन्होंने इन सब अनुभवों को अर्थ दिया। हिन्दी भवन ऐसा ही एक बिन्दु है। और हिन्दी भवन की स्मृति में सबसे पहले जो चेहरा उभरता है, वह दादा का है।

यह भी जीवन का एक अद्भुत संयोग है कि मेरे छात्र जीवन की बौद्धिक यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव भी हिन्दी भवन बना, मेरे साहित्यिक संस्कार का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय भी वहीं लिखा गया, मेरे जीवन-सहचर्य की एक मधुर स्मृति भी उसी भवन से जुड़ी, मेरे गुरु की स्मृतियाँ भी वहीं हैं, और सेवा-निवृत्ति के बाद मेरे सार्वजनिक साहित्यिक जीवन का नया अध्याय भी उसी भवन से प्रारम्भ हुआ। यदि इन सब सूत्रों को जोड़ने वाला कोई एक नाम है, तो वह दादा कैलाशचंद्र पंत का है।

आज लगता है कि वे व्यक्ति कम, एक सेतु अधिक थे।

उन्होंने पीढ़ियों को जोड़ा।उन्होंने पत्रकारिता और साहित्य को जोड़ा।उन्होंने परम्परा और समकालीनता को जोड़ा।उन्होंने वरिष्ठों की गरिमा और युवाओं की आकांक्षा को जोड़ा।उन्होंने हिन्दी के स्वाभिमान और भारतीय भाषाओं के पारस्परिक सम्मान को जोड़ा।
और सबसे बढ़कर, उन्होंने संस्था और आत्मीयता को जोड़ा।

संस्थाएँ प्रायः नियमों से चलती हैं; दादा ने उन्हें संबंधों से चलाया।

मैंने अपने प्रशासनिक जीवन में अनेक संस्थाएँ देखी हैं। अनेक भवन बने, अनेक योजनाएँ प्रारम्भ हुईं, अनेक समितियाँ गठित हुईं। पर वर्षों के अनुभव ने मुझे एक बात सिखाई है—किसी संस्था की वास्तविक शक्ति उसके संविधान में नहीं होती, उसके चरित्र में होती है। भवन बनाना अपेक्षाकृत सरल है; संस्था का चरित्र गढ़ना कठिन है। उसके लिए ईंट, सीमेंट और धन नहीं, मनुष्य चाहिए। ऐसे मनुष्य, जिनका अपना व्यक्तित्व संस्था के व्यक्तित्व में विलीन हो जाए।

दादा ने यही किया।

उन्होंने हिन्दी भवन को अपने नाम से बड़ा बनाया।

आज यह बात और स्पष्ट दिखाई देती है। जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब हिन्दी भवन का प्रत्येक कोना उनके श्रम की मौन गवाही देता है। सभागार में होने वाला प्रत्येक व्याख्यान, अक्षरा का प्रत्येक अंक, पुस्तकालय की प्रत्येक अलमारी, उन सीढ़ियों से ऊपर चढ़ता प्रत्येक विद्यार्थी—सब जैसे अनकहे शब्दों में उनकी उपस्थिति का प्रमाण देते हैं।

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि मनुष्य अपने पीछे वास्तव में क्या छोड़कर जाता है?
धन?
वह उत्तराधिकारियों में बँट जाता है।
पद?
वह अगले व्यक्ति को मिल जाता है।
यश?
वह समय के साथ धुँधला भी पड़ सकता है।
किन्तु संस्कार?
वे एक बार यदि मनुष्यों के भीतर उतर जाएँ, तो पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।

दादा ने यही सबसे बड़ी विरासत छोड़ी है।
उन्होंने सिखाया कि भाषा की सेवा करना केवल लेख लिखना नहीं है; भाषा के लिए वातावरण बनाना भी है।

उन्होंने सिखाया कि संस्था का संचालन केवल कार्यक्रमों का आयोजन नहीं है; मनुष्यों के भीतर विश्वास जगाना भी है।

उन्होंने सिखाया कि भारतीयता का अर्थ किसी के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, सबको साथ लेकर चलना है।

उन्होंने सिखाया कि विनम्रता पद का अलंकार नहीं, व्यक्तित्व का स्वभाव होती है।

और उन्होंने यह भी सिखाया कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि लोग आपके सामने खड़े हों; सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आपके जाने के बाद भी लोग आपके मूल्यों के साथ खड़े रहें।

उनके जीवन की एक और बात मुझे बार-बार स्मरण आती है।

वे कभी जल्दी में नहीं दिखे।

आज का समय अधैर्य का समय है। हर व्यक्ति तत्काल परिणाम चाहता है। हर संस्था तत्काल प्रसिद्धि चाहती है। हर लेखक तत्काल प्रतिष्ठा चाहता है। दादा ने इसके विपरीत हमें धैर्य का मूल्य सिखाया। उन्होंने दशकों तक बिना किसी प्रचार की आकांक्षा के काम किया। जैसे कोई माली प्रतिदिन पौधों को पानी देता है, बिना इस चिंता के कि लोग उसके श्रम की चर्चा करेंगे या नहीं। वह जानता है कि वृक्ष उसके श्रेय से नहीं, उसके श्रम से बड़े होंगे।
दादा हिन्दी भवन के ऐसे ही माली थे।

उन्होंने वृक्ष लगाए भी, सींचे भी, और उनकी छाया में स्वयं सबसे पीछे बैठ गए।

आज जब वे नहीं हैं, तब उनकी लगाई हुई छाया में बैठने वाले लोगों को शायद पहली बार उस माली की याद अधिक आएगी।
कुछ महीने पहले जब उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया, तब मन में संतोष हुआ था कि राष्ट्र ने अपने एक निस्पृह साधक को पहचान लिया। पर आज लगता है कि उस सम्मान का वास्तविक अर्थ अब जाकर समझ में आ रहा है। वह अलंकरण उनके जीवन का अंत नहीं था; वह उस साधना की सार्वजनिक स्वीकृति थी जो उन्होंने दशकों तक बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के की।

मुझे उस अंतिम भेंट की स्मृति बार-बार लौटकर आती है।
उनकी थकी हुई वाणी।
उनकी डगमगाती एकाग्रता।
और उनके कानों में धीरे-धीरे गूँजती हनुमान चालीसा।

उस समय मैं केवल एक प्रार्थना कर रहा था।
आज लगता है कि वह प्रार्थना केवल उनके लिए नहीं थी; वह अपने लिए भी थी।

क्योंकि हम सबके जीवन में कभी-न-कभी ऐसी घड़ी आएगी जब हमारे शब्द हमारा साथ छोड़ देंगे। तब हमारे साथ केवल वही रहेगा जिसे हमने जीवन भर अपने भीतर संस्कार की तरह संजोया होगा।

दादा ने अपने भीतर शब्दों से भी अधिक गहरे संस्कार संजोए थे।

इसलिए मुझे विश्वास है कि उनकी अंतिम यात्रा भी उन्हीं संस्कारों के आलोक में सम्पन्न हुई होगी।

अब जब कभी मैं हिन्दी भवन जाऊँगा, तो सहज ही दृष्टि उन्हें खोजेगी।

वे अपनी परिचित कुर्सी पर नहीं मिलेंगे।
वे किसी व्याख्यान के पहले विषयों पर चर्चा करते हुए नहीं मिलेंगे।

शायद किसी पुस्तक पर झुके हुए नहीं मिलेंगे।
शायद मुस्कराकर यह कहते हुए भी नहीं मिलेंगे—”बैठिए, आप चाय तो लेते नहीं। कुछ और बुलवाता हूँ।

किन्तु तब मैं स्वयं को स्मरण कराऊँगा कि कुछ लोग कुर्सियों पर नहीं रहते; वे वातावरण में रहते हैं।

वे कमरों में नहीं, संस्कृति में रहते हैं।

वे दीवारों पर टंगी तस्वीरों में नहीं, संस्थाओं के चरित्र में रहते हैं।

वे पुस्तकों के आवरण पर नहीं, उनके भीतर प्रवाहित विचारों में रहते हैं।

किन्तु यदि आने वाले वर्षों में हिन्दी भवन अपने भीतर वही आत्मीयता बचाए रख सका, यदि अक्षरा अपने बौद्धिक स्वाभिमान और सांस्कृतिक संवेदना को बनाए रख सकी, यदि वहाँ आने वाला कोई युवा यह अनुभव कर सका कि यह भवन केवल पुस्तकों का नहीं, मनुष्यों का भी घर है—तो समझना चाहिए कि दादा कहीं गए नहीं हैं।

कि उनका प्रकाश अब एक दीपक में सीमित नहीं रहा।
वह अनेक दीपों में विभाजित होकर फैल गया है।
और शायद यही दादा की सबसे बड़ी विजय हो।

दीपक का उद्देश्य स्वयं जलना नहीं होता।
उसका उद्देश्य अगला दीप जलाना होता है।
दादा कैलाशचंद्र पंत ने अपने जीवन में न जाने कितने दीप जलाए।

आज वे स्वयं दृष्टि से ओझल हो गए हैं।

किन्तु जिन-जिन दीपों में उनकी लौ पहुँची है, वे सब मिलकर उनके जीवन का ऐसा आलोक रचेंगे जिसे समय की कोई हवा बुझा नहीं सकेगी।

इसलिए मैं उन्हें विदा नहीं कह सकता।

सॉरी दादा, यह मुझसे नहीं हो सकेगा।

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