दिन विशेष (युवा लेखन) में उत्सव त्रिपाठी की ग़ज़ल

नाम – उत्सव मणि त्रिपाठी
पता – ग्राम बरपार, देवरिया
शोधार्थी – शांतिनिकेतन, बंगाल

१. ग़ज़ल

जाने कैसे डोल रही हैं ,दोनों अँखियाँ बोल रही हैं।
राग रंग से रची गदोरिया किससे रिश्ता जोड़ रही है ?

सारे जीवन सार तुम ही थे, इन नयनों के प्राण तुम ही थे ।
छन-छन रूठ-रूठ कर बजते,मन वीणा के तार तुम ही थे
पाँव महावर रचि गुजरिया कौन डगरिया खोज रही है ?
जाने कैसे डोल रही हैं, दोनों अँखियाँ बोल रही हैं। १

गांव सिरहाने शिव मंदिर के, जहाँ किनारे पीपल डोले।
जहाँ बांध रखे थे हमने, शंकाओं के सभी पुजौरे ।
जाने उसकी आँख कजरिया कौन नजरिया खोज रही है?
जाने कैसे डोल रही हैं दोनों अँखियाँ बोल रही हैं। २

जहाँ-जहाँ पर दीप रखे थे,वहाँ वहाँ पर ज्योति नहीं है।
जब से गई छोड़ कर दी डिहवा, देव पुजैया हुई नहीं है।
खन-खन करती चूड़ियाँ तोरी कौन सांवरिया खोज रही है

जाने कैसे डोल रही हैं दोनों अँखियाँ बोल रही हैं। ३

२. ग़ज़ल

उसको बस आवाज़ लगाना होता है,
मुझको तो कितनी दूर से आना होता है।

तुम क्या जानो कैसे ख़ल्वत होती है,
उसको बस पायल छनकाना होता है।

बन दुल्हन-सी याद तुम्हारी आती है,
घंटो फ़िर दिल को समझाना होता है।

इस घर में बस एक उदासी रहती है,
जिससे ख़ुद को रोज़ मिलाना होता है।

बरसो पहले नेह गीत गाया था हमने,
अब तो दु:ख बीन बजाना होता है।

३. ग़ज़ल

गंगातट पर शशि-रजनी में
तिरते थे पहले ध्रुव तारे
गोरे पाॅंव महावर वाले।
उतरी नभ से क्षणदा क्षण-क्षण
हुए प्रणय के भाव प्रखरतर
पाॅंवो की गति मन्द-मन्द सी
उदित हुए नवनीत छंद सी
उसके स्वर के मृदु घातों से
वैदिक-साम-संहिता हारे
अर्धरात्रि में घेर-घेर कर
शशि करता है प्रश्न तुम्हारे ?
गोरे पाॅंव महावर वाले।

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