दिन विशेष नवोदित रचनाकार में प्रीति साहू की कविताएँ

नाम – प्रीति साहू
निवासी-लालमाटी जबलपुर (म. प्र.)
शोधार्थी – रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर

आजाद हैं हम

आजाद हैं हम, आजाद हैं हम, कह-कहकर तुम इतराते हो,
क्या कीमत थी इस आज़ादी की, कभी यह सोच भी पाते हो?

खाते हो, पहनते हो, रहते हो, चाहे जहाँ नज़र तुम आते हो,
अभिमान से तुम इस आज़ादी का पूरा लुत्फ़ उठाते हो।

मैं यह नहीं कहती, गर्व न करो, मौज मनाओ—आज़ाद हैं हम,
पर याद रखो उस कीमत को, जिस पर आज़ादी हमने पाई है।

महसूस करो इतिहास के उन पन्नों को,
जिनमें आज़ादी ने बलिदानों को माँगा था।

सोचो, जो भगत सिंह ने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा झूला था,
उस उम्मीद भरी हँसती आँखों का क्या मोल तुम चुका पाओगे?

जब चंद्रशेखर ने खाई थी कसम—
“ज़िंदा अंग्रेज़ों के हाथ नहीं आएँगे,”
मारी खुद को गोली, दिया बलिदान—
क्या तुम इसे याद रख पाओगे?

थी वह रानी लक्ष्मीबाई, जिसने अंग्रेज़ों को भी झुकाया था,
युद्ध लड़ी थी मर्दानी और वीरगति को पाया था।

हज़ारों वीरों ने दिया था अपने प्राणों का बलिदान,
बताओ ज़रा, क्या रख पाओगे उनके खून के एक कतरे का भी मान?

क्या भूल गए हो उस कीमत को, जिस पर आज़ादी तुमने पाई है?
जिन्होंने तुम्हारे पूर्वजों की आत्मा उनके तन से भगाई है,
करते हो तुम उनकी सराहना—क्या लाज ज़रा तुम्हें आई है?

देख लें तुम्हें आज अगर वे, तो उनकी आँखों में आँसू होंगे,
क्या इसीलिए दिया था बलिदान, जो तुमने देश की गति बनाई है?

वास्तविक आज़ादी तुम शायद उस दिन पा जाओगे,
जब रखोगे मान अपनों के बलिदानों का
और परतंत्रता को कभी भूल नहीं पाओगे।

सिसकियाँ

(जब हम समझेंगे……..)

याद करो उन पलों को, जब
माता-पिता कुछ समझाते हैं,
खून खौलता है जो हमारा,
हम गुस्से में आ जाते हैं।

कहते हैं—“मैं बड़ा हो गया,
फिर क्यों मुझ पर हुक्म चलाते हो?”
जिन्होंने हमको जन्म दिया है,
क्यों उनकी बात समझ नहीं पाते हो?

रौब दिखाते हैं हम उन पर,
शान इसी में हमें आती है,
और कुछ नहीं तो जाने-अनजाने,
हमसे कटु बातें कहलाती हैं।

रो पड़ती है माँ तब अक्सर,
पिता भी मन ही मन शर्मिंदा हो जाते हैं,
हम तो रूठे रहते हैं उनसे,
पर वे फिर भी हमें मनाते हैं।

माँ कहती है—“कुछ खा ले बेटा,”
पापा हर ज़रूरत पूरी कर जाते हैं,
हम चाहे कितना भी रूठें उनसे,
वे फिर भी प्यार लुटाते जाते हैं।

क्या याद हैं वे बचपन के पल,
जब हमने गिर-गिरकर चलना सीखा था?
थामी थी हमने उनकी ही उँगली,
जिससे आज उन्हीं पर उँगली उठाते हैं।

जिन हाथों ने हमें सँभाला था,
जब हम चलना भी नहीं जानते थे,
जिन आँचल में छिपकर रोए थे,
जब दुनिया को हम नहीं पहचानते थे।

वही माँ आज भी दुआएँ देती है,
वही पिता आज भी सहारा बन जाते हैं,
हम उनकी भावनाएँ ठुकरा देते हैं,
फिर भी वे हमें अपनाते हैं।

वे तो कर देते हैं माफ़ हमें,
इसीलिए तो माता-पिता कहलाते हैं,
हम उनकी ममता समझ नहीं पाते,
और वे हर दर्द अपने भीतर छिपाते हैं।

सोचा है कभी हमने—
जब हम भी इस दर्जे पर आएँगे,
क्या अपने आज के व्यवहार को याद कर,
तब खुद से नज़रें मिला पाएँगे?

शायद उस दिन बहुत देर हो जाएगी,
शायद आँखें भी भर आएँगी,
आज जो बातें हम हँसकर कहते हैं,
कल वही हमें भीतर से रुलाएँगी।

तब माँ की हर सिसकी सुनाई देगी,
पिता की हर खामोशी सताएगी,
आज जिन्हें हम समझ नहीं पाए,
कल उनकी कमी बहुत रुलाएगी।

इसलिए जब तक वे साथ हैं,
उनकी कद्र करना सीखो,
माँ की ममता और पिता के त्याग को
दिल से समझना सीखो।

क्योंकि लौटकर कभी नहीं आते
बचपन के वे दिन और वे साए,
और जब माता-पिता दूर हो जाते हैं,
तब इंसान बस यादों में सिसकता रह जाता है।

जीवन की प्याली

जीवन ने जब प्याला थामा,
मैंने हँसकर घूँट लिया,
कड़वे पल जो हिस्से आए,
उनको भी अमृत समझ लिया।

राह कठिन थी, धूप कड़ी थी,
फिर भी कदम रुके नहीं,
जिन सपनों ने साथ निभाया,
वे आँखों से झुके नहीं।

कुछ अपने थे, कुछ बेगाने,
कुछ रिश्ते अनजाने थे,
जो कल तक अपने लगते थे,
आज वही अफ़साने थे।

समय कभी मधुमास बना तो,
कभी बना अंगार,
फिर भी मैंने सीख लिया है—
जीवन से करना प्यार।

आँसू आए तो बहने दिए,
हँसी मिली तो हँस ली मैं,
टूटी जब भी कोई आशा,
नई सुबह फिर चुन ली मैंने।

मंज़िल चाहे दूर खड़ी हो,
राहों से क्या डरना है,
गिरकर फिर से उठ जाना ही
जीवन का आभूषण है।

जो खोया, उसका शोक नहीं अब,
जो पाया, उसका मान,
हर अनुभव ने मुझे बनाया,
हर ठोकर ने दी पहचान।

कल की चिंता क्यों करूँ मैं,
कल तो हैं अभी अनजान,
आज मिला जो जीवन मुझको,
आज ही वो मेरा जहान।

मन में दीप जलाए रखना,
चाहे रात घनी हो,
अपने भीतर प्रेम बचाना,
चाहे दुनिया कैसी भी हो।

प्याला मेरा, राह मेरी है,
अपना ही आकाश,
जीवन चाहे जैसा दे दे,
मैं रखूँगी विश्वास।

कड़वाहट को गीत बनाऊँ,
दर्दों को मुस्कान,
अपने हिस्से की दुनिया में
बाँटूँ प्रेम महान।

जब अंतिम साँसें आएँगी,
तब इतना संतोष रहे—
मैंने जीवन जिया नहीं केवल,
जीवन को भी जीने दिया रहे।

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