दिन विशेष (युवा लेखन) में यासिन रशीद पठान की लघुकहानी “वो दो जोड़ी आँखें”

(यासिन रशीद पठान, महाराष्ट्र)

सावन अपने पूरे शबाब में था। आसमान घने बादलों से ढका था और बारिश कभी धीमी फुहार बनकर बरसती, तो कभी अचानक तेज़ हो जाती। स्टेशन की छत पर गिरती बूंदों का शोर, चायवालों की आवाज़ें, यात्रियों की भागदौड़ और ट्रेनों के आने-जाने की हलचल, सब मिलकर एक अलग ही माहौल बना रहे थे।

हर कोई अपने-अपने सफ़र में व्यस्त था। कोई घर लौटने की जल्दी में था, कोई किसी के आने का इंतज़ार कर रहा था। और इन्हीं सबके बीच वह लड़का चुपचाप खड़ा होकर यह सब देख रहा था।

कुछ देर बाद वह टिकट निकालने वाली मशीन के पास पहुँचा। बाहर बारिश अब और तेज़ हो चुकी थी। उसने टिकट निकाला ही था कि तभी एक लड़की बारिश से बचती हुई वहाँ आकर रुकी।

उसके काले काले बाल बारिश से भीगे हुए थे। कुछ लटें उसके माथे से चिपकी थीं और चेहरे पर ठहरी बूंदें उसे और भी अलग बना रही थीं। वह शायद जल्दबाज़ी में आयी थी, इसलिए उसकी साँसों में हल्की सी बेचैनी थी।

लड़के की नज़र अनायास उस पर ठहर गई।
और तभी लड़की ने भी उसकी ओर देखा।
दोनों की नज़रें मिलीं।
बस कुछ पल के लिए मानो वह दो जोड़ी आँखे किसी सपनों की दुनिया में खो गयी।
लड़के ने झेंपकर नज़रें हटा लीं।
कुछ क्षण बाद उसने फिर देखा, इस बार लड़की पहले से ही उसे देख रही थी।
दोनों ने तुरंत नज़रें फेर लीं।
बात कोई नहीं कर रहा था, मगर उन दो जोड़ी आँखो ने एक दूसरे के प्रति बहुत कुछ सोच लिया था।
इसी बीच ट्रेन की अनाउंसमेंट की बेवज़ह सी आवाज उन दोनों की सपनों की दुनिया को भंग कर देती है।
और फिर वो दोनों अपने-अपने गंतव्य की ओर निकल पड़ते हैं।
शायद… वो दो जोड़ी आँखे कुछ देर और बिन कहे बहुत कुछ कहना चाहती थी।
शायद… वो दो जोड़ी आँखे फिर कभी न मिलने के लिए एक दूसरे से दूर हो रही थी।
शायद… जीवन भी इसी ठहराव से गुजरने का नाम है।

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