“संपर्क भाषा से राजभाषा की यात्रा” : विजय नगरकर

यही भारत में हिंदी की पूरी कहानी है।
हिंदी राजभाषा है, राष्ट्रभाषा नहीं, मातृभाषा भी नहीं
संविधान में कहीं भी किसी भाषा को ‘राष्ट्रभाषा’ घोषित नहीं किया गया है।
अनुच्छेद 343(1) में कहा गया है कि हिंदी संघ की राजभाषा होगी और उसकी लिपि देवनागरी होगी।
और उसका स्वरूप कैसा होगा, यह अनुच्छेद 351 बताता है:
संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।
ध्यान दीजिए, यहाँ दो बातें बहुत साफ हैं:
हिंदी को बनाना है — प्रसार और विकास करना है।
वह विकास किसी एक स्रोत से नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी, आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं और मुख्यतः संस्कृत से होगा।
इसीलिए संविधान निर्माताओं ने उसे ‘मातृभाषा’ नहीं, ‘राजभाषा’ कहा।
संपर्क भाषा से राजभाषा तक
आजादी से पहले पूरे उत्तर-मध्य भारत के बाजार, रेल, फौज और तीर्थयात्रा में जो बोली समझी जाती थी, वह हिंदुस्तानी थी — न संस्कृतनिष्ठ हिंदी, न फारसीनिष्ठ उर्दू।
संविधान सभा में इसी को लेकर लंबा विवाद हुआ। अंत में मुंशी-आयंगर फॉर्मूले से तय हुआ कि अंग्रेजी को तुरंत हटाना व्यावहारिक नहीं, इसलिए हिंदी को संघ के कामकाज की राजभाषा माना जाए, और उसे धीरे-धीरे इस लायक बनाया जाए कि वह सच में सबको जोड़ सके।
अर्थात हिंदी को ऊपर से थोपा नहीं, नीचे से विकसित करने का निर्देश दिया गया।
‘ हिंदी किसी प्रदेश या व्यक्ति की मातृभाषा नहीं ’
भाषा विज्ञान की दृष्टि से कथन बिलकुल सटीक है।
जिसे हम जनगणना में ‘हिंदी’ कहते हैं, वह वास्तव में एक भाषा-समूह है। किसी बच्चे की घर में बोली जाने वाली पहली भाषा ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी होती है। खड़ी बोली पर आधारित मानक हिंदी किसी भी प्रदेश की स्वाभाविक घरेलू बोली नहीं थी, वह बाद में शिक्षा, पत्रकारिता, आकाशवाणी और प्रशासन के माध्यम से बनी संपर्क भाषा है।
इसीलिए जनगणना में 40% से अधिक लोग अपनी मातृभाषा ‘हिंदी’ लिखते हैं, पर उनके घर की बोली कोई आंचलिक भाषा ही होती है।
संविधान का अनुच्छेद 351 इसी सच्चाई को पहचानता है — तभी वह कहता है कि हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदों को आत्मसात करना होगा।
इस अर्थ में हिंदी किसी एक की नहीं, सबकी साझा संपत्ति के रूप में कल्पित की गई है।
अनुच्छेद 351 में यही शब्द हैं कि हिंदी को
उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए… उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।
यह एक आदेश नहीं, एक संस्कार है।
नूतन संविधान ने हिंदी को क्या दिया?
1950 से पहले हिंदी मुख्यतः साहित्य और संपर्क की भाषा थी। संविधान ने उसे दो चीज़ें दीं —
- मर्यादा: अनुच्छेद 343 में राजभाषा का दर्जा, पर राष्ट्रभाषा का अहंकार नहीं।
- दिशा: अनुच्छेद 351 में कहा कि तुम्हें भारत की सामासिक संस्कृति का माध्यम बनना है, तो तुम्हें सबका बनना पड़ेगा। शब्दकोश मुख्यतः संस्कृत से, पर गौणतः अन्य भाषाओं से भी लेना होगा।
इसलिए हिंदी ने किसी को हटाया नहीं, सबको जोड़ा।
अभिजात भाषाओं के साथ सद्भाव
आज भारत में 11 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा माना गया है। 2004 से 2014 के बीच तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया को यह मान्यता मिली थी, और 3 अक्टूबर 2024 को मंत्रिमंडल ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को भी इस श्रेणी में जोड़ दिया, जिससे संख्या 11 हो गई।
वर्तमान में ये ग्यारह भाषाएँ हैं: तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, ओडिया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली।
हिंदी स्वयं इस सूची में नहीं है, पर उसका पूरा विकास इन्हीं से हुआ है—
तमिल और मलयालम से सांस्कृतिक बिंब,
बंगाली और मराठी से आधुनिक गद्य की लय,
संस्कृत, पाली, प्राकृत से शब्द-भंडार,
और दक्खिनी हिंदी, दफ्तरी उर्दू, बाजार की हिंदुस्तानी से उसकी सहजता।
यही कारण है कि हिंदी फिल्म, रेल, प्रवास और व्यापार में बहुप्रचलित हुई, कानून की लाठी से नहीं, लोगों की स्वीकृति से।
बहुप्रचलित होने का अर्थ क्या है?
संविधान ने राजभाषा अधिनियम 1963 और त्रिभाषा सूत्र के द्वारा यह सुनिश्चित किया कि हिंदी केंद्र के काम की भाषा रहे, पर किसी राज्य की शिक्षा या प्रशासन की भाषा पर थोपी न जाए।
न किसी का ह्रास हुआ, न किसी का अतिक्रमण। यही वह सद्भाव है।
संविधान-प्रदत्त हिंदी ने प्रतिस्पर्धा नहीं, सह-अस्तित्व का मार्ग चुना, और इसीलिए वह बहुप्रचलित बन सकी।
